गुरुवार, 5 नवंबर 2009

एक खुला ख़त अपनी दीदी के नाम ...अन्तिम किश्त

अब तक आपने पढ़ा ...एक खुला ख़त अपनी दीदी के नाम ..और ...एक खुला ख़त अपनी दीदी के नाम ...2
अब आगे ...

ख़त कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया है ...मगर कोई बात नही ...जितना ज्यादा वजन लिफाफे का होगा ...मन उतना ही हल्का होता जाएगा ...
हाँ तो दीदु ...आगे बढूँ ...तुम्हे उस समय यह सब नही बताया अपने खतों में ...बताकर फायदा क्या था ...तुम इतनी दूर थी ...और अपने दुखडे रोने की मेरी आदत भी नही थी ...घर लौटी अपने माता पिता के पास ...पढने के सनकीपन के हद तक शौकीन , अंग्रेजी में लिखे ख़त जेब में लेकर घुमने वाले और माँ को अक्सर पढ़कर सुनाने वाले मेरे गर्वीले पिता को कैसा महसूस हुआ होगा ...पता नहीं ..मगर उन्होंने मुझसे एक शब्द भी नही कहा ...ना कुछ पुछा ...पास के शहर के महाविद्यालय में दाखिला दिला दिया ...हम नियमित तौर पर भारी भरकम खतों के माध्यम से लगातार जुड़े रहे ...तुम्हारे लंबे खतों में जिक्र होता था ...अभिरंजन सर से हुई मुलाकातों का ...किस तरह अपनी माँ से गले मिलकर रो पड़े थे वे ..और उनकी इस भावुकता पर निहाल हो उठी थी तुम ....की किस तरह तुम अपनी एक सहेली के माध्यम से उनसे मिला करती थी ....की किस तरह बहुत साहस कर एक दिन तुम्हारे घर भी पहुँच गए थे...सब कुछ जाना तुम्हारे खतों के जरिये ...बाद के खतों में अपने पिता के दिल की बीमारी से उपजी उनकी मजबूरियों के जिक्र ने मुझे थोड़ा परेशां किया ...मैंने तुम्हे सचेत किया था की कही वे तुम्हे धोखा तो नही दे रहे ...लौटी डाक से तुम्हारा जवाब था ..." मुझे इससे खास फर्क नही पड़ता ...मैं अपने भीतर बसी अभिरंजन की छवि से प्यार करती हूँ ..."
फिर तुम्हारे पत्रों से ही उनसे अलग होने ...तुम्हारी शादी तय होने की जानकारी मिलती रही ...इधर पापा की पुरानी बीमारी विकराल रूप ले चुकी थी ...आंतों के इन्फेक्शन से पीड़ित पिता को इलाज के लिए बड़े शहरों में इलाज के लिए जाना पड़ता और माँ भी साथ होती ...घर पर छोटे भाई बहनों के साथ मैं ...जिन्दगी की दिशा बदलने लगी थी ...लंबे जटिल ऑपरेशन के बाद स्वस्थ हए पिता के सामने जल्द से जल्द अपनी जिम्मेदारियां पूरी करने का लक्ष्य था ...तीन महीनों के अंतराल में हम दोनों बहनों की शादी तय हुई ...इस बीच तुम एक नन्ही गुडिया की माँ बन चुकी थी ..