बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

बातचीत का लहजा आपकी पोल खोल सकता है ...

कल शाम किसी परिचित के घर जाना हुआ ...उनका अपना ब्यूटी पार्लर है ....मतलब आइना देख कर घबराने वाली महिलाओं की शरणस्थली ...खूबसूरत हो या उम्रदराज़ , किशोरियां हो या युवतियां , सौंदर्य विशेषज्ञ उन्हें अपनी अँगुलियों पर नचाते हैं .... बड़े अफसरों या उद्योगपतियों की पत्नियाँ उनके आगे सर झुकाए बैठी रहती हैं ...अपनी बारी का इंतज़ार कर रही महिलाओं से लगातार बात करती वे किसी को बोर नहीं होने देती इसलिए अच्छा -खासा जमावड़ा रहता है उनके आस- पास ...हिंदी में बात चीत करते हुए वे कई बार अपनी मातृभाषा शेखावाटी में बतियाने लगती ...मेरी कोशिश रहती है कि जो जिस भाषा मे बात कर रहा हो , उसे जवाब उसी भाषा मे दिया जाए ....हमारी बातचीत हिंदी , शेखावटी , नागौरी , ढूँढाडी ,ब्रज भाषा आदि की पटरियां चढ़ती उतरती रही ...क्योंकि वहां उपस्थित महिलाएं अलग -अलग लहजों और बोली मे बात कर रही थी ..
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राजस्थान के शेखावाटी इलाके में बोले जाने वाली मारवाड़ी भाषा शेखावटी है ....जैसे कि हमारे देश मे (विदेश में भी हो सकता है ) हर बीस कोस पर भाषा या बोली अपना रूप परिवर्तन कर लेती है , राजस्थानी भाषा या बोली भी कई तरह से बोली जाती है ....शेखावाटी , नागौरी , ढूँढाडी, मेवाडी, मारवाडी , मालवी आदि ... शेखावटी क्षेत्र मे राजस्थान के झुंझनु , सीकर , फतेहपुर , नवलगढ़ , चुरू आदि शहर आते हैं ...जबकि ढूँढाडी जयपुर और इसके आसपास के क्षेत्रों मे बोली जाती है .... नागौरी हमारी मातृभाषा है इसलिए इसमें तो फ़र्राट बातचीत हो जाती है और पिछले २३ वर्षों से लगातार जयपुर मे रहने के कारण ढूँढाडी भी बोलना समझना हो जाता है ...नागौरी , शेखावटी और मारवाड़ी मे बहुत समानताएं हैं इसलिए इसमें भी बातचीत मे मुश्किल नहीं होती ...ढूँढाडी आम मारवाड़ी से थोड़ी भिन्न है ...इसमें छो ... छूं का प्रयोग होता है ....
जैसे यदि पूछना हो
क्या कर रहे हो तो इसे अलग- अलग मारवाड़ी बोली मे
काईं कर रिया हो ....काई करो हो...के करो हो ....काई कर रया छो आदि बोला जाता है ...
कहाँ जा रहे हो ....
कठ जावो हो , कठिन जा रिया हो , सीध चाल्या , कोड जा रया छो.....आदि

शेखावटी मे बात करते जैसे ही एक महिला ने हिंदी बोलना शुरू किया , मैं चौंक कर उसका मुंह देखने लगी ...उनकी हिंदी राजस्थान मे बोली जाने वाली नहीं थी ...उनका लहजा बिहार या बंगाल मे बोली जाने वाली हिंदी जैसा था ...मैंने उनसे पूछ ही लिया ," आप बिहार या बंगाल मे काफी समय तक रहे ये हो "....वे भी चौंक गयी ....बोली बिहार , बंगाल तो नहीं असाम मे काफी सालों तक रहे हैं हम लोंग ....पर आपने कैसे जाना ....मैंने हँस कर कहा कि बातचीत का लहजा आपकी पोल खोल देता है ....भाषा तो वही रहती है , मगर उसे बोलने का तरीका और हाव भाव जता ही देता है कि आप देश के किस हिस्से मे रह रहे हो या रह चुके हो ....

