शनिवार, 14 मई 2011

परदे हमारे चेहरों पर हैं , दिमागों पर नहीं !

रोज सुबह घर के सामने नीम के पेड के नीचे पक्षियों के लिए मिट्टी के तसले में पानी भर कर रखती हूँ ...जब चिड़ियों का झुण्ड उसमे पानी पी रहा होता है , या फिर उसमे नहा कर अपने पंख झाड़ता किलोल करता है , पानी के छींटे बहुत सुन्दर दृश्य बनाते हैं , कुछ दिनों से पानी भरते समय देखती हूँ कि पानी बहुत ही गन्दला -सा और पूरा भरा ही रहता है , जैसे गन्दा पानी होने के कारण किसी पक्षी ने पिया ही ना हो ...गौर किया तो देखा कि एक कौवा कहीं से रोटी का टुकड़ा लेकर आता है , और पानी के पात्र में डुबो देता है ....इस रहस्य को मैं समझ नहीं पाती कि वह कौवा ऐसा क्यों करता है ...रोटी का टुकड़ा आराम से खाने के बाद भी तो पानी पी सकता है , मगर शायद उसे पानी पीना ही नहीं होता , बस उस पानी को गन्दा करना होता है ...और उसकी इस हरकत के कारण पानी के पात्र में काई भी जम जाती है , बदबू मारता है सो अलग ...रोज उसे मांजना पड़ता है , ताजा पानी रखते ही अगर छोटी चिड़ियाँ पानी पी ले तो उनकी किस्मत वरना एक बार कौवे के आने के बाद बस वे दूर से उस पानी को देख ही सकती हैं , कौवा चोंच मार कर उन्हें भगा देता है , और फिर उस पानी में रोटी डाल कर चला जाता है ...अब मैं भी दिन में कितनी बार उसका पानी बदल सकती हूँ आखिर ... उस कौवे को देखते जाने कितने इंसानी चेहरे आँखों के सामने घूम जाते हैं , जो बिना अपने किसी फायदे के दूसरों को नुकसान पहुंचाते हैं ...दुष्ट प्रवृति पक्षियों और मनुष्यों में एक -सी ही होती है , अब इसका विश्लेषण कौन और कैसे करे कि किसने किससे सीखा ...अब ये काम तो किसी बुद्धिजीवी के लिए ही उचित है ...

बुद्धिजीवी से याद आया कि एक दिन यहाँ टिप्पणी में लिख दिया " किसी भी लेखक /लेखिका की रचनाओं को पसंद करने के लिए भाई , बहन , माता , मित्र आदि का संबोधन देना आवश्यक क्यों है , आखिर कैसे बुद्धिजीवी हैं हम लोंग "
और मैंने इसमें कुछ गलत नहीं लिखा या कहा .... ब्लॉगजगत में बहुत से ब्लॉगर्स ऐसे हैं जो आपके लेखन प्रयास पर आपकी त्रुटियों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए अपनी संतुलित प्रतिक्रिया देकर उसे बेहतर बनाने में मदद करते हैं ,मगर मुझे नहीं लगता कि उन्हें किसी रिश्ते का नाम देकर ही उनका आभार प्रकट किया जा सकता है ....कुछ ब्लॉगर्स से असीम स्नेह और प्रोत्साहन मिला है मुझे , मगर वे भली भांति जानते /जानती हैं कि अपनी भावनाओं या उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए मुझे उन्हें किसी रिश्ते के संबोधन की जरुरत नहीं है ... हालाँकि इस आभासी दुनिया में मेरे भी कुछ भाई -बहन हैं और वे भली भांति जानते हैं कि मेरे लिए इन शब्दों /रिश्तों के क्या मायने हैं ...इस विषय पर अमरेन्द्र ने बहुत संतुलित और संजीदा टिप्पणी की है ...

मेरी टिप्पणी पर एक विदुषी बहन चिहुंक उठी और विद्वान् ब्लॉगर का तमगा थमा दिया ...वैसे तो हम शत प्रतिशत महिला ही हैं , इसलिए विदुषी कहलाया जाना चाहिए था ...अब कोई हमेशा अपने आपको साधारण गृहिणी कहता रहे और अचानक बुद्धिजीवी ब्लॉगर की जमात के हम में,गैर इरादतन ही सही ,खुद को भी शामिल कर ले तो विदुषियों का ऐतराज़ जायज़ है ...

