बुधवार, 9 जुलाई 2014

द्विरागमन .... (2)




मुझे लगता था कहीं भीतर से आती उसकी आवाज - तुम सब कुत्ते ही होते हो , सब एक जैसे।  गोश्त चूस लेने के बाद हड्डियां चुभलते रहने वाले कुत्ते , तुम्हारी भौंक बस हड्डी मुंह में रहने तक ही बंद रह सकती है।  
मैं काँप रहा था इस अनकही को सुनते , उसने तो कुछ कहा नहीं था।  कहीं मेरे मन की ही बात तो मेरे कानों में नहीं उड़ेली जा रही थी उसके अनकहे शब्दों में।  अपने आप को हमसे बेहतर और कौन जान सकता था! 
अपनी बेरहमी और बेशर्मी से घबराया मैं उसी बाग़ के दूसरे कोने पर लगे फूलों और बच्चों को देख मुस्कुराता , अपने भीतर के पशु को छिपाते सांत्वना देता मनुष्य को ! (द्विरागमन -1)
अब इससे आगे --

उस दिन जब वह लॉन की दूब को दांतों से कुरेदती ही तो मिली थी मुझे यहाँ , अपनी व्यग्रता को ही कुरेदती थी जैसे।  बाद के दिनों में मुझे बताया उसने।  मध्य आयु के स्त्री पुरुषों में जैसे परिवर्तन होते हैं  वैसी ही बेचैनियां लिए बढ़ती उम्र ...रिश्तों का ठहरापन ...मुट्ठी से फिसली उम्र के बीच कुछ भी अपने मन का न पा सकने की निराशा .,जाने क्या -क्या !

उस दिन फिर जल्दी -जल्दी करते भी तवे पर पराठे जल गए थे और उसका पति गुस्से में खाना खाए बिना ऑफिस निकल गया था ...नल से  पानी भांडे भरे बिना ही जा चुका  था ...बच्चों की डायरी में क्लास में पिछड़ते जाने का नोट !
वह देखती थी आस- पास स्त्रियों को सुबह जल्दी उठकर झाड़ू बुहारू लगाते , पूजा -पाठ करते , खाना बनाते ,  बच्चों को तैयार करते ख़ुशी -ख़ुशी और सबसे फारिग होकर कभी बाजार तो कभी पास पड़ोस में गप्प गोष्ठियां करते।  बड़ी ख़ुशी से अपनी गोपनीय बातें उजागर करते जैसे कि  आज धूप  में कुछ कार्य कर रही थी तो लाड़ में भरा पति दूध में ढेर सारे ड्राई ट्स घोल लाया उसके लिए ... कोई पिछली रात की बात खुसर फुसर में इस तरह करते कि  दूसरी महिलाएं झट कान लगा कर पूछ ले दुबारा।  कोई पति की शिकायत इस तरह करती मिल जाती जैसे कि  प्रशंसा कर रही हो ... हमारे ये तो कुछ काम ही नहीं  कराते घर का या की इन्हे तो कुछ पता ही नहीं रसोई  में कौन सी चीज कहाँ रखी  है ...कोई बताती छिपा  कर रखे गए पैसों से सोने के गहने / खरीददारी जिससे वह अपने उनको  चौंका देगी। सास की पदवी पा चुकी कुछ स्त्रियां अपने दुःख का पुलिंदा खोले बैठी होती।  उसका कभी इस गपगोष्ठी  में शामिल होना होता तो  चुपचाप बस सुन लेती क्योंकि उसके पास  या तो ऐसा कुछ सुनाने को होता नहीं  या फिर रिश्तों की गोपनीयता उजागर करना उसे अच्छा लगता भी नहीं। मंगोड़ियां , पापड़ बनाती हुई स्त्रियां , तो कभी लहंगा , ब्लाउज सिलती ये स्त्रियां खुश लगती थी अपनी जिंदगी से,  बहुत खुश !

किसने कौन सी किताब पढ़ी ...कौन सी फिल्म देखी... नया क्या सीखा सुन लेने को ही तरसती ! ऐसा नहीं था कि उन गोष्ठियों में स्त्रियां  पढ़ी लिखी नहीं थी।  अधिकांश संतोषजनक डिग्रियां प्राप्त थी , कुछेक कामकाजी भी मगर उनकी बातचीत का दायरा वहीँ तक सिमित था।  जल्दी ही वह ऊब जाती , अलबत्ता उसके पास समय भी नहीं होता था अधिक देर इनका हिस्सा बनने का ....

