शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

बिना बात की बात ...


कल हमारे केस की हीअरिंग है , मुझे वकील साहब के पास जाना है , मेरे बैग में ज़रूरी समान रख देना ...पापा माँ से कह रहे थे . अपने कमरे से सुनकर दौड़ी आई रेवती ..
पापा .कल मैं भी आपके साथ चलू, मुझे भी अपने कॉलेज में कुछ काम है , आप जबतक अपना काम निपटायेंगे मैं अपनी हॉस्टेल की फ्रेंड्स से मिल लूंगी , आप लौटते समय मुझे साथ ले आना .
ठीक है , लेकिन सुबह जल्दी तैयार रहना.
सुबह जल्दी करते हुए भी रेवती कुछ देर से तैयार हो पाई . पापा के ऑफिस की गाडी घर के गेट पर लग चुकी थी .
जल्दी करो , रेवती को आवाज़ लगाते हुए पापा कमरे से बाहर निकले . रेवती दुपट्टा सँभालते हुए एक हाथ में कंघी लिए दौड़ती भागी पहुंची . पीछे माँ आवाज़ लगाती ही रह गयी , रेवती , बेटा कुछ तो खा लो !
तब तक गाडी का होर्न बज चुका था. जानती है पापा को लेटलतीफी बिलकुल पसंद नहीं , उसे घर पर ही छोड़कर रवाना हो जायेंगे.
क्या पापा , जीप मंगवाई है आपने , कोई कार फ्री नहीं थी .
पापा ने पीछे की सीट पर मुड कर देखा , गैरेज में कोई कार नहीं थी , और मुझे इंतज़ार नहीं करना था , फिर यहाँ की सड़कों के लिए तो जीप ही ठीक है.
बुरा सा मुंह बनाया रेवती ने . सही कहा था पापा ने .कम्पनी के कम्पाउंड से बाहर निकलते ही टूटी सड़कों के कारण हिचकोलों के झूले प्रारम्भ हो गये थे .
आम और लीची के बागों से गुजरते इन पगडंडियों की टूटी सड़कें हिचकोलों के दर्द को थोडा कम कर देती है . दोनों ओर बड़े- बड़े पेड़ों की शाखाएं ऊपर जाकर इस तरह मिल जाती हैं कि पता ही नहीं चलता कि इनकी जड़ें सड़क के दो विपरीत छोरों पर हैं . इनके झुरमुटों के बीच से अपनी उपस्थिति दिखाने के लिए सूरज को कितनी तिकड़में लगानी पड़ती होंगी .
दूसरे छोर पर वृक्षों की हरी पत्तियों के बीच आसमान की लाली के बीच एक क्षीण सी किरण पत्तों से टकराकर इन्द्रधनुषी दृश्य उपस्थित कर रही थी . इन सबके बीच मुंह पर अंगोछा ढके लोटा लिए जाते हुए , तो कही मोटरसाकिल पर दूध के बड़े ड्रम लटकाए हुए लोंग भी नजर आ रहे थे .
लौरिया के अशोक स्तम्भ से गुजरते हुए सोचा रेवती ने , इतिहास की किताबों में खूब पढ़ा है इनके बारे में , मगर यहाँ किस कदर असरंक्षित है यह स्मारक. घर का जोगी जोगना बाहर का सिद्ध . मानव स्वभाव भी अजीब है , सबसे करीब या आसानी से उपलब्ध वस्तुएं हमारा ध्यान आकर्षित नहीं करती . यही विचित्रता रिश्तों में भी तो होती है . अपने सबसे करीबी रिश्तों के प्रति हम कितने लापरवाह होते हैं .