अब आपको वो किस्सा भी बयान कर ही दें , जिसने हमें खुद को बुद्धिजीवी समझने की धृष्ट अकल प्रदान की ...क्या है कि कुछ बहुत बेहतर लिखने वाले साहित्यकार टाईप ब्लॉगर्स कभी हमारे ब्लॉग पर दर्शन नहीं देते , उनका लिखा हम पढ़ते हैं , वाकई बुद्धिजीवियों टाएप ही लिखते हैं ..तो हम यही सोचे कि इ लोंग विशेष लेखन पर ही टिप्पणी देते हैं ...फिर देखा उन्हें उन विषयों पर टिपियाते जिन पर काफी पहले लिखा जा चुका है और ... एक समान विषय पर ही कहीं बड़ी -बड़ी टिप्पणी , तो कहीं उपस्थिति भी दर्ज नहीं तो हमको लगा कि ये महान लेखक लोंग बुद्धिजीवी हैं और सिर्फ बुद्धिजीवियों के ब्लॉग पर टिपियाते हैं , तो हमरे ब्लॉग पर नहीं आने का कारण हमारा साधारण लेखन ही रहा होगा ..मगर जब ढेरों अशुद्धियाँ वाले लेखन , टिप्पणी लेनदेन विवाद , गाय -कुत्ते के साथ फोटो खिंचाने के किस्से ,और तो और आशिकी की खीर के खटाई होते किस्से में तड़का देते देखा तो अपने साधारण होने का भ्रम मिटने लगा ...एक दिन पतिदेव अमिताभ बच्चन जी के ब्लॉग के बारे में बात कर रहे थे ," देखो , इतना व्यस्त होने पर भी समय निकालते हैं लिखने के लिए "..सही बात है ... मगर वे आज प्रतिष्ठा के जिस मुकाम पर हैं , सिर्फ ये भी लिख दे कि आज मुझे छींक आई , जुखाम हुआ , यहाँ गए , वहां गए तो भी लोंग आराम से पढ़ लेंगे ..उन्हें आम ब्लॉगर्स की तरह विषय ढूँढने नहीं पड़ते ...तो जरुरत अपने लिए एक ऊँचा मचान बनाने की है , बाद में आप चाहे जो लिखे , छापे ...

उन्ही विदुषी ब्लॉगर पर किसी की टिप्पणी पढ़ी कि आभासी दुनिया क्या होती है , जो ब्लॉगर हैं , वे वास्तविक ही हैं तो ये दुनिया आभासी कैसे हुई ...बात तो जमी हमको भी , मगर हमारे लिए तो यही सच है कि हम सिर्फ अपनी कम्प्यूटर स्क्रीन पर आने वाले नाम से ही परिचित हैं इसलिए हमारे लिए तो ये दुनिया आभासी ही है ...जिस दिन कोई ब्लॉगर सम्मलेन अटेंड कर लेंगे , शायद हम भी इसे आभासी कहना छोड़ देंगे ...
तो आभासी दुनिया के ही एक विद्वान् /विदुषी ब्लॉगर (पुरुष /महिला सस्पेंस बने रहने दीजिये ) से बात हुई चैट पर कि फलाने ब्लॉग पर फलाना ब्लॉगर सबसे पहले टिपियाता/टिपियाती है ...मुझे तो इसमें कोई भेद नजर नहीं आया क्योंकि ये हर इंसान कि व्यक्तिगत इच्छा है कि वह क्या पढना चाहता/चाहती है ॥कोई भी पाठक अपनी पसंद का विषय सबसे पहले पढना चाहता है तो संभवतः वही व्यक्ति उसका पहला पाठक भी होगा ...इसमें इश्किया जैसा कोई समीकरण मुझे तो समझ नहीं आया , मैं उनकी सोच को संकुचित मान भी लेती मगर चूँकि बहुत से ब्लॉगर व्यक्तिगत रूप से एक दूसरे के संपर्क में हैं , तो शायद वे ज्यादा जानते होंगे , यह सोचकर मन को समझा लिया ...इसी तरह महान बुद्धिवादीयों के ब्लॉग पर ही नहीं , उनकी आपसी फेसबुकिया बातचीत में भी धर्म और जाति- विशेष को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी पढने के साथ ही अपने साधारण होने का भ्रम भी मिटता गया ...देखती हूँ अपने आस- पास भी ऐसे /ऐसी ही आधुनिक /आधुनिकाओं को जो , दिखने/दिखाने में पूरी तरह प्रगतिवादी , नए फैशन की हेयर स्टाईल /परिधानों में , मगर कभी उनसे बात कर लो तो सारी असलियत सामने आ जाती है हालाँकि सभी आधुनिक /आधुनिकाएं इस तरह के दोहरे मापदंड वाले नहीं होते हैं ...जब दिमाग पर पर्दा हो तो सिर्फ बेबाकी और बेपर्दगी से ही आधुनिक नहीं बना जा सकता ...इनसे तो हम पर्देदार ही अच्छे , जिनका दिमाग तो खुला है ...क्योंकि परदे हमारे चेहरों पर हैं , दिमागों पर नहीं !


