बुधवार, 23 मई 2012

थैंक्स राम ! (1)

अन्जना कई वर्षों के बाद लौट आयी थी इस शहर मे ...गगनचुम्बी अट्टालिकाएं और उन पर लगे बड़े- बड़े होर्डिंग्स ,घुप्प अँधेरी रात में भी रौशनी से जगमगाता निजामों का शहर हैदराबाद ... प्राचीन धरोहरों को बड़े करीने से संभाले यह शहर पुरातन और आधुनिकता का अनोखा संगम है ...जहाँ गुलजार हौज़ , शमशेरगंज , बेगम बाज़ार , सहित शहर की तंग गलियों में क्रिकेट की बॉल के साथ जूझते बच्चे तो वहीं आबिद रोड की चौड़ी सड़कों पर फ़र्राट बाईक दौडाते भी ...

चारमीनार के पास से गुजरते उसके चारों ओर ट्रैफिक की रेलमपेल .  भेलपुरी ,कट्लीस , डोसा , आमलेट की बंडीयां (थडीयां ), बांह भर हरी -लाल चूड़ियाँ खनकाती काले  क्रीमी   नकाब से झांकती सिर्फ़ आँखें . वहीँ चार मीनार के पास सड़कों के किनारे पर स्वादिष्ट चाट के चटकारे लेती महिलाएं.  उसे याद है शाम को घर से पैदल घूमते चारमिनार तक चक्कर काट आना ...  भेलपुरी , चाट का स्वाद , जीभ पर खट्टा -मीठा सा स्वाद तैर आया ...

लाड़ बाजार मे लाख के जडाऊ कड़ों का मोल -भाव करती दर्जन भर महिलाएं ...कुछ भी तो नहीं बदला था ...पत्थर गट्टी पर मोतियों के जगमगाते शो रुम के बीच अलग प्रभाव जमाता गार्डेन वरेली शोरुम . सड़क के दूसरे किनारे पर रेडीमेड सलवार कमीज ,मैचिंग दुपट्टे की छोटी दुकाने पीछे छोड़ता हुआ उसका रिक्शा आगे बढ़ रहा था ....उसे याद आया काकी के साथ छोटे भाईयों को उनके मिशन स्कूल से लेकर लौटते अनगिनत बार यहीं पेड़ के नीच गन्ने का जूस पिया जाता  था .  गुलज़ार हौज़ से घर की और पैदल ही लौटते दुकानों के बाहर चिल्ला कर ग्राहकों को आमंत्रित करते 
" देख लो दीदी . नयी डिजाईन के सलवार कमीज है या अम्मा ऐसे क्या करते . देख तो लो . नहीं जमे तो नक्को होना बोल देना "
कई बार पीछा छुड़ाना मुश्किल हो जाता था ...
 
काकी ठसक कर कहती ... क्या करते जी तुम , तुम्हारे मालिक को बोलती अभी .  ऐसे राह चलते लोगों को परेशान करते . हौला समझ के रखा है क्या हमको .
 बेचारे खिसिया कर अपनी राह नापते .

शहर की चहल पहल से आँखे मिलाते पता ही नहीं चला .  उसका रिक्शा छः लाईन पुल को कब का पीछे छोड़ चुका था ... सुल्तान बाजार चौराहे पर बहुमन्जिला इमारत के एक कोने पर तेज धूप मे चमकता आंध्रा बैंक का होर्डिंग ...
 
"बस यहीं रोक दो भैया" ....वर्षों बाद ऐसे रिक्शे पर बैठना हुआ था उसका ...पिता की नौकरी ने उसे मातृभूमि से अक्सर दूर ही रखा मगर जब भी हैदराबाद लौट कर आना होता तो घुटनों को पेट तक सटाए रिक्शे पर बैठे लोगों को देखकर बहुत हंसती थी ...कितने अजीब रिक्शे हैं ...और जब पूरा परिवार इन पर एक साथ लद कर निकलता तो नजारा देखने लायक होता था. रिक्शे पर चार सवारी एडजस्ट की जाती . दो बैठे हुए और दो नीचे पैर लटका कर . अंजना भाग छूटती .
 मुझसे नहीं बैठा जाता . मैं ऑटो से आउंगी .
उसी अंजना को आज क्या सूझा...?

