रविवार, 29 अगस्त 2010

एक प्रेम कथा ऐसी भी ....

एक प्रेम कथा ऐसी भी ....

 मैं तुझे इतनी अच्छी लगती हूँ . मेरे चेहरे पर झुर्रियां हैं. काले धब्बे हैं. उम्र भी बहुत हो गयी है.
फिर भी !!

हाँ . तू मुझे बहुत बहुत अच्छी लगती है .मुझे तेरी ऊपरी सुन्दरता से क्या मतलब. खूबसूरत तो मन होना चाहिए . मेरी नजरों में तू सबसे अधिक कीमती है.

आँखें बंद कर इत्मिनान से कंधे पर सर टिकाते दुर्लभ रक्त ग्रुप की वह स्वस्थ स्त्री उस कुटिल मुस्कान को नहीं देख पायी .

प्रेमी मानव अंगों का व्यापारी था ....!

शनिवार, 21 अगस्त 2010

सर्कस की कलाबाजियां .....

अभी कुछ दिनों पहले स्कूल से लौटी बेटी बड़ी मायूसी से बैग पटकती हुई बोली ," आपको पता है स्कूल की ओर से हमें कहाँ लेकर जाया जा रहा है ...सर्कस में ..."

"अच्छा !" ...मेरे आश्चर्य और ख़ुशी को नजरंदाज़ करते हुए उसकी झल्लाहट जारी रही ..." मुझे नहीं जाना कोई सर्कस -वर्कस , इनको और कोई प्लेस नहीं मिला ...और उसपर मजबूरी ये है कि जाना जरुरी है , नहीं जाना हो तब  भी उनकी फीस तो देनी ही होगी ...

बच्चे बहुत छोटे थे तब ही एक बार सर्कस देखा था उन्होंने ...आजकल के आधुनिक बच्चे फिल्मों , गाने , कंप्यूटर , विडियो गेम , मोबाइल, मेकडोनाल्ड्स ----इन के अलावा ना कुछ सुनना चाहते हैं , ना ही देखना ....इनके बीच में अपने बच्चों की रूचि बिरला मंदिर , वाटर पार्क , तारामंडल जैसी जगहों में भी होना मुझे तसल्ली देता है ...एक और नए स्थान "जी टी" के नाम से मशहूर गौरव टावर की बच्चों के मुंह से बड़ी तारीफ़ सुनकर पहुँच गए ...टीन एजर्स की भीड़ से दो- चार होते अन्दर पहुंचे तो वहां सिर्फ दुकानों के अलावा कुछ नहीं था ....टीन एजर्स के लिए जयपुर का मोस्ट वांटेड आउटिंग प्लेस ...कहाँ है आर्थिक मंदी का दौर ..... ऐसे प्लेसेज में तो ढूंढें नहीं मिलता ...!

इस बार बच्चों को सर्कस घूमने जाने का मौका मिलता देखकर मुझे ख़ुशी हुई ....इस बहाने वे मनोरंजन के एक पुराने माध्यम से रूबरू होंगे ...मगर बेटी थी कि जाने को तैयार नहीं ...खाना खिला पिला कर उसके भेजे में बात डालने की कोशिश की ...
" बेटा , तुम्हे वहां जा कर अच्छा लगेगा "...
"कह दिया ना मुझे नहीं जाना , हम छोटे थे तब आप लेकर गए थे ना ! देख तो लिया था , अब क्या नया होगा उसमे !"
वह मां ही क्या जो बच्चों की जिद के आगे हथियार डाल दे ...मेरा समझाना बदस्तूर जारी रहा ...

" बहुत पुरानी बात है , अब तो तुम भूल चुके हो , इस बार जाओगे तो बहुत अच्छा लगेगा ...तुम टी वी के डांस रिअलिटी शो कितने मजे से देखते हो , यही सब तो होता है सर्कस में भी ...इसको  तुम दूर से देखते हो , एडिटिंग के बाद और यही सब वहीँ तुम्हारी आँखों के सामने लाइव देखने को मिलेगा! "

इस बार बात कुछ जमती सी नजर आई ....जैसे -तैसे बिटिया रानी सर्कस जाने को राजी हुई और जब देख आई तो महाखुश...घंटों तक बस सर्कस की ही बातें ....