नोट...कुछ कहानिया हैं जो दिमाग से कागज पर उतरना चाह रही है , मगर उससे पहले दिमाग की काट -छांट ज़रूरी थी !

43 टिप्‍पणियां:

  1. मानसिक हलचल? कौवे के व्यवहार पर आश्चर्य हुआ। सच पूछिये तो इस पोस्ट में मेरा सबसे ज़्यादा ध्यानाकर्षण करने वाली बात यही रही। वैसे न तो सबकी सोच एक सी हो सकती है, न सब सही हो सकते हैं। फिर भी समान विचारधारा, समान पृष्ठभूमि के लोगों की सोच मिलने की सम्भावना अधिक होती है। इसी तरह कूपमण्डूक का संसार कुएं की परिधि तक ही होता है जबकि बुद्धिमान व्यक्ति निजी अनुभवों की सीमाओं के आगे के सत्य को भी समझने के लिये आतुर रहते हैं। कौन किस ब्लॉग पर टिप्पणी करता है यह उनकी पसन्द/नापसन्द है यद्यपि इस बात पर मैंने बडे मज़ेदार वाकये होते देखे हैं।

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  2. दुष्ट प्रवृति पक्षियों और मनुष्यों में एक -सी ही होती है ... yah baat shatpratishat sahi hai aur yah bhi sahi kaha ki parda hamare chehron per hai dimaag per nahi

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  3. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. शत प्रतिशत सहमत हूँ आपसे, किन्तु आश्चर्य नहीं हुआ थोड़ा भी।
    अलावा इसके, अनुराग जी ने कह ही दिया है ऊपर।

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  5. चेहरे से अधिक बुद्धि व्यक्त हो जाती है ब्लॉग से।

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  6. आज वाणी जी कुछ नाराज़ सी लगती हैं ।
    ब्लोगिंग का एक ही फायदा है कि यहाँ कोई बंधन नहीं है । जो पसंद आए , पढ़िए , टिप्पणी दीजिये या न दीजिये , आपकी इच्छा है ।
    फिर भी जाने क्यों विवाद पैदा हो जाते हैं ।
    शायद इसका हल यही है कि टिप्पणी को व्यक्तिगत रूप न दिया जाये ।

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  7. एकदम सही लिखा है आपने.....पढ़कर मज़ा भी आया और चिंतन भी हुआ......सच है परदे चेहरे पर ही पड़े हैं.

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  8. @ अरविन्दजी ,
    इतनी तीक्ष्ण टिप्पणी लिखने की कोई आवश्यकता नहीं थी ..दिव्याजी ने मुझे अपमानित करने के लिए नहीं लिखा था , उनकी अपनी विचार धारा है और मेरी अपनी ...कृपया विचारों की असहमति को गलत दिशा ना दें ..

    कौवा यदि चिड़ियों के लिए रोटी लाता तो परोपकार का कार्य होता , मगर कौवा रोटी खुद भी नही खाता , सिर्फ रोटी को पानी में डुबोता है , पानी में भीगने के बाद रोटी किसी के भी काम की नहीं रहती ...बेचारी चिडिया उस गंदले पानी को पी भी नही सकती , इसलिए मुझे उसे बदलना पड़ता है l

    ब्लॉगिंग पुस्तक में मैंने खुद अपना परिचय साधारण गृहिणी ही दिया है , जो सही भी है ...इन दिनों मैं फुलटाईम गृहिणीही हूँ और घर सँभालने के अतिरिक्त कोई अन्य कार्य नहीं करती ..ब्लॉगिंग के जरिये ही लेखन कार्य शुरू हुआ है जो पत्र - पत्रिकाओं तक पहुंचा है ...

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  9. @डॉ टी एस दराल जी ,
    जी , मुझे कुछ नाराजगी भी है ...किसी के भी स्वभाव में दोहरापन देखती हूँ तो गुस्सा आता है !

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  10. सहजभाव से लिखे इस आलेख में आपने बहुत कुछ कह दिया!

    अधिकांश के तो आजकल तो परदे चेहरों पर ही हैं
    और मन में कपट के सिवा कुछ भी नहीं है!