" कहाँ जाना है अम्मा " घर से निकलते ऑटो रिक्शे वालों की पुकार को अनसुना कर जानबूझ कर यह रिक्शा पसंद किया उसने ...इन बीच के वर्षों में उसकी और आर्णव की नौकरी के के चलते कई छोटे -बड़े शहरों में प्रवास करना हुआ .

किसी शहर को जानना हो उसकी ख़ूबसूरती निहारनी हो तो  उसे पैदल घूमो या फिर छोटे रिक्शा में . तेज भागते वाहनों से भी कभी किसी शहर को जाना जा सकता है . अक्सर आर्णव कहता था .

और फिर ये तो उसका अपना शहर है. उसकी भीनी खुशबू को अपने नथुनों में भर लेना चाहती थी. जाने फिर कितने वर्षों बाद उसे यह मौका मिले ..उसे याद आया ,यहाँ पहुँचते ही उसे फोन करना था . पर्स से मोबाइल निकाल कर आर्णव का नंबर मिलाने लगी .


क्रमशः  थैंक्स राम ! (2)थैंक्स राम ! (3)थैंक्स राम ! (4)), थैंक्स राम ! (5), 
थैंक्स राम !  (6) आखिरी किश्त 


बहुत दिनों से नहीं , सालों से कहानियों के पात्र दिल और दिमाग में हलचल मचाते रहे हैं , देखूं... लेखनी से क्या कुछ कहते हैं!!

बारिश से तरबतर एक सप्ताहांत ....


केंद्रीय विभागों की तर्ज पर ही राजस्थान में कर्मचारियों के लिए पांच दिन का सप्ताह किये जाने की घोषणा पिछली सरकार के समय की गयी थी, जिसके अंतर्गत पेट्रोल की खपत में कमी के एक उपाय के रूप में सरकारी विभागों में कामकाज की अवधि सोमवार से शुक्रवार तक की गयी . इसके तहत कार्यालयों में प्रतिदिन के कामकाज के समय में भी परिवर्तन किया गया . पहले के 10 से 5 कार्य करने के समय को 9.30 से 6 बजे तक कर दिया .
सरकारी दफ्तरों में कामकाज किस तरह होता है , हम सभी जानते हैं . ऐसे में पांच दिन के सप्ताह से कामकाज प्रभावित होने की सम्भावना ही ज्यादा थी . सर्दियों में दिन छोटा होने से अँधेरा जल्दी ही घिर आने के कारण भी कर्मचारियों के जल्दी दफ्तर छोड़ जाने की पूरी सम्भावना थी , मगर सरकार ने कर्मचारियों को इस समय के नियम का पालन करने को लेकर सख्ती दिखाई और धीरे -धीरे इसके सकारात्मक प्रभाव नजर आने लगे . कम से कम कर्मचारियों के परिवारजनों ने तो इससे राहत ही महसूस की . दफ्तर का समय सुबह 10 से घटाकर साढ़े नौ करने का ख़ास फर्क नहीं पड़ा , मगर इससे परिवार के लिए एक दिन अतिरिक्त मिलने लगा और यहाँ भी सप्ताहांत मनाने का रिवाज़ निकल पड़ा . सरकारी कर्मचारियों की पेट्रोल की खपत में कमी का तो पता नहीं , पारिवारिक सदभाव बढ़ने में जरुर सफलता मिली होगी ..

इस सप्ताहांत पर जब बहुत समय बाद घर से निकलना हुआ तो गाड़ियों की रेलमपेल के बीच दोनों छूट्टियों के दिन भी गुलजार हो रही सड़कें बता रही थी कि इस शहर को भी पांच दिन का सप्ताह रास आने लगा है .
रविवार को सूनी रहने वाली सड़कें अब गुलज़ार रहने लगी हैं . पिछले वर्षों में प्रोपर्टी मार्केट में बूम आने के बाद चौपहिया वाहनों की बढ़ी संख्या ने भी परिवार के साथ छुट्टियों मनाने वालों की संख्या में वृद्धि की है.
इस शनिवार को ट्रैफिक में फंसे हुए समीर जी की उपन्यासिका के कई अंश आँखों के सामने साकार हुए . लोंग भागे जा रहे हैं बाहर , क्या घर में बैठ कर परिवार जनों के साथ अच्छा वक़्त बिताते हुए छुट्टियाँ नहीं मनाई जा सकती या फिर पर्यटन के लिए शहर अथवा देश से बाहर जाना ही क्या आवश्यक है ...