आम स्त्रियों से भिन्न शौक/मिजाज  रखने वाली निम्न अथवा उच्च  मध्यमवर्गीय स्त्रियों के मन का एक कोना किस तरह सूखा  अनछुआ सा रहता है .उससे नहीं मिलता तो शायद कभी जान भी नहीं पाता।  उसकी बातों ने , उसके चुप रह जाने ने , उसके चिल्ला पड़ने में , उसके हंसने ने , उसके मुस्कुराने ने मुझे बताया , समझाया। बस उसके आंसूं नहीं देखे मैंने . भरा गला और चेहरे की मुस्कराहट के साथ कुछ नमी जरूर थी कोरों पर मगर उसे आंसू नहीं कहा जा सकता था।

उसका नाम क्या था , क्या फर्क पड़ता है , भीड़ में शामिल भीड़ से अलग दिखने वाली कोई भी स्त्री हो सकती है वह. मध्यवय की मध्यमवर्गीय स्त्री जो अपने नाम का अपने होने का अर्थ ढूंढ रही हो वही स्त्री हो सकती है , हो सकती थी।

उस दिन जब मैं पहली बार उससे मिला था उस पार्क की बेंच पर बैठा उसे देखता दूर तक फ़ैली दूब  से तिनका तोड़ दांत में फंसाते जैसे कि  जिंदगी की तमाम नीरसता , व्यग्रता , बेचैनियों को खुरचती हो जैसे !

उस दिन बस मुस्कुराकर नमस्कार को नाराजगी से अनदेखा करने वाली स्त्री कभी इतनी घुली मिली होगी मुझसे कि  मैं उसके वय और परिवेश की स्त्रियों की मानसिक स्थिति का अंदाजा भी लगा सकूंगा  सोचा नहीं था मैंने।
उस दिन उसकी नाराजगी पर  मुस्कुराते हुए मैंने कहा था ,
शुक्र है आप बोली तो …
मैं अजनबियों से बात नहीं करती! त्योरियां अभी चढ़ी ही हुई थी।
मगर हम अजनबी नहीं है , कितने समय से तो एक दूसरे को देख  रहे हैं यहाँ !
क्या मतलब , मैं यहाँ किसी को देखने -दिखने नहीं आती।
जी , आप तो यहाँ लॉन की दूब  कुतरने आती हैं। मैंने लॉन के एक हिस्से से उखड़ी हुई दूब  की ओर इशारा किया।
इस बार वह कुछ झेंपी सी थोड़ी अधिक ही  मुस्कुराई।  पहली बार उसके चेहरे की ओर ध्यान से देखा मैंने , गेंहुए रंग पर कुछ गोल सा चेहरा, घनी पलकों वाली सम्मोहित करती सी बड़ी काली आँखें , मुस्कुराते गालों पर पड़े हुए भंवर... एक सामान्य चेहरे मोहरे से कुछ अधिक आकर्षक . बहुत  खूबसूरत  नहीं कहूँगा क्योंकि अपने इस जीवन काल में बहुत खूबसूरत लड़कियां देखी मैंने , लम्बे अंडाकार चेहरे वाली दूध सी गोरी लड़कियां , संतरी फांकों से गुलाबी होठों वाली पहाड़ी लड़कियां तो  लम्बी पतली तरासी हुई अँगुलियों से गालों पर उतर आई लटें संवारती सैंडिलों को खटखटाती आधुनिकाएं भी। वह इतनी खूबसूरत नहीं थी ! मगर उसकी छोटे बच्चों जैसी भोली कोमल मुस्कराहट बहुत प्यारी थी।   बेध्यानी में मैं एक बारगी उस  मुस्कराहट में अटक सा गया , मगर जब उसने भोंहे तरेर कर आँखें सिकोड़ी तब अपनी बेहूदगी पर लज्जित होता दूसरी ओर देखने लगा।

उस दिन बातचीत का  वह सिरा पकड़ने के बाद हम अब तक बातों के पालने बुनने लगे थे। अपनी शिक्षा , बच्चों की बातें , शरारतें , अपने शौक , राजनीति , खेल , फ़िल्में जाने कितनी दुनिया जहां की बातें करते हम।  कई बार मैं खुल कर हँसता उसकी बेवकूफियों भरी बातों पर , कभी चिढ़ता भी तो कभी सरल सहज सी बातों में उसकी दार्शनिकता ढूंढ लेने पर  अचंभित भी होता।  सामान्य से  दिखने वाले लोग सामान्य से अधिक ही चौंकाते हैं कई बार।  हालाँकि आम स्त्रियों की तरह ही उसे गुलाबी रंग बहुत पसंद था , गीत- संगीत भी ,  फूलों और बच्चों से भी उसका प्यार वैसा ही था जैसा की  स्त्रियों को होता है, मगर कहीं कुछ अलग था, अलग लगता था, बस बता नहीं सकता क्या। .... यही कहूँगा पता नहीं !

