रविवार, 1 मई 2011

साहस और हौसले ने फैला दिया परचम .....





तस्वीरें खुद कहती हैं दास्ताँ बुलंद हौसलों की ....


ये साहसिक गाथा है 40वर्षीय गौतम मीणा की , जो राजस्थान पुलिस सेवा में कॉन्स्टेबल के पद पर कार्यरत है ...वर्ष 1983 से बाईक के साथ स्टंट करने वाले गौतम जयपुर जिले के जमवारामगढ़ तहसील के ग्राम शान कोटरा के निवासी हैं ...वर्ष 1992 में राजस्थान पुलिस,चित्तौरगढ़ में सिपाही के पद पर नियुक्त गौतम 2006 में सिपाही से कॉन्स्टेबल के पद पर पदोन्नत हुए ...अपने साहसिक हैरतंगेज कारनामों के बदौलत दिल्ली पुलिस ने इन्हें वर्ष 2004 में तथा सांसद किरोड़ी लाल मीणा ने भी वर्ष 2009 में बुलेट प्रदान की ...

अपने हैरतंगेज स्टंट के लिए मशहूर गौतम ने लिम्का बुक और वर्ड रिकोर्ड्स में भी स्थान प्राप्त किया है ...6 मार्च 2005 को अपनी बाईक पर खड़े होकर 13 मिनट और 3 सेकण्ड में 10,124 मीटर की दूरी तय कर सबसे लम्बी और तीव्र गति का लिम्का रिकोर्ड बनाया ...गौतम गिनीज़ वर्ड रिकोर्ड में भी अपना स्थान बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं !

अपने साहसिक कारनामों के उम्दा प्रदर्शन के लिए गौतम 125/होंडा एक्स़ल ,कावासाकी या यामाहा की दरकार रखते हैं , जिसके लिए सरकार से 6 लाख के बजट पास करने अनुरोध किया है ,वर्ष 2008-09 में 4 लाख का बजट पास भी हो चुका है !





शनिवार, 16 अप्रैल 2011

आवारा सडको पर कभी -कभी इत्तिफाक से ...

हमारा शहर जयपुर ना सिर्फ देश बल्कि विश्व में ऐतिहासिक , संस्कृति एवं धार्मिक पर्यटन के लिए जाना जाता है, मगर कहते हैं ना कि "घर का जोगी जोगना बाहर का सिद्ध" ... शहर के कई पर्यटन/धार्मिक स्थल अभी भी अनदेखे रहे हैं , हालाँकि कई बार उनके सामने से होकर निकलना हो जाता है , मगर "फिर कभी" कहते हुए वे इतने वर्षों में भी अनदेखे ही रह गए हैं ...ऐसा ही एक प्रसिद्द मंदिर है " जयपुर का गढ़ गणेश मंदिर "...गूगल पर पर्यटन स्थलों की खोज में इसे ढूँढने की कोशिश की ,मगर इस मंदिर पर कोई विशेष सामग्री मौजूद नहीं है...जबकि मोती डूंगरी गणेश मंदिर की तरह ही यह गणेश मंदिर भी जयपुरवासियों की आस्था का केंद्र है ...

ऊँची पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर में भी प्रत्येक बुधवार को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है ...पिछले दिनों जब बेटियों को ज्ञात हुआ कि उनका भाई (कज़िन लिखना बहुत अजीब लग रहा है ) प्रत्येक बुधवार को जिस मंदिर में दर्शन करने जाता है , वह ऊँची पहाड़ी पर है और वे कभी वहां गयी नहीं है तो ठिनकना शुरू हो गया उनका " हमें भी जाना है "...बुधवार का इंतज़ार भी नहीं करना चाहती थी ...चूँकि उस मंदिर में बुधवार के अलावा लोगों की ज्यादा आवाजाही नहीं होती , और रोज अख़बारों की हेड लाईन्स शहरों के असुरक्षित होने की गवाही देती हुए अभिभावकों को कितना डराती हैं ... इसलिए अनुमति देते हुए हम थोडा हिचकिचा रहे थे ..मगर जैसे- तैसे चारों बच्चों ने मिलकर हमसे सहमति ले ही ली ...हजार तर्क होते हैं , आप ही तो कहते हो , अपने आप आना- जाना सीखो , अभी तो भाई भी साथ है , और कोई हम घूमने दोस्तों के साथ नहीं जा रहे हैं , मंदिर ही तो जाना है ... इन नयी पीढ़ी के बच्चों से सीखे कोई तर्क से अपनी बात मनवाना ...