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  11. ज्यादा समझ नहीं आया।
    गनीमत यह है कि आजकल किसी को हमने कुछ कहा नहीं, लिहाजा चैन से टिप्पणी कर जा सकते हैं!

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  12. डॉ दराल की बात सही लग रही है.कौन क्या पढता है और कहाँ टिप्पणी करता है ये उसकी अपनी पसंद होती है.
    और दुष्ट प्रवर्ति जो प्राकर्तिक है सबमें एक सी ही पाई जाती है.पक्षी हो या मनुष्य.

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  13. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (16-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  14. उस कौवे को देखते जाने कितने इंसानी चेहरे आँखों के सामने घूम जाते हैं , जो बिना अपने किसी फायदे के दूसरों को नुकसान पहुंचाते हैं ...

    सच है यह ...रोज जीवित उदाहरण सामने दीखते हैं ! शुभकामनायें आपको !!

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  15. मैं तो ब्लाग-जगत को इसीलिये अच्छा मानती हूं कि पसन्द न आने पर कुछ दूसरा पढ़ा जा सकता है ।दो लोगों के विचारों में अन्तर तो होगा ही । इतना तो हम कर ही सकते हैं कि नापसन्दगी दिखाने में भी शालीनता बरतें और सही गलती पर ही दिशा दिखायें। मुझे अभी बहुत कम समय हुआ है इस दुनिया में ,पर मेरा आकलन है कि अधिकतर महिला ब्लागर्स गॄहिणी ही हैं ......सादर !

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  16. उस कौवे को देखते जाने कितने इंसानी चेहरे आँखों के सामने घूम जाते हैं , जो बिना अपने किसी फायदे के दूसरों को नुकसान पहुंचाते हैं ...दुष्ट प्रवृति पक्षियों और मनुष्यों में एक -सी ही होती है ,

    बहुत सही अवलोकन किया है ...


    एक लेख की ये पंक्तियाँ ..यहाँ देना चाहूंगी ..
    .
    मुझे हमेशा लगता हैं गलती अपनी हैं रियल दुनिया के संबंधो से भाग कर आभासी दुनिया में आये हैं और इसी लिये यहाँ सम्बन्ध खोज रहे हैं ...

    यहाँ सम्बन्ध खोजने कोई नहीं आता ...बस एक से विचार मिलते हैं तो सम्बन्ध बन जाता है ...जिनसे न कभी मिले हैं और न ही शायद मिल पायेंगे वो भी बहुत करीब महसूस होते हैं ...शायद इस लिए कि उनसे हम कोई अपेक्षा नहीं रखते ..असल ज़िंदगी में अपनो से अपेक्षाएं ही कष्ट का कारण बनती हैं ..

    आप कि कहानियों का इंतज़ार रहेगा ...आशा है दिमाग में काट छांट जल्दी ही पूरी हो जायेगी ..

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  17. @ संगीता जी ,
    बिलकुल सही कहा आपने , हम ब्लॉगिंग में सम्बन्ध खोजने नहीं आये , उसके लिए तो सोशल नेटवर्किंग, चैट रूम ही काफी है ..मगर एक दूसरे के विचारों को पढ़ते एक सहज आत्मीयता हो जाती है ,उसके लिए कोई रिश्ता होना कत्तई ज़रूरी नहीं है !

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  18. @ अनुराग जी ,
    आपने इस पोस्ट की भावना को ठीक से समझा ...आभार !

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  19. वाणी,सबसे पहले तो तुम्हारा बहुत बहुत शुक्रिया...नारी ब्लॉग का लिंक देने के लिए..
    इधर व्यस्तता कुछ ज्यादा है...कई पोस्ट छूट गयी हैं...वहाँ आराधना ने मेरा उल्लेख करते हुए इतनी प्यारी टिप्पणी की है....जिसे देखने से मैं वंचित रह जाती...Thanx Again :)

    अब तुम्हारी पोस्ट की बात...क्या तुम sure हो कि वो कौवा सिर्फ पानी गन्दा करने के लिए रोटी डालता है...रोटी भिगा कर खाता नहीं??

    तुमने लिखा है...इस रहस्य को मैं समझ नहीं पाती कि वह कौवा ऐसा क्यों करता है ...रोटी का टुकड़ा आराम से खाने के बाद भी तो पानी पी सकता है
    मैं अपने अनुभव से बता रही हूँ...मेरी फ्रेंड खिड़की के बाहर...कौवे के लिए ,एक टूटे कप में पानी और रोटी दोनों रखती थी......और कौवा उसमे रोटी भिगा कर खाता था...जिस दिन पानी भूल जाती रखना...वो कांव-कांव करके शोर मचाता था...फिर वो पानी रख देती ...(ये मेरी आँखों देखी घटना है....मैं उस समय योगा के लिए उसके घर जाती थी )

    कौवे की प्रवृत्ति हो सकती है..वैसी होती हो..पर यहाँ ये कारण भी हो सकता है...और जब कौवा रोटी डूबा कर खायेगा..तो पानी तो गंदा होगा ही...और कुछ रोटी पानी में गिर भी जायेगी.