तो  आज जब मैंने कहा कि  हम सब कुत्ते हैं ! तब भी वह मुस्कुराई मगर मैं जान गया था कि उसने क्या कहा था।

तुम लड़कियां अजीब होती हो , सोचती कुछ हो , कहती कुछ हो और करती कुछ उससे अलग ही हो !

खुद का पता है ! तुम सब एक जैसे होते हो तुम्हारा शब्द इस्तेमाल नहीं करुँगी मगर ! वैसे तुम्हारी जानकारी के लिए मैं बता दूँ कि मैं लड़की नहीं हूँ .अपने पति के दो प्यारे बच्चों की अम्मा हूँ!  अपने मातृत्व के गर्व से गर्दन टेढ़ी कर वह इतरा- सी जाती।
क्यों ! क्या अम्माएं लड़कियां नहीं होती ! सीधे अम्मा ही जन्म लेती हैं !
 तुम्हे कैसे पता यह सब  , तुम्हारी तो शादी नहीं हुई न ! वह तीखी नजर से देखती!
पता चल जाता है ! मैं चिढ़ाता उसे !
कैसे पता चल जाता है , बताओं न … उसे अपने शब्दों  के द्विअर्थी होने का भान ही नहीं होता   मगर जब मैं शरारत से मुस्कुराता तो खिसिया सी जाती … तुमसे तो बात करना ही बेकार है , दिमाग में भूसे की तरह बस एक ही चीज भरी होती है।
अच्छा ! कौन सी एक चीज !
वह  इस तरह दांत पीसती मानो कच्चा ही चबा जाएगी।

सब जानता था मैं उसके बारे में ! उसका छोटा सा घर ... प्यार करने वाला पति ...स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे मगर अपने बारे में कभी कुछ कहा नहीं मैंने।
एक दिन जिद पर अड़ ही गयी ...
तुम बहुत आत्मकेंद्रित हो . कभी अपने परिवार और बच्चों के बारे में बात ही नहीं करते।
मैं क्या कहता … कई बार पूछने पर एक दिन झूठ बोल दिया मैंने।  मेरी शादी नहीं हुई अब तक !
उसे हैरानी जरूर हुई थी मगर वह इसे  सच मान बैठी थी।

क्यों नहीं की शादी अब तक तुमने ! किसी ने  धोखा दिया क्या !
क्या बताता कि  मुझे धोखा किसी और  ने नहीं स्वयं मेरी किस्मत ने दिया था।

