मंगलवार, 11 अगस्त 2009

अब मार के दिखा ..!!

अभी अभी बेटी को बस स्टाप तक छोड़ कर आयी हूँ। सुबह के समय चहुँ ओर विद्यालय की और दौड़ती बसें , ऑटो रिक्शा और गणवेश में सुसज्जित विद्यार्थिओं और उनके अभिभावकों की आवाजाही ही नजर आती है। बेटी के बस स्टाप पर ही कई विद्यालयों के बच्चे बस का इंतिजार करते हए आपस में चुहलबाजी करते नजर आ जाते हैं । आज जब वहां पहुंचे तो देखा दो बच्चे आपस में धींगा मस्ती कर रहे थे। देखते ही देखते उनकी मस्ती झगडे में बदल गयी।
दोनों बच्चों में से एक तो अच्छा खासा सेहतमंद गोल मटोल सा था उसका नाम था रोहित , वही दूसरा बच्चा थोड़ा हल्का फुल्का सा रमेश । दोनों में किस बात पर झगडा हुआ ये तो ज्यादा पता नही चला ..मगर शायद कोई पुराना मसला था . रमेश ने रोहित की शिकायत कर दी थे अपने अध्यापक से इसीलिए वह बहुत नाराज़ था। उसने छुटके को धमकाते हुए कहा "देख..अगर अगली बार तुने मेरी शिकायत की तो समझ लेना ..."
रमेश दुबला पतला था तो क्या हुआ ...तैश में आते हुए बोला ..." करूँगा ..बोल क्या कर लेगा."
"देख मेरे भाई ..तुझे इतने प्यार से कह रहा हूँ...तू नही करेगा शिकायत ...समझा।"
"हाँ.. हाँ... समझ गया ...नही...बोल ..तू क्या कर लेगा।"
अब तक तो रोहित को गुस्सा आ गया ..." तू ऐसे नही मानेगा" बोलते हुए दो थप्पड़ जड़ दिए।
रमेश ने उसका हाथ पकड़कर रोकना चाह मगर कामयाब नही हो पाया। गाल सहलाते हुए फिर से बोला ..." देख... अभी तो तुने मुझ पर हाथ उठा दिया ...मैं कुछ नही कह रहा...मगर अबकी तुने ऐसा किया तो अच्छा नही होगा।"
रोहित का गुस्सा और भड़क उठा...''क्या कहा ..क्या अच्छा नही होगा..."कहते हुए उसने एक चांटा और जड़ दिया।
बेबस सा रमेश थप्पड़ से तो नही बच सका मगर फिर भी बोला " देख मैं तुझे कह रहा हूँ.. मान जा ...अब मत उठाना मुझ पर हाथ..."अब और झगडा बर्दाश्त करने की हिम्मत नही थी। उनका बीच बचाव करते हुए दिमाग में क्या कुछ गूंजने लगा।
क्या हमारे देश की ... नागरिकों की यही हालत नही है... हर आतंकवादी घटना के बाद देश के कर्णधारों का यह बयान ..." आतंकवाद बर्दाश्त नही किया जाएगा ..." वे फिर-फिर कर आते हैं ...चोट पह्नुचाते हैं ...जान माल का नुक्सान होता है....अपने घावों को सहलाते हम फिर से यही नारा सुनते है ..."आतंकवाद बर्दाश्त नही किया जाएगा ...हम मुँहतोड़ जवाब देंगे..." वे फिर आते हैं ...कभी संसद भवन पर ....कभी ताज होटल ...कभी कोई रेल ...कभी कोई बस ....कभी किसी शहर में ....कभी किसी शहर में ....."
बहुत कुछ ऐसा ही चुनाव के दौरान होता है ...बढती महंगाई ...अव्यवस्था ....सामरिक सुरक्षा आदि मसलों पर किसी एक सरकार को संसद के बाहर का रास्ता दिखाने वाले हम ... शिकायत करते हैं उनसे...जो अब हमारी समस्यों पर ध्यान नही दिया तो ....!! जनता जनार्दन को भगवान मानने वाले चुनाव से कुछ वक़्त पहले ही पेट्रोल- डीजल, रसोई गैस , रोजमर्रा की जरुरी चीजों के दाम कर दिए जाते हैं और एक बार बहुमत हासिल करने के बाद ....कौन सी जनता...कहाँ की जनता...और हम फिर से अपने घावों को सहलाते अगले चुनाव के इत्निज़ार में लग जाते है ..."अब चुनाव में जीत कर दिखाना..." .

बुधवार, 22 जुलाई 2009

ताऊ तेरी रामप्यारी !!