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  20. पहली तो बात तो कौआ प्रकरण पर लिख देता हूं फिर आगे पढूंगा।

    मेरी तो कौए से दोस्ती हो गई है। हमारे बालकनी में आकर हमारे हाथ से बिस्कुट खाए बगैर जाता नहीं। जब उस पर ध्यान नहीं जाता तो घर में घुस कर डायनिंग टेबल पर बैठ जाता है। बिस्कुट के अलावा यदि कुछ और दिया तो मुंह फिरा लेता है, और अगर ज़िद किया तो मुंह में लेकर बगल में रख देता है।

    आप कौए से दोस्ती कर के देखिए, वह दुष्ट नहीं होगा। और फिर आपकी बात समझ कर पानी गंदा नहीं करेगा।

    या फिर एक और कटोरा रख दीजिए, चिडि़यों के लिए।

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  21. कौआ बेचारा अपनी छवि खराब होने की सजा भुगत रहा है। इंसान रहा होता तो लॉबिंग बहुत काम आती:)
    साहित्यकार तो यहाँ सारे ही हैं,जो हमारे यहाँ आते हैं उन्हें हम क्या साहित्यकार नहीं मानते? असली बात तो समान सोच की ही है, देर सवेर अपनी पसंद की जगह हम सब पहुंच ही जाते हैं।

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  22. कौआ प्रकरण से बात को आगे बढाता हूं, देखिए जो लोक गीत बना वह झूठ बोले कौआ काटे वैसे ही नहीं बना ... वो बेचारा ऐसा प्राणी है जो झूठ बर्दाश्त कर ही नहीं सकता।
    और हमारे घर की महिलाएं, साम, मां, कहती हैं उस कौए को देख कर कि वो हमारे ‘पितर’ हैं।
    इतनी श्रद्धा से हम देखते है उन्हें।

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  23. कौए वाली बात तो कुछ हट के थी। आपने उनका ज़िक्र किया तो मुझे भी शेयर करने का मन बन गया।

    जहां तक ब्लॉगिंग और रिश्ते की बात है ... तो मेरा मत और अनुभव कुछ भिन्न है।
    अभी-अभी एक शादी से आया हूं।
    एक ‘था’ ब्लॉगर और दूसरी ‘थी’ पाठिका, प्रशंसिका, ... आज दम्पत्ति हैं।
    जी हां, यहां तो जोड़े भी बनते हैं।
    (ज़ारी....)

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  24. और आभासी क्या होता है ... कभी लोग एक छत के नीचे भी मन न मिलने से दूरियां बनाए रखते हैं, कभी दूर रहकर भी अपने लगते हैं।

    अब निर्मला जी को अगर निर्मला दीदी कहता हूं तो यह उनका व्यक्तित्व कहलवा लेता है।
    मेरी टिप्पणी देने लेने की लालसा नहीं।

    कई महिला ‘बहन’ बनीं हैं, भैया कहती हैं। अच्छा लगता है।
    कुछ ब्लॉगर मित्र हैं, भाई है ये सब नहीं होता अगर हम ब्लॉगिंग नहीं करते होते।

    हम आज तक किसी ब्लॉगर मीट में नहीं गए, पर जिस शहर में जाते हैं वहां के ब्लॉगर मित्र से ज़रूर मिलते हैं। इनमे महिलाएं भी हैं जो अपने पति और बच्चों से यथोचित संबोधन के साथ मिलवाती हैं।

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  25. महीनों पहले एक पोस्ट लिखी थी ... कि यहां मतभेद हो सकते हैं, मन भेद नहीं है। ... और यह भी कि यह एक परिवार की तरह लगता है मुझे, संयुक्त परिवार की तरह।

    आपनी बात पर आज भी क़ायम हूं। हम यहां उसी तरह रहते आए हैं, ... रहेंगे।

    आपकी इस पोस्ट पर इतने मुद्दे हैं कि जिसपर सोच तो बहुत दिनों से बनी हुई थी, लिखा नहीं था। सो सारी बातें मन की आज निकालने का मन बन गया।