क्यों करोगे तुम लोग शादी ! तुम्हारी आवारगी पर बंधन जो लग जाएगा इसलिए ही न .... मगर इस बंधन से तुम लोगो को क्या फर्क पड़ता है . घर में उसे बिठाकर बाहर तुम्हारी मटरगश्तियाँ तो उसी प्रकार चलती हैं . घर  में तुम लोगों को सती सावित्री , शांतचित्त , सुघड़ गौ सी स्त्री चाहिए मगर घर से बाहर तुम उनकी तारीफों में मरे जाते हो जो स्मार्ट , तेजतर्रार , महफ़िलों की शान लगती हो।
ओह अच्छा ! तुम्हारा पति भी करता है यही सब !
शटअप  , वो ऐसे नहीं है . बहुत मेहनत करते हैं हमारी छोटी सी गृहस्थी की गाडी खींचने को !
अच्छा , तो तुम कैसे जानती हो पुरुषों के बारे में यह सब ....
लो इसमें जान लेने का क्या है , दिखता  है न हर तरफ !
 मैं गोल घुमाता बात बदल देता , वह कई बार कोशिश तो करती कि मेरे जीवन का कोई सिरा  पकड़ सके। मगर सैनिक जीवन के अभ्यास ने ही शायद इतनी दृढ़ता दी थी कि मैं अपने गम भुलाकर दूसरों को हंसा सकता था।
मैं उसे हँसते देखना  चाहता था हमेशा , क्यों पता नहीं ! और सिर्फ उसे ही नहीं ., मैं सभी को खुश देखना चाहता था हमेशा।  खुशियों की कितनी छोटी सी उम्र देखी थी मैंने ! मैं जानता था उनकी अहमियत और हैरान हुआ करता था जब लोगो को  छोटे मामूली मसलों पर टन भर मुंह लटकाये देखता था।
 उससे भी शायद मेरी इसलिए ही अधिक बनती थी कि  वह मुस्कुरा सकती थी फूलों को खिलते देख , बच्चों की हंसी के साथ खिलखिला सकती थी , कितनी ही बार चहकते देखा मैंने उसे जब वह किसी की छोटी सी भी मदद कर पाती , कभी रसोई में अपने नए प्रयोग पर ही खुश हो लेती।
 एक दो बार ही अनमना सा देखा मैंने उसे - दो छोटे बच्चों को खेलते देख मुग्ध निहारते कुछ उदास सी ! मैंने लक्ष्य किया उसकी उदासी को तो बोल पडी , मुझे बच्चों की याद आ रही है ! हर दिन मुझे हैरान करने की उसकी यह  हरकत थी।  रोज घर से गायब रहना एक घंटे के लिए , इस पार्क में यूँ ही बैठे , अब तक जान नहीं पाया था मैं।
 तो घर चली जाओ , यहाँ क्यों बैठी हो।
 नहीं , अभी नहीं जाना है मुझे घर।  बच्चों को कुछ देर अकेले भी रहना चाहिए न !
इस रहस्य की गुत्थी मुझसे सुलझती न थी. एक दो बार लेकर भी आई थी वह उन्हें साथ ही ., दो छोटे से बहुत ही  प्यारे बच्चे थे उसके .,मोनू और स्वीटी।   पहले कुछ दिनों में जितनी चुप उदास -सी दिखी ... वह स्त्री स्वयं वही नहीं थी।

शुक्रवार, 27 जून 2014

द्विरागमन .... (1)




"We All are Dogs !"
कह दिया मैंने और उसकी प्रतिक्रिया को परखता रहा।  पिछले जितने समय से उसे जानता था उसे लगा था कि वह  बुरी तरह चिढ़ेगी , चीखेगी और कहेगी कि  इसमें क्या शक है ! 
मगर नहीं! एक सेकण्ड के लिए उसके चेहरे का रंग बदला और फिर से वही  स्निग्ध मुस्कराहट लौट आई थी।
बात चल रही थी उसके पति की .  अपनी धुन में डूबी हुई सी वह बता रही थी उसके पति के बारे में . वह मितभाषी है , ईमानदार है , दिल बहुत बड़ा है उनका …  
मैं उसे चिढ़ाना चाहता था या फिर उसका भ्रम दूर करना चाहता था  पता  नहीं क्यों . मैं देर तक  सोचता रहा था  उसके जाने के बाद कि  आखिर क्यों। … 
मैं जवाब नहीं जानता था या  जो जानता था उसे झुठलाना चाहता था। । पता नहीं , क्या , क्यों।
अचानक हंसी आ गयी मुझे। 

उस दिन पूछ लिया था था मैंने. आखिर तुम अपनी  जिंदगी से चाहती क्या हो।
पता नहीं!
तुम जिंदगी से खुश हो!
पता नहीं!
तुम नाराज हो!
पता नहीं!

मुझे झुंझलाहट होने लगी थी। तुम्हे कुछ पता भी  होता है !
अभी मैं इस समय यहाँ तुम्हारे साथ हूँ , तुम रखते हो न सब पता… 
और उसकी  खिलखिलाहट में मेरी झुंझलाहट जाने कहाँ ग़ुम  हो गयी।
मैं चिढ़ता हूँ खुद पर  उस पर-  गुस्सा हो तो खिन्न दिखना  चाहिये मगर  नहीं, उसे तो मुस्कुराना या  कहकहे ही लगाना है हमेशा। 
और आज मैं था जो हर बात पर कहता था.… पता नहीं !
इतनी देर से बात कर रहा हूँ उसके बारे में। 
वह कौन! कौन थी वह !कहाँ से आई थी ! कौन थी वह मेरी !
इस अनजान  शहर में चला आया था सबकुछ छोड़कर , या कहूँ छूट गया था …

अपने बारे में क्या लिखूं , उसकी ही बात करता हूँ.  इस  नए शहर की वसंत ऋतु की  एक दोपहर रही होगी . उस बाग़ की एक बेंच पर बैठा यूँ ही कर रहा था जिंदगी का हिसाब- किताब .  पता नहीं चला था कब सामने आ बैठी थी वह बेंच से थोड़ी दूर . पार्क की दूब पर बैठी तिनके तोड़ कर दांत में कुरेदती जैसे कुछ फंसा था  उसके दांत में ! 
नहीं , कुछ अटका हुआ जेहन में जैसे कुतरती जाती थी।