गर्मी की छुट्टियाँ तो बच्चों की परीक्षाओं,शादियों की भेंट चढ़ी , रही सही कसर अस्वस्थता ने पूरी कर दी , नतीजन पूरी छुट्टियाँ घर में भरपूर आराम करते ही बीती . सोचा इस सप्ताहांत पर अपने ही शहर को नवीन दृष्टि से देख लिया जाए .

शनिवार का दिन झाड़खंड महादेव के दर्शन के लिए निकले . द्रविड़ स्थापत्य शैली पर आधारित यह शिव मंदिर इसे राजस्थान के अन्य प्रसिद्ध मंदिरों से अलग बनाता है . जन्मभूमि ही द्रविड़ों का प्रदेश है तो इस प्रकार की इमारतें , मंदिर, चित्रकारियां मुझे बहुत लुभाती है , इन स्थलों पर जाने पर बहुत दिन बाद बेटी का अपने मायके आने जैसा ही अहसास होता है . हम महिलाएं उम्र के किसी भी पड़ाव पर हों , ससुराल की परम्पराओं ,रीति -रिवाजों को निभाते उनमे ही रच बस गयी हो , मगर मायके की एक छोटी सी झलक भी स्मृतिलोक के कितने ही परदे भेद कर बचपन तक ले आती हैं . माँ को भी कई बार गुजरते देखती हूँ इन्ही अनुभूतियों से जब हुलस कर वे अपने मायके के बारे में बताती हैं ...ये रिश्ता बेटियों का बेटियों से पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता चलता रहता है .

झारखण्ड महादेव , जयपुर
आर्मी एरिया के पास होने के कारण यहाँ का प्राकृतिक वातावरण लुभाता है .मंदिर प्रशासन भी पर्यावरण के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध नजर आया . मंदिर के अहाते की छत डालते समय में पीपल या बरगद के बड़े पेड़ों को कटा नहीं गया बल्कि छत का वह हिस्सा खुला ही छोड़ दिया गया है .
मदिर के भीतर पक्षियों के चुग्गे और पानी के लिए बड़ी जगह सुरक्षित है , कबूतरों के ढेर के बीच सफ़ेद कबूतर भी नजर आये . यहाँ बड़ी संख्या में मोर भी हैं , हालाँकि मंदिर के बाहर हरे चारे के ढेरों के पास गायों और सांडों का हुजूम थोडा डराता भी है . मैं देख नहीं पाए , शायद कही आस पास ही मंदिर की अपनी डेयरी भी हो . देश में हर तरफ मंदिरों में भारी संख्या में धन मिलने की ख़बरों के बीच यह सब देखना सुखद लगा .
दूर से देखने पर मंदिर की बाहरी बाउंड्री के रंग इसे कहीं से भी मंदिर होने का आभास नहीं देते . सफ़ेद रंग की दीवार और खिडकियों और दरवाजों पर हरा रंग , बच्चों ने आश्चर्य से पूछा ," यहाँ मंदिर है ?"
भक्ति भी भला किस रंग का अवलंबन चाहती है ! हम इंसानों ने इसे अलग -अलग रंगों में बाँट दिया है .
शाम गहराने लगी तो बिरला मंदिर और मोती डूंगरी गणेशजी के दर्शन कर घर लौट आये ...

बिरला मंदिर , जयपुर बिरला मंदिर से ट्रैफिक का नजारा

दूसरे दिन आमेर किले के लिए निकले घर से , जलमहल तक आते -आते मौसम ने तेजी से करवट ली और बारिश के साथ लबालब सड़कों ने रास्ता रोक लिया . जलमहल की पाल से उमड़ते घुमड़ते बादल और बरसात ने इस पर्यटन स्थल की रौनक को चार चाँद लगा दिए थे .