    अब भी कई बाते हैं जिन पर बिना कुछ कहे जा रहा हूं। मैं साधारणतया लंबी टिप्पणी नहीं करता, पर जो बात या पोस्ट मन को अच्छी लगती है उसपर थोड़ा अधिक समय देता हूं।

    इस पोस्ट मे अभी कई ऐसे विषय हैं जिस पर लिखने को रह गया ... जैसे बुद्धिजीवी ब्लॉगर के पोस्ट पर टिप्पणी कर खुद को मैं भी गर्वान्वित महसूस करता आया हूं कि आज उनकी पोस्ट पढी और कुछ लिख आया।

    *** अंत में एक बहुत ही विचारोत्तेजक पोस्ट पढवाने के लिए आभार।

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  26. सभी गुणी जनो के विचार पढे, बहुत अच्छे लगे, आप के लेख से भी सहमत हुं, इस दुनिया मै भांति भांति के लोग हे, इस लिये छोडो इन्हे मस्त रहो, मैने कई तरह के लोग देखे हे इस कॊव्वे जैसे लोग आज कल ज्यादा हे...

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  27. किसी शायर ने भी क्या खूब कहा है कि -

    "एक चेहरे के पीछे छिपे होते हैं कई चहरे,
    जिसको भी देखना हो बार-बार देखो।"

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  28. बात तो सही कही, आपने वाणी जी...
    परन्तु ब्लॉग्गिंग सही मायने में नेट्वोर्किंग ही है...यहाँ बिरले ही कोई साहित्यकार होता है...
    यहाँ हमलोग तो बस अपने मनोभावों को ही व्यक्त करते हैं...यह तो भाग्य की बात है, कुछ लोग हमें पढ़ भी लेते हैं...और सीधी सी बात है..किसी को, कुछ भी, कहीं भी पसंद आ सकता है...यह हर पाठक का अधिकार है...परन्तु टिप्पणी करना उनके कर्तव्य के अंतर्गत नहीं है....अगर वो करते हैं, तो एकबार फिर यह उनका बड़प्पन है...
    मैं अपने मनोभाव लिखती हूँ...कोई भी उसे पढता/पढ़ती है तो कृतज्ञं हूँ....अन्यथा स्वीकार करती हूँ कि मैं एक अति-साधारण लिखने वाली हूँ...'लेखिका/कवित्री/साहित्यकार' इत्यादि बनने की क्षमता मुझमें नहीं है...क्यूंकि मैं इसकी विशेषज्ञ नहीं हूँ...मैं जिस काम के लिए प्रशिक्षित हूँ..उस काम में मैं निपुण हूँ ऐसा मैं मानती हूँ...
    आप विदुषी हैं...इसपर अगर कोई संदेह करे तो वो अपनी मूर्खता ही बतायेगा...
    और मुझे नहीं लगता कि ब्लाग्गर शब्द के साथ विदुषी/प्रज्ञं/विद्वान्/प्रबुद्ध/बुद्धिजीवी जैसे विशेषण होने चाहिए....ब्लॉग्गिंग कोई विधा नहीं है...यह सिर्फ़ एक मंच है...जो मुफ्त है और प्रचूर उपलब्ध है...जिसका लोग भरपूर उपयोग कर रहे हैं, 'आत्माभिव्यक्ति' के लिए...
    यह एक तरह का फ़ूड कोर्ट है...जहाँ जिसे जो पसंद है, उसकी लाइन में खड़ा हो जाता है...किसी को चाईनीस पसंद है, तो वो चाईनीस ही खाता है...हाँ कभी-कभी वो इटैलियन पीज़ा भी खा लेता है...लेकिन दूसरे दिन वो फिर चाईनीस की ही लाइन में नज़र आता है...और अगर कोई इस फ़ूड कोर्ट से ऊब जाता है तो फिर अपने घर बैठ जाता है...आप-हम उसे ज़बरदस्ती नहीं लाकर खड़ा कर सकते हैं इस फ़ूड कोर्ट में...
    वैसे संजय जी ने सही कहा है...'असली बात तो समान सोच की ही है, देर सवेर अपनी पसंद की जगह हम सब पहुंच ही जाते हैं।'
    हाँ नहीं तो..!

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  29. @ अदाजी,
    इस बहाने आप अपने रंग में तो आयी ...हाँ नहीं तो ! घर में सब पूछ रहे थे कि आजकल अदा से बात नहीं होती क्या :):)

    @ समीरजी ,
    सचमुच ..
    एक अदद शफ्फाक चेहरा ढूंढते उम्र गुजरती गयी
    न जाने कब अपने चेहरे पर ही कई चेहरे चढ़ गए !

