मेहनतकश लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मेहनतकश लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 16 जून 2015

छोटू घडी नहीं उतारता..... समय को मुठ्ठी में रखना चाहता है !!


मध्यप्रदेश से गर्मी की छुट्टियों में धर्मेन्द्र अपने भाई के पास यहाँ आया हुआ है. मिस्त्री का काम करता है उसका भाई . सात भाई बहनो में सबसे छोटा धर्मेंद्र नवीं कक्षा में पढता है. गर्मी की छुट्टियों का उपयोग परिवार की अतिरिक्त आमदनी में मदद करता है. उसका भाई पास में ही दूसरी साइट पर काम कर रहा है .
छोटू (धर्मेन्द्र) का साथी बताता है कि ये उसके साथ काम नहीं करता . वहाँ भारी समान उठाते रहना पड़ता है इसलिये हम अपने साथ रख लिये.
प्रतिदिन 1100 में से 700 स्वयं रखता है और 400 छोटू को. दोनों एक ही गाँव के हैं.

पुरानी दीवार पर टाइल लगाना बहुत मेहनत का कार्य है . पहले पूरी दीवार को खरोंचना पड़ता है. पूरा दिन मेहनत करके भी कुछ काम दिखता नहीं . मालिक पूछ लेता है कि आज दिन भर क्या किये तो क्या बतायें.

मैं सोचती हूँ कि अब उसको क्या बतायें कि सब गृह कार्य अपने हाथों से दिन रात करने वाली गृहिणी से भी लोग कई बार पूछ लेते हैं कि सारा दिन क्या करती हैं. कैसे टाइमपास होता है सारा दिन घर में!

अब तक कितने कमा लिये!!

 उसके साथ काम कर रहा कारीगर बताता है 4000 रूपये.

क्या करेगा इन पैसों का?

टूशन रखूँगा...

सोचती हूँ कि ट्यूशन मतलब स्कूल फ़ीस देना होता होगा. श्रमिक वर्ग की शिक्षा के प्रति यह रूचि सुखद लगती है.
श्रम और बुद्धि का मेल अति हितकारी है व्यक्ति के स्वयं के लिये, परिवार के लिये, समाज के लिये , राष्ट्र के लिये भी .

अच्छा... माँ के लिये क्या लेकर जायेगा...साडी?

क्या ले जायें... सकुचाते हुए कहता है . साडी वहीं खूब मिल जाती है.

मगर जयपुर जैसी नहीं मिलेगी न!

जयपुर में महँगी मिलेगी . उसका साथी बोला
.
मैं उसकी बात मान लेती हूँ.  जयपुर महँगा शहर है . 28 वर्ष पहले जब जयपुर की धरती पर कदम रखा था तब भी मान लिया था. सबसे पहला सामना ऑटो रिक्शा से ही हुआ. हैदराबाद के मुकाबले दुगुना किराया ही नहीं  सेंडिल से लेकर खाना पीना तक भी  महँगा ही लगा था. तब से अब तक कहाँ -कहाँ घूम आये मगर धारणा वही सही साबित होती है आज भी.

धर्मेन्द्र (छोटू ) से उसकी पढाई के बारे में बात करता देख उसके साथी कारीगर के चेहरे पर बेचारगी के भाव साफ़ पढे जा सकते थे. अपने स्थान पर खड़ा ही इधर उधर होता रहा बेचैनी में जैसे कि कश्मकश में हो कि यदि उससे पूछा जायेगा तो वह क्या जवाब देगा.

पूछ लिया उससे भी कि तुम कितना पढे हो.

हम नहीं पढे हैं!

ऐसे कैसे हो सकता है. यह सब नाप जोख करना , हिसाब लगाना , हिसाब से सेट करना कैसे करते हो!