बरसात में जलमहल का नजारा

बारिश में भीगते भुट्टे खाते लोंग जश्न मनाते नजर आये . पानी के निकास की सही व्यवस्था ना होने के कारण बहुत ज्यादा बारिश नहीं होने के बावजूद सड़कों पर नहर बन जाने जैसे हालात को देखते हुए वहीं से वापस लौट आना पड़ा . रास्ते में जयपुर नगर निगम का बोर्ड और उनके शहर को विश्वस्तरीय बनाने की प्रक्रिया का दर्शन कर
लौटे ..
जयपुर विकास प्राधिकरण का आश्वासन


जरा सी बारिश में जो हुए शहर के हालात ...
इस तरह बनेगा हमारा शहर विश्वस्तरीय !
मगर इन्हें नहीं है किसी से कोई शिकायत ....

हवामहल को भी देखा भीगते हुए

झमाझम बारिश के बीच संपत की नमकीन और आलू- प्याज कचौरी का स्वाद लेते हुए लौटे घर तो हमारे इलाके में एक बूँद पानी की नहीं ...कॉलोनी में गाडी को बारिश से भीगे देखते लोग आश्चर्यचकित हुए , कहाँ हो गयी इतनी बारिश ...बच्चे अलग भुनभुनाते रहे " यहाँ इतने पेड़ पौधे लगाने की जरुरत ही क्या है , जब बारिश ना हो तो "
रोज शहर के विभिन्न इलाकों में अच्छी बारिश के समाचार मिल रहे हैं और यहाँ बस बादल गरजते बरसते पानी की कुछ बूँदें बरसाकर चले जाते हैं ...
जगजीत सिंह जी की ग़ज़ल याद आ रही है ...
बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने , किस राह से बचना है , किस छत को भिगोना है ...
वाकई बादल दीवाने ही हो गए हैं ...


सोच रही हूँ कुछ दिनों के लिए ब्लॉगिंग को भी अपनी झमाझम टिप्पणियों से मुक्ति दे दी जाये ...ज्यादा नहीं ,बस कुछ ही दिन रह लीजिये हमारी टीका टिप्पणी के बिना भी !


गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें !


शुक्रवार, 18 मई 2012

परिवार वही बेहतर हैं जहाँ आपस में प्रेम , विश्वास और अपनापन है , संयुक्त परिवार हो या एकल !


