गुरुवार, 3 सितंबर 2009

****** दुहाई है !!*****

तोडा सख़्ती-ए- हालात ने इस कदर
दिल तड़प कर कहता दुहाई है
रगों मे बहता था जो खून मुद्दतों से
बहाकर जमीं पर कहते हो रोशनाई है
चलते चले जाओ भले मंजिल न मिले
वाह रहनुमाओं ने क्या राह दिखाई है
दम निकल गया उफ़ जुबां से न निकली
आशिक-ए-ज़िन्दगी क्या तेरी आशनाई है ...!!

--साभार ----" शरद कोकास "

मेरी पिछली पोस्ट पर शरद कोकास जी ने टिपण्णी करते हुए "रदीफ़" और "काफिये" की त्रुटि की और संकेत करते हुए गीत ग़ज़ल के तकनीकी पहलू पर ध्यान देने का सुझाव दिया था ...इस बार ग़ज़ल पोस्ट करने से पहले शरद जी की राय ली मैंने ...उन्होंने ग़ज़ल में कुछ शब्दों के हेर फेर से क्या खूब बना दिया है इसे ..इसे ही तो कहते है ना स्वस्थ आलोचना की स्वस्थ प्रतिक्रिया ...शरदजी की परिष्करण प्रक्रिया से गुजरने से पहले ये ग़ज़ल कुछ यूँ थी--

तोडा सख्ती - ए- हालत ने इस कदर
दिल तड़प कर कहता है दुहाई है दुहाई है
पल पल के पसीनों से भरा था रगों में खून
गिराकर जमीं पर कहते हो रोशनाई है
चलते ही चले जाओ मंजिल न मिले
रहनुमाओं ने क्या राह दिखाई है
दम निकल गया जुबां से उफ़ न निकली
वाह इश्क ! क्या तेरी आशनाई है ..

आप सभी देख सकते है की शब्दों की जरा सी अदला बदली ने ग़ज़ल को किस खुबसूरत शक्ल में ढाल दिया है ...अब आप बताएं की शरद जी क्यों किया ऐसा ...उन्हें क्या जरुरत थी की वो मुझे इस तकनीकी पक्ष का ध्यान रखने का सुझाव देते ...इससे उन्हें क्या व्यक्तिगत फायदा होने वाला है ...कुछ भी तो नही ...यह इंसानियत का ही तो जज्बा है ...ख़ुद तरक्की के पायदान चढ़ते हुए भी दूसरो की मदद कर उनकी राह को सुगम बनाते रहना ...

राह के कांटे थे जो सब मैंने अपने नाम कर लिए
इनायत औरों को मिले जो गुलिश्तां की ..!!

यह तो प्रमाणित हो ही गया है कि यदि ब्लॉगजगत में एक दूसरे की टिपण्णी को अपनी व्यक्तिगत क्षति न मानते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण दिया जाए तो कितना कुछ खुशनुमा हो सकता है ...शरदजी का एक बार फिर से बहुत आभार ...!!