शुक्रवार, 12 मार्च 2010

ना ....अब बचपन ...ना .....!!




ना अब बचपना
अब बचपन ना
बहुत हुआ बचपन पर हँसना
अब हँसना ना
अब हँस ना ......!!

बचपन कब चाहे बड़ा होना
मगर जब बड़ा होना
तो बड़ा हो ना ......!!

बचपन से बड़प्पन का सफ़र...
पलक नम सुस्त कदम
बुझी निगाह सांस कम
यही तो है बड़ा होना
तो अब बड़ा ही होना
अब बड़ा हो ना ......!!

चाहा यही तो
बचपन से बड़प्पन का सफ़र
सीखे चुप रहना
तो अब चुप है ना
चाहे मौन रखना
तो अब मौन रख ना ......!!

बस अब और ना बचपना
अब बचपन ना .....!!



........................................................................................................................................................

मंगलवार, 2 मार्च 2010

असर तो है .........




खेतों में सरसों का रंग और चटक हुआ
लहराया मेरा आँचल चुनरी का कसूमल

गालों के भंवर मुस्कुराते रहे गुलाबी
रंगत चेहरे की हुई और सुर्ख रतनारी

कदम नापते रहे दूरियां आसमानी
रंग सुनहरा बिखेरती रही चांदनी

सिलबट्टे पर चढ़ी रही मेहंदी हरियाई
चक्की में पिसता रहा मक्का पीतवर्णी

साबुनी- झाग भरे हाथ
झिलमिलाते रहे इन्द्रधनुषी

सिंक में बर्तनों की खडखडाहट
बन गयी गीत फागुनी


खड़े रहे ....हाथ बान्धे ....
सर झुकाए ....कतारबद्ध
रंग सारे आबनूसी ...

दुआओं में उसकी
असर तो है ....!!



नोट ....कविता में लय , तुकांत , बहर, कुछ मत ढूंढें ...नहीं मिलेगा .....गौतम राजरिशी जी के ब्लॉग पर टिप्पणी करते हुए आये कुछ खयाल ...बस ऐसे ही लिख दिए ....

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

अब जीना है मुझे भयमुक्त जीवन


जीने दो मुझे
मत डराओ
कि अब मैं डरने वाली नहीं हूँ
अब बस
जीना चाहती हूँ भयमुक्त जीवन
मरने से पहले ............

भर लू बाँहों में
खुला आसमान
फुद्फुदाती तितलियाँ
रंगबिरंगे फूल
सूरज की लालिमा
तुलसी की पवित्रता
चन्द्रमा की शीतलता
चिड़ियों का कलरव
नदियों की रुनझुन
हवाओं सी मस्ती
ख्यालों की बस्ती
सुरों की झंकार
शंख की पुकार
सब कुछ ........
समेट लेना चाहती हूँ
इन आँखों में भी
मरने से पहले .....

कि पा जाऊं
अनन्य अद्भुत शांति
सिमटी हो मेरी आँखों में
अंतस तक भिगोती स्निग्धता
बिखरी हो मेरे चेहरे पर
जो देती रहे साहस
जीने का हौसला
तमाम दुश्वारियों के बीच
कि आने वाली पीढ़ी कर सके यकीन
कि जीवन जीने के लिए है
ख़त्म करने के लिए नहीं
ख़त्म होने के लिए नहीं ........

जी लूं सांस भर जीवन
जाने कौन सी सांस आखिरी हो
दिला सकू यकीन
कितना कुछ यहाँ जीने के लिए
मरने से पहले .....



मन बहुत उदास है ....जिन आँखों ने अभी जीवन ठीक से देखा ही नहीं ....जिन सांसों ने जीवन ठीक से जिया ही नहीं ....माता पिता की आँखों की उम्मीद कैसे एक क्षण में तोड़ कर निर्मोही विदा हो जाते है ....जैसे जीने लायक इस जीवन में कुछ रहा ही नहीं ......क्यों .....!!


*************************************************************************************
चित्र गूगल से साभार