सर्कस कलाकारों की कला से अचंभित बेटी महिला या बाल कलाकारों के वस्त्रों से खासी नाराज़ थी ....और उनके भावनाविहीन चेहरों से आश्चर्यचकित ....!!

इस बहाने मैं भी सर्कस के इतिहास में घूम आई ...

सर्कस चलती-फिरती कलाकारों की कम्पनी होती है जिसमें नट, विदूषक और विभिन्न प्रकार के जानवर तथा अन्य प्रकार के भयानक करतब दिखाने वाले कलाकार होते हैं। सर्कस में कलाकारों द्वारा करतब एक वृत्तिय या अण्डाकार घेरे में एक विशाल तम्बू के नीचे दिखाए जाते हैं जिसके चारो तरफ दर्शकों के बैठने की व्यवस्था होती है।

एक समय था जब सर्कस मनोरंजन का प्रमुख साधन था ...लेकिन आज के हाई टेक ज़माने में असीमित साधनों ने इनके अस्तित्व पर संकट पैदा कर दिया है ...टीवी , विडियो गेम  आदि ने तो इनके दर्शकों की कमी की ही है  और सर्कस में जानवरों के उपयोग पर प्रतिबन्ध ने भी आम दर्शकों को इससे दूर कर दिया ...
शेर , हाथी आदि ही तो इनके मुख्य आकर्षण होते थे ...मुझे तो एक सर्कस में " हिप्पो " को देखना भी याद है ....और आजकल के डांस रिअलिटी शोज भी इनके पेट पर लात मारने में कम भूमिका नहीं निभा रहे हैं ...मुझे  ये नृत्य कम और सर्कस ज्यादा लगता है ...बस फर्क ये है कि सर्कस के कलाकार इनकी तरह मशहूर और संभ्रांत परिवारों से नहीं होते हैं ...नृत्य के नाम पर होने वाली इन कलाबाजियों पर क्या कहा जाए !!

जानवरों के प्रयोग से रोक होने के कारण यह अब सिर्फ इसके कलाकारों के जोखिम भरे प्रदर्शनों पर ही टिका हुआ है ...जिसमे इनके लिए कोई  रिप्ले नहीं होता है ...एक बार में ही शूट ओके वरन जिंदगी खल्लास ...ऐसे करतबबाजों की जिंदगी भी कम कष्टदायक नहीं है ...इनके एक ग्रुप में करीब डेढ़ से दो सौ लोंग होते हैं , जिनका प्रतिदिन का खर्चा ही हजारों में होता है ....उस पर दर्शकों का ना पहुंचना इनकी बदहाली को बढाता जा रहा है।
  सरकार की ओर से भी इन लुप्तप्राय उद्योगों को कोई समर्थन नहीं है।   ऐसे में जो लोग  इस कला को बरकरार रखे हैं , प्रशंसा के योग्य है ...सरकारों को इन कलाकारों के झोखिम भरे जीवन तथा उनके अस्तित्व पर आते संकटों के मद्देनजर जरुरी कदम उठाये जाने चाहिए ही ,वही आम दर्शकों को भी इन्हें अपना समय देकर सराहना और सहयोग किया जाना चाहिए ..

सर्कस के कलाकारों की समस्या को सर्वप्रथम धारावाहिक " सर्कस "के माध्यम से जोर- शोर से उठाया गया था ...शाहरुख़ खान के अभिनय से सजा यह धारावाहिक खासा लोकप्रिय था ...


