बुधवार, 23 मई 2012

आपका नाम क्या है!.......थैंक्स ,राम !(2)

थैंक्स, राम ! से आगे ....


दूसरी ओर फोन पर आर्णव हमेशा की तरह अस्तव्यस्त ..."मेरी चौकलेटी शर्ट नहीं मिल रही , और वो पीली फाईल भी "
अब 2000 किलोमीटर की दूरी से भी मैं तुम्हे ये बताऊँ कि तुम्हारी कौन सी चीज कहाँ रखी है ?
अंजना को खीझ होनी चाहिए थी , मगर वह मुस्कुरा रही थी ...वह आर्णव की उस पर निर्भरता के इन पलों को बहुत इंजॉय करती है .

कहता है आर्णव ..."तुम लड़कियां बहुत चतुर होती हो ...अपनी जड़ें छूटने का पूरा बदला हम बेचारे मासूम लड़कों से लेते हुए हमारी हर एक चीज , हर एक आदत पर अपना अधिकार जमाते हुए अपनी मर्जी से बनाती , बिगाड़ देती हो ... तुमने भी मेरी सारी आदतें बिगाड़ दी है , मैं अपनी सब चीजें व्यवस्थित रखता था , अब मुझे अपने हर काम के लिए तुम पर निर्भर होना पड़ता है "
अंजना में नहले पर दहला मारने से नहीं चूकती ," पता है मुझे ,तुम्हारा व्यवस्थित रहना कैसा होता था ...एक सूटकेस में कुछ जोड़ी कपड़े , फालतू के कागज़ , ज्यादा हुआ तो एक परफ्यूम की बॉटल ...अलमारी , ताकों पर बेकार के कागजों का ढेर , जिन पर मनों धूल जमी होती थी ... शुक्र मानो , तुम्हे घर में रहना हम लड़कियां ही सिखाती हैं, वरना तुम्हारे लिए घर और जंगल में क्या अंतर होता है..."

खुद के प्रति लापरवाह आर्णव... ताजा खाना फ्रिज में ठूंस कर आई थी ,उसके अलावा मठरियां , लड्डू भी ...जानती है , हर काम इत्मीनान से करने वाले आर्णव को बस खाना ठीक से खाने की फुर्सत नहीं होती ...रोज ऑफिस के लिए घर से निकलने से पहले खाने की थाली लिए उसके पीछे चक्कर काटना पड़ता है ...कई बार झुंझलाती है अंजना , खाना तो ढंग से बैठ कर खा लो मगर हमेशा की तरह आर्णव का वही गीत..." आज फिर देर हो गयी है "...

जब स्कूल में उसकी मोर्निंग शिफ्ट शुरू हो जाती है तो स्टाफ रूम से फोन पर आर्णव को खाना ठीक से खा लेने को कहते हुए वह एक नजर उसकी साथी शिक्षिकाओं को कोहनियों से एक दूसरे को टोहका मारते देख आँखें तरेर देती है ...नारी  जागृति  मंच से जुडी मिशेल कई बार ताना मारती है " तुम्हारी जैसी नारियां तो मेरे नारी सशक्तिकरण मंच की हवा ही निकाल कर रख देंगी , तुम्हारा पति कोइ बच्चा है ??"
" अरे बाबा , जिससे प्यार करते हैं , उसकी चिंता तो रहती ही है, ये नारी ,पुरुष की बात नहीं है ना ..." अंजना मुस्कुराने  लगती  थी ...

