बुधवार, 28 जुलाई 2010

इनसे सावधान हो जाएँ .....

कल दैनिक भास्कर के इस आलेख को पढ़कर मन में अजीब सी बेचैनी छा गयी .....
इनसे सावधान हो जाएँ ...

ऐसे लोगों का अपने आसपास होना जो आपकी निजता , आपकी पहचान चुरा लेते हैं , चिंताजनक है ...मित्रों और परिचितों की अचानक बदलती नजरों को आप समझ भी नहीं पाते , बस भीतर ही भीतर हैरान होते रहते हैं कि आखिर आपने किया क्या है ...आपसे कुसूर क्या हुआ है ...आपको पता ही नहीं चलता कि कोई आपका करीबी बन कर किस बेदर्दी से आपकी ही जड़ें खोदे जा रहा है ...जिंदगी के इस सफ़र में कई बार ऐसे लोगों से पाला पड़ा है ...जब भी ऐसा होता है , देर सबेर आप समझ तो जाते हैं मगर कुछ कह नहीं पाते , संकोच के कारण या फिर उस व्यक्ति से अपने लगाव के कारण ...

आलेख की इन पंक्तियों ने मुझे बहुत प्रभावित किया ...
"जो घनिष्ठता की जड़ों को ठीक से जमा लेते हैं, उनकी पहचानें कहीं नहीं खो सकतीं। कोई भी दो करीबी दोस्तों या रिश्तेदारों में दरार या दूरी तभी पैदा कर सकता है, जबकि इसकी गुंजाइश हो।"
सबसे बड़ी बात यही है कि यदि दो व्यक्तियों के बीच इतना प्रेम , विश्वास या समझ है तो उनके बीच में दरार होनी भी कैसे चाहिए ... गौर करें कि कहीं अनजाने ही इसका कारण हम खुद तो नहीं ....हमारे आपसी रिश्तों में पारदर्शिता है तो किसी शक की कोई गुन्जायिश नही होनी चाहिए ....

मैंने सोचा तो पाया कि अंतरजाल पर तो यह और भी आसान है ...किसी की तस्वीर .... प्रोफाइल और रचनाएँ आसानी से दूसरे की पहचान चुराई जा सकती है...तकनीक के जहाँ फायदे हैं , नुकसान भी ....किसी भी इंसान को कुछ भी साबित किया जा सकता है ...

राजस्थान के गाँवों में अशिक्षित लोगों के बीच किसी भी महिला के संपत्ति को हड़पने या दुश्मनी निकलने के लिए डायन साबित कर बेदखल कर देना आम घटना से हो गयी है ...जब अशिक्षित लोगो द्वारा यह सब किया जा सकता है तो शहरों के पढ़े लिखे लोगों द्वारा तकनीक के सहारे कुत्सित मनोवृति के लोगो द्वारा किसी भी महिला को क्या से क्या साबित नहीं किया जा सकता ...इसकी भयावहता का सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है ....


अपना एक संस्मरण बाँट रही हूँ ....बहुत कुछ इस लेख को स्पष्ट करता हुआ ...

