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गुरुवार, 14 नवंबर 2019

जहाँ प्यार दिख जाये.....


चित्र गूगल से साभार....

सत्यनारायण पूजा पर एकत्रित परिवार की सब स्त्रियाँ पूजा के बाद सबको प्रसाद खिला अब स्वयं भी तृप्त होकर आराम करते गप्पे लड़ा रही थीं. जैसा कि अकसर महिला मंडल की बैठकों में होता है, वही यहाँ भी होने लगा. अनुपस्थित छोटी बहू के बारे में बातें करते कोई ताली बजाकर हँस रहा तो किसी के चेहरे पर उपहास उड़ाती मुस्कान...

देखो तो. भैया कितना प्यार करते हैं. जब तक रसोई में थी, वही मंडराते रहे....

अरे हाँ, कोई शरम ही नहीं है बोलो. सबके सामने एक ही पत्तल में परोस कर खा रहे थे.

उसके मायके जाने की बात से इनकी आँखों से आँसू निकल आते हैं.
कोई कुछ कह रहा कोई कुछ. सबके साथ हँसती मुस्कुराती कविता अचानक गंभीर हो गई....

" अच्छा है न. आज के समय में दो लोगों के  बीच प्रेम नजर कहाँ आता है.  माँ बाप और बच्चों के बीच, भाई बहनों के बीच, पति पत्नी के बीच.... प्रेम आजकल दिखता कहाँ है....ऐसे नाशुक्रे समय में यदि दो लोगों के बीच इतना प्रेम है यो यह खुशी की बात हुई न. प्रेम में डूबे हुए दो लोगों को देखकर मुझे तो अच्छा ही लगता है!
सोचो, क्या तुम लोगों को अच्छा नहीं लगेगा यदि  तुमसे इतना प्यार किया जाये....."

बात तो सही है. प्यार पाना किसे अच्छा नहीं लगेगा!

बातों का रूख सहसा ही परिवर्तित हो गया. सब स्त्रियाँ जैसे एक साथ सपनीली मधुरता में खो गईं एक संतोषजनक मुस्कान चेहरे  पर सजाये....


शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

अधिकार और कर्तव्य या स्नेह और प्रेम ...सवालों का चक्रव्यूह !

व्यक्ति परिवार की तो परिवार समाज की महत्वपूर्ण इकाई है इनमे से एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती वही किसी भी परिवार की मुख्य धुरी माता -पिता या पति -पत्नी हैं जैसा कि हमारे समाज में पित्रसत्तात्मक व्यवस्था रही है , परिवार बसाने के लिए विवाह के बाद लड़कियों को अपने -माता पिता का घर छोड़ना पड़ता है , और वे अपने पति के घर को अपना घर बनाती हैं पुराने समय में पित्रसत्तात्मक व्यवस्था में घर की आर्थिक स्थितियों पर नियंत्रण पुरुषों के हाथ में होने के कारण धन की व्यवस्था करने से लेकर खर्च करने तक के अधिकार पुरुषों के हाथ में ही रहते थे समाज के विकास के साथ परिवारों की सोच में परिवर्तन के साथ महिलाओं में शिक्षा के प्रति जागरूकता आई जिसने उनकी आर्थिक स्थितियों पर विचार करने को विवश किया
चूँकि महिलाओं में शिक्षा और आत्मनिर्भरता नहीं थी इसलिए विवाह के समय दिए लड़कियों को मायके से दिए जाने वाले धन , जिसका उपयोग महिला स्वयं अपनी इच्छा से कर सकती थी, को स्त्रीधन की संज्ञा दी गयी समय के साथ महिलाओं में साक्षरता दर बढ़ी , उच्च शिक्षा के प्रति उनका रुझान बढ़ा और वे आत्मनिर्भर होने की दिशा में आगे बढ़ी , हालाँकि आत्मनिर्भर महिलाओं का प्रतिशत कम ही रहा जो महिलाएं स्वयं आत्मनिर्भर नहीं है , वे अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए तीज त्यौहार पर मायके से मिलने वाले नेग और पति द्वारा दी जाने वाली मासिक आय अथवा जेबखर्च पर निर्भर हैं वही यदि महिलाओं को इस तरह के कोई अधिकार नहीं दिए जाए तो उनके प्रताड़ित होने या दोयम दर्ज़ा हासिल होने की भी पूरी सम्भावना होती है , क्योंकि जिस परिवार में वह प्रेम के कारण आती है ,उससे उनका रक्त सम्बन्ध नहीं है . तो क्या रक्त सम्बन्धियों में प्रेम प्राकृतिक रूप से मौजूद है , ऐसा है तो क्यों अक्सर महिलाओं के लिए उनका रक्त सम्बन्ध प्रेम सम्बन्ध के आगे छोटा ही पड़ जाता है . पति के घर आने के बाद उनकी सारी जवाबदेही उस परिवार से ही क्यों हो जाती है , क्या यह सिर्फ कंडिशनिंग की बात है ? क्या यह सिर्फ इसलिए है कि उन्हें बचपन से सिखाया जाता है कि यह तुम्हारा घर नहीं है , तुम्हारे पति का घर तुम्हारा है . इसलिए जो सपने पिता के घर पूरे नहीं किये जा सके , पति के घर, जो अब उनका भी घर होगा , अधिकार स्वरुप हासिल करने की जिद सी हो जाती है .

प्रेम के कारण और महिलाओं की जरुरत को समझते हुए दी जाने वाली राशि महिलाओं में आत्मविश्वास को बढाती है . सिर्फ अधिकार स्वरुप पति की रकम का एक बड़ा हिस्सा पत्नी को दिया जाए , क्या तब भी ??