चाय तो पीनी है, मगर रुकेंगे तो देर हो जायेगी , वकील साहब हमारा इंतज़ार कर रहे होंगे , बहुत तैयारी करनी है . पहले इसके कॉलेज की ओर मोड़ लो , अच्छा है वकील साहब का घर भी पास ही है , वे शहर की सीमा में प्रवेश कर चुके थे .
कॉलेज के बाहर पसरे सन्नाटे से आशंकित रेवती ने पता किया ऑफिस में , आज कॉलेज की छुट्टी है .
ओह , फोन करके घर से निकलना था . अब क्या करे , यहाँ किसी परिवार से भी परिचित नहीं है . अब दिन भर पिता के साथ उनकी कानूनी कार्यवाही का साक्षी बनते घूमना होगा .
आजका तो दिन ही खराब है , कोई बुक , नोवेल भी साथ नहीं लाई , कैसे दिन गुजरेगा. वह सोच रही थी कि उनकी गाडी शहर के प्रसिद्ध वकील शिवशंकर श्रीवास्तव के घर के बाहर जा रुकी . ऊँची बाउंड्री से घिरे मकान का कोई हिस्सा बाहर से नजर नहीं आ रहा था . बड़ी कोफ़्त होती है रेवती को , लोंग ऐसे घरों में क्यों रहते हैं कि ना बाहर से कुछ नजर आये ना भीतर से बाहर के लोंग नजर आये .
मैं वकील साहब से बात करके आता हूँ , फिर साथ ही कोर्ट में चलना पड़ेगा ...तुम जीप में ही रहना , हम आते हैं.
आधा घंटा हो गया था पिता को अन्दर गये हुए , और उस बड़े बंगलों वाली सुनसान सड़क पर जीप की अगली सीट पर उबासियाँ लेती हुई दोनों हाथों में सिर छिपाकर स्टीयरिंग के सहारे बैठी रेवती मन ही मन खुद से बात कर रही थी . कहीं भी नींद ना आने की भयंकर बीमारी थी रेवती को वरना इस शांत स्थान पर नींद का एक दौर तो आसानी से पूरा हो सकता था . बहुत गुस्सा और झुंझलाहट हो रही थी उसे अपने आप पर , पापा के साथ आने का लोभ क्यों किया उसने , बस से ही आ जाती तो इतनी बोरियत तो नहीं होती .
" दीदी जी , आपको साहब अन्दर बुला रहे हैं ", जीप के पास से किसी की आवाज़ सुनकर उसने सिर उठाकर देखा, शायद उस बंगले का नौकर था .
जी पापा , आपने बुलाया ...
ये मेरी बेटी रेवती है , यहीं कॉलेज के हॉस्टल में रहती है , आज कॉलेज की छुट्टी है , नाहक ही मैं अपने साथ ले आया . रेवती से मुखातिब होते हुए उसके पिता ने कहा ...हमें बहुत समय लगेगा , तुम यही आराम करो.
नमस्ते अंकल , कहते हुए रेवती ने हाथ जोड़ दिए .
कोई बात नहीं ,यह भी अपना ही घर है . किशोर , इन्हें दीदी के पास ले जाओ .