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  30. @ मनोज जी ,
    कृतज्ञ हूँ , पोस्ट की विस्तार से व्याख्या की आपने ..
    @ रश्मि रविजा ,
    तुम्हारा नजरिया भी अपनी जगह ठीक होगा , फिर से नजर रखनी होगी उस कौवे पर ..
    @ रश्मि प्रभा जी ,
    आप मेरी सकारात्मक उर्जा की स्रोत हैं ..
    @ ज्ञानदत्त पाण्डेय जी ,
    दर्द हमेशा अपना ही बयां नहीं होता ..हम सब आस- पास जो देखते हैं ,महसूस करते हैं , लिख देते हैं ...
    @ प्रवीण पाण्डेय जी ,
    सही कहा आपने ,लेखन हमारी अभिव्यक्ति को , हमारे अंतर्मन को दर्शाता है , मगर अभी कुछ दिनों पहले अरविन्दजी के ब्लॉग पर इस पर बहुत विमर्श हुआ कि इंसान जो लिखता है , वही नहीं होता !
    @ सतीश सक्सेना जी ,निवेदिता जी , वंदना जी , शिखा जी ..
    बहुत आभार !

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  31. @ राज भाटिया जी ,
    सही कहा , विभिन्न प्रकार के स्वाभाव और चरित्र वाले लोगों से ही यह संसार इतना रंगीन है !

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  32. नैको ...मतः प्रमाणम्‌!!
    सत्य/ब्रह्म-संदर्भी बातों पर उपनिषद में हाथी की उपमा देकर काफी काम की बात कही गयी है, इस कौव्वाली में सुन लेवें :

    http://www.youtube.com/watch?v=47hSVU0ajtg

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  33. bahut achchi baat ki aapne foodcourt se tulanaa karake.jisko jo paSAND HAI WAHI PADHNAA CHAHIYE.sabki pasand alag hai kisiko kuch pasand aata hai kisi ko kuch.bahut achchi baat likhi aapne.badhaai aapko.

    please mera utsaah badhane ke liye mere blog main aapka swagat hai.aaiye aur comments dijiye.

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  34. post bhi padh lee
    kament bhi padh liyae

    kyaa aap jaantee haen inglish mae "genius" kisi ko kehna "mad" mannaa hotaa haen agar ham uskae vicharo sae ashmat haen to

    samjhee yaa nahin vani "the grahini !!!"

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  35. मुझे हमेशा लगता हैं गलती अपनी हैं रियल दुनिया के संबंधो से भाग कर आभासी दुनिया में आये हैं और इसी लिये यहाँ सम्बन्ध खोज रहे हैं ...

    यहाँ सम्बन्ध खोजने कोई नहीं आता ...बस एक से विचार मिलते हैं तो सम्बन्ध बन जाता है ...

    sangeeta ji
    jo log ek dusrae sae sambandh banaatey haen yaani kisi ko bhai bahin kehtey haen wo logo sambandho ki garima ko kyun nahin nibhatey haen

    yae sab sambhandh kewal tippani kae liyae kiyae aur banaye jaatey haen

    is blog jagat mae to log prem bhi kar rahey haen aur phir prem patro ko apnae apnae blog par bhi daal rhaey haen !!!!

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  36. आपकी बात से बिल्‍कुल सहमत हूं ... बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  37. @ रचना जी ,
    बिलकुल समझती हूँ जी , तभी तो ये पोस्ट लिखनी पडी ...!

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  38. किसी भी व्यक्ति का लेखन उसके विचार बताता है और कहीं न कहीं उसका आईना होता है ... हाँ जो जान कर अपनी छवि बनाना चाहते हैं उसका लेखन अलग दिशा में हो सकता है पर अधिकतर लेखन मन की बात को ही लिखता है ... और हर कोई स्वतंत्र है अपनी बात कहने के लिए ... और जहाँ विचार मिलने लगते वहीं रिश्ते की शुरुआत हो जाती है .... आपके लेख से सहमत हूँ ...