मेरी नजर कैसे पड़ी उस पर . शायद वहां खेलते दो बच्चों की बॉल उसके सर पर जा लगी थी . बच्चे डरे सहमे उसके पास जा खड़े हुए थे . उसने हलकी सी मुस्कराहट के साथ बॉल उठाई और दम  लगा कर दूर फेंक दी। बच्चे हुलस  कर बॉल के पीछे भागे और वह फिर उदास सी दूब कुतरती रही दांतों में जैसे कि  जिंदगी की मुश्किलात को कुतर देना चाहती हो।

क्या सूझा मुझे मैं अपनी जिंदगी के हिसाब किताब बंद कर उसकी ओर  देखने लगा।  एक अनचीन्ही सी मुस्कराहट लिए बैठी रहती है रोज उसी स्थान पर कभी मेरे आने से पहले , कभी आने की बाद से। कभी किसी को  देख मुस्कुरा देती मगर कुछ कहती नहीं  . कभी हाथ में पकडे काले क्लच के बटन को खोलती बंद करती , कभी घडी में समय देखती , कभी अँगुलियों पर कुछ गिनती। … एक सप्ताह  हो गया था मुझे उसे इसी प्रकार देखते। अपनी आँखों के सामने पड़ने वाले दृश्य से बिना  जाने कब हमसे  रिश्ता  बना लेते हैं .  जाने कब हमें उनकी आदत हो जाती है।  रोज देखते हुए उसे मुझे भी  उत्सुकता होने लगी थी . कौन है यह स्त्री ! किसी से बातचीत नहीं बस कभी अपने में खोयी तो कभी दूसरों को निहारती चुपचाप एक निश्चित समय तक ,. उसके बाद उठकर धीमे क़दमों से चल देती।

अपनी शांति को दरकिनार रख मेरा मन करने लगा  था  कुछ बातचीत करने को ,. किसी से भी  पास से गुजरते चने या आईसस्क्रीम वाले को रोक उससे जोर से बातें करता ,  मगर वह निस्पृह सी दूसरी और निगाह  किये जाने क्या तलाशती लगी मुझे।  बात करना चाहता था मैं उस ख़ामोशी से जो उस हरी दूब के मखमली लॉन  से  इस बेंच के दरमियान पसरी रहती थी. संकोच भी था कहीं वह मुझे  असभ्य न समझ बैठे।

मौका मिल गया था उस दिन बातचीत का जब फिर से एक बॉल आ टकराई थी उसके क्लच से होते हुए मेरी बेच तक !
मैंने मुस्कुराकर उसे नमस्कार कहा-  रोज देखता हूँ आपको यहाँ !
हूँ -  उसके शब्दों के रूखेपन में टोकने पर टरका  दी जाने वाली की नाराजगी ने मुझे आगे कुछ कहने से रोक लिया !
 भीतर कही जिद जोर मारने लगी . शायद मेरे भीतर का पुरुष  जानवर क्यों न कहूँ .  एक स्त्री की उपेक्षा को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। कहीं भीतर मेरे सम्मान को चोट तो नहीं लगी यह देखकर कि  मुस्कराहट का जवाब भी मुस्कुराहट से नहीं दिया  गया। अब मेरी जिद मेरी ख़ामोशी को पीछे धकेलते वाचालता में तब्दील होती जाती थी।  उससे बेखबर होने का दिखावा करता मैं कभी बॉल खेलने वाले बच्चों से  कभी कुल्फी या चना  वालों से जोर से बातें करता . बिना बात कहकहे लगाता मगर इतने दिनों बाद भी उन आँखों में पहचान या होठों पर मुस्कराहट नहीं उभरी। 
मैं समझ नहीं पाता  था , क्यों चाहता था मैं ऐसा। ऐसा कुछ ख़ास तो नहीं था उस स्त्री में . उसके सामान्य कद जैसा ही सामान्य पहनावे में लिपटा  .... किसी भी स्त्री को देखकर ही प्रभावित हो जाने वाला या उनके आगे पीछे चक्कर काटने जैसा चरित्र मेरा नहीं था. अपने  सैनिक जीवन के  औपचारिक  माहौल में जमने  वाली  अनौपरिक बैठकों में खूबसूरत ग्लैमरस तेजतर्रार  पार्टी की शान बनी तितलियाँ कम  नहीं देखी थी मैंने , देखने से लेकर मित्रता , साथ घूमना और वह सब भी जो सामान्य जीवन में अनैतिक माना जा सकता था … शायद एक सामान्य सी स्त्री द्वारा उपेक्षित किये जाने   ने ही मुझे कही भीतर नाराज किया था। जिस व्यक्ति को आप रोज देखते हो दिखते हो !  बात न करे पहचान आगे न बढ़ाये मगर सामने पड़ने पर मुस्कुराया तो जा सकता है !