और अब एक कविता " सर्कस " पर ...." इब्बार रब्बी "

वह कलाबाज़ी दिखा रही है
झूले में लटक गई
खड़ी हुई
पैरों के बल गुड़ी-मुड़ी और
हवा में उछल गई
हाथ-पैर गोल-गोल
सब ग़ायब
सिर्फ़ पेट दिखता है
झूले पर खड़ी हुई
तो पेट निकल आया

सुन्दर नहीं है
नंगी हैं टांगें और बाहें
गुड़मुड़ी कच्छे और गुलाबी चोली में
भली नहीं दिखती वह
चेहरा सपाट
जैसे ख़ुरदुरा तख़्ता

तख़्ते के सहारे खड़ी है
आँख बांध कर जोकर
मारता है छुरे
एक भी नहीं लगा उसे
हाथ-पैर कुछ नज़र नहीं आता
पसलियाँ गिन लो
पर पेट उभर आता है
पूरा तख़्ता ही पेट है।

उसकी बच्ची
एक पहिए की साइकिल चलाती है
नहीं दिखते हाथ-पाँव
लौंदा जमा है साइकिल पर
पेट धरा है झूले पर
पेट जड़ा है तख़्ते पर

कविता कोश से साभार

सर्कस की बात हो राजकपूर की फिल्म या ना आये ...जीना यहाँ मरना यहाँ ....यह गीत इन कलाकारों की जिंदगी पर कितनी गहरी नजर डालता है ...


शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

बेशक स्वतन्त्रता का जश्न मनाये ...ये तो जान लें कि देश- प्रेम है क्या ....!

मुबारक हो ...हम एक बार फिर स्वतंत्र होने जा रहे हैं ...... एक बार फिर तरंगा लहराएगा , राष्ट्र गान गायेंगे , लड्डू या अन्य मिठाईयां बाटी जायेंगी ....विद्यालयों में तो फ़िल्मी गानों पर लटके झटके दिखाते छोटे- मोटे सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हो जाएँ शायद ... सार्वजनिक स्थलों पर परेड भी ...बस इस तरह मन जाएगा स्वतन्त्रता देवास ...हर वर्ष की भांति ही ...बस कलेंडर में वर्ष तिथि बदली होगी ...और क्या बदलेगा .....

गरीबी , अशिक्षा , भूखमरी , हिंसा , साम्प्रदायिकता ये सब कुंडली मारे ज्यों के त्यों बैठे रहेंगे ...लोकतंत्र और उदार होता रहेगा ...चाहे आर्थिक और सामाजिक ढांचा चरमराता रहे , हिमालय की चोटियों से कोई ललकारता रहेगा , देश के विभिन्न कोनों से अलगाववाद की चिमनी से निकलता धुआं , खाप पंचायतों की भेंट चढ़े कुछ और परिंदे , हमारा स्वतंत्रता दिवस बदस्तूर बिना किसी रूकावट यूँ ही मनाया जाता रहेगा ....

बल्कि मेरा तो मानना है कि सरकारी संस्थानों और विद्यालयों में स्वतंत्रता दिवस समारोहों की रिकॉर्डिंग कर रख ली जानी चाहिए और हर वर्ष उसे विडियो पर घर बैठे देख लेना चाहिए .....फालतू आने जाने में बच्चे और बड़े परेशान क्यूँ ....हर वक़्त किसी हादसे की चपेट में आने का डर क्यूँ पालें ... सुरक्षा व्यवस्था पर इतना खर्च क्यों ....समय और धन दोनों की ही बचत हो जायेगी ...एक औपचारिकता को निभाने के लिए इतना ताम जहां क्यूँ ...माफ़ कीजिये यदि आपको इस लेख में कुछ तल्खी नजर आये ....मगर कवि रामनाथ सिंह जी की इन पंक्तियों को पढ़कर बताये ....कि हम कितने आज़ाद है ...
'सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है
दिल पे रखकर हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है
'

बेशक रस्मी ही मनाएं स्वतंत्रता दिवस ...एक बार याद कर लें उस महापुरुष को जिसने रामराज्य के सपने देखे थे...उसी देश में राम के अस्तित्व को ही नकारा जा रहा है और रावण असलियत का जामा पहने अट्टहास करता नजर आ रहा है ... स्वतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत करने का सन्देश प्रसारित किया जाता है ....आखिर हमारी सुरक्षा इतनी असुरक्षित क्यूँ हो गयी है जो 64 वर्षों से हर बार पहले -से कड़ी होने के बाद भी सुरक्षित नहीं ...

