ऊँची पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर में भी प्रत्येक बुधवार को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है . पिछले दिनों जब बेटियों को ज्ञात हुआ कि उनका भाई (कज़िन लिखना बहुत अजीब लग रहा है ) प्रत्येक बुधवार को जिस मंदिर में दर्शन करने जाता है वह ऊँची पहाड़ी पर है और वे कभी वहां गयी नहीं है तो ठिनकना शुरू हो गया उनका . हमें भी जाना है. बुधवार का इंतज़ार भी नहीं करना चाहती थी . चूँकि उस मंदिर में बुधवार के अलावा लोगों की ज्यादा आवाजाही नहीं होती और रोज अख़बारों की हेड लाईन्स शहरों के असुरक्षित होने की गवाही देती हुए अभिभावकों को कितना डराती हैं इसलिए अनुमति देते हुए हम थोडा हिचकिचा रहे थे . मगर जैसे- तैसे चारों बच्चों ने मिलकर हमसे सहमति ले ही ली . हजार तर्क होते हैं . आप ही तो कहते हो अपने आप आना- जाना सीखो . अभी तो भाई भी साथ है और कोई हम घूमने दोस्तों के साथ नहीं जा रहे हैं . मंदिर ही तो जाना है . इन नई पीढ़ी के बच्चों से सीखे कोई तर्क से अपनी बात मनवाना ...
सुबह जल्दी उठकर कम्प्यूटर से मगजमारी मेरे लिए कोई नयी बात नहीं है . सुबह 5 बजे ही बेटी का मोबाइल बजा . भाई अपने घर से रवाना हो चुके थे . 15 मिनट में तो दोनों हाज़िर उत्साहित बेटियां फुर्ती से तैयार हुई मेरी चुटकियों को नजर अंदाज करते हुए ...खाली पेट इतनी ऊँचाई चढ़ना ठीक नहीं है समझाते हुए बड़ी मुश्किल से केला खाने को राजी किया ...6 बजे उनका काफिला घर से रवाना हो गया ...चली तो गईं बड़ी ख़ुशी- ख़ुशी पर जब उस चढ़ाई पर पहुंची तो प्यास के मारे बुरा हाल ... चूँकि उन्हें खड़ी चढ़ाई का अंदाजा नहीं था और रास्ते में पानी का इतंजाम भी नहीं .. लेेकिन वहां पहुँचने के बाद उनके आनद की सीमा नहीं थी . सुबह सवेरे पक्षियों कोयल , मोर और चिड़ियों आदि की बोलियाँ सुनते हुए पहाड़ी से पूरे शहर का विहंगम नजारा और मंदिर के दर्शन ...अब मैं तो साथ थी नहीं पर उनके बताये विवरण से ही लिख रही हूँ ...कभी मेरा जाना हुआ तो बाकायदा इस मंदिर के इतिहास और तस्वीरों के साथ विवरण भी होगा ...दरअसल आज की पोस्ट लिखने का कारण बच्चों का घूमना नहीं बल्कि लौटते समय हुआ एक रोचक वाकया है .
दोनों बेटियां अपनी स्कूटी पर और भतीजे अपनी बाईक पर खाली सड़कों पर ट्रैफिक नहीं होने का लाभ लेते हुए आड़ी- तिरछी गाड़ियाँ चलाते हुई लौट रहे थे ...छोटा भतीजा पीछे रह गयी अपनी बहनों को चिढाता मोबाइल से उनकी तस्वीरें खिंच रहा था . बेटी भी स्पीड तेज करती हुई उनसे आगे निकल गयी . उनके पीछे आ रही एक कार में एक सज्जन यह सब देख रहे थे . भतीजों की बाईक को रोकते हुए उनसे तस्वीरें खींचने पर डांट लगाने लगे . जब बच्चों ने उन्हें बताये कि वे अपनी बहनों के साथ है और उन्हें स्कूटी मोड़ क़र वापस उनके पास आते देखा तब वे थोड़े शांत हुए ...बाद में बेटियां देर तक चिढाती रही ,यदि हम ज्यादा दूर आ गए होते तो तुम्हारी वो पिटाई होती . यह तो खैर मजाक की बात है .
अब कुछ गंभीर हो जाए ... हम सब उन सज्जन के इस कार्य से बहुत प्रभावित हुए ...यदि इस तरह के जागरूक लोग खाली सड़कों अथवा भीड़- भाड़ वाले स्थानों पर अपनी सजगता दिखाएँ तो यह दुनिया /समाज लड़कियों /महिलाओं के लिए कितना सुरक्षित हो जाए . समाज के ऐसे जागरूक नागरिकों का होना हौसला देता है . एक विश्वास जगाता है ...सभ्य नागरिक बदतमीजियों/प्रताड़ना को अनदेखा ना करते हुए इस प्रकार अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करे तो लड़कियों /महिलाओं के लिए एक सुरक्षित समाज की स्थापना से कौन रोक सकता है !
मुझे गर्व है इस शहर के इस जिम्मेदार नागरिक पर ....थोड़ी थोड़ी जागरूकता हम सब भी दिखाएँ . ना सिर्फ लड़कियों या महिलाओं के सम्बन्ध में बल्कि किसी के साथ भी . जहाँ भी कुछ गलत /बुरा घटता दिखे क्योंकि प्रताड़ना और दुर्घटनाओ के शिकार तो पुरुष भी होते ही हैं !
क्या संयोग है कि इसी दिन आनंद द्विवेदी जी की यह रचना भी पढ़ी ...
"आओ कुछ और करें !