"तुमने नाश्ता किया या नहीं"
"नहीं , ऑफिस में ले लूँगा"
"इतना कुछ बना कर आई हूँ .थोडा तो खा लेते , कितनी तेज गर्मी है , भूखे पेट घर से मत निकलो "
"तुम कब लौट रही हो अपने घर"
"काकी से कह देती हूँ , एक दिन में ही सारी रस्में निपटा दे" चिढ़ा रही थी अंजना ... "अच्छा सुनो , राशिका जी के परिचित का सामान पहुंचा दिया"
"वही देने तो आई हूँ , यही पास में ही लीना का घर भी है , उसे लेते हुए घर लौटना है"
"अच्छी तरह चल रही है शादी की तैयारियां??"
"हाँ , बस तुम्हरी कमी लग रही है , सब पूछ रहे थे कंवर साहब क्यों नहीं आये ,"
"तुम जानती तो हो , औडिट का काम चल रहा है , मैं नहीं सकता था ...शादी के माहौल को एन्जॉय करो और जल्दी लौटो "....
"बाय.. टेक केअर"
आर्णव की कलिग राशिका जी का ससुराल भी यहीं था  ...लम्बी दूरी पर रहने वाले परिचित जैसे सामान पहुँचाने वालों की ताक में ही रहते हैं , जैसे ही पता चलता है कि कोई उनके शहर जाने वाला है , लाने और ले जाने वाले सामान या उसकी लिस्ट के साथ हाज़िर हो जाते हैं ...आरामदायक यात्रा के लिए कम से कम सामान ढ़ोने का आपका सपना साकार होने से पहले ही ढह जाता है ...दूरियों के मारे स्नेह से भीगते लोगों को इनकार भी तो नहीं किया जा सकता ...खुद काकी ने कई बार परिचितों के माध्यम से उसके लिए ख़ास हैदराबादी नान खटाई , टमाटर और इमली की खट्टी चटनी के साथ कई प्रकार के लहसुनिया अचार भेजे हैं उसके लिए !
राशिका जी का सामान पहुंचा कर अंजना फटाफट लीना के घर पहुंची ...लीना यूँ तो उसकी रिश्तेदार है , मगर साथ ही अच्छी सहेली भी है...अंजना के हैदराबाद पहुँचते ही धमकी भरा फ़ोन खुड़का दिया ,
" तुम रही हो या मैं जाऊं , चूल्हे पर चढ़ी दाल और आटे में डला पानी यूँ ही छोड़ कर "
भरोसा नहीं है लीना का , उसी हाल में घर छोड़ कर भागी आये ...
" तुम्हारे पड़ोस में ही काम है मुझे , मैं ही आती हूँ , मगर जरा फ्रेश तो हो लूं , तुम तैयार रहना , साथ ही लौटेंगे संगीत में ...
काकी को सामान अर्जेंट पहुंचा कर जल्दी लौटने का वास्ता देकर बड़ी मुश्किल से मनाया ...
"एक तो ऐन टाइम पर पहुंची हो , अब घूमने चल दी ....बहू के घर आज मेहंदी की रस्म है , वहां भेजे जाने वाले गहने ,कपड़े तो देख ले ...सब तो तैयारी हो गयी है , बस बहू की छोटी बहन के लिए कुछ लाना रह गया था '...

"आपकी तैयारी है तो सब कुछ परफेक्ट ही होगा , फिर भी जो रह गया है मैं लीना के साथ मार्केट से ले आउंगी ...क्या लाना है , साडी या सलवार कमीज" ...
"तू देख ले , जो तुझे पसंद हो ,ले आना , मगर समय से लौटना , फिर हमें यहाँ से मैरिज हौल भी जाना है , तू कुछ रिहर्सल भी कर लेती महिला संगीत के लिए"

हंसी आती है अंजना को , मेहंदी लगाते महिलाओं की हंसी -ठिठोली के बीच गाये जाने वाले विवाह गीतों का स्थान एक- एक कर स्टेज पर फ़िल्मी गीतों पर नृत्य कला के प्रदर्शन ने ले लिया है ..
उसे याद आया ...महिला संगीत में बहनों की ओर से क्या बांटा जाएगा ...सीमा से पूछा उसने ," जीजी, मैं ले आई हूँ , आप निश्चिन्त रहें "
ठीक है , कितने रूपये देने हैं , मुझसे ले लेना ...अभी तो मैं भागती हूँ , फिर जल्दी लौटना भी है ...और वह रिक्शे में बैठ कर चली आये लीना से मिलने ...

"कहाँ है तेरी जली हुई दाल ,फ़ोन पर तो यूँ दिखा रही थी कि बेचारी गृहस्थी के बोझ से दबी जा रही है , देख रही हूँ कि तेरा खुद का बोझ कितना बढ़ गया है " लीना से गले मिलते उसके बढ़ते मोटापे की ओर इशारा किया अंजना ने ...

"ओये नजर मत लगा , खाते -पीते घर के हैं हम" ... गले मिलते लीना ने धौल जमा दिया उसकी पीठ पर
"हाँ , मासी तो तुझे कुछ खिलाती- पिलाती नहीं थी "....लीना की माँ को अंजना मौसी ही कहती थी .
दोनों सहेलियां चाय की चुस्कियों के बीच एक दूसरे के परिवारों के हालचाल पूछती बतियाने लगी ...