तुम्हारे ख़त छोटे होते जा रहे थे और उनके बीच अंतराल लंबे ....कुदरत का करिश्मा ही था.... मेरी शादी तुम्हारे शहर में तय होना ...जो अब तुम्हारे लिए पराया हो चुका था ...तुम आयी थी शादी में अपनी गुडिया और जीजाजी के साथ ..और बड़ी बहन की तरह बहुत अच्छी तरह संभाला भी ...शादी के तीसरे दिन तुम आई थी हमारे पुराने शहर में बने आधे अधूरे पुश्तैनी मकान में ...अपने पिता के घर चाय पर निमंत्रण देने ...तुम्हे कितना असहज लगा होगा ...ये तब जाना जब तुमने अपने फ़िल्म वितरक पिता के बंगलेनुमा मकान के बड़े से ड्राइंग रूम में हमारा स्वागत किया...जीजाजी अपने मित्र से मिलने गए हुए थे ...तुम हमें बैठक में अपने छोटे भाई के पास बिठा कर अन्दर चली गयी ...वे पति से बातें करते रहे ..काफी देर तक जब तुम नही आयी तो भैया ने अन्दर जाकर तुम्हे बुलाने को कहा ...अन्दर तुम अपनी भाभी और माँ को कल खरीदी हुई साडियां दिखा रही थी ...मुझे देखकर बोली ..." कल कुछ साडियां खरीद कर लाई हूँ ..ससुराल में सब पूछेंगे ...मायके शादी में गयी थी ..क्या दिया उन्होंने " ...दुनियादारी की इन रस्मों से मेरा कभी पाला नही पड़ा था ...कुछ चुभ सा गया ...कोई टीस उठी ...तुम्हारा ये व्यवहार मुझे स्तंभित कर देने वाला था ...हमारे बीच तथाकथित सामाजिक रुतबे का फर्क चुका था ...आख़िर अब मैं चीफ एकाउंटेंट पिता की पुत्री या बैंक मैनेजर मामा की भांजी नही रही थी ...अब मैं एक साधारण शिक्षक की बहू और जूनियर लिपिक की पत्नी थी ...बस वह हमारी आखिरी मुलाकात थी ...उसके बाद भी मैं अक्सर तुम्हे पत्र लिखती रही ...नए वर्ष ...शादी की सालगिरह आदि पर शुभकामना कार्ड भी भेजती रही ...तुमने कभी उसका जवाब नही दिया ...मैंने भी ख़त लिखने बंद कर दिए ...हाँ ... तुम्हारे घर फ़ोन कर तुम्हारे हाल चाल पूछती रहे ...इन फ़ोन काल्स से ही पता चलता रहा...छोटे भैया की शादी हो चुकी थी ...बड़े भैया की गृहस्थी में भी छोटे बच्चों का पदार्पण हो चुका था ..तुम भी दो बेटियों की मां बन चुकी थी....व्यस्त मैं भी बहुत रही इन वर्षों में ...शादी के बाद फिर से पढ़ाई प्रारम्भ करना ...साथ ही दो नन्ही मुन्नी परियों का आगमन ...मगर मैंने तुम्हे एक दिन के लिए भी नही भुलाया ....बिना शर्त बेइन्तहा प्यार करने का सबक मैंने तुमसे ही सिखा था दीदी ....मगर मेरी वो दीदी कही खो गयी थी ...