हॉस्टल में ज्यादा समय नहीं रहना पड़ा मगर जितने दिन भी रहे , वे यादगार पल थे ...हमउम्र सखियों के साथ 24 घंटे एक साथ रहना , खाना पीना , बतियाना , पढ़ना ...जीवन भर याद रखने लायक सुनहरी यादें दे जाता है ... मितभाषी रही हूँ शुरू से ...मगर जाने कैसे बहुत सार संभाल करने वाली सखियाँ अपने आप जिंदगी से जुडती चली गयी है ...लापरवाही से जमाया मेरा ब्रीफकेस , फैली पुस्तकें , कपड़ों की सीवन पर तुरपाई करने जैसे कई काम रूम मेट ही कर देती थी ...अब ये हमारी भोली सूरत का असर था या बचपन सी मासूमियत का ..ईश्वर ही जाने ...ऐसे ही एक बहुत प्यारी दोस्त थी ...मंजूश्री ....जब भी छुट्टियों से लौट कर आती ...टिफिन भर कर मेरे पसंद का नाश्ता लाना नहीं भूलती ...एक बार छुट्टियों से लौटते उसे याद आया कि मुझे एक बैग की जरुरत है ...नेपाल बोर्डर के नजदीक बसे उसके कस्बे से खरीददारी करने वे लोंग नेपाल ही जाते रहे थे ...वर्षों तक हमारी खरीददारी भी नेपाल में ही होती रही ...हाँ तो ...वह अपने साथ बहुत ही खूबसूरत सा बैग लेकर आई मेरे लिए ...बहुत इसरार करने पर ही उसका मूल्य बताने और लेने को को राजी हुई ...मेरे कस्बे की ही एक और कन्या जो मेरी रूममेट थी, को उस बैग की कीमत ज्यादा लगी ...मैंने उसकी बात को उड़ा देने गरज से सिर्फ इतना ही कहा ...कि कोई बात नहीं अगर कीमत ज्यादा भी हो तो , वो वैसे भी मेरे लिए इतना कुछ करती है ....बात आई गयी हो गयी ... मैं भूल भी गयी इस बात को ...
तीन चार दिन बाद मैंने देखा कि मंजूश्री अपने रूम में बैठी रो रही है ...मैं उसके पास गयी पूछने तो वह मेरा हाथ झटक कर वहां से उठ कर चली गयी ...उसका यह अप्रत्याशित व्यवहार देखकर मैं भोंचक रह गयी ...तब जाकर मुझे याद आया कि इधर तीन चार दिन से हमारी कोई बात ही नहीं हो रही थी ..सचमुच मैं बहुत नासमझ हो जाती हूँ कभी कभी ...मैंने ये सोचा ही नहीं कि इसका कारण उसकी नाराजगी है ....मुझे तो यही लगता रहा ही कि हम अपनी परीक्षा की तैयारियों में व्यस्त है इसलिए बात नहीं हो पा रही होगी ...बहुत पूछताछ करने पर पता चला कि उसकी नाराजगी का कारण मेरी कस्बाई सखी से बैग के सम्बन्ध में हुई बातचीत थी ...पता नहीं हलके मूड में कही गयी मेरे बात को उसने किस तरह तोड़ मोड़ कर मंजूश्री के सामने पेश किया कि वह इतनी आहत थी ...बहुत कोशिश की मैंने उसे अपना पक्ष समझाने की ...आखिर मैंने भी यही सोच कर संतोष कर लिया कि कही ना कहीं हमारी दोस्ती में ही बड़ा झोल था ...वरना किसी के कुछ कहने पर बिना मेरा पक्ष जाने उसे इस तरह अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करनी चाहिए थी ....रिश्ता टूट तो जाता है मगर यह टीस बनी रह जाती है कि बिना वजह आपको इतनी अच्छे मित्र को खोना पडा ....

अपने आस पास के इन नारद और मंथरा टाइप लोगों से सावधान होने की जरुरत है ...आपकी कही बात को जाने किस तरह तोड़ मोड़ कर दूसरों के सामने रख दें कि आपको शर्मसार होना पड़े ...
फिर भी इस अविश्वास भरी दुनिया में मेरा विश्वास बना रहेगा कि अच्छे लोगो को अच्छे लोंग भी हमेशा मिल जाते हैं .....ईर्ष्यालुओं की ही तरह ...

कुछ लोगो को यह पोस्ट निरर्थक से लग सकती है ...मगर दिमाग से बोझ उतरने के लिए आवश्यक भी ....!

28 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही अच्छा लिखा है तूने...सचमुच जो रिश्ते ज़रा ज़रा सी बात पर टूट जाएँ ..उनका टूटना ही बेहतर है....
    बहुत बहुत बहुत ही अच्छी पोस्ट....
    सच्ची.....!!

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  2. बहुत अच्छा लिखा है आपने, लेकिन बेचैनी क्यों?
    आपका अनुभव बताता है कि ऐसे लोग भी हैं जो लोगों के आपसी संबंध बिगाड़कर ही प्रसन्न होते हैं।

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  3. आशा की जानी चाहिए कि अब बोझ उतर गया होगा !