उसे मुस्कुराता देखने की मेरी नाकाम कोशिशें मुझे चिढ़ाती जाती थी।  अपने व्यवहार की तबदीली पर हैरान मैं स्वयं पर झुंझलाता  था  और एक दिन जब यह झुंझलाहट हद से बढ़ी तो मैं पास से गुजरते कुल्फी वाले को जबरन रोककर उसे सुनाने की गरज से जोर से  बोल पड़ा , जब लोगो को किसी से बात नहीं करनी होती , किसी से घुलना मिलना पसंद नहीं होता तो घर से बाहर ही क्यों निकलते हैं।  सार्वजानिक स्थानों पर आने  की क्या आवश्यकता है , अपना कमरा बंद कर पड़े रहे न घर में !
इस बार पलटकर देखा उसने।  जाने कैसी सख्त निगाहें थी - सार्वजानिक स्थान किसी की बपौती नहीं , और  लोग  हर किसी से बातें करने के  लिए यहाँ आते भी नहीं।
मेरा तीर निशाने पर लगा था .  गुस्से से तिलमिलाती ही सही कुछ कहा तो उसने ! 

उस शाम से लेकर अब तक जाने कितनी शामें थी हम रोज ही आते मुस्कुराते  बातें करते .  वह बताती अपने बारे में , अपने पति , अपने बच्चों के बारे में , और मैं सुनता , कभी कुछ पूछ भी लेता … 
जाने कब  बीच की अनौपचारिकता की दीवार ढही मुझे या शायद उसे भी पता नहीं चला नहीं होगा  जब भी मैं उस दिन की तल्खी की बात सोचता हूँ।

आज वह गुस्से में तिलमिलाई नहीं  मगर उसके शब्दों में पर्याप्त तीखापन था - हंसी आ रही  है मुझे कि एक पुरुष मुझे यानि एक स्त्री को यह बता रहा है!
उसकी आँखों में अभी भी वही पहले से सख्ती जैसे कह रही हो मुझे कि हम स्त्रियां बेहतर जानती हैं कि तुम कुत्ते ही होते हो मगर अगले ही पल  फुर्ती से लौटी उसी स्निग्ध मुस्कराहट ने अपने शब्दों पर पर्याप्त  बल  देकर कहा - नहीं , वे ऐसे नहीं है ! सब ऐसे नहीं होते !
मत  मानो अभी  . एक दिन तुम मानोगी तब मुझे याद करोगी।
तुम्हे याद तो मैं यूँ ही कर लूंगी . कुत्तों के बहाने क्यों !
उसकी तिरछी नजरों के साथ  खिलखिलाहट  का अंदाज बात वहीं समाप्त कर देने जैसा था ! मगर बात समाप्त नहीं हुई  थी वहां।
मुझे लगता था कहीं भीतर से आती उसकी आवाज - तुम सब कुत्ते ही होते हो , सब एक जैसे।  गोश्त चूस लेने के बाद हड्डियां चुभलते रहने वाले कुत्ते , तुम्हारी भौंक बस हड्डी मुंह में रहने तक ही बंद रह सकती है।  
मैं काँप रहा था इस अनकही को सुनते . उसने तो कुछ कहा नहीं था।  कहीं मेरे मन की ही बात तो मेरे कानों में नहीं उड़ेली जा रही थी उसके अनकहे शब्दों में।  अपने आप को हमसे बेहतर और कौन जान सकता था! 
अपनी बेरहमी और बेशर्मी से घबराया मैं उसी बाग़ के दूसरे कोने पर लगे फूलों और बच्चों को देख मुस्कुरा दिया. अपने भीतर के पशु को छिपाते सांत्वना देता मनुष्य को !

मुझमे अभी बाकी है जिंदगी . रहेगी भी ! यकीन दिलाता स्वयं को।  वह थी ही ऐसी . बुरी तरह कुरेदती  अपने शब्दों से भीतर को बाहर खड़ा कर देती  जैसे कि आईने में अपना अक्स नजर आ रहा हो।

क्रमशः

(चित्र गूगल से साभार )

गुरुवार, 22 मई 2014

संत हृदय नवनीत समाना ....