एक बार फ़ोन पर तुम्हारे छोटी भाभी से बात हुई ...नाम सुनते ही पहचान गयी ..." आपका जिक्र होता रहता है अक्सर जब दीदी छुट्टियों में मायके आती है ..." मतलब भूली तो तुम भी नही थी ...फिर हमारे बीच ये फासले क्यों आ गए थे ...पता नही ...कई बार तुम्हारी कालोनी से गुजरना होता मगर तुम्हारे घर की ओर उठते कदम उस दिन के व्यवहार को याद कर वापस मुड जाते ...
और एक दिन ...अप्रत्याशित सा तुम्हारा फ़ोन आया...तुम्हरी आवाज थोडी अनजानी सी लगी ...तुम अपनी चिरपरिचित शैली में बोल रही थी ..." अच्छा ...मेरी आवाज पहचानी नही ...पिटेगी अब ..." मैं बल्लियों उछल पड़ी ...तुम हमारे परिवार ..बच्चों के बारे में पूछती रही ...तुम सब भूल चुकी थी मेरे पति कहाँ काम करते हैं... हम कहाँ रहते है...सब ....तुमने बताया की तुम अपने बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए रायपुर शिफ्ट कर चुकी हो ...अपने मायके के पास ही कमरा किराये पर लिया है ...अब तुम मुझसे मिलना चाह रही थी ...मैंने तुम्हे पता बता दिया ...मगर साथ ही यह भी की कल मुझे अपनी मां के घर पिता के श्राद्ध पर जाना है ....आने से पहले फ़ोन कर लेना ....या फिर मैं फ़ोन कर बता दूंगी ...
फ़ोन का रिसीवर रखते हुए मुझे फिर वही तुम्हरे पिता की आलिशान कोठी याद आ गयी ..फिर ना कभी तुम्हारा फ़ोन आया ...ना ही मैंने किया ...तुम जानती थी मैं नाराज थी ...इतने वर्षों तक तुमने कोई खोज ख़बर नही ली ....तुम मेरी वो दीदी रही ही नही ...अगर होती तो कभी भी घर आ धमकती और कान उमेठते हुए कहती ...बड़ी आई व्यस्त रहने वाली ..... कितने आश्चर्य की बात है ना ...हम वर्षों एक दुसरे से दूर रहे ...मगर खतों के माध्यम से जुड़े रहे ...और ...आज इतने वर्षों से एक ही शहर में ...बिना दुआ सलाम किए ....मेरे लिए कितना तकलीफदेह है यह सब कुछ ...मगर है तो है ....खो दिया मैंने एक अमूल्य स्नेही रिश्ते को ...अगर मैंने खोया है अपनी मां जैसी दीदी को ... तो उसने भी खोया है अपनी गुडिया को ...जिसने तमाम विपरीत परिस्थितियों में प्रौढावस्था की ओर बढ़ते हुए भी अपने भीतर के निष्पाप बचपन को खोने नही दिया है ...हो सकता है कभी किसी राह पर हम मिल भी जायें ...एक शहर में ही तो हैं ...मगर दुआ हमेशा यही की है ...
गर अजनबी बन कर मिलो कभी जिंदगी की राह में ...बेहतर है ना ही मिलो ....