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  4. ऐसे नकारात्मक विचारों वाले लोग जो आस्तीन के सांप होते है, वो हर माहौल में जहर घोलने का काम करते है. जरुरत है अपने बीच ऐसे लोगो को पहचानने की और उनसे बच कर रहने की.

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  5. बेवजह यह बोध न पालें...उम्दा लेखन!

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  6. aapne aamtour par ghatne wali baat hi kahi hai mera sabkaa bhi aise logon se khoob padataa hai ...bahut mushkil ho jaata hai saaf man se koi baat kah paana .lekin isamen shak nahin ki achchhe log bhi usee anupaat men hain ...

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  7. मंथरा एवं नारद के प्रतिरुप तो हर युग और काल में मिलते हैं।
    जरुरी यह है कि हम उनकी बातों को कितना मह्त्व देते हैं।

    यह सब मानव जीवन में ही घटित होता है।

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  8. ऐसे लोगों के कारण हम सरीखे बड़बड़िए हमेशा झेलते हैं। मैं और मेरी दोस्त मण्डली झेलती थी और जा रही है। आदत है कि सुधरती ही नहीं !
    बड़ा नुकसान होता है। बात करिअर तक जा पहुँचती है। कुछ दिन सँभले रहते हैं। फिर वही बड़बड़, मुँहफटई और हा हा ही ही...लेख तो सचमुच उपयोगी है। मगर सीख को उपयोग में लाएँ तब न। :(

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  9. वाणीजी, यह दुनिया है, यहाँ हर प्रकार के इंसान रहते हैं। दूसरों को धक्‍का मारकर खुद आगे बढ़ने वाले लोग बहुत मिल जाते हैं। हमारे जीवन में भी न जाने ऐसे कितने लोग आते हैं। हर पल ऐसे लोगों से संघर्ष करना होता है। इसका कोई उपाय भी नहीं है बस हमारे मुँह से अनावश्‍यक किसी के लिए कुछ भी नहीं निकले इसी में समझदारी है।

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  10. बड़ी सुन्दर पोस्ट। छोटे छोटे उभार भी खटक जाते हैं कभी।

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  11. नारद और मंथरा टायप लोगों की संख्या अब समाज और देश में बढती ही जा रही है और ऐसे लोग इंसानियत के दुश्मन हैं और सामाजिक सद्भाव तथा आपसी सहयोग के लिए बेहद खतरनाक इसलिए जब भी बिना तथ्यों के कोई आपके किसी मित्र की बुराई करे तो उसकी जाँच परताल अपने उसी मित्र से कर झूठे बातों के लिए एकजुट हो बुराई करने वाले को जरूर लतारें और किसी भी शिकायत को सार्वजनिक करने से पहले अपने मित्र से पहले उस मुद्दे पर बातचीत कर समाधान का प्रयास करें क्योकि आज जोड़ने वाले बहुत कम हैं लेकिन तोड़ने वाले स्वार्थी लोग हर जगह मौजूद है |

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  12. निरर्थक ??? आपकी ये पोस्ट तो बहुत ही सार्थक है वाणी जी. सच में हमारे चारों ओर ऐसे बहुत से नारद और मंथरा टाइप लोग घूमते रहते हैं और कई बार अच्छी-खासी दोस्ती में दरार डालने में कामयाब हो जाते हैं. ये सच है कि दोस्ती अगर सच्ची हो तो इतनी आसानी से नहीं टूटनी चाहिए, पर जो लोग बहुत संवेदनशील होते हैं, उन्हें समझाना कई बार मुश्किल हो जाता है... नतीजा एक अच्छे रिश्ते का अंत.

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  13. निरर्थक नहीं, बहुत गंभीर अर्थ है।
    विश्‍वास से बढ़कर कुछ नहीं होता।

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  14. बहुत सुंदर पोस्ट। गहरे विचार लिए हुए।

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  15. मंथरा टाइप के लोग हर युग में थे और रहेंगे ...ये बिलकुल सच कहा आपने कि दोस्ती या कोई भी रिश्ता विश्वास पर ही टिकता है अगर रिश्ता टूटता है तो इसका मतलब उसमें वजन ही नहीं था .
    बहुत सार्थक पोस्ट है आपकी .