चल अब तू जल्दी कर . थोड़ी शॉपिंग करते हुए लौटना है घर ...सभी इंतज़ार कर रहे हैं वहां ...अंजना ने बाजार से ख़रीदे जाने वाले सामान की लिस्ट निकाली...
"यह सब तो यही पास में मिल जाएगा , तुझे याद है, वो किराये का मकान जिसमे हम रहा करते थे ...उस पूरे बाड़े को गिराकर एक नया शॉपिंग काम्प्लेक्स बना दिया गया है , वही कर लेते हैं सारी शॉपिंग "लीना ने लिस्ट पर नजर डालते हुए कहा ...

बाड़ा , एक बड़ी सी धर्मशाला रही होगी कभी ...किसी पुराने मारवाड़ी सेठ की बनवाई हुई ...शादियों में बारात को रुकवाने या शहर घूमने आये अतिथियों के सस्ते और आरामदायक निवास के लिए शहर में कई स्थानों पर धन्ना सेठों द्वारा धर्मशालाएं बनाई गयी थी , मगर समय के साथ इन धर्मशालाओं को नौकरी पेशा लोगों के रहने के लिए किराये पर दिया जाने लगा ...उसी बाड़े के एक हिस्से में लीना रहती थी अपनी माँ के साथ ...लीना के जन्म के कुछ समय बाद ही कम उम्र में विधवा हुई उसकी माँ ने बड़ी मुश्किलों के बीच उसका पालन पोषण किया ...पति के जाने के बाद ससुराल से ठुकराई छोटी दुधमुंही बच्ची को गोद में लिए मायके आ तो गयी थी मासी , मगर भाई -भाभियों पर बोझ बन जाना उसे मंजूर नहीं था ...बहुत जिद करने पर उसके भाई ने ही अपनी परिचित द्वारा उस बाड़े में मामूली से किराये पर आजीवन रहने का बंदोबस्त कर दिया था , मासी ने दूसरों के कपडे सिलते , खाना बनाते , पापड़ मंगोड़ी बना कर बेचते हुए भी लीना के लिए हर प्रकार की सुविधाएँ जुटाने में कोई कसर नहीं रखी थी ...मगर पिता के साये से महरूम लीना को पढने लिखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी , उसकी दुनिया सजना संवरना , फ़िल्में देखना और बस पूरे बाड़े में उछल कूद मचाये रखना ...

मित्रता मित्र के गुण -अवगुण से परे होती है , एक सामान विचारों अथवा स्वभाव का होना वांछनीय नहीं है ...कई बार लगता है उसे, बाकी रिश्तों की तरह मित्रता भी ईश्वर ही तय करता है वर्ना कहाँ अंजना जैसी धीर, गंभीर,  ज़हीन  और सादगी पसंद लड़की , किताबें जिसके हाथ से छूटती नहीं और कहाँ किताबों के नाम से ही दूर भागने वाली फैशन परस्त लीना ...कोई जोड़ नहीं था दोनों का , मगर फिर भी उनके बीच अच्छी मित्रता थी.
कुछ ही देर में दोनों सखियाँ शॉपिंग काम्प्लेक्स में दाखिल हो रही थी ...उसकी आधुनिक साजसज्जा देख कर यकीन ही नहीं कर सकता कोई कि यहाँ कोई पुरानी धर्मशाला रही होगी, जिसकी सीढियों पर दर्जन भर परिवारों की आवाजाही रहती होगी , नीचे एक कोने में दूध की डेयरी जहाँ कुछ भैंसे भी बंधी होती थी ...

" कुछ याद आया " लीना छेड़ रही थी उसे ...देख यहाँ कही दीवारों पर तेरा नाम तो नहीं ...
तू सुधरने वाली नहीं है ...
एस्केलेटर से सीढियाँ उतरते उसकी धीमी खटर पटर में सुना अंजना ने ..." आपका नाम क्या है "
चौंक कर देखा इधर -उधर ... कोई नहीं था ...लीना की शैतान मुस्कराहट अंजना को भी संक्रमित कर रही थी ...वह भी धीमे से मुस्कुराने लगी ।
मगर तब वह इस तरह मुस्कुराई नहीं थी ...
गुस्से से लाल- भभूका हो गया था उसका चेहरा , जब राह चलते एक किशोर ने रोक कर उससे पूछ लिया....
" आपका नाम क्या है " अंजना के बिगड़े मूड को देख कर लीना ने उसकी हथेलियाँ अपने हाथ में कसकर दबा ली थी ...