बहुत प्यार के साथ

तुम्हारी गुडिया


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मंगलवार, 3 नवंबर 2009

एक खुला ख़त ...अपनी दीदी के नाम ...भाग 2

पिछली पोस्ट के सन्दर्भ में ...
अधिकांश टिपण्णीयां इसे संस्मरण समझकर की गयी हैं ...मगर यह सिर्फ़ संस्मरण नही है ..संस्मरण में घटनाएँ ज्यों की त्यों रखी जाती है ...मगर यदि कहानी की तरह लिखा जाए तो रोचकता बनाये रखने के लिए इसमे कई कल्पनाये भी जुड़ जाती है ...मेरा अनुरोध है कि इसे कहानी की तरह ही पढ़ा जाए ...लेखन शैली जरुर संस्मरणात्मक है ....

अब आगे ...
घर आमने सामने होने के कारण ...लुका छिपी ..तांक झांक चलती रहती थी ...उधर से गुलाम अली की ग़ज़ल ..." तेरा मिलना बहुत अच्छा लगे है " सुनायी जाती तो इधर तेज आवाज में रेडियो की खटर पटर शुरू हो जाती ...कभी कभी कटोरी चम्मच से सुर में सुर मिलाया जाता ....महाविद्यालय में वार्षिकोत्सव की तैयारी प्रारम्भ हो चुकी थी ...सांस्कृतिक व खेलकूद प्रतियोगिताएं में भाग ना लेने के कारण कॉलेज जाना कम ही होता था ...छोटे मामा छुट्टियों में घर आए हुए थे ....फुरसत के दिनों में पढ़ना लिखना मौज मस्ती करते हुए दिन हँसी खुशी बीत रहे थे ..
तभी एक दिन दोपहर में ...तुम कॉलेज से आई और सीधे अपने कमरे में चली गई ..बिना कुछ बोले ...काफी देर तुम्हारा इंतज़ार करने के बाद दरवाजा खटखटाया तो तुमने बहुत ही अनमने ढंग से मुझे टरकाते हुए जवाब दिया ..." अभी मैं बहुत थक गई हूँ ...कुछ देर आराम करने दे ..." और फिर अपना दरवाजा बंद कर सो गयी ...मैं देर तक तुम्हारे इस अजीबोगरीब व्यवहार के बारे में सोचती रही ....दुसरे दिन घर में छोटे मामा और उनके दोस्तों के सुगबुगाहट में जो शब्द कानों में पड़े ...कलेजे को चीरते से ...मैं दनदनाती तुम्हारे कमरे में पहुँच गयी ..." तुम आज कॉलेज नही गयी..क्या हुआ ...और ये क्या सुन कर रही हम मैं ... मुझे यकीं नही हो रहा ...मेरी दीदी से सम्बंधित कुछ ऐसा भी हो सकता है जो मुझे पता नही ...और मामा और उनके दोस्तों को पता है ..." एक साँस में इतने सारे सवाल कर गई तुमसे ....बिखरे बालों और उतरे चेहरे के साथ जब तुमने उन समाचारों की पुष्टि की तो मेरे क़दमों के तले जमीं ही खिसक गयी .....शांत ...संस्कारवान ...सुरक्षित माने जाने वाले उस कस्बे में इस तरह की घटना बहुत ही अप्रत्याशित थी ....कॉलेज से घर लौटते के लिए अक्सर हम जिस छोटे सुनसान रास्ते का उपयोग करते थे ...जहाँ 3 हॉस्टल एक साथ बने हुए थे ...वहीं से घर लौटते समय अचानक किसी ने तुमपर हमला कर दिया था ...गनीमत थी की अभी सर साथ थे ...उनके साथकुछ हाथापाई भी हुई ...तुम सुरक्षित घर लौट आयी ...मगर बहुत घबरा गयी थी ...हम बहुत देर तक खामोश हाथ में हाथ लिए बैठे रहे ...मगर ...मेरी बहादुर दीदी ...ऐसे होसले पस्त नही होने थे उसके ...शाम तक फिर वही चहल पहल लौट आई ....जब छोटे मामा और उनके दोस्तों को इस ख़बर को चटखारे लेकर सुनते सुनाते देख जो तकलीफ हुई ...वह इस दुर्घटना से किसी भी तरह से कमतर नही थी ...उस रोज लड़की होने की अपनी बेबसी और आत्मीय रिश्ते के वैधानिक नही होने पर कितना गुस्सा ...कितनी घुटन ..महसूस हुई ...उसे शब्दों में बयान नही किया जा सकता ...घर वालों को तुमसे सहानुभूति होने की बजाये उन्हें मुझे तुमसे दूर रखने की कोशिश ज्यादा रुचिकर लगने लगी थी ...उन्हें पुरजोर कोशिश नही करनी पड़ी ...क्योंकि तुम्हारा प्रोबेशन पिरिअड जल्दी ही ख़त्म होने वाला था ...