शुक्रवार, 12 मार्च 2010

ना ....अब बचपन ...ना .....!!




ना अब बचपना
अब बचपन ना
बहुत हुआ बचपन पर हँसना
अब हँसना ना
अब हँस ना ......!!

बचपन कब चाहे बड़ा होना
मगर जब बड़ा होना
तो बड़ा हो ना ......!!

बचपन से बड़प्पन का सफ़र...
पलक नम सुस्त कदम
बुझी निगाह सांस कम
यही तो है बड़ा होना
तो अब बड़ा ही होना
अब बड़ा हो ना ......!!

चाहा यही तो
बचपन से बड़प्पन का सफ़र
सीखे चुप रहना
तो अब चुप है ना
चाहे मौन रखना
तो अब मौन रख ना ......!!

बस अब और ना बचपना
अब बचपन ना .....!!



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22 टिप्‍पणियां:

  1. वाह !!
    कितने अच्छे हैं ये शब्द संयोजन
    दिल से इसको पढ़ना
    बिना दिल पढ़ ना

    वाणी की बच्ची....
    पंगा....!!!

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  2. बस अब और ना बचपना
    अब बचपन ना ----!!
    शब्दों की कलाकारी और भावों के विविध रूपों का समावेश
    बहुत सुन्दर

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  3. समझने की कोशिश कर रहा हूँ !

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  4. शब्दों का जबरदस्त तोड है. इस तरह का संयोजन हर किसी के वश की बात नही है. बहुत सुंदर.

    रामराम.

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  5. रचना बहुत बढ़िया लगी । लेकिन पता नहीं क्यों अब लगता है कि बचपन कहीं खोता जा रहा है ।

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  6. बचपन से बड़े होने का सफ़र ..सुंदर शब्द वैसे भाव भी....बधाई

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  7. वानी जी ये क्या बात हुयी हम तो बचपन मे ही रहेंगे। वैसे बहुत अच्छी लगी रचना धन्यवाद

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  8. बचपन और बचपना
    पहला बालावस्था में ही...।
    दूसरा जीवन में कभी भी संभव ।

    गहरे भावबोध की कविता ।
    आभार ।

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  9. बचपन से बड़प्पन तक की दूरी को बखूबी आँका है....सुन्दर रचना

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  10. bahut sundar rachna......bachpan se badappan ka safar.......bahut khoob.

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  11. बचपन को हमेशा जीना
    इसीमें है हर सपना सलोना
    बड़े होकर भी बचपन को जीना

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  12. जो न छोटे हैं न बड़े,
    बड़ी मुश्किल में वो पड़े,
    उनके लिए वक्त किसी के पास नहीं,
    उनकी मुश्किलों का हिसाब नहीं...
    जो न छोटे हैं न बड़े...

    मैं भी ग्यारह साल की बिटिया पूजन का पिता हूं...देखता रहता हूं कि उसकी मां कैसे सिखाती रहती है, ऐसे नहीं, वैसे बैठो...ऐसे नहीं, वैसे चलो...पत्नीश्री अपनी जगह ठीक है...लेकिन मुझे लगता है बेटों से ज़्यादा बिटियाओं को ही सलीके, कायदे-कानूनों की सीख-नसीहतें मिलती हैं...लेकिन मेरी सोच थोड़ी दूसरी है...बचपन फिर कभी लौट कर नहीं आता...इसलिए उसे ज़्यादा बंदिशों में नहीं बांधना चाहिए...आजकल वैसे ही नोएडा जैसे शहरों में बच्चों के साथ खेलने के लिए ज़्यादा साथी भी नहीं है...बच्चों को बचपन खुल कर जीने देना चाहिए...वरना बड़े होकर तो ज़िंदगी हर कदम, इक नई जंग है...

    जय हिंद...

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  13. vani ji sach me bahut acchha shabd sanyojan he aur M verma ji ki tareh me b kahungi...ki bhaavo me vividh rupo ka samavesh.

    khushdeep ji ki baat ka samarthan karti hu...bachpan jane k baad lautne wala nahi..so bachho ko kam se kam bachpan bharpoor jine diya jaye.

    rachna bahut utkrisht hai.

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  14. बचपना...
    बच पाए ना
    उलझ गए ना
    शब्दों के जोड़- घटाव से
    कोई बचा ना..
    ...ठिठक-ठिठक कर..
    अटक-अटक कर भी..पढ़ लिया ना...
    बहुत सुन्दर...........

    लड्डू बोलता है ....इंजीनियर के दिल से
    http://laddoospeaks.blogspot.com/

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  15. वाणी जी ! शब्दों के साथ खूबसूरत कलाकारी की है आपने...पढ़कर अच्छी लगती है कविता..बहुत सुन्दर

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  16. रचना बहुत बढ़िया लगी । लेकिन पता नहीं क्यों अब लगता है कि बचपन कहीं खोता जा रहा है ।

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  17. वाह..बहुत बढ़िया...ये बचपने से बड़प्पन तक की बात....और फिर मौन...मन को छू गयी ये बात...

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