समाजशास्त्र की किताबों में पढ़ा था कि  मनुष्य एक सामाजिक पशु है .   पशु  समूह में रहना पसंद करते हैं , मनुष्य के लिए भी विभिन्न कारणों से अकेले रहना संभव नहीं . वह परिवार , कबीला ,गाँव आदि बनाकर एक समूह में रहना ही पसंद करता है . समूह में रहने के लिए ना सिर्फ भोगौलिक और प्राकृतिक परिस्थितियां जिम्मेदार है बल्कि मनुष्य की मानसिक अवस्था भी प्रकारांतर से परिवार, कबीला आदि  की रचना के लिए प्रोत्साहित करती रही है . 
 एक परिवार का मतलब समझा जाता है , पति- पत्नी और उनके बच्चों का एक साथ मिल कर रहना , मगर वास्तव में यह रक्तसम्बधियों का समूह है , जहाँ कई भाई , चाचा आदि साथ रहते हैं . विश्व के बड़े भूभाग में परिवार को दो प्रकार से निरुपित किया जाता है . पहला एकल परिवार जहाँ एक ही मुख्य सदस्य और उसकी पत्नी और बच्चे साथ रहें और दूसरा संयुक्त परिवार जहाँ एक पिता के कई बेटे अपने परिवारों के साथ रहते हों , जिनमे व्यस्क होने के बाद भी बंटवारा ना हुआ हो , घर की हर चीज , दायित्व और अधिकार साँझा हैं . 
प्रारंभ से हमारे देश में संयुक्त परिवार का प्रचलन ही रहा है . जैसा की ऊपर बताया संयुक्त परिवार ऐसे कई छोटे परिवारों का समूह है जिसमे घर के प्रत्येक सदस्य की जिम्मेदारी , सुविधाएँ और सुख दुःख भी साझा ही होते हैं . संयुक्त परिवार का एक मुखिया होता है , जो परिवार के सभी सदस्यों के लिए नीतियाँ और निर्देश देता है. इन परिवारों में पुत्र विवाह के बाद अपने लिए अलग रहने की व्यवस्था नहीं करता . परिवार में जन्मे बच्चों के पालन पोषण के लिए एक स्वस्थ वातावरण निर्मित होता है जिसमे वह  समाज में घुल मिल जाने के संस्कार , नीतियाँ , दायित्व आदि सीखता है . एकल परिवार में जहाँ कुछ ही लोगों का लाड़ दुलार मिलता है , वही संयुक्त परिवारों में बच्चा विभिन्न प्रवृतियों वाले एक बड़े समूह  के बीच रहता है , जहाँ उसे लाड़ दुलार के साथ समाज में विभिन्न परिस्थितियों में सामंजस्य स्थापित करने के गुण सीखता है जो उसके भावी जीवन के लिए एक सुदृढ़ नींव का निर्माण करते हैं . इन परिवारों में किसी भी बुजुर्ग, अविवाहित या बेरोजगार को विशेष समस्या का सामना नहीं करना पड़ता क्योंकि बाकी सदस्य उनकी जिम्मेदारी उठा लेते हैं . मनुष्य को अवसाद , उदासी , अकेलेपन से बचाने में इन परिवारों की सशक्त भूमिका होती है .
संयुक्त परिवार एक लुभावनी धारणा है. लेकिन प्रत्येक व्यक्ति की दिन प्रति दिन हो रही  आर्थिक और मानसिक उन्नति ने संयुक्त परिवार की अवधारणा को बहुत नुकसान पहुँचाया है . आज एक परिवार कई परिवारों के साथ एक संयुक्त ढांचे में रहकर स्वयं को बंधन में  महसूस करते हैं . पहले तो संयुक्त परिवार बचे ही नहीं है और जो हैं वे क्लेश के घर बने हुए हैं . जिन परिवारों में संयुक्तता  बची हुई है ,उनमे एकल परिवारों को उपहास की दृष्टि से देखा जाता है . ये बात और है कि अक्सर इन दिखावटी संयुक्त परिवारों के मुकाबले एकल परिवारों में बच्चे बेहतर संस्कार पाते हुए सामाजिक होने का गुण सीख रहे हैं .
वास्तव में परिवार कुछ लोगों के साथ रहने से नहीं बनता है . कुछ लोगो के प्यार से साथ रहने , एक दूसरे के सुख दुःख को समझने , साझा करने और संवेदनशीलता और विनम्रता बनाये रखने से ही परिवार की मर्यादा है . पहले संयुक्त परिवारों में सबकी जरुरत के लिए भौतिक सुविधाएँ साझा होती थी मगर आजकल  संयुक्त परिवारों में हर कमरे में एक अलग घर बसा हुआ ही ज्यादा नजर आ जाता है . जो समर्थ है , वह अपने कमरे में सारी भौतिक सुविधाओं का जमावड़ा कर लेता है , असमर्थों द्वारा इनका उपयोग लगभग वर्जित या फिर ताने सुनने का उपक्रम हो जाता है . ऐसे परिवारों में बुजुर्गों की हालत और भी खस्ता हो जाती है .अपनी युवावस्था में अपने सिंचित धन का उपयोग वे परिवार को सुदृढ़ करने में लगाते हैं और आखिर में होता यह है कि बेटों द्वारा अपने कमरे बाँट लिए जाने के कारण मकान के गलियारे में स्थान पाते हैं . अपनी मेहनत की पूंजी से बनाये गये मकान में उन्हें अपने लिए एक कोना तलासना होता है , क्योंकि अपनी युवास्था में उन्होंने स्वयं के लिए नहीं , परिवार की सुख -सुविधा पर ध्यान केन्द्रित रखा .