क्यों गुस्सा हो गयी थी अंजना इस कदर , नाम क्यों पूछा उससे किसी अनजान शख्स ने ...
क्रमशः

थैंक्स राम .......(4)

थैंक्स राम भाग एक , भाग दो , भाग तीन से आगे ....



महिला संगीत का आयोजन एक बड़े हॉल में था ...पहली बार मिली अंजना होने वाली भाभी से ...ट्रेडिशनल लहंगा ओढ़नी में प्यारी हंसमुख गुडिया- सी लगी ...लीना और अंजना बांह पकड़कर खींच लाई भाई को और होने वाली भाभी को भी  ...कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मां ने अंजना को टोका ..." आंजलि नहीं भरनी है ? "
भूल गयी थी अंजना ,हालाँकि घर लौटते समय मिठाई , पान और माला खरीद ली थी , आखिर माँ ने ही सलाह दी ...कोई बात नहीं , अभी जब वारना करेंगे तब भर देना ...

बीच चौक में कुर्सी पर बैठाया भाई को और उसकी गोद में सूखे मेवे , बतासे , मिठाई और पैसे रख पान का बीड़ा पकड़ा दिया ...घर में उपस्थित सभी महिलाएं दो ग्रुप बना कर दोनों ओर खड़ी हो गयी और फिर उनके बीच शुरू हो गयी दोहों की प्रतियोगिता ..आधुनिक अंदाज़ में महिला संगीत में फ़िल्मी गानों पर नृत्य की धूम के बाद पारंपरिक अन्ताक्षरी का सा लुत्फ़ , गर्व हुआ उसे ...आधुनिकता ने पारंपरिक उत्साह को लजाया नहीं था ...

" एडी म्हारी उजली जी ,कोई फाबो सूंतवा सूंठ
ऐसी चालूं ठुमकती जी कोई रंडुआ छाती कूट "

के जवाब में दूसरी ओर से आया सनसनाता तीर ...

" चार कूंट को नातनो जी कोई बांध्या मूंग मरोड़
पाड़ोसिया को डावड़ो जी कोई रह गयो मूंछ मरोड़ "

अंजना अपने ग्रुप का उत्साह बढ़ाते हुए दोहे याद दिला रही थी ..."

छह छल्ला छह मूँदडी जी कोई छल्ला भरी परात
एक छल्ला का कारण से कोई छोड्या माँ अर बाप !

गीत गाते आँखें भर आई माँ की , अंजना माँ के पास खिसक आई ..पलकों में रुका बाँध आंसुओं की राह निकल पड़ा ...बड़ी काकी भी अंजना के सिर पर हाथ फेरती सिसक पड़ी, ब्याह की रौनक तो छोरियां सा ही है ..वल्लभ का ब्याह में कोणी आई ...
याद आया अंजना को ...वल्लभ की शादी के बाद लौटते पापा कुछ देर के लिए उसके शहर आये थे ...जितनी देर  रुके   , टैक्सी बाहर खड़ी रही , उन्हें तुरंत लौटना था ..कल ज़रूरी मीटिंग है दिल्ली में , बस तुझे देखने की इच्छा हुई तो चला आया ,शादी में सब तुझे बहुत याद कर रहे थे , तेरी काकी की भी आँखें भर आई थी ..."छोरिय कोणी आई "

...अंजना को सहसा यकीन नहीं हुआ था ..दो बेटों की गर्विता माँ पुत्रवती होने के गर्व से तनी रहती थी " छोरियां हो जाव तो नाक कट जाव "..माँ को कितनी बार ताना दिया होगा उन्होंने ...माँ कुछ कहती नहीं थी , अंजना के बिफर पड़ने से पहले बस उसे अपने अंक में समेट लेती थी ...एक दिन पता चलेगा इन्हें कि बेटी की माँ होने का मतलब क्या होता है , उन काकी के बारे में यह सुनकर उसने अनुमान लगाया , आज माँ का गर्वीली मुस्कान से चेहरा खिल उठा होगा ...