सुबह जल्दी उठकर कम्प्यूटर से मगजमारी मेरे लिए कोई नयी बात नहीं है , सुबह 5 बजे ही बेटी का मोबाइल बजा ...भाई अपने घर से रवाना हो चुके थे ...15 मिनट में तो दोनों हाज़िर ...उत्साहित बेटियां फुर्ती से तैयार हुई , मेरी चुटकियों को नजर अंदाज करते हुए ...खाली पेट इतनी ऊँचाई चढ़ना ठीक नहीं है , समझाते हुए बड़ी मुश्किल से केला खाने को राजी किया ...6 बजे उनका काफिला घर से रवाना हो गया ...चली तो गयी बड़ी ख़ुशी- ख़ुशी , मगर जब उस चढ़ाई पर पहुंची तो प्यास के मारे बुरा हाल ... चूँकि उन्हें खड़ी चढ़ाई का अंदाजा नहीं था और रास्ते में पानी का इतंजाम भी नहीं ... मगर वहां पहुँचने के बाद उनके आनद की सीमा नहीं थी ...सुबह सवेरे पक्षियों कोयल , मोर और चिड़ियों आदि की बोलियाँ सुनते हुए पहाड़ी से पूरे शहर का विहंगम नजारा , और मंदिर के दर्शन ...अब मैं तो साथ थी नहीं मगर तस्वीरों और उनके बताये विवरण से ही लिख रही हूँ ...कभी मेरा जाना हुआ तो बाकायदा इस मंदिर के इतिहास और तस्वीरों के साथ विवरण भी होगा ...दरअसल आज की पोस्ट लिखने का कारण बच्चों का घूमना नहीं , बल्कि लौटते समय हुआ एक रोचक वाकया है ...

दोनों बेटियां अपनी स्कूटी पर और भतीजे अपनी बाईक पर खाली सड़कों पर ट्रैफिक नहीं होने का लाभ लेते हुए आड़ी- तिरछी गाड़ियाँ चलाते हुई लौट रहे थे ...छोटा भतीजा पीछे रह गयी अपनी बहनों को चिढाता मोबाइल से उनकी तस्वीरें खिंच रहा था ... बेटी भी स्पीड तेज करती हुई उनसे आगे निकल गयी ...उनके पीछे आ रही एक कार में एक सज्जन यह सब देख रहे थे ...भतीजों की बाईक को रोकते हुए उनसे तस्वीरें खींचने पर डांट लगाने लगे ...जब बच्चों ने उन्हें बताये कि वे अपनी बहनों के साथ है, और उन्हें स्कूटी मोड़ क़र उनके पास आते देखा , तब वे थोड़े शांत हुए ...बाद में बेटियां देर तक चिढाती रही ,"यदि हम ज्यादा दूर आ गए होते तो तुम्हारी वो पिटाई होती "...यह तो खैर मजाक की बात है ...

अब कुछ गंभीर हो जाए ... हम सब उन सज्जन के इस कार्य से बहुत प्रभावित हुए ...यदि इस तरह के जागरूक लोंग खाली सड़कों अथवा भीड़- भाड़ वाले स्थानों पर अपनी सजगता दिखाएँ तो यह दुनिया , समाज लड़कियों /महिलाओं के लिए कितना सुरक्षित हो जाए ...ऐसे समय में जब चेन लूटने से अथवा बदतमीजी का प्रतिरोध करने वाली लड़कियां/महिलाएं ट्रेन के डब्बों से उठाकर पटरियों पर फेंक दी जाती हैं , बोरी में पार्सल कर भिजवा दी जाती है ,समाज के ऐसे जागरूक नागरिकों का होना हौसला देता है , एक विश्वास जगाता है ...सभ्य नागरिक बदतमीजियों/प्रताड़ना को अनदेखा ना करते हुए इस प्रकार अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करे तो लड़कियों /महिलाओं के लिए एक सुरक्षित समाज की स्थापना से कौन रोक सकता है ...
मुझे गर्व है इस शहर के इस जिम्मेदार नागरिक पर ....थोड़ी थोड़ी जागरूकता हम सब भी दिखाएँ , ना सिर्फ लड़कियों या महिलाओं के सम्बन्ध में , बल्कि किसी के साथ भी ,जहाँ भी कुछ गलत /बुरा घटता दिखे ...क्योंकि प्रताड़ना और दुर्घटनाओ के शिकार तो पुरुष भी होते ही हैं !

क्या संयोग है कि इसी दिन आनंद द्विवेदी जी की यह रचना भी पढ़ी ...
"आओ कुछ और करें !"



एक मानवीय कमजोरी बहुत दिनों से चिढ़ा रही है ...हम लोंग अपना दुःख तो बहुत जल्दी दूसरों के साथ बांटते हैं , मगर खुशियाँ अकेले ही सेलिब्रेट करते हैं ...एक पोस्ट लिखी थी , बेटे की बीमारी के बारे में "बेटा बीमार है "... सभी ब्लॉगर्स की दुआ भी काम आई और आज वह एकदम स्वस्थ चित्त अपने पैरों पर खड़ा है ... बहुत दिनों से इस ख़ुशी को बांटना चाह रही थी ..आखिर आज लिख ही दिया ...

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

माया की भारती .....