अपने एक परिचित परिवार का उदाहरण देना चाहूंगी . भरा -पूरा परिवार है , सात- आठ भाई -बहनों का . बहनों का विवाह हो चुका है , वे अपनी गृहस्थी में मगन हैं और सभी भाइयों का अपना घर अपना परिवार , मगर जब किसी भी परिवार में कोई मंगल कार्य हो या पर्व उत्सव हो , ना हो तब भी महीने में कम से कम एक बार  सभी परिवार किसी एक भाई के घर  इकट्ठा होते हैं , मिलकर खाना -पकाना और उसके बाद मौज मस्ती , ताश- कैरम खेलना ,साथ घूमने जाना . व्यक्तिगत होने के बावजूद इनकी खुशियाँ और सुख दुःख साझा होते हैं . जिस सदस्य को  आर्थिक मदद की आवश्यकता है , दूसरे सक्षम सदस्य मिलकर उनकी सहायता करते हैं . 
अब एक संयुक्त परिवार की बात लें . एक ही घर में कई अलग घर बसे हुए . जो सबल है , अर्थ में , जबान में वह जीत में .  मकान में दरारें पडी हैं , घर में बुजुर्ग बीमार है , कोई साझा मेहमान आया है ...ये इस परिवार की समस्या है क्योंकि साझेदारी का काम है . कोई एक पहल क्यों करे , जिम्मेदारी क्यूँ उठाये . महँगी कटलरी , अचार  , मिठाई आदि प्रत्येक कमरे में उनके ससुराल पक्ष के लिए सुरक्षित होती हैं .  कौन आया , कौन गया , घर का बुजुर्ग सदस्य देखेगा क्योंकि यह घर तो उसका ही बसाया है . जब तक बच्चे छोटे हैं , उनकी देखभाल के लिए परिवार की जरुरत है , बुजुर्ग के पास धन है , तब तक उनकी जरुरत है , वरना घर के एक कोने में रहते हुए  बाकी सदस्यों के चेहरे देखने , बात करने को तरस जाते हैं . कई दिनों तक आपस में संवादहीनता बनी रहती है .  
संयुक्त परिवार ही पारिवारिक सद्भाव की गारंटी नहीं है . इसके भी भी अपने गुण- दोष है . 
ऐसे संयुक्त परिवारों का क्या लाभ जिसमे संयुक्त रहने के नाम पर बुजुर्गों का जीवन भर दोहन करने के बाद  एक कोने में पटक दिया जाए और उनकी संपत्ति अपर अपना हिस्सा काबिज करने के लिए उनके मरने का इंतज़ार किया जाए .  जबकि एकल परिवारों में बच्चे या बड़े ज्यादा समय अकेले रहते हैं , उनके घर आने वाले मेहमान अथवा दूसरे पारिवारिक सदस्यों की जिम्मेदारी उनकी अकेले की होती है , जिसे वे बेहतर तरीके से निभाते हैं , साझा करना सीखते हैं वरना तो साझा परिवारों में बच्चे मिठाई , फल तक अपने कमरे में छिप कर खाना सीख लेते हैं . संयुक्त परिवार के पक्ष में एक बड़ी दलील दी जाती है कि इसमें बच्चे ज्यादा सुरक्षित होते हैं . संयुक्त परिवारों में प्रत्येक सदस्यों का अपना परिचय क्षेत्र , मित्र आदि होते हैं, ऐसे में अवान्छितों  का घर में प्रवेश रोक पाना इतना सरल नहीं होता . परिवार के दूसरे सदस्यों के बीच मनमुटाव का कारण बन जाता है . एकल परिवार में  संघर्षपूर्ण जीवन परिवार के सदस्यों के  बीच आपसी समझ को बढाता है , जो रिश्तों को मजबूत करता है .  
हम भारतीय अपने परम्पराओं और संस्कृति पर बहुत गर्व करते हैं, मगर उन्हें परिष्कृत कर बदलते समय के अनुकूल बनाने में उतनी रूचि नहीं रखते . परिवार प्रेम , विश्वास और सहयोग की बुनियाद पर इकट्ठे रहने चाहिए , ना कि सिर्फ लोक लुभावनी संस्कृति के दिखावटी  पोस्टर के रूप में . 
इसलिए परिवार वही बेहतर हैं जहाँ आपस में प्रेम , विश्वास और एक दूसरे के सुख- दुःख में शामिल होने का अपनापन है , वह चाहे संयुक्त परिवार हो या एकल !
मनोजजी कि इस प्रविष्टि ने सोचने पर विवश किया कि क्या वाकई संयुक्त परिवार ही पारिवारिक प्रेम की कसौटी हैं , एकल परिवार में बच्चे या बड़े सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं . 