पापा के जाने के बाद परिवार में पहला शुभ कार्य हो रहा था ...उन्हें याद कर सबकी आँखें एक साथ भर आयी ..
मारवाड़ म छोरियां स सीख जावा , आज कसी रोळ मचा राखी है , बड़ी बुआ माँ से कह रही थी , सुना अंजना ने ...लीना ने उनके मुंह की बात लपक ली ..." और क्या बुआ ...हमारी वियोगिनी मीरा का सलोनी राधा में कायांतर हो चुका है ...मेरी शादी में कितनी मुश्किल से मनाया था इसे "..

लीना की शादी अचानक ही तय हुई थी ...अंजना को अपने माता पिता के पास असाम लौट जाना था ...उसके पिता वहां एक चाय बगान में प्रशासनिक पद पर कार्यरत थे ... उत्तर पूर्वी राज्यों में स्थानीय निवासियों में प्रवासियों को विशेषकर मारवाड़ियों को लेकर बहुत आक्रोश था , आये दिन होने वाले उपद्रव के बीच चिंतित माता- पिता ने उसे अभी कुछ और दिन हैदराबाद ही रुकने की सलाह दी थी ...राजमंद्री से मौसी का फोन था ...बस हमेशा अपने ददिहाल के परिवार से मिल कर ही चले जाना है तुझे , हम तो जैसे कुछ लगते ही नहीं तेरे , इस बार कुछ नहीं सुनूंगी तेरी , विकास को भेज रही हूँ लिवाने ...दूसरे दिन ही आ गया था विकास , उसे जाना पड़ा ...अपने हमउम्र भाई-बहनों के बीच खूब मन लगा उसका , दो सप्ताह कैसे बीत गाये , पता ही नहीं चला ...विदा करते मौसी भावुक हो गयी थी ," आती -जाती रहा करो"...

हैदराबाद लौटने पर पता चला कि इस बीच लीना का रिश्ता तय हो गया था ...किसी समारोह में देखा था उसे निखिल के परिवारवालों ने और नेवी में कार्यरत अपने बेटे के लिए हाथ मांग लिया था लीना का ...मासी इनकार करती भी तो कैसे , अच्छा परिवार , अच्छी नौकरी ...वह हैरान थी क्या लीना भी राजी है इस रिश्ते के लिए ...काकी ने उसे झिड़क- सा दिया ," और क्या चाहिए था , इतना अच्छा रिश्ता है , लड़का भी देखने में ठीक- ठाक है "
दूसरे दिन सुबह सवेरे ही जा पहुंची थी लीना के घर ...पूरा घर अस्तव्यस्त ,सामान से अटा पड़ा था ...सही मौके पर आयी , मासी ने उसे बाँहों में भर लिया...अच्छा परिवार मिल गया , मैंने सोचा की इस रिश्ते को चूकना ठीक नहीं ...
मगर मासी इतनी जल्दी में ...
हाँ , अच्छा खासा लड़का है , लीना भी मिल चुकी है ..जल्दी क्या बेटा , बेटियों को तो एक दिन पराया होना ही है , लड़का नेवी में हैं , वहां जाने से पहले उसके पेरेंट्स शादी कर देना चाहते हैं ..परसों सगाई है और पंद्रह दिन बाद शादी ...
लीना , तू खुश तो है ...
हां रे , ऐसे क्यों पूछ रही है ...
नहीं , वो ...उस दिन ...वो लड़का ...अंजना अटक रही थी ...
क्या वो लड़का ,छोड़ उसे ...

कुछ कही तड़क गया , छोड़ना इतना आसान !! वही उसे तसल्ली भी थी कि लीना खुश है ...
अगले पंद्रह दिन पलक झपकते ही गुजरने थे ...लीना की चंडाल चौकड़ी(सत्या , पूर्णिमा , ख़ुशी , गीतांजलि ,विनय , ) रात -दिन मुस्तैद रहती थी वहीँ ,रामदास और राजू भी उनके साथ लगे रहते ...मासी को घबराते देख उन्होंने पूरा जिम्मा खुद पर ले लिया था ...कैटरिंग , हलवाई , टेंट के साथ ही दहेज़ में दिए जाने वाले सारे सामान की खरीददारी , पैकिंग ...लीना ने काकी से मिन्नत कर कुछ दिन उसे अपने पास ही रोक लिया था ...दिन भर खरीददारी , फिर शाम को पैकिंग करना , ऐनवक्त पर अफरातफरी से बचने के लिए  सामान   को क्रमवार जमाना और फिर मिलकर सबके लिए खाना पकाना ...उन लोगों ने मासी को परिवार की कमी महसूस नहीं होने दी ...मासी की कई बार आँखें भर आती ...तुम लोग नहीं होते तो मैं कैसे कर पाती यह सब कुछ ...