ओही आठ तक पढे हैं खाली. हमारे पिताजी तभी खतम हो गये थे. कोई घर सम्भालने वाला नहीं था. उसीसे हमको पढाई छोड़ कर काम करना पडा. हम पंद्रह साल मद्रास मे काम किया. अब कुछ साल से यहाँ जयपुर में. मद्रास बहुत दूर पड़ता है. यहाँ से गाँव पास है. महीने में एक बार गाँव चल जाते हैं.
एक साँस में अपनी पूरी बात कहने के बाद  उसकी बेचैनी कम होती सी दिखी. जैसे उसने भी कोई परीक्षा उत्तीर्ण कर ही ली.

तभी बाहर दरवाजे पर कर्कश स्वर उभरा. बाहर जाकर देखा तो कान, नाक , गले , पैर में आभूषण पहने टेर लगाने वाली स्त्री को दो तीन बच्चे घेरे खडे थे . सोचती हूँ इनकी भी कूछ मजबूरी होती होगी. अपनी ही लिखी हुई कविता याद आ गई -
पेट की आग से
क्या बडी होती है
इनके तन की आग!
उसी समय मन की आंखों के आगे अखबार में छपी उस लड़की की तस्वीर आ जाती है जो बीमार पिता और भाई की तीमारदारी के बीच कई घरों में काम करते हुए भी मेरिट में स्थान लाती है.
पीछे खड़े मजदूर, सामने खड़ी वह स्त्री और दिमाग में वह लड़की तीनों मिलकर जैसे किसी प्रोजेक्ट का विवरण सा खींच रहा हो कागज में. एक साथ मस्तिष्क कितने आयाम में विचरता है.

छोटू को देखती हूँ मुड़ कर . वह कभी अपने हाथ की घडी नहीं उतारता. पता नहीं किसी ने उसे उपहार दिया था अथवा अपने मेहनत की कमाई से खरीद लाया मगर उसका मोह देखते बनता है. काम समाप्त कर हाथ मुँह धोते या सीमेन्ट बजरी मिलाकर मसाला तैयार करते या कि सर पर रख कर परात उठाते समय हर समय घडी उसके हाथ में होती है . पूछा भी मैने क्या घडी खराब नहीं होती इस तरह...
इंकार में सर हिलाते हौले से हाथ फेरता है . चेहरे पर किंचित नाराजगी सी दिख पडी . जैसे कहीं उसकी घडी को नजर न लग जाये. 
जिन चीजों से हम प्रेम करते हैं हम कितनी बार उनके प्रति निर्मम हो जाते हैं .
मन से ही गूंजा - चीजों नहीं, इन्सानों से भी . 
व्यामोह की यह कौन सी दशा है... कैसी विवशता है!! भावनाओं के कितने रहस्य अबूझ होते है.  रिश्तों के उलझे धागे!!

करनी, फीता, धागा, हथोडा जल्दी जल्दी थैले में डालते छोटू की हड़बड़ी पढती हूँ. दिन भर के श्रम के बाद हाथ में आये हरे नोट की चमक उसकी मासूम आंखों में लहराती है हरियाली सी. 

छोटू घडी नहीं उतारता. समय को मुठ्ठी में रखना चाहता ही नहीं, प्रयास भी करता है . श्रम भी करता है. ईश्वर इन छोटूओं का स्वयं पर विश्वास डिगने न दे. सफलता हासिल हो इसी ईमानदारी और श्रम की पीठ पर सवार होकर.

एक नि:शब्द दुआ निकलती है दिल से!!