बिहार के एक छोटे से गाँव मे पढ़े -लिखे मारवाड़ी इंजिनीय र  भैया वर्षों से विदेश मे हैं मगर जब भारत आकर हिंदी बोलते हैं तो उनका लहजा वही बिहारी ....कई बार अमिताभ बच्चन जी को बातचीत करते सुना ....उनकी हिंदी मे भी वही इलाहाबादी या बनारसी झलक ही जाता है ....उत्तरप्रदेश वासियों में लखनऊ , मुरादाबाद , बरेली , बहराईच आदि स्थान मे रहने वालों का "ल" बोलने का अंदाज उनकी पहचान करने के लिए काफी है ...दक्षिण भारतीयों की हिंदी /अंग्रेजी भाषा से तो उनकी पहचान कोई भी कर सकता है ...पंजाबी भाषा बोलने वालों को आधा स बोलने मे परेशानी होती है ...वे स्टेशन या स्कूल को सटेशन या सकूल बोलते हैं (अक्सर )....

ऐसे ही हरियाणा मे बोले जाने वाली हिंदी का ककहरा भी अलग ही है ....सब टी वी पर आने वाले हास्य धारावाहिक (FIR )मे चंद्रमुखी चौटाला के हरियाणवी  लहजे का अनुकरण मुश्किल है ....
हैदराबादी हिंदी भी सबसे अलग है....किधर जाते , कायको आदि
मुम्बैया हिंदी की छटा  हिंदी फिल्मों में जब तब मवाली पात्रों के माध्यम से बिखरती  ही रहती है ...

अपुन ऐसेईच  है भीडू , खाली पीली ...

आप लाख छुपाना चाहे मगर देश के किस हिस्से मे आप ज्यादा समय रहे हैं या आपका मूल स्थान क्या है , आपकी बातचीत का लहजा इसकी पोल खोल ही देता है....!




24 टिप्‍पणियां:

  1. बढियां ,भाषा हमारे जन्म स्थान और आरम्भिक लालन पालन की स्पोक्स पर्सन है -
    मेरे चाचा जी ३५ वर्षों से अमेरिका में हैं खड़ी हिन्दी ठेक से नहीं बोल पाते मगर ठेठ अवधी धाराप्रवाह
    बोलते हैं -मुझसे बेहतर गाँव वालों से संवाद करते हैं और मैंने खड़ी हिन्दी के चक्कर में ठेठ भुला दी ...
    बोली भाषायें हमें सहसा ही एक दूसरे के काफी करीब ला देती हैं!
    आप भोजपुरी बोल लेती हैं ?

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  2. बोलने से पता लग जाता है, स्थान का प्रभाव।

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  3. बहुत ही बढ़िया आलेख.सच में,आप की भाषा सारी पोल खोल देती है.लोग पहचान ही जाते हैं .
    सलाम

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  4. जबान से पहचान हो, तो यह पोल खुलना तब होगा, जब आप अपनी जमीन छुपाना चाहें, वरना तो निज भाषा उन्‍नति अहै...

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  5. सही कहा , accent से पता चल जाता है ,व्यक्ति का देश , स्थान !

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  6. ye baat to sahi hai aur apni pahchaan bhi hai, jise beauty parlour ki tarah badalna bhi nahi chahiye

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  7. बोली के लहजे से आपकी सरजमीं का पता लग ही जाता है।

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  8. आपने भाषा के तो इन्द्रधनुष ही बना दिया.....
    ऐसे ही इंग्लिश बोलने पे भी पता चलता है की कहाँ का रहने वाला आदमी है...चंद्रमुखी चौटाला की भी खूब याद दिलाई आपने....साथ ही गोपी हवालदार भे मस्त पंजाबी हिन्दी बोलता है.....
    इसी सन्दर्भ में सलिल जी (चला बिहारी ब्लॉगर बनाने) की याद आ गयी.....