एक दिन शाम को सामान की लिस्ट चेक करती , दिन भर के खर्चों का ब्यौरा लिखती मासी के पास बैठी थी अंजना , बाकि लड़कियां खाना बनाते चुहलबाजी में लगी थी ...मासी ने तकिये का सहारा लेते हुए पैर सीधे कर लिए ...थक गयी थी ...तभी रामदास आकर मासी के पास बैठ गया ... मासी , आपके पैर दबा दूं कहता हुआ सचुमच ही उनके पैर दबाने लगा ...
तू दबा ले पैर , मगर इससे कोई फायदा होने वाला नहीं है ..
मौसी उसे आँखें दिखा रही थी , एक चोर मुस्कान उसने सभी के चेहरे पर देखी , उसे माजरा समझ नहीं आया ...

गेलो पग दाबता कठई गलो भी दबा देव , मासी ध्यान राखजो ...(पागल कहीं पैर दबाते हुए गला दबा दे, ध्यान रखना )सबके सामने व्यक्तिगत बात करते समय मासी से मारवाड़ी में बात करती थी अंजना और लीना ..

क्या बोला मासी , मुझे समझ नहीं आया !
जब ये सब लोग तेलगु में बात करते हैं तो मैं पूछती हूँ कभी कि क्या बोला , समझा दो मासी ...

उनकी अप्रत्यक्ष नोंक झोंक चलती रहती थी ...नाम पूछने वाले हादसे के बाद रामू की कभी हिम्मत नहीं हुई उससे सीधे बात करने की ...पता नहीं तेलगु में क्या गिटर- पिटर करता रहता मीना से , वह कई बार लीना से उलझ जाती " मैनर्स नहीं हैं तुम लोगों में , जानते हो, मुझे तेलगु नहीं आती , फिर भी उसी भाषा में बात करते हो ,"
रामू ने ऐसे हीएक दिन एक कागज -पेन लाकर लीना को देते हुए कुछ कहा ...लीना ने कागज सरका दिया उसके आगे ," देखना , जरा ये प्रॉब्लम सोल्व कर दे , मैंने तो मैथ्स पढ़ी नहीं है "
उसने देखा  ट्रिग्नोमैट्री   का कोई सवाल था , उसका मनपसंद विषय ...उत्साह से ले लिया कागज.
तू इसे सोल्व कर मैं आती हूँ अभी ...लीना रामू के साथ बाहर चली गयी .

ये क्या हो गया है मुझे , सब कुछ ब्लैंक , ये आसान- सा सवाल मुझसे हल नहीं हो रहा ...दिमाग में अजीब -सी बेचैनी महसूस की उसने ...सर को हाथों से पकड़ कर दीवार के सहारे सरक गयी ...क्या हो रहा है ... बेबसी में कुछ बूँदें आंसुओं की ढलक पड़ी , कागज भी गीला होने लगा !

अंजना को इस हाल में देख लीना घबरा गयी ...

क्या हुआ अंजू , तू ठीक तो है ...छोड़ ये सब ...उसके हाथ से छीनते हुए उसने कागज- पेन फेंक दिया !

कुछ नहीं , सिर में बहुत अजीब -सा लग रहा है , जैसे मैं सब पढ़ा- लिखा भूल गयी हूँ !
हो जाता है कभी -कभी , तू आराम कर ले थोड़ी देर , इधर बहुत भाग दौड़ हो गयी ...बहुत परेशान कर रही हूँ ना मैं तुम सबको .

अंजना तकिये का सहारा लेकर लेट गयी , पता नहीं कब उसे नींद आ गयी ..उठी तो शाम का धुंधलका हो चुका था ...
मुझे उठाया नहीं , कितनी देर तक सोती रही मैं ..सबको अपने काम में लगे देख एक अपराध बोध महसूस किया उसने .