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  39. मुझे आपकी पोस्‍ट में कुछ समझ आया और कुछ नहीं। कौवे वाली बात का विश्‍लेषण जरूरी है कि वह ऐसा क्‍यों करता है? इसका अनुभव भी नहीं आया। ब्‍लाग जगत के बारे में एक बात कहना चाहूंगी कि पता नहीं हम इतना व्‍यक्तिगत क्‍यों हो जाते हैं? यहाँ विभिन्‍न विचार देने हैं और विभिन्‍न विचार लेने हैं बस। किसी ने किसी को क्‍या सम्‍बोधन कर दिया, उसका इतना विवाद खड़ा कर देना कि कटुता ही घुल जाए, मुझे समझ नहीं आता। मुझे तो समझ नहीं आता कि विवाद का विषय ही क्‍या है? मैं तो इस पोस्‍ट के माध्‍यम से सभी को कहना चाह रही हूँ कि मुझसे कोई भी गलती हुई हो तो क्षमा करें लेकिन अनावश्‍यक कटुता उत्‍पन्‍न ना करें। पोस्‍ट पढ़ने का सभी का अपना नजरिया है, किसी को क्‍या पसन्‍द है और किसी को क्‍या नहीं। इसमें भी विवाद का कारण समझ नहीं आता। आपकी पोस्‍ट 14 तारीख की है और मैं आज टिप्‍पणी कर रही हूँ, उसका भी कारण है कि मैं इन दिनों शहर से बाहर थी। अभी नेट खोला है और पोस्‍ट पढ़ने और टिप्‍पणी करने का प्रयास कर रही हूँ।

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  40. @वाणी जी, मेरी आपत्ति दर्ज की जाय -
    आपने मेरी टिप्पणी मिटा दी मगर उस पर अपना जवाब ठोक दिया -
    दुसरे यह नहीं समझ पायेगें कि मैंने क्या कहा था जिसका जवाब आपने दिया
    अगर मेरा जवाब आपको अच्छा नहीं लगा और आपने डिलीट किया तो फिर वहीं उसका जवाब भी नहीं देना था ..
    रही बात खुद को साधारण गृहिणी घोषित करते रहने की तो यह एक रणनीति भी हो सकती है ताकि दूसरे सोचें कि
    देखो कितनी विनम्र है इत्ता अच्छा तो लिखती है मगर फिर भी खुद को गृहिणी ही नहीं एक साधारण गृहिणी का दर्जा देती है ...
    ये गृहिणी ,साधारण गृहिणी और अति साधारण गृहिणी क्या होती हैं -मुझे तो पता है हम सब यहाँ महज एक ब्लॉगर भर हैं यही परिचय है हमारा -फिर यह सब झान्सेबाजी क्यों?
    प्रबल विश्वास है कि यह टिप्पणी डिलीट नहीं होगी -होगी भी तो कोई बात नहीं यह आपका विशेषाधिकार है -
    मगर याद रहे लेखक को कोई रोक नहीं पाया है -वह यहाँ नहीं तो और कहीं लिखेगा अगर की बोर्ड का धनी है तो :)

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  41. @ अरविन्दजी ,
    कौन अपने ब्लॉग पर क्या लिखता है , उसको ना मैं रोक सकती हूँ और ना ही ऐसा कोई अधिकार रखती हूँ ...मेरे ब्लॉग पर किसी को कटु शब्दों में अपमानित करने वाली भाषा का मैंने हमेशा बहिष्कार किया है,करुँगी ..वो चाहे मेरा हो या किसी दूसरे ब्लॉगर का ...

    अब इतने विस्तार से तो समझा दिया था अपना साधारण गृहिणी होने का अर्थ , फिर भी आपको जो समझ आया , आपका अपना नजरिया हो सकता है ...वैसे अब हम खुद को बुद्धिजीवी घोषित कर ही चुके हैं , आपको ऐतराज नहीं होना चाहिए ...

    आपके सभी इलज़ाम सर -माथे पर :)

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  42. @ अपने पसंद के स्थान पर पहुँचने की ही बात नहीं है ...हर व्यक्ति ,हर ब्लॉग की अपनी विशेषता होती है ... हर बार हम उनसे सहमत या असहमत हों , जरुरी नहीं ...मगर आभासी या वास्तविक रिश्तों में भी असहमतियों को प्रकट करने का अधिकार हर व्यक्ति के पास होना चाहिए !

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  43. बहुत दिनों बाद आई लेकिन आना बेहद सार्थक लगा...पूरे लेख से सौ फीसदी सहमति लेकिन कौवे के व्यवहार के बारे में कहना चाहूँगी....मेरा अपना अनुभव है...खिड़की पर रोटी और पानी कटोरा रखा जाता..बासी रोटी और बिना पानी के कटोरा होने पर कौवे की आवाज़ बदल जाती..लेकिन जैसे ही ताज़ी रोटी और पानी भर दिया जाता ..उसकी कर्कश आवाज़ में तरलता महसूस करती...तब से कौवा बहुत समझदार प्राणी लगने लगा...

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