अपनी एक पोस्ट में मोहल्ले की सफाई कर्मी महिला "माया "के बारे में लिखा था ...अक्सर उसकी बेटी की पढ़ाई के बारे में पूछताछ करते रहती हूँ ...एक दिन बड़ी ख़ुशी -ख़ुशी कहने लगी ," आपके घर कौन सा अखबार आता है, मेरी बेटी ने रविन्द्र मंच पर अपने विद्यालय के वार्षिकोत्सव में भाग लिया था , उस अखबार में उसकी फोटो छपी थी ...कार्यक्रम की सूचना और रिपोर्ट और तस्वीरें तो बहुत से अखबार में है , मगर मेरी बेटी की तस्वीर उस विशेष अखबार में ".... चूँकि मैं वह समाचार पत्र नहीं लेती ,उसको थोड़ी निराशा हुई ..आगे उसने बताया कि भारती (माया की बेटी ) का उस विद्यालय में आखिरी साल है , अब उसे दूसरी स्कूल में एडमिशन दिलाना है , मगर आर्थिक और सामाजिक मजबूरियों के कारण शायद यह संभव नहीं हो पाए ...

मुझे लगा कि भारती का परिचय ब्लॉग पर लिखना चाहिए ...ब्लॉग के बारे में वो नहीं समझती ...उसे लगा कि उसकी बेटी का परिचय अखबार में लिखा जाएगा , और उसकी इच्छाशक्ति तो देखिये , वर्षा जी ने डेली न्यूज़ में इस पर लिखने की अनुमति दे दी ...



भारती चंडालिया
भारती चंडालिया ... पिता का नाम कैलाश चंडालिया ... माता का नाम माया चंडालिया ... मैं लिटिल स्कॉलर्स स्कूल , मानसरोवर में पढ़ती हूँ ... मेरे मातापिता बहुत मेहनती हैं ... मैं शिक्षिका बनकर अपने माता पिता का नाम रौशन करना चाहती हूँ ......
अपना यह परिचय उसने अंग्रेजी में लिख कर दिया और उसके साथ दो सर्टिफिकेट नत्थी थे ...

भारती ने बैडमिन्टन और स्पून रेस प्रतियोगिता में विद्यालय में पहला और दूसरा पुरस्कार भी प्राप्त किया है ...अभी कुछ दिनों पहले भारती ने जयपुर के रविन्द्र मंच पर विद्यालय के वार्षिकोत्सव कार्यक्रम में भी भाग लिया था ...
पहली नजर में इतना कुछ ख़ास नहीं नजर आता इस परिचय में ...मगर यदि इस परिचय को घर -घर कचरा इकठ्ठा करने वाली सफाईकर्मी की पुत्री के रूप में देखें तो .....

आम सफाईकर्मियों से अलग साफ़ सुथरे रहने वाले व्यवहारकुशल माया और कैलाश (भारती के माता- पिता ) अपने बच्चों की शिक्षा के लिए बहुत जागरूक है ...माया बड़े उत्साह से बताती है कि उसके बच्चे अंग्रेजी माध्यम वाले डे -बोर्डिंग स्कूल में पढ़ते हैं ....इस वर्ष उसकी बेटी आठवीं की परीक्षा दे रही है ....अब उनकी समस्या यह है कि उसके बच्चे जिस विद्यालय में पढ़ते हैं , वह सिर्फ आठवीं तक ही है , इसके बाद भारती को दूसरे विद्यालय में प्रवेश लेना होगा ...उसकी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के उत्साह को देखते हुए यहाँ विद्यालय प्रबंधन ने उनकी आधी फीस माफ कर दी थी ...मगर नए सत्र में बढ़ी हुई फीस दरें आधी करने पर भी आर्थिक बोझ को बढ़ाएंगी ही, माया की चिंता है कि वह इतनी फीस कहाँ से चुका पायेगी ...उधर भारती रो -रोकर हलकान अपनी माँ से कह रही है कि उसे अच्छी स्कूल में ही दाखिला दिलाये , सड़कों की सफाई और कचरा एकत्रित करने में वह उसकी मदद कर देगी , मगर उसकी शिक्षा में खलल ना डाला जाए ...हालाँकि माया स्वयं भी अच्छे स्कूल में अपनी बेटी के एडमिशन के लिए प्रयासरत है मगर उसे एक उम्मीद भी है कि कोई सहृदय विद्यालय प्रबंधन उसकी बेटी की अच्छी शिक्षा में उसकी मदद कर दे तो भारती का भविष्य संवर जाए ...

इस परिवार का जो गुण बहुत प्रभावित करता है ,वह है अपने काम को छोटा नहीं मानना ....बच्चे अपनी माँ के साथ कचरा एकत्रित करने में कोई हेठी नहीं समझते हैं , इसे लेकर उनके मन में कोई हीन भावना नहीं है , कम से कम अभी तक तो ....अल्प आयवर्ग के अस्पृश्य माने जाने वाले लोगों में अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति इतनी जागरूकता और समाज की मुख्य धारा में सामान्य व्यक्ति की तरह ही जुड़ना एक सुखद बदलाव है ...समाज को सुशिक्षित बनाने में प्रयासरत जागरूक समाजसेवी यदि मदद कर सके तो इन हौसलों को पंख लग जाए और भारती की आँखों के सपने साकार हो और सामने हो एक स्वतंत्र खुला आसमान ...

सफाई कर्मियों में शिक्षा को लेकर ऐसी जागरूकता और जुझारूपन प्रभावित करता ही है , साथ ही ऐसे ही दूसरे अभिभावकों के लिए उत्प्रेरक का कार्य भी !