तुमने अपने घर रायपुर लौटने की तैयारी कर दी ...छोटे मामा जा ही चुके थे ...फिर उसी सन्नाटे की आहट पाकर मुझे उदास होते देख तुमने अपने जाने से पहले मेरे पापा को आने का टेलीग्राम कर दिया ...मम्मी पापा तो नही आए मगर उन्होंने दोनों छोटे भाइयों को भेज दिया ...मामी पहले ही परेशां थी और मेरे दो शैतान भाइयों को देखकर तो उनका पारा सातवे आसमान तक पहुँच गया था ...मगर किया भी क्या जा सकता था ..फायनल एक्जाम थे ..बीच में छोड़ का नही जाया जा सकता था ...तुम्हारे जाने के बाद कुछ अच्छा नही लग रहा था ...मैं अक्सर छत पर टहलते अपनी उन यादों को समेटने की कोशिश लगी रहती ...सामने वाले मकान में जब कभी अभीरंजन नजर आते ...तुम्हारी याद और बेतरह आती ...ऐसे में एक दिन बैंक से मामा दनदनाते हुए आए ...मामी को एक तरफ़ ले जाकर कुछ खुसर फुसर किया ...उनके चेहरे के बदलते भाव कुछ अनहोनी होने की आशंका व्यक्त कर रहे थे ...मामा ने तो मुझे कुछ नही कहा ..मगर मामी बड़े प्यार से अभिरंजन सर और मेरे रिश्ते के बारे में पूछने लगी ...मैं सन्न रह गयी ...उस व्यक्ति के साथ रिश्ता !!!..जिसे मैं अपना पिता मान बैठी थी ...उन अभी सर के साथ जिनसे क्लास तक में कभी सवाल पूछना तो दूर ...उनके सवालों का जवाब देने तक की हिम्मत नही होती थी ....मामी ने झिझकते हुए बताया कि मामा के कोई दोस्त है बैंक में ...जो अभिरंजन सर के भी दोस्त हैं ...कुछ बताया है उन्होंने ...मगर हमें तुम पर पूरा विश्वास है ...तब ही जाना मामा मामी के वास्तविक स्नेहिल रूप को ...नारियल के सख्त खोल के भीतर छिपी मुलायम सी गिरी जैसा उनका प्यार ....जब अभिभावक सख्त होते हैं तो शायद उसके पीछे उनकी मंशा मायावी दुनिया की कुटिल चालों से अपने बच्चों को बचाना ही होता है ...घर में पूरा समर्थन मिला.. मगर जाने क्यूँ घर से बाहर हर नजर व्यंग्य से घूरती सी महसूस होती रही ...और एक दिन तो हद ही हो गयी ...सुबह कॉलेज जाने के लिए जैसे ही घर से बाहर निकली ...सामने वाले मकान की दीवारों पर बड़े बड़े अक्षरों में अभिरंजन के साथ अपना नाम लिखा देखा ...उल्टे पैरों अन्दर लौट कर बहुत हिम्मत से मामी और संजय को यह बात बताई ...हालाँकि बाद में संजय ने उसपर पुताई कर छिपा दिया था ...मगर मुझे हर वक्त सोते जागते वे शब्द मुंह चिढ़ते से प्रतीत होते ...अभी सर को पता लगा तो उन्होंने संजय से कहलवाया था ..." बेबी को बोलना ..परेशां नही होगी ...आवारा किस्म के लोग इस तरह की हरकत किया करते है ...सब भूलकर अपनी पढ़ाई में मन लगाओ .." मैं समझ नही पा रही थी ...इस तरह दुश्मनी निकालने वाला अजनबी शख्स कौन था ...मैंने किसी का क्या बिगाडा था ...हाँ ..कुछ लोगों के प्रेम पत्र जरुर बेरंग लौटाए थे ...और अपनी क्लास मेट के साथ बदतमीजी करने वाले एक परिचित को लताडा था ...क्या मेरा यह गुनाह इतना बड़ा था ...इन सवालों से रात दिन उलझते किस तरह एक्जाम दिए ...क्या पढ़ा ...क्या लिखा ...कुछ याद नही ...हमेशा फर्स्ट डिविजन से उत्तीर्ण होने वाली ...विद्यालय में सबसे अधिक मार्क्स प्राप्त कर सबसे बुद्धिमान छात्रा का खिताब जितने वाली मैं ...किताबों से दूर भागने लगी ...परीक्षा परिणाम वही हुआ जो ऐसे हालातों में होना था .... मेरा सुनहरे कैरिअर का सपना बरबाद हो चुका था ....मम्मी पापा के पास लौट गयी मैं ...कभी पलटकर यहाँ नही आने के लिए ...मगर स्थान बदलने से दुखद यादे बदली या भूली जा सकती तो क्या सभी यही नही कर लेते ...