अब महिलाओं को पति द्वारा दिए जाने वाली राशि की बात करते हैं तर्क दिया जाता रहा है क्योंकि महिलाएं घर में पति से ज्यादा श्रम करती हैं , इसलिए उन्हें इस हक़ के रूप में यह रकम जेबखर्च की तरह मिलनी चाहिए दिमागी तर्क के रूप में यह सही लगता है लेकिन क्या कोई भी महिला अपने बच्चों का या परिवार का पालन पोषण महज उस रकम के हिसाब से करती है , जो उसे अपने श्रम के बदले मिलने वाली है क्या पत्नी के प्रेम , माँ की भावनाओं और देखभाल, बहन के स्नेह का कोई मोल लगाया जा सकता है , इसके लिए कोई कीमत निर्धारित की जा सकती है , माँ या पिता भी अपने बच्चों और परिवार के लिए जो करते हैं , अपने कर्तव्यों की पूर्ति के लिए या प्रेम के लिए , इसकी भी क्या कीमत लगाई जा सकती है क्या घर गृहस्थी अथवा अन्य रिश्तों का आधार प्रेम की बजाय लिया- दिया जाने वाला धन होना चाहिए सिर्फ अधिकार की भावनाओं से ही क्या घर अथवा रिश्ते बनते हैं, या निभते हैं वे रिश्ते जो सिर्फ कानून के डर से निभाए जाए , उनकी उम्र और वास्तविकता क्या हो सकती है !!!

जो रिश्ते प्रेम और विश्वास की डोर से बांधे हों , उनकी कीमत क्या हो सकती है ... महिलाओं के कर्तव्य और अधिकार की बात पर कई बार सवालों के इस चक्रव्यूह में घिर जाती हूँ ...


रविवार, 6 जून 2010

शादी निभाने के लिए क्या आवश्यक है ... ..." प्रेम " या "समझौता" ...??

भयंकर अलर्जी की शिकायत के कारण आजकल काम कम और आराम ज्यादा हो रहा है । गृहिणियों के लिए ज्यादा आराम का मतलब ज्यादा टीवी शो देखना ...आजकल एक धारावाहिक " ससुराल गेंदा फूल " नियमित देख रही हूँ ।

संयुक्त परिवार की महत्ता को कायम करता हुआ यह धारावाहिक परिवार के सदस्यों के आपसी तालमेल और उनके बीच प्यार सद्भाव बनाये रखने के लिए घर की मुख्य धुरी बड़ी बहू के त्याग और समर्पण को दिखाता है ।

बड़ा बेटा पत्नी और बच्चों को छोड़ अपना दूसरा घर बसा चुका है , जबकि उसकी पत्नी इसी घर में रहते हुए अपने सास ससुर और देवर की मदद से पूरे परिवार को एकजुट रखने का संकल्प निभा रही है । कहानी का मूल विषय है ..." शादी का बंधन सिर्फ एक व्यक्ति से नहीं , पूरे परिवार से जोड़ता है "

धारावाहिक के इस अंक में गृहत्यागी बड़े बेटे का जन्मदिन है और सभी सदस्य बड़ी बहू को प्रसन्न करने के प्रयास में लगे हैं । फ्लैश बैक में बेटे का घर छोड़ कर जाने का कारण और उसकी अंतिम पाती को याद करते उसके माता पिता और पत्नी का अपने परिवार से संवाद को दिखाया जा रहा है ।


धारावाहिक देखते हुए शुरू हुई दिल दिमाग की रस्साकसी इस पोस्ट का विषय बन गयी है ....

बेटा (ईश्वर ) ईमानदारी से स्वीकार करता है कि उसका अपनी पत्नी से प्रेम नहीं रहा और जिस दूसरी स्त्री से उसे प्रेम हो गया है , वह उसके बगैर रह नहीं सकता इसलिए अपने इस रिश्ते को समाप्त करते हुए वह दूसरे देश में अपनी दूसरी पत्नी के साथ घर बसा रहा है ....

जब प्रेम नहीं है या अब नहीं रहा तो इसका दिखावा करते हुए साथ क्यों रहा जाए ...यह ईमानदारी ठीक ही लगती है ....वही दूसरी ओर यह प्रश्न भी है कि प्रेम नहीं था तो इतने वर्ष साथ क्यों रहा गया ...और इस साथ के कारण जन्मे बच्चों का क्या ....बच्चों की परवरिश में लिए माता -पिता दोनों का योगदान समान होता है ...तो
क्या अपने प्रेम के लिए बच्चों से उनका स्वाभाविक हक़ छीन लेना उचित है ...??

क्या शादियाँ सिर्फ प्रेम से निभती हैं , निभानी चाहिए ...??

पास बैठी बेटी से मैंने मेरे दिमाग ने पूछ लिया " शादियाँ निभती तो समझौते से ही है ...यदि प्रेम विवाह भी किया जाए तो वह भी समझौते के बिना निभ नहीं सकता ...वास्तव में शादिया निभायी ही जाती हैं , निभती नहीं "

ठीक उसी क्षण यह ख़याल भी दिल में आया ...

" पर यदि प्रेम हो तो समझौता करने का दिल करता होगा ना , अपने आप ही हो जाता होगा सामंजस्य , यदि प्रेम नहीं है तो सामंजस्य सिर्फ मजबूरी बन कर रह जाएगा "


क्या यह सही है कि प्रेम निभाया नहीं जाता , अपने आप निभता है , जबकि शादियाँ निभानी पड़ती हैं ...
सफल वैवाहिक जीवन के लिए क्या आवश्यक है ....." प्रेम या समझौता " ....

ससुराल गेंदा फूल .....इस धारावाहिक को देखते हुए मेरे दिल और दिमाग की इस रस्साकसी को सुलझाने में मेरी मदद नहीं करेंगे आप ....??



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