कोई गल्ल नहीं है जी ,अब बाकी का काम आप ही कर लेना ...सत्या ने कहा .आज से विनायक के गीत शुरू होंगे शाम को , नाच, गाना , मस्ती सब तुझे ही करने होंगे ...

चुप कर , ये नाच ,गाना, मस्ती तुझे ही मुबारक ...मैं तो दर्शक ही रहूंगी .

और सचमुच उस रात खूब धमाल हुआ ...पधारों म्हारा घरां विनायक के साथ काल्यो कूद पड्यो , टूटी बाजूबंद री लूम जैसे मारवाड़ी गीत तो गुजराती गरबा , पंजाबी गिद्धा , भांगड़ा सब एक साथ ..अंजना चुपचाप बैठी देखती रही , उसे इनमे कोई रूचि नहीं थी ..
दूसरे दिन सगाई का कार्यक्रम था ...लीना के ससुराल जाना था शगुन लेकर और अंगूठी पहनने की रस्म भी वही अदा होनी थी ...यूँ तो दुल्हन का शादी से पहले जाने का रिवाज़ नहीं था , मगर लीना के ससुराल वालों ने नई पहल करते हुए लीना को भी वहीँ बुलवा लिया था ...उस दिन काकी ने सौगंध दी अंजना को ...समाज का काम है , सौ लोंग इकट्ठे होंगे ...आज मैं तेरी नहीं सुनूंगी , बिंदी लगाएगी और बालों में फूल भी , साड़ी नहीं पहने तो कोइ बात नहीं , मगर मेरी इतनी बात तो तुझे माननी ही पड़ेगी ...
ओह! एक निःश्वास छोड़ी थी अंजना ने ...ये क्या रिवाज़ है यहाँ का , लड़कियों को बिंदी लगाना जरूरी है ...हल्के रंग के सादा चूड़ीदार कमीज के साथ बिना बिंदी के देख कई बार टोका था ...एक बार तो ट्रेन में गोरे चिट्टे भाई और बिंदी और फूलों से सजी सांवली भाभी के साथ अंजना को देख एक दक्षिण भारतीय परिवार ने भाभी को टोक दिया था ,"आपकी लव मैरिज है ...शादी मुस्लिम परिवार में हुई है क्या , ये दोनों भाई -बहन एक जैसे दिखते हैं , आप अलग हो "..भाभी ने बाद में बताया था और इस पर वे तीनों देर तक हँसते रहे थे ...

अंजना ने काकी की बात मान ली , दिन भर सिर पर भारी बोझ महसूस होता रहा था मगर काकी खुश थी , आज तूने मेरा मान रख लिया !

अंजना और लीना खोयी थी उन दिनों की याद में कि वल्लभ उनका हाथ पकड़कर तेज धुन पर झूमते भाई बहनों के बीच खींच लाया .....काका झूठ मूठ गुस्सा दिखाते हर कह रहे थे ..." दिन भर नाच गाना , मन नहीं भरा तुम लोगों का अभी " मगर सभी बच्चों ने उन्हें भी खींच लिया तो वे खुद को भी थिरकने से रोक नहीं पाए!

क्रमशः ...

थैंक्स राम ! (1)

अन्जना कई वर्षों के बाद लौट आयी थी इस शहर मे ...गगनचुम्बी अट्टालिकाएं और उन पर लगे बड़े- बड़े होर्डिंग्स ,घुप्प अँधेरी रात में भी रौशनी से जगमगाता निजामों का शहर हैदराबाद ... प्राचीन धरोहरों को बड़े करीने से संभाले यह शहर पुरातन और आधुनिकता का अनोखा संगम है ...जहाँ गुलजार हौज़ , शमशेरगंज , बेगम बाज़ार , सहित शहर की तंग गलियों में क्रिकेट की बॉल के साथ जूझते बच्चे तो वहीं आबिद रोड की चौड़ी सड़कों पर फ़र्राट बाईक दौडाते भी ...

चारमीनार के पास से गुजरते उसके चारों ओर ट्रैफिक की रेलमपेल .  भेलपुरी ,कट्लीस , डोसा , आमलेट की बंडीयां (थडीयां ), बांह भर हरी -लाल चूड़ियाँ खनकाती काले  क्रीमी   नकाब से झांकती सिर्फ़ आँखें . वहीँ चार मीनार के पास सड़कों के किनारे पर स्वादिष्ट चाट के चटकारे लेती महिलाएं.  उसे याद है शाम को घर से पैदल घूमते चारमिनार तक चक्कर काट आना ...  भेलपुरी , चाट का स्वाद , जीभ पर खट्टा -मीठा सा स्वाद तैर आया ...