कहानी में अभी और बहुत ट्विस्ट हैं ...देखिये अगले अंक में

रविवार, 1 नवंबर 2009

एक खुला ख़त ....अपनी दीदी के नाम



प्रिय
दीदी,

आज बरसों बाद तुम्हे पत्र लिखने बैठी हूँ तो कोई सिरा नजर नही आ रहा है .... कहाँ से बात शुरू करूँ ...अंतराल भी तो बहुत लंबा हो गया है ....मगर दीदी ...जब हम पहले काफी खतो-खुवात किया करते थे ...तब तो ऐसा कभी नही होता था ...कितने लंबे लंबे ख़त हो जाया करते थे ...कहाँ गए ...किससे मिले ...किसने क्या कहा ...कौन सी मूवी देखी ...और भी अंतहीन निरर्थक बचकानी बाते ....लिखते हुए अगर कलम रूकती भी थी तो सिर्फ़ इस डर से की लिफाफे का वजन ज्यादा ना हो जाए ...
ये सच है की सालों बीत गए ...तुम्हारे पास मेरा कोई ख़त नही पहुँचा ....मगर जाने कितने ख़त लिखे तुम्हे मन ही मन ....लिखे और फाड़ दिए बस ...इस आस में की तैरते हुए वे शब्द तुम तक जरुर पहुँच गए होंगे ...तुम ...यानि मेरी प्यारी दीदी...मेरी मां ....
आज जब फिर से तुम्हे ख़त लिखने बैठी हूँ तो सब कुछ चल चित्र सा आँखों के आगे घूम रहा है ...वो अनायास हुई तुमसे पहली मुलाकात ...मैं और संजय घर के बीचों बीच बने चौक में खाना खा रहे थे ....तभी पता चला की ...हमारे कॉलेज की कोई लेक्चरार आयी है ....हमारे घर में कमरा किराये पर लेने ....अपनी किसी लेक्चरार दोस्त के साथ ...अचानक दो अजनबियों को सामने देखकर हडबडाते हुए हम अपनी थाली ले भागे ....बाद में जब तुम हमारी किरायेदार बन गयी थी ...हमारी इस हरकत के लिए बड़े प्यार से लताडा था ...क्यों भागे तुम लोग ...क्या हम तुम्हारा खाना छीन कर ले जाने वाले थे ....कितना लाड दुलार था तुम्हारी झिड़की में की पहले ही दिन सारी लाज और झिझक छोड़ तुम हमारी मेम की बजाय दीदी बन गयी थी ...पहली नियुक्ति थी तुम्हारी हमारे कॉलेज में ...तुम्हारे अधिकार भरे लाड दुलार ने ही इस दब्बू ...डरी सहमी लड़की को मिलनसार और वाचाल बना दिया ...
अपने गाँव में उच्च शिक्षा हेतु कॉलेज की कोई व्यवस्था नही होने के कारण मैं यहाँ इस कस्बे में अपने मामा के घर रह कर पढ़ाई कर रही थी ....अपने माता पिता से दूर मामी के कठोर अनुशासन के बीच स्नेह को तरसती इस किशोरी को तुम्हारी ममतामय शीतल छाँव मिल गई थी ...कॉलेज से आते है तुम्हरी गोद में सर रखकर लेटना और कॉलेज में दिन भर की खट्टी मीठी गतिविधियों की चर्चा करना दिनचर्या का एक प्रमुख हिस्सा बन गया था ...तुम्हे याद है दी ....हमारे इतिहास की कक्षा में जब तुम्हारा पिरिअड होता तो...हम दोनों एक दुसरे से अनजान बने हुए आंखे चुराए रहते थे ...की कहीं क्लास में ही हँसी ना छूट पड़े ...मुझे पहले ही धमका देती थी तुम ..." खबरदार जो क्लास में मेरी ओर देखकर मुस्कुराई तो " ...अभी भी मुस्कराहट पसरी जा रही है चेहरे पर ....