मनोज जी की इस प्रविष्टि  और फेसबुक पर पर हुई चर्चा ने सोचने पर मजबूर किया कि क्या वाकई सिर्फ संयुक्त परिवार ही अच्छे पारिवारिक रिश्तों की गारंटी है , एकल परिवार सिर्फ स्वार्थी ही होते हैं!! फेसबुक पर भी विचार मंथन हुआ जिसके नतीजे में यह पोस्ट आई .   

फेसबुकिया विचार विमर्श ---
बकौल रश्मि प्रभा जी ...परिवार एक सोच है , रिश्तों का संस्कारों का - जहाँ इसका अस्तित्व है , वह एकल हो या संयुक्त - सही मायने में परिवार वही है . ढोने जैसी भावना का निर्वाह नहीं होता , वह ख़त्म ही हो जाता है ! दिखावे का संयुक्त परिवार ही अधिक देखा है ... जहाँ कई चूल्हे जलते हैं और घिनौनी लडाइयां होती हैं -चूल्हा एक भी हो तो अपने खाने पीने का सामान बेडरूम में भेजने के बाद डाल और सब्जी में ढेर पानी की मिलावपर दिखावा ही अधिक है .... हाँ मर जाने पर यूँ चीत्कार करते हैं कि .... खैर मुझे कोई भ्रम अब नहीं होता ! क्योंकि शांति की लकीरें उस चीत्कार में मुझे दिखी हैं . हमेशा आटे दाल का भाव बढा ही है ... आज के हिसाब से जो महंगाई पहले कम थी , तो वेतन कम था ... पर उस वक़्त दिलों में जगह थी . परिवार में एक उत्साह था , मिल बांटकर खाने का सुख था ...... अब तो बस अपना आराम ! पहले एक आलसी था , अब पलड़ा बराबर है इस आज का भयानक रूप कल होगा .... स्व जब चलने से लाचार होगा तो कोई देखनेवाला नहीं होगा पहले ये दिवस नहीं थे .... तब हर दिन माँ का था , प्यार का था , बुजुर्गों का था , पिता का था , बच्चों का था ------- अब एक दिन का कार्ड , इतिश्री

शिखा वार्ष्णेय ने कहा --आजकल संयुक्त परिवारों में भी सबका अपना कमरा, अपनी अलमारी , अपना फ्रिज, अपना टीवी , अपने नाश्ते ,मेवे, मिठाई के डिब्बे आदि आदि होते हैं..संयुक्त परिवार में नाम के अलावा कुछ भी संयुक्त रहा कहाँ है .मनोज जी जितना ज्यादा कमाते हैं उतना ही लालच बढ़ता जा रहा है.."मैं" के अलावा किसी की जगह ही नहीं बची है इंसानी रिश्तों में .

सोनल जी ने बताया --मैं एक बहुत बड़े संयुक्त परिवार से हूँ पहले त्याग ,सामंजस्य और ममता थी पर आज ,चालाकी दिखावा और चालबाजी ज्यादा है.
बढती महंगाई , लोगो की महत्वाकांक्षा और स्वार्थ ने इसका रूप विकृत कर दिया है.

मनोज जी बोले --परिवार कुछ लोगों के साथ रहने से नहीं बन जाता। इसमें रिश्तों की एक मज़बूत डोर होती है, सहयोग के अटूट बंधन होते हैं, एक-दूसरे की सुरक्षा के वादे और इरादे होते हैं। हमारा यह फ़र्ज़ है कि इस रिश्ते की गरिमा को बनाए रखें।
कभी-कभी दोनों खूब कमाते हुए होते हैं पर एक छत के नीचे रहकर भी वह परिवार परिवार नहीं लगता रह पाता। मुझे लगता है कि त्याग और उदारता की भावना का लोप होता जा रहा है। मानवता के गुणों का ह्रास। हमने (जिस दादी - नानी के ज़माने की बात आपने की है) कि उस ज़माने में एक बेरोज़गार भी संयुक्त परिवार का ऐसेट हुआ करता था।