गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

जात ना पूछो साधू की ......, छाया का भ्रम ...दो संकलित प्रेरक प्रसंग

रेल में यात्रा कर रहे एक तिलकधारी सेठ ने जब अपने भोजन का डिब्बा खोलना चाहा तो पास ही बैठ खद्दरधारी नेता को देखकर उसे कुछ शंका हुई।
सेठ ने कहा ...." अजी नेताजी ! आप किस जाति के हैं? क्षमा करना । जरा ख़ास काम है । इसलिए पूछने की हिम्मत हुई ।"

इस पर खद्दरधारी व्यक्ति ने सेठ से पूछा ..." जात न पूछिये साधू की , पूछ लीजिये ज्ञान .....वाली कहावत नहीं सुनी क्या आपने सेठ जी ..."

पर आप तो गेरुए वस्त्र पहने साधू नहीं हो। आजकल ब्राह्मण , बनिए सभी अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए पहन लेते हैं। हो सकता आप भी इसी कारण पहने हो। अपनी जाति बनाने में क्या हर्ज़ है ...?

सेठजी का आग्रह सुनकर नेताजी कुछ सोचकर बोले ..." किसी एक जाति का हो तो बताऊँ । प्रातः काल जब घर आँगन और शौचालय की सफाई करता हूं तो सफाई कर्मी हो जाता हूँ। दाढ़ी बनाते समय नाई , कपडे धोते समय धोबी , हिसाब- किताब करते समय बनिया और विद्यार्थियों को पढ़ाते समय ब्राह्मन ...इस तरह मेरे कर्म के आधार पर आप खुद ही निर्णय ले ।

उत्तर सुनकर ट्रेन के सभी यात्री खुश हुए । तभी स्टेशन आ गया । स्टेशन पर उतरते ही नेताजी को मालाएं पहनाते अभिवादन करते देख सेठ जी ने पुछा ..." ये नेताजी कौन है ....."
तो उन्हें बताया गया..." आचार्य जे. बी.कृपलानी ..."

सुनते ही सेठ जी क्षमा याचना करने लगे ।

तब कृपलानी जी बोले ..." व्यर्थ जाति की श्रेष्ठता का ढोल पीटना छोडो , यही क्षमा है ..."

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छाया का भ्रम

भोर हुई तो लोमड़ी आँखे मलती हुई उठीउसके पूछ उगते हुए सूरज की ओर थीछाया सामने पड़ रही थीउसकी लम्बाई और चौडाई देखकर लोमड़ी को अपने असली स्वरुप का आभास मानो पहली बार हुआसोचने लगी कि वह बहुत बड़ी हैऔर इस लिए कोई बड़ा शिकार करना पड़ेगाअपने इसी भ्रम को लेकर वह जंगल में गहरी घुसती चली गयीभूख जोरों से लग रही थी मगर छोटी खुराक से तो पेट नहीं भरेगा , इसी भ्रम में उसे हाथी का शिकार करने की धुन लग गयी थी

भूखी लोमड़ी दौड़- दौड़ कर थक कर चूर हो गयीतब तक दोपहर हो गयी थीसुस्ताने के लिए जब जमीन पर बैठी तो सारा नजारा ही बदल चुका थाछाया सिमट कर पेड के नीचे जा छुपी थी
अब लोमड़ी के चिंतन की नयी दिशा प्रारंभ हो चुकी थीवह सोचने लगी - मेरे इतने छोटे आकार के लिए तो मेंढक का शिकार ही काफी थामैं बेकार छाया के भ्रम में इतनी देर भटकी

मनुष्य भी इसी तरह अपनी इच्छाओं को देखकर अपनी आवश्यकताएं आसमान के बराबर मानने लगता हैविवेक के आधार पर जब सत्य का आभास होता है , तो उसका दृष्टिकोण बदल जाता है



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29 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर प्रसंग
    प्रेरणादायक भी

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  2. प्रात सदुपदेश -आज का दिन धन्य हुआ !

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  3. आभार प्रेरक प्रसंगों के लिए.

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  4. आज तो कुछ और ही रूप है आपका...
    बहुत सुन्दर लगीं दोनों ही लघु कथाएँ...बहुत ही शिक्षाप्रद...
    चलिए कुछ न कुछ तो काम में आ ही जाएँगी दोनों ..जीवन में भी..
    धन्यवाद..

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  5. बहुत ही अच्छे प्रेरक प्रसंग और आज भी प्रासंगिक...

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  6. वाणी जी म्हारी माँ रोजाना म्हारो कान पकड़ी नी असी असी ज्ञानवर्धक बाते बतियावे हैं ............अबे हूँ (मैं) कीं कऊ तमसे सुबह सुबह म्हारो तो दिण बनिगियो ...............

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  7. bahut khoob prerak prasang subah ki khurak mil gayi...
    http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

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  8. बहुत धन्यवाद, सुबह सुबह ही इतने सुंदर प्रेरक प्रसंग पढवाये.

    रामराम.

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  9. दोनों प्रसंग प्रेरणादायक....आभार

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  10. आपका शुक्रिया, सुबह सुबह ज्ञानपरक कथा पढाने के लिए...

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  11. ज्ञानवर्धक उपदेशक सुंदर प्रसंग...धन्यवाद वाणी जी

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  12. दोनो ही लघु कथायें शिक्षाप्रद्…………………अति उत्तम्………………आभार्।

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  13. दोनों ही प्रसंग बहुत ही प्रेरक हैं....ब्लॉग के नाम को सार्थक करती पोस्ट...ऐसे ही ज्ञान की वाणी बोलती रहा करें...:)

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  14. दी.... यह दोनों प्रेरक प्रसंग बहुत अच्छे लगे.... शिक्षाप्रद .....

    दी.... क्या इस छोटे भाई से कोई नाराजगी है क्या?

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  15. दोनों हो प्रसंग अत्यंत प्रेरणात्मक।
    सुन्दर लिखा है वाणी जी ।

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  16. बहुत सुन्दर। कृपलानी जी भी और लोमड़ी बहन भी।

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  17. प्रेरक प्रसंग !
    अनुकरणीय वृत्तांत !
    आभार प्रस्तुति के लिए ।

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  18. कृपलानी जी वाला प्रसंग बहुत प्रेरक है.

    लोमड़ी को तो बुद्धि आ गई..काश, इन्सानों को भी आ जाये मगर छाया इनको सिमटती दिखती ही नहीं, क्या करें.

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  19. बहुत अच्छे प्रेरणादायक प्रसंग.

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  20. जब भी मुझे कोई धार्मिक विचारों वाला
    ब्लाग मिलता है तो खुशी होती है
    और अच्छा हो कि संतो के दृष्टांत
    आदि शामिल करें हमारे यहाँ प्रेरक
    कथाओं की कमी नहीं पर हम उधर
    अक्सर ध्यान नहीं देते
    satguru-satykikhoj.blogspot.com

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  21. aapki rachna padh kar jitna acchha laga utna dukh b hua..acchha u laga ki aapki rachna ne ek atyant mehetvpoorn baat saralta se samjha di..dukh is baat ka ki itne dino tak me kyu nahi aa payi aap ki rachna par.
    bt ye kah kar khud ko tasalli de leti hu ki DAIR AAYE...DURUST AAYE...:):)
    badhayi.

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