जैसे जैसे हमारी नजदीकियां बढती जा रही थी ...मामी की कठोरता भी ...पता नही क्या था उनके स्वाभाव में ज्यादा दिन किसी से पटरी बैठती ही नही थी उनकी ...कुल चार प्राणी ही तो थे हम ...मामा, मामी, उनका बेटा संजय , और मैं ...मामा के बैंक जाते है मामी पुरे घर में ताले जड़ कर घुमने निकल जाती , संजय अपनी पढ़ाई , दोस्तों और लाइब्रेरी में मस्त रहता ...उस हवेलीनुमा बड़े से मकान में सन्नाटों के बीच बहुत अकेली हो जाती थी मैं ... मामी के दबंग स्वाभाव के कारण सहेलियां भी घर आने से कतराती थी ....अकेले कही जाना तो खैर सम्भव ही नही था ...इन्ही गहरी उदासियों और अकेलेपन के बीच तुम आयी थी खुशनुमा सुबह बन कर ....कभी चाय भी ना बनाने वाली किताबी कीडा इस लड़की को तुमने अपनी प्यारी नसीहतों के जरिये ना सिर्फ़ आटा गूंधना सिखाया ...बल्कि छोले और सेवइयां बनाना भी ....तुम अपने शहर से लेकर आयी थी ...अपनी नानी के हाथ की बनी खास सेवईआं ...कभी तुम अपनी साथी लेक्चरार के साथ घुमने निकल जाती और देर से घर आती तो मैं तुमसे इतनी नाराज हो जाती ...मुंह फुलाकर बैठ जाती ...तुमसे बात नही करती और ना ही तुम्हारी किसी बात का जवाब देती ....तो तुम भी कहाँ मनाती थी ...गुर्राकर कहती ...सीधी तरह से बात करती है या लगाऊं दो थप्पड़ ...बिना पीटे तेरे चेहरे की सुजन नही उतरेगी क्या ...सारा गुस्सा और नाराजगी धुएँ की तरह काफूर हो जाता और मैं फिर एक बार तुम्हारी स्नेह की आंच से भीगती तुम्हारी गोद में सर रखकर पूरे दिन भर का लेखा जोखा सुनती ...
इधर तुम्हारी बातें अक्सर घूम फिर कर एक नाम पर आकर अटक जाती ......अभिरंजन वासवानी ....हमारी कॉलेज के भौतिकशास्त्र के प्रोफेसर ....जो हमारे सामने वाले मकान में ही किरायेदार भी थे ...सामान्य से कुछ लंबे ...लंबा चेहरा ...घने बाल ...घनी मूंछे .... आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी अभिरंजर सर से सभी प्रभावित थे ....हमारी रसायन शास्त्र की प्रोफ़ेसर डॉ.रत्नेश भी ....साथ साथ कॉलेज आते जाते उनसे तुम्हारी मित्रता कब अनुराग में बदल गयी ...तुम्हारी इतनी घनिष्ठ होने के बावजूद मुझे भी पता नही चला ...मैं अक्सर उनका नाम लेकर तुम्हे छेडा करती थी...एक दिन बहुत लाड में आकर तुम बोल उठी ..." मेरी शादी हो जाने दे ...मैं तुझे कानूनन गोद ले लूंगी ...और फिर हम हमेशा साथ रहेंगे..." मुझे चहकने का एक और बहाना मिल गया ..." अरे वाह ...फिर तो मैं अभी सर को बापूजी कहा करुँगी...."... जब तुमने यह बात अभिरंजन सर को बताई तो अपने लिए बापू शब्द का प्रयोग सुनकर वे दिल खोल कर हँसे थे ...बाद में तुम्ही ने तो बताया था ...तब कहाँ पता था ....ये सब कोरी भावुकता भरी बातें हैं जो यथार्थ के धरातल पर कदम रखते ही दम तोड़ने वाली हैं ...



क्रमशः ...... अभिरंजन के उनकी जिन्दगी में आने से और क्या परिवर्तन हुए...जानिए अगली कड़ी में ...


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