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  16. आपने अपने मन का बोझ हल्का कर एक सार्थक पोस्ट लगायी है....सोचने वाली बात यही है कि रिश्ते बनाने आसान हैं लेकिन निबाहने कठिन ....सबकी अपनी सोच होती है ..जो दूसरों की बात पर ज्यादा ध्यान देता है वो मित्रता या रिश्ते निबाहने में चूक जाता है ..

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  17. जो आपका अपना होगा वो कभी जायेगा नही और जो चला गया वो कभी अपना था ही नही………………बस इतना सोच कर यदि जिया जाये तो वो ही काफ़ी है बाकि दुनिया किसी के लिये नही बदलती।

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  18. वाणी ये तो तुमने अपनी,उनकी,सबकी बातें कर दी...किसने नहीं भुगता है ये सब....दो लोगों की अच्छी दोस्ती देख,तीसरे को जलन शुरू हो जाती है...और बस दरार डालने के प्रयास शुरू हो जाते हैं. पर इस जलन में तप कर ही दोस्ती की परख होती है. और दोस्ती सच्ची हुई तो कायम रहती है.

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  19. ईर्ष्या जो न करा दे....अब ऎसे लोगों की दुनिया में कोई कमी थोडे है.

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  20. आप की रचना 30 जुलाई, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपने सुझाव देकर हमें प्रोत्साहित करें.
    http://charchamanch.blogspot.com

    आभार

    अनामिका

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  21. अक्सर आप द्वारा उल्लेखित घटना से कभी ना कभी हर इंसान को मुखातिब होना पडता है. और मुझे भी ऐसी ही एक घटना बरबस याद हो आई. लेकिन मुझे लगता है कि यह अक्सर होजाता है. इस पर अपना कोई वश नही है. कारण जो भी हो. पर हां रिश्तो की टीस तो उम्र भर बनी ही रहती है. बहुत मुश्किल होता है दोस्तो को अपनी जिंदगी से निकालना.

    बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  22. दी......बहुत सही कहा आपने...... आपने तो आँखें खोल दीं.... बहुत उपयोगी आलेख...

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  23. कई आपबीती याद आ गई आपकी इस पोस्ट को पढ़कर....

    निरर्थक नहीं लिखा है आपने कुछ भी...इस तथ्य को ध्यान में रखना बहुत जरूरी है...तभी अच्छे संबंधों को संभाल कर रखा जा सकता है...

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  24. एक शेर है ---
    ''कौन सी बात ने किस शख्स का दिल तोड़ दिया ,
    बोलने वाले को एहसास ही कब होता है ! ''

    बाकी आपके लेख की अंतर्वस्तु पर यही कहूंगा कि ऐसा सबके साथ होता रहता है , और कितना भी सम्हला जाय पर पूर्णतया निवृत्ति संभव नहीं , जिन्दगी इतने सेट पैटर्न पर कहाँ चलती है ! हाँ , बातें बाँट लेने पर सुकून तो मिलता ही है !

    आपका लेख निरर्थक कहाँ ? , देखिये महफूज भाई तक की आँखें खुल गयीं ! हमारी भी ! गिरिजेश भाई अपने पूरे समूह की पीड़ा कह गए ! सार्थक पोस्ट कहूंगा ! आभार !

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  25. अच्छा लिखा आपने. संभलकर आगे बढ़ने की जरुरत है....

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  26. नारदजी और मंथरा तो एक ही थे वो भी सतयुग में |इस कलयुग में तो पग पग पर दोनों चरित्र है |फिर भी हमें अपने आप को बचना ही होगा |एक सामान्य कितु महत्वपूर्ण विषय पर सुन्दर आलेख |
    सब कुछ सिखा हमने न सीखी होशियारी
    सच है दुनिया वालो की हम है अनाड़ी|

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  27. bahut badiya likha aapne...
    Meri Nai Kavita padne ke liye jaroor aaye..
    aapke comments ke intzaar mein...

    A Silent Silence : Khaamosh si ik Pyaas

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