स्वतंत्र होने का औपचारिक जश्न मानते सरकारी मुलाजिम और लोकसेवक , देश प्रेम की सच्ची भावना क्या है ...क्या होनी चाहिए ...देखिये आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने क्या कहा ....

" जन्मभूमि का प्रेम , स्वदेश -प्रेम यदि वास्तव में अंतःकरण का कोई भाव है तो स्थान के लोभ के अतिरिक्त और कुछ नहीं है ... इन लोभ के लक्षणों से शून्य देश प्रेम कोरी बकवाद या फैशन के लिए गढ़ा हुआ शब्द है ... यदि किसी को अपने देश से प्रेम है तो उसे अपने देश के मनुष्य , पशु , पक्षी , लता , गुल्म , पेड , पत्ते , वन , पर्वत , नदी , निर्झर सबसे प्रेम होगा ...सबको वह चाह भरी दृष्टि से देखेगा , सबकी सुध करके वह विदेश में भी आंसू बहायेगा ....जो यह भी नहीं जानते कि कोयल किसी चिड़िया का नाम है , जो यह भी नहीं सुनती के चातक कहाँ चिल्लाता है ...जो आँख भर यह भी नहीं देखते के आम प्रणय सौरभपूर्ण मंजरियों से कैसे लदे हुए हैं , जो यह भी नहीं झांकते कि किसानों के झोंपड़ों के भीतर क्या हो रहा है , वे यदि दास बने ठने मित्रों के बीच प्रत्येक भारतवासी की औसत आमदनी का परता बता कर देश प्रेम का दवा करें तो उनसे पूछना चाहिए कि " भाइयों , बिना परिचय का यह प्रेम कैसा ...? जिनके सुख-दुःख के तुम कभी साथी नहीं हुए , उन्हें तुम सुखी देखना चाहते हो , यह समझते नहीं बनता । उनसे कोसों दूर बैठे बैठे , पड़े पड़े , या खड़े खड़े तुम विलायती बोली में अर्थशाश्त्र के दुहाई दिया करो , पर प्रेम का नाम उनके साथ ना घसीटो । "

प्रेम हिसाब किताब की बात नहीं है । हिसाब - किताब करने वाले भाड़े पर मिल जाते हैं पर प्रेम करने वाले नहीं । हिसाब किताब से देश की दशा का ज्ञान मात्र हो सकता है । हित- चिंतन और हित- साधन की प्रवृत्ति इस ज्ञान से भिन्न है । वह मन के वेग पर निर्भर है , उसका सम्बन्ध लोभ या प्रेम से है जिसके बिना आवश्यक त्याग का उत्साह हो ही नहीं सकता है । जिसे ब्रज की भूमि से प्यार होगा इस प्रकार कहेगा ...
नैनन सो रसखान जबै ब्रज के बन बाग़ तडाग निहारौं
केतिक ये कलधौत के धाम करीक के कुंजन ऊपर बारौं ..

रसखान तो किसी की लकुटी अरू कमरिया पर तीनों पुरों का राजसिंहासन तक त्यागने को तैयार थे , पर देश प्रेम की दुहाई देनेवालों में से कितने अपनी किसी थके -मांदे भाई के फटे पुराने कपड़ों और धूल भरे पैरों पर रीझकर या कम से कम खीझकर , बिना मन मैला किये कमरे की फर्श भी मैली होने देंगे ...

अब पूछिए के जिनमे वह देश प्रेम नहीं है उनमे वह किसी प्रकार भी हो सकता है ...? हाँ , हो सकता है ....परिचय से ...सान्निध्य से .....


जय हिंद ..