ताऊ तेरी रामप्यारी !!
उस दिन जब ताऊ अपने ब्लॉग पर रचनाएँ आमंत्रित कर रहा था ...रामप्यारी की बहुत सी सखियों की तो बांछें खुल गयी ...ज्यादा क्या कहूं ..आप सब जानते हो इस युग के सखा और सखियों के बारे में...सारी की सारी लग गयी ...अब आयेगा मजा ...जम कर रामप्यारी की पोल खोलेंगे ....पर ये ताऊ कम ना है ...पूरी फीडबैक रखे है ...झट रचनाएँ आमंत्रित करने का आप्शन रद्द कर दिया ...मगर रामप्यारी की सखिओं को जो खडबडी लग गयी ...कहाँ मानती ...बहुत मान मनौवल करने लगीं ...अपने ब्लॉग पर ही लगा दो हमरी पोस्ट ...वोह ताऊ तो रामप्यारी के बारी में कुछ छपने न देगा ... हमने भी सोचा ...के फरक पड़ेगा ...थोडी रामप्यारी की सखिओं की भड़ास निकल जायेगी ...तो फिर सुनो किस्सा ...

एक बार ताऊ के दरबरिओं ने भड़का दिया ताऊ को ...कुछ पता है तमने ...तुम तो बड़े खुश हो रहे हो ...की रामप्यारी को घर घर की निगरानी पर लगा दिया है ...कुछ पता है ...यूँ आँख मूँद कर भरोसा करना ठीक ना है ...किसीने तो रामप्यारी के पीछे भी लगा निगरानी करने को ...बात ताऊ के जच गयी ...
इब क्या था ...ताऊ ने अपने तोते रामखिलावन को लगा दिया रामप्यारी के पीछे ...
जहाँ जहाँ रामप्यारी जाती ...रामखिलावन भी पीछे लगा रहता ....रामप्यारी परेशान ...यह कुन है जो रात दिन पीछे लगा रहता है ...रामखिलावन अपनी मीठी मीठी बातों के जाल में रामप्यारी ने फांसने की कोसिस करने लागा ...
कान खड़े हो गए रामप्यारी के ...वा भी कोई कम ना है ...ट्रेनिंग जो ताऊ ने दी सै ...
तो ...एक दिन रामखिलावन बड़े लाड से बोला ...
रामखिलावन :- रे रामप्यारी ...तू मन्ने भोत अच्छी लागने लागी है ।
रामप्यारी :- तू भी मन्ने भोत अच्छा लागे है ।
रामखिलावन :- तो फिर बणा ले ना अपना ..
रामप्यारी :- ये तो कोई बात ना हुई ...काळ कोई और अच्छा लागने लगेगा ...।
रामखिलावन :- ना...रामप्यारी ...तू आखिरी होगी ।
रामप्यारी :- ओये रामखिलावन ...भीगी लकड़ी की जलावन ...मैं तेरी थोडी ना बोल री हूँ ...
मैं तो अपनी बात करे थी ...!!
बेचारा राम खिलावन जा पड़ा ताऊ के चरणों में ...ताऊ ये तेरी रामप्यारी !!
और ताऊ अपने मुछों पर ताव देता मुस्कुराता रहा ....देखा मेरी ट्रेनिंग का असर ....बेचारे दरबारी अपना मुंह लटका कर रह गए ।

जैसा की रामप्यारी की सखी रामदुलारी ने बताया ...

रविवार, 19 जुलाई 2009

आभार प्रेम का मनाती कैसे .....

जब चेतना किसी परिस्थिति विशेष के केन्द्र में स्वयं को रखकर देखती है तो दुसरे का दारुण दुःख भी स्वयं का ही हो जाता है ...ह्रदय की अनंत गहराइयों से निकले उदगार जब बोलों की शक्ल ले लेते हैं...कविता बन जाती है ...दरअसल कविता लिखी नही , लिखवाई जाती है ...भावनाओं की कलम से ...ह्रदय के द्वारा....
आभार प्रेम का मनाती कैसे .....

आलेख प्रेम का लिखा गया हो जब बारूद की कलम से
किस्मत के हाथों उसे बंचवाती कैसे !
तुम ही कहो ...आभार प्रेम का मनाती कैसे !!

कंटीली पथरीली राहों पर तो
लहूलुहान कदमों से भी चल पड़ती साथ
लाशों की नींव ...बेजुबान आहों की कंक्रीट ..
भय से निर्मित डगर पर कदम बढाती कैसे !
तुम ही कहो ...आभार प्रेम का मनाती कैसे !!

मेहनतकश हाथो के छालो से रिश्ते लहू भरी
गुलाबी हथेलिओं को थाम भी लेती.. मगर
बेगुनाह मासूमों के रक्त से सने हाथों में
मेहंदी भरे यह हाथ थमाती कैसे !!
तुम ही कहो ...आभार प्रेम का मनाती कैसे !!

जब किसी मासूम को कर दिया अनाथ तुमने...
की कभी तुमसे भी छिना था बचपन किसीने
यह कह देने भर से तो गुनाह तुम्हारा कम ना होगा
खुदा के घर जवाब तुम्हे भी तो देना ही होगा

जो भर लाई थी प्रेमाश्रु ...
ह्रदय की अथाह गहराइयों से खींच कर ...
बेगुनाह आहों से श्रापित ह्रदय पर अर्ध्य चढाती कैसे !
तुम ही कहो ...आभार प्रेम का मनाती कैसे !!

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