बुधवार, 16 सितंबर 2009

बे - बहर ख्याल

ख्याल कुछ बे-बहर से


तन पिंजर मैं कैद सही
भीतर मन आजाद है
छितराए से हैं पंख बहुत
बेखौफ मगर परवाज़ है

थके रुके नही अब कदम कभी
राहें कितनी भी दुशवार हैं
शिकन आए कोई माथे पर
संग मेरे जो हमराह है!

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नजर चुरा कर गुजरा गली से
ये क्या अंदाज़-ए-मुलाकात है
'ख्याल-ए-ताल्लुक रहा हर पल
बेलफ्ज़ जिसकी फरियाद है

अंजाम -ए-आशिकी क्या होगी
ज़फा जिसकी आगाज़ है
करता बात मुहब्बत की है
तल्ख़ मगर अंदाज़  है ..!!

**************************************


सम्पादित।  … 


32 टिप्‍पणियां:

  1. "नजर चुरा कर गुजरा गली से
    ये क्या मुलाकात-ए-अंदाज है..."

    इस प्रश्न का जवाब तो नीचे ही दे दिया है आपने - "ताल्लुके खयाल रहा हर पल.." ।

    पूरी कविता बहर में हो न हो (मुझे इसकी तमीज भी नहीं), लुभाती है । आभार ।

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  2. जज्बात जब उमड़ के सामने आ जाते हैं
    कुछ ऐसा ही होता है
    बिन बात बात निकल जाती है
    परवान चढ़ने से कोई रोक सकता है भला..!
    क्या खूब बयां किया है आपने
    बेपनाह ख्वाहिशों को ।

    झूम उठा मन । आभार ।

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  3. अच्छा है जो ये बे-बहर ख्याल है, जो कही बहर में होती तो क्या होता जी ? हम तो flat हो गए.
    अंजामे आशिकी क्या होगी.
    जफा जिसका आगाज़ है
    करता बात मोहब्बत की
    तल्ख बड़ी आवाज़ है
    सुभानाल्लाह !!!
    हमने तो बहर की चिंता छोड़ दी है, दिल में जो बात उतर जाती हैं वो बहर में हो जाती है जो दिल में नहीं उतरती तो हम बहरे हो जाते हैं.. :):):)

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  4. बे-बहर ख्याल ................वाणी जी ये ख्याल तो दरअसल चार ताबीज़ हैं .............इनमे आपका अंदाज़ भरकर आपने हमें पहना दिया हैं ...................आमीन ...........

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  5. वाह क्या खूब सुंदर रचा आपने !

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  6. अत्यंत सुंदर रचना!!!
    बहुत अच्छा लगा...बधाई!!

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  7. आपके जितना बड़ा शायर तो नहीं हूं लेकिन इन लाइनों के आगे कुछ कहना है....
    ...शिकन ना आए कोई माथे पर, साथ मेरे जो हमराह है
    -ना जाने क्यूं लोग साये से डरते हैं,
    पल पल मरने की बात करते हैं
    साया तो जीने का अहसास है
    बिछड़े सब बारी बारी नहीं कोई हमराह है
    साया ही सही, जीवन पथ पर कोई तो साथ है

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  8. आपके जितना बड़ा शायर तो नहीं हूं लेकिन इन लाइनों के आगे कुछ कहना है....
    ...शिकन ना आए कोई माथे पर, साथ मेरे जो हमराह है
    -ना जाने क्यूं लोग साये से डरते हैं,
    पल पल मरने की बात करते हैं
    साया तो जीने का अहसास है
    बिछड़े सब बारी बारी नहीं कोई हमराह है
    साया ही सही, जीवन पथ पर कोई तो साथ है

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  9. बहुत सुन्दर रचना, ख़ासकर आखिरी चार लाइने

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  10. waah bahut sunder khas kar dusrawala muktak behad pasand aaya

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  11. vani ji,
    bahut sundar BE-BAHAR...
    adaji ne sach hi to likha he ki yadi BAHAR me hoti to..../ sachmuch behtreen rachna he/
    bahut achha likhati he aap/

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  12. कमाल का लेखन है आपका......बहुत ही खुबसूरत है आपके सोच !

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  13. Di........ bahut hi sunder rachna hai......alfaazon ko bahut hi achche se piroya hai....... aapne.......

    -------------------------------------


    Aur......... AAPKO JANMDIN KI BAHUT BAHUT BADHAI..........

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  14. करता बात मोहब्बत की
    तल्ख बड़ी आवाज़ है
    तौबा तौबा जी बहुत सुन्दर लाजवाब

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  15. "नजर चुरा कर गुजरा गली से
    ये क्या मुलाकात-ए-अंदाज है..."behad khoobsurat pankatia...yun churaee usne ankhe sadgee to dekhiye...bazam me meri janib ishara kar diya.....

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  16. बहुत सुंदर और लाजवाब रचना लिखा है आपने! हर पंक्तियाँ मुझे बहुत अच्छी लगी!

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  17. तन पिंजर मैं कैद सही
    भीतर मन आजाद है
    छितराए से हैं पंख बहुत
    बेखौफ मगर परवाज़ है
    -----------
    ये पंक्तियां ही विक्तोर फ्रेंकल की याद दिला देती हैं!

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  18. "तल्ख मगर आवाज़ है…!"

    …बेहतरीन!!!
    :)

    धन्यवाद।

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  19. मुझे तो यह सूफियाना कलाम जैसा लगता है तन पिंजर मैं कैद सही
    भीतर मन आजाद है वाह

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  20. Wah aapki "AAnjam E Ashquie"

    aji behar vehar choro....

    ....accha hai ki behron ki is duniya main koi to sun sakta hai....

    yahi kabhi adadi ko bhi kaha tha...
    ...vichaaron ka koi 'grammaer' nahi hota !!

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  21. नजर चुरा कर गुजरा गली से
    ये क्या "'मुलाकात ए अन्दाज"' है
    "'ताल्लुक ए ख्याल"' रहा हर पल
    बेलफ्ज़ जिसकी फरियाद है ...

    संयोग से टिप्पणीकार भाई हिमांशु ने उन्हीं दो बातों का ज़िक्र किया जिन्हें मैं उलट देने की फ़िराक में हूं ! मेरा ख्याल है कि आपके ख्यालों का बे-बहर होना कोई मुद्दा नहीं पर...'''अंदाज़-ए-मुलाकात''' और '''ख्याल-ए-ताल्लुक''' लिखना सही माना जाएगा !

    बस इसी तर्ज पर एक सुझाव ये भी कि अंजाम ''होता'' है ''होती'' नहीं सो आखिरी शेर की पहली लाइन में लिखा जाए...
    अंजाम -ए-आशिकी क्या '''होगा'''

    पहले जो खटका उसे कहा अब जो मन में अटका है वो कहना है ! आपने बहुत शानदार ख्याल रचे हैं ! आपकी फीलिंग्स अतुलनीय है खासकर पहला शेर ! साधुवाद !

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    1. इतनी गलतियां थी तभी तो उस समय बेबहर लिखा :)

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