सद्जनों की संगति आचार /विचार और व्यवहार में परिवर्तन लाती ही है , ऐसे लोग संख्या में कम होते हैं जिन पर इसका विशेष प्रभाव नहीं होता ! माँ के पूज्य फूफाजी विद्वान शिक्षक थे।   जब कभी  छुट्टियों में घर आते , फुर्सत मिलते ही किताबें मंगवा कर प्रश्न पूछते , और न आने पर विस्तार से समझा भी देते हालाँकि ये स्मृतियाँ  उन दिनों की है जब ऐसा होता नहीं था कि हमसे कोई प्रश्न पूछा जाए और हम उसका उत्तर दे न सकें . उन दिनों शिक्षा से जीविकोपार्जन तो अवश्य होता था मगर वह व्यवसाय नहीं थी. हालाँकि एक दुक्का किस्से सुनने को मिल जाते थे सरकारी विद्यालयों के कि फलां शिक्षक ने छात्रों से फल , सब्जी , अनाज आदि मंगवाए।  शिक्षक के लिए शिक्षा देना विद्या का दान करने जैसा ही अधिक होता था . कोर्स की किताबों के सिवा नैतिक शिक्षा का ज्ञान भी अभिभावकों से अधिक गुरु से ही प्राप्त होता था . इसलिए पढ़ते हुए वे ज्ञान/ धर्म की चर्चा भी कर लिया करते थे . और हम तो ठहरे हम , जिज्ञासा और प्रश्न करते रहना तो अब तक इस अधेड़ावस्था में भी नहीं छूटा  तो तब तो बचपन ही था .

एक बार "कल्याण " पत्रिका से संस्मरण सुनाते हुए वे उपदेशकों पर चर्चा करने लगे . पंडितों /ज्ञानियों या सन्यासियों का सुख सुविधाओं का उपयोग करना मुझे आश्चर्यचकित करता ही था . वे किसी गुरु की अगवाई के किस्से सुना रहे थे . साधू महात्मा जी का बड़ी गाडी में आना , लाल कालीन बिछाकर उनका स्वागत करना  मुझे हैरान कर रहा था . उनके बड़प्पन का  लिहाज करते हुए भी मैंने पूछ ही लिया कि सन्यासियों को इस ठाठ बात की क्या आवश्यकता है . वे जनता को भोग लिप्सा से दूर रहने को कहते हैं , स्वयं क्यों डूबे रहते हैं !
मेरी शंका को समझ लिया उन्होंने . प्रत्यक्ष कुछ कहा नहीं , मगर एक दूसरा किस्सा सुना दिया अपने गुरु जी का . हुआ यूँ कि उनके गुरु जी को किसी अमीर शिष्य ने महँगी घड़ी भेंट की .  गुरु जी हर समय उस घड़ी को धारण किया करते।  उनके  एक शिष्य को बहुत अखरता।  कई दिनों तक वह देखता रहा , मन मे सोंचता रहा कि गुरूजी हमे तो माया मोह त्यागने का उपदेश देते हैं , मगर स्वंयं इतनी महँगी घड़ी पहने रखते हैं।  गुरूजी से उसकी मानसिक स्थिति छिपी नहीं रही।   उन्होंने शिष्य को पास बुलाया और कहा , मैं बहुत समय से देख रहा हूँ कि तुम कुछ पूछना चाहते हो , तुम्हारे मन मे जो भी शंका है , खुलकर कहो।  
शिष्य  ने झिझकते हुए पूछ  लिया - आप हमें भौतिक वस्तुओं के प्रति लालसा न रखने का उपदेश  देते हैं , मगर  स्वयं इतनी महँगी घडी पहनते हैं !
गुरूजी स्नेह पूर्वक मुस्कुराये, तुम्हे यह  घडी बहुत पसंद है !
किसे पसंद नहीं होगी , आपको भी है इसलिए आपने पहन रखी है।

गुरूजी  ने तत्काल घडी हाथ से उतारकर शिष्य को दे दी।  इसे हर समय पहने रखना !