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  9. आपने बहुत रोचकता से प्रस्तुत किया है ...यह सच है कि हमारे कहने के अंदाज से हमारे स्थान का पता चल जाता है ....आखिर भाषा भी व्यक्ति का एक सटीक परिचय होती है ...बहुत बढ़िया

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  10. बहुत प्रभावी है आपका यह ब्लॉग भी ...इसलिए इसका अनुसरण कर लिया ..अब आपकी हर पोस्ट से वाकिफ रहूँगा ..शुक्रिया

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  11. बोली और उसका लहजा हमेशा ही रहता है, वह बात अलग है कि हम खुद न उसको समझ पायें लेकिन दूसरा इस बात को बहुत जल्दी समझ जाता है और अपनी जमीन से जुड़े रहने का अहसास हमें एक गर्व देता है कि हमने अपनी पहचान खोई नहीं है.

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  12. बहुत बढिया आलेख सही कह रही हैं बातचीत से पता चल जाता है।

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  13. सिर्फ लहजा ही नहीं कई बार बात-चीत में प्रयुक्त कोई शब्द भी पहचान बयाँ कर देता है...और परिचय के नए द्वार खुल जाते हैं...

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  14. एकदम सही kaha आपने...

    लिखने की भाषा और बोलने की भाषा में बहुत बहुत अंतर है...

    जिस क्षेत्र में हम रहते हैं,उस स्थान के बोली और लहजे से अपने को मुक्त रख पाना बड़ा ही कठिन है... और हिसाब से होना भी यही चाहिए,मनुष्य यदि सामाजिक प्राणी है तो...

    एक हमारे मित्र हैं लखनऊ के जब यहाँ काम करने आये तो शुरुआती दिनों में हमारी हिन्दी का खूब मजाक उड़ाते थे...कुछ वर्ष इधर रह गए तो उनकी हिन्दी हमसे भी जबरदस्त हो गयी...अब कभी उन्हें याद दिलाने पर झेंप जाते हैं...

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  15. बिलकुल सच कहा है ..लहजा और भाषा देश में ही नहीं विदेश में भी पोल खोल देते हैं :).

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  16. इब मैं थारे को के बोलूं? थमनै तो घणी सपष्ट बात लिख राखी सै. हम भी चुपचाप रहवैं तो लोग घणे शरीफ़ समझणे की गलती कर देवै सैं पर जैसे ही म्हारा थोबडा खुला कि सीधा हरियाणा दिखण लाग ज्यासै.

    रामराम.

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  17. सही कहा वाणी जी । एक्सेंट को बदलने में बड़ा समय लगता है । कभी कभी तो बदल भी नहीं पाते ।

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  18. आप ने सही कहा हर बीस कोस पर भाषा बदल जाती हे, युरोप मे भी यही हाल हे, हिन्दी की तरह जर्मन तो मेन भाषा हे लेकिन हर बीस कोस पर इस को बोलने का लह्जा भी बदल जाता हे,
    चलिये अब भरात की बात करते हे तो यहां भी आप से सहमत हे, मे खुद पंजाबी हुं, लेकिन भारत मे अलग अलग राज्यो मे रहा इस लिये हर राज्य की छाप मेरी भाषा के लहजे मे भी झलकती हे, हरियाणवी, उतर प्रदेश (आगरा) दिल्ली, पंजाब, मध्यप्रदेश, नेपाल यहां के लहजे से भी हिन्दी बोल लेते ओर समझ लेते हे, कई साल पहले आगरा गये तो, हमारे कपडे देख कर एक पुलिस वाला ज्यादा ही पूछताछ करने लगा, जब हम उसी के लहजे मे बोले ओर सारे स्थानिया जगहा का नाम लिया तो बगले झांके लगा... यानि जुबान आती हो तो बहुत अच्छा भी हे

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  19. पोल खोलने का सही फ़ार्मूला बताया है। हमारा धन्यवाद सवीकारें।

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  20. :)


    तो फिर बताइये हमारा देस क्या है :)

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  21. बिल्कुल सही कहा आपने............ सच जबान खुलते ही कई बार पता चल जाता है की ये आदमी कंहा से होगा. बहुत ही अच्छा विश्लेषण.

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