शनिवार, 22 अगस्त 2009

प्रिन्स डांस ग्रुप

गणेश चतुर्थी पर बताते हुए बहुत प्रसन्नता हो रही है कि आख़िर प्रिन्स डांस ग्रुप ही प्रथम स्थान पर विजयी रहा। कलर्स चैनल पर प्रसारित होने वाला "indias got talent" नामक यह कार्यक्रम शुरूआती दौर में इतना लोकप्रिय नही था। सच कहूँ तो मैंने भी नियमित रूप से इसे नही देखा ...मगर सेमी फाइनल में प्रिन्स डांस ग्रुप की प्रस्तुति ने तो समां ही बाँध दिया ...स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर इस ग्रुप की प्रस्तुति में जो खास था वह था देश के राष्ट्रीय चिह्न अशोक चक्र आदि का अपनी नृत्य प्रस्तुति में निरूपण करना ... जब कार्यक्रम के उदघोषक ने इस ग्रुप का परिचय दिया तो ...इस ग्रुप के कलाकारों के प्रति मन श्रद्धा से भर गया । नृत्य कार्यक्रम के द्वारा देश प्रेम का अलख जगाने वाले ये प्रस्तोता अनोखे हैं ...इस सन्दर्भ में की ये कोई पारम्परिक नृत्य कलाकार नही थे ...इनमे से अधिकतर कलाकार इमारतों के निर्माण में कार्यरत मजदूर थे ...कोई मिटटी ढोता है ...कोई मिटटी खोदता है ...कोई इंटों को जमाता है ...इनकी मेहनतकश जिंदगी के बावजूद नृत्य का या जज्बा... और वो भी देश प्रेम को प्रर्दशित करता हुआ ....सचमुच बहुत अद्भुत लगा ...घर में आरामदायक स्थिति में ...कूलर एसी की ठंडी हवा खाते ...रिमोट द्वारा लगातार चैनल बदलकर कार्यक्रम देखते हम लोगों के लिए देश की हालत पर चिंता जताना ज्यादा मुश्किल कार्य नही है ...मगर तेज चिलचिलाती गर्म धुप के थपेडों के बीच रोजी रोटी की मशक्कत में जुटे इन मेहनतकशों को देश से कोई शिकायत नही है ...उडीसा के बुरहानपुर से आए इस ग्रुप के कार्यक्रम ने तो यही साबित किया । विपरीत परिस्थितियों में पले बढे इन कलाकारों के जज्बे को देखकर कार्यक्रम के जज शेखर कपूर भी अपने आँसू नही रोक पाए ...मेरा दावा है घरों में कार्यक्रम देखने वालों को भी इनके जज्बे ने जरुर रुलाया होगा ...न सिर्फ़ मजदूर बल्कि इनके ग्रुप में दो सदस्य शारीरिक अक्षमता के शिकार भी थे ..पूरे नृत्य कार्यक्रम में इन कलाकारों का स्थान इस तरह निश्चित किया गया था कि इनकी शारीरिक अक्षमता कार्यक्रम प्रस्तुति में कही भी आडे नही आयी । इस अद्भुत कार्यक्रम को देखने के बाद से ही इसके फायनल शो तथा उसके परिणाम का बेसब्री से इन्तिज़ार था जो कल देर रात जाकर मुकम्मल हुआ। कार्यक्रम के टॉप 11 प्रस्तुतियों को देखकर एक बारगी प्रिन्स डांस ग्रुप के लिए थोडी चिंता हुई मगर टॉप थ्री में इनकी पहुँच के बाद जीत को लेकर आशा बंध गयी । इस ग्रुप ने कृष्ण सहित विष्णु के दशावतार को अपनी नृत्य क्षमता द्वारा बहुत खूबसूरती से पेश किया जिसमे से नृसिंह अवतार तो बहुत ही लुभावना रहा । कार्यक्रम के निर्माताओं द्वारा उन्हें 50 लाख रुपये नकद, साथ ही एक मारुती कार इनाम में दी गयी . अक्सर अपने आसपास लगातार सच को निर्ममता से हारते हुए ...बेईमानी द्वारा लोगों को जीत हासिल करते हुए ही देखा है अब तक ...इन सबके बीच दैनिक मजदूरी कर जीवन यापन करते हुए इस प्रिन्स डांस ग्रुप को अपनी कला के बल पर जीतते हुए देखना बहुत सुखद अनुभव रहा ...मतलब अभी हालात इतने बुरे भी नही हुए हैं ...उम्मीद की एक किरण अभी भी बाकी है . गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनायें .....!! http://www.youtube.com/user/IndiaGotTalent1 ..............................................................................