अब शिष्य बड़ा  प्रसन्न हुआ।  मूल्यवान होने  के कारण  वह हर समय घडी पहने रखता मगर उसकी हिफाजत के लिए प्रयत्नशील भी बना रहता। घडी की देखभाल और चिंता में उसके दैनिक प्रभावित होने लगे। स्नान - ध्यान में विघ्न पड़ने लगा।  एक दिन स्नान के लिए जाते समय उसने घडी उतार कर रखी।  जरा सी आँख चूकते घडी अपने स्थान से गायब।  हर तरफ  हेर लेने पर भी  घडी का कही पता न चला ।  उसे बहुत दुःख हुआ और जार जार रोने लगा।  उसे भय भी था की गुरूजी  ने उसकी ख़ुशी को देखते हुए घडी प्रदान की थी और उसकी हिफाजत के लिए निर्देश भी दिए थे, मगर वह उसे संभाल न सका।  
एक  दो दिन के बाद गुरूजी की नजर उसपर पड़ी , वह फिर से वैसे ही उदास , चिंतित !
 गुरूजी  ने पास बुलाकर  उसकी उदासी का कारण पूछा।  सर झुकाया अश्रुपूरित नेत्रों के साथ उसने  घडी के खो जाने की बात बताई और साथ ही उनसे क्षमायाचना करने लगा।  
गुरु  जी ने उसे आश्वस्त किया  कि आश्रम से घडी कहाँ खो जायेगी , यही कहीं मिल जायेगी। साथ ही सभी शिष्यों  को बुलाकर घडी को तलाशने के निर्देश दिए।  खोजबीन करते आखिर एक शिष्य को वह घडी मिल ही गयी, किसी पेड़ की डाल पर लटकी।  शायद किसी पक्षी की करामात रही हो , या किसी शिष्य की ही !  
गुरु जी ने सभी शिष्यों को बुलाया , और  उनकी उपस्थिति में घडी ढूंढ  लाने वाले शिष्य से कहा.…   यह घडी तुमने  परिश्रम से ढूंढ ली है , इसलिए अब इसे तुम ही रख लो !
इस पर  पहले  वाले शिष्य का प्रतिवादी स्वर गूंजा - मगर यह घडी तो मेरी है , आपने इसे मुझे दिया था !

मगर यह घड़ी मैंने तुम्हे दी थी , जो मुझे भी किसी ने भेंट की  थी।   इस शिष्य ने तो इसे परिश्रम से प्राप्त किया है , इसलिए इसका अधिकार होना चाहिए ! गुरूजी के चेहरे पर स्मित मुस्कान थी।
मगर  दूसरे शिष्य ने भी घडी लेने  से इंकार कर दिया  यह कहते हुए कि  मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है।

अब पहले शिष्य को अपनी गलती का एहसास हुआ।  उसे समझ आया कि गुरूजी के लिए मूलयवान घडी का कोई मोल नहीं था. श्रद्धापूर्वक भेंट की गयी वस्तु को वे धारण तो किये हुए थे , मगर उनका उस घडी या वास्तु से कोई मोह नहीं था।

विद्वान शिक्षक भी मुझे समझा रहे थे। ऐसे ही सही मायनों में संत वे हुए जो किसी प्रलोभन अथवा मोह माया में अटकते नहीं।  उनका स्वागत किया श्रद्धा से , उन्होंने प्रेम से स्वीकार किया !  वे सुविधा के लिए लालायित नहीं हैं , ना प्रयत्नपूर्वक सुविधा प्राप्त करना चाहते हैं मगर इन अमीर  भक्तों को इस प्रकार आत्मसंतुष्टि मिलती है तो यही सही ! यदि वे सिर्फ झोपडी / मुफलिसी / असुविधा में रहने वालों को ही उपदेश देते रहेंगे तो सुविधाभोगी उन तक पहुंचेंगे ही नहीं।  जबकि इस वर्ग में सद्विचार का प्रसारण अधिक आवश्यक है ताकि वे गरीबों/वंचितों  के कष्ट  का कारण समझें , कष्ट को समझे और उसके निराकरण में अपना सहयोग कर सकें। उनमे सद्विचारों का रोपण उनकी सुविधाजनक स्थितियों में ही करना होगा , वरना वे विमुख ही होंगे ! संत पानी में रहकर भी सूखे रह सकते हैं , सुविधाएँ उनके मार्ग का व्यवधान नहीं होती।  वे प्रत्येक स्थिति को ईश्वर प्रदत्त मानकर निरपेक्ष भाव से  रहते हैं।


नोट -  अनेकानेक तथाकथित धार्मिक/सामाजिक  संस्थाओं के सन्दर्भ में न पढ़े जो धर्म और समाज सेवा की आड़ में व्यभिचार और नाकारापन को बढ़ावा देती हैं !!