लाड़ बाजार मे लाख के जडाऊ कड़ों का मोल -भाव करती दर्जन भर महिलाएं ...कुछ भी तो नहीं बदला था ...पत्थर गट्टी पर मोतियों के जगमगाते शो रुम के बीच अलग प्रभाव जमाता गार्डेन वरेली शोरुम . सड़क के दूसरे किनारे पर रेडीमेड सलवार कमीज ,मैचिंग दुपट्टे की छोटी दुकाने पीछे छोड़ता हुआ उसका रिक्शा आगे बढ़ रहा था ....उसे याद आया काकी के साथ छोटे भाईयों को उनके मिशन स्कूल से लेकर लौटते अनगिनत बार यहीं पेड़ के नीच गन्ने का जूस पिया जाता  था .  गुलज़ार हौज़ से घर की और पैदल ही लौटते दुकानों के बाहर चिल्ला कर ग्राहकों को आमंत्रित करते 
" देख लो दीदी . नयी डिजाईन के सलवार कमीज है या अम्मा ऐसे क्या करते . देख तो लो . नहीं जमे तो नक्को होना बोल देना "
कई बार पीछा छुड़ाना मुश्किल हो जाता था ...
 
काकी ठसक कर कहती ... क्या करते जी तुम , तुम्हारे मालिक को बोलती अभी .  ऐसे राह चलते लोगों को परेशान करते . हौला समझ के रखा है क्या हमको .
 बेचारे खिसिया कर अपनी राह नापते .

शहर की चहल पहल से आँखे मिलाते पता ही नहीं चला .  उसका रिक्शा छः लाईन पुल को कब का पीछे छोड़ चुका था ... सुल्तान बाजार चौराहे पर बहुमन्जिला इमारत के एक कोने पर तेज धूप मे चमकता आंध्रा बैंक का होर्डिंग ...
 
"बस यहीं रोक दो भैया" ....वर्षों बाद ऐसे रिक्शे पर बैठना हुआ था उसका ...पिता की नौकरी ने उसे मातृभूमि से अक्सर दूर ही रखा मगर जब भी हैदराबाद लौट कर आना होता तो घुटनों को पेट तक सटाए रिक्शे पर बैठे लोगों को देखकर बहुत हंसती थी ...कितने अजीब रिक्शे हैं ...और जब पूरा परिवार इन पर एक साथ लद कर निकलता तो नजारा देखने लायक होता था. रिक्शे पर चार सवारी एडजस्ट की जाती . दो बैठे हुए और दो नीचे पैर लटका कर . अंजना भाग छूटती .
 मुझसे नहीं बैठा जाता . मैं ऑटो से आउंगी .
उसी अंजना को आज क्या सूझा...?

" कहाँ जाना है अम्मा " घर से निकलते ऑटो रिक्शे वालों की पुकार को अनसुना कर जानबूझ कर यह रिक्शा पसंद किया उसने ...इन बीच के वर्षों में उसकी और आर्णव की नौकरी के के चलते कई छोटे -बड़े शहरों में प्रवास करना हुआ .

किसी शहर को जानना हो उसकी ख़ूबसूरती निहारनी हो तो  उसे पैदल घूमो या फिर छोटे रिक्शा में . तेज भागते वाहनों से भी कभी किसी शहर को जाना जा सकता है . अक्सर आर्णव कहता था .

और फिर ये तो उसका अपना शहर है. उसकी भीनी खुशबू को अपने नथुनों में भर लेना चाहती थी. जाने फिर कितने वर्षों बाद उसे यह मौका मिले ..उसे याद आया ,यहाँ पहुँचते ही उसे फोन करना था . पर्स से मोबाइल निकाल कर आर्णव का नंबर मिलाने लगी .


क्रमशः  थैंक्स राम ! (2)थैंक्स राम ! (3)थैंक्स राम ! (4)), थैंक्स राम ! (5), 
थैंक्स राम !  (6) आखिरी किश्त 


बहुत दिनों से नहीं , सालों से कहानियों के पात्र दिल और दिमाग में हलचल मचाते रहे हैं , देखूं... लेखनी से क्या कुछ कहते हैं!!