कानून की मोटी किताबों और फाइलों के अम्बार से सजे उनके ऑफिस में पिता के साथ कम्पनी के केस की हीअरिंग की तैयारियां चल रही थी.
बड़ी सी कोठी की आलिशान बैठक को क्रॉस कर नौकर उसे गेस्ट रूम में ले गया .
आप बैठिये , मैं दीदी को बुलाता हूँ .
बैड , ड्रेसिंग टेबल , स्टडी टेबल पर लैम्प , बड़ी आलमारियां , मन ही मन सोच रही थी रेवती , ये इंतजाम तो मेहमानों के लिए है , तो खुद के लिए क्या होगा.
पूरे घर में जैसे सन्नाटा सा था . बंगला उपन्यासों की गंभीर पाठिका रेवती ने सोचा ,बड़ी कोठियां निर्जन होने के लिए अभिशप्त ही होती हैं शायद.
थोड़ी देर में एक युवती एक युवक का सहारा लेकर धीरे -धीरे चल कर कमरे में आई . गर्भावस्था के कारण चलने में उसे थोड़ी परेशानी थी .
दोनों के बीच परिचय का आदान प्रदान हुआ . इस घर की बेटी शर्मीला अपनी पहली जचगी के लिए मायके आई हुई थी . उनके विवाह को अभी डेढ़ साल ही हुआ था . अपने और अपने भाई वीर के परिचय के साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि माँ को आवश्यक काम से लिए शहर के बाहर जाना पड़ा , डिलीवरी में अभी एक महीने से भी ज्यादा का समय है .
तब तक किशोर चाय ले आया .
सचमुच उसे चाय की बहुत तलब हो रही थी , जीप से उतर कर एक चक्कर भी लगाया था उसने आस पास कि कही कोई चाय की दूकान नजर आये , मगर वहा तो दूर- दूर तक सन्नाटा पसरा था , कुछ ऐसा ही सन्नाटा कोठी के भीतर भी महसूस हुआ उसे . इतने बड़े बंगले में घर में कुल तीन प्राणी थे , दो नौकर जो घर के पिछले हिस्से में बनी रसोई में नाश्ते और खाने के प्रबंध में जुटे थे . वह अपनी कॉलोनी के छोटे से बंगले में भरे -पूरे परिवार के शोरगुल के बीच रहने की आदी थी .

चाय ले लो , नाश्ता भी तैयार है ...दीदी किशोर को आदेश दे रही थी , थोड़ी देर में ले आना ...
नहीं , आप लोंग करें नाश्ता , मैं घर से करके आई हूँ , संकोचवश साफ़ झूठ बोल गयी रेवती , नाश्ता कहा किया था उसने.
शर्मीला दी ने उससे उसकी कॉलेज के बारे में पूछा ...वे आश्चर्यमिश्रित ख़ुशी से बोली , अच्छा , इसी कॉलेज में पढ़ती हो , ये तो हमारे घर के पास ही है , मैंने भी अपनी बी एस सी यही से की है . शर्मीला की ख़ुशी ने जताया कि उन एकसार लम्हों या स्थानों से गुजरे लोंग अचानक ही अपने सहयात्री लगने लगते है. और रेवती को महसूस हुआ जैसे विदेश में एक ही कस्बे के रहने वाले दो अजनबी मिले हों .
फिर वे सभी लेक्चरर्स के बारे में पूछने लगी , फिजिक्स की नयी मैंम आई हैं, कैमिष्ट्री के सर पुराने हैं , वे अपने ग्रुप की पुरानी शरारतों को याद कर रही थी, जब रेवती ने बताया कि हम भी उन लम्बे और दुबले पतले सर को पेंडुलम सर(उनके सामने नहीं ) कह कर ही बुलाते हैं , तो वे खूब हंसी .
इस हंसी में वीर भी शामिल था और उसने टोक दिया कि मेरा अक्सर आना होता है कॉलेज में . एक बार सहमी रेवती मगर फिर से उसी उत्साह से बोली , तो क्या , मैं थोड़े ना बुलाती हूँ उन्हें पेंडुलम , मेरी अच्छी इमेज है क्लास में , सबसे ज्यादा सवालों के सही जवाब मैं ही देती हूँ .
तीनों की बातों का दौर कई घंटो तक चलता रहा, खेल , राजनीति , कॉलेज लाईफ , प्रतियोगी परीक्षाएं , फ़िल्में ,साहित्य ,शरतचंद्र , प्रेमचंद्र कौन सा ऐसा विषय नहीं होगा जो उनकी बहस में शामिल नहीं हुआ होगा . इस बीच वीर खुद चाय भी बना लाया . दीदी हँसते हुए उसे छेड़ रही थी, कुछ खा रही नहीं हो , चाय तो पी लो .
बीच में वह घडी भी देख लेती . दोपहर हो आई थी . उसे बुरा लग रहा था शर्मीला दीदी के लिए , उन्हें आराम की जरुरत थी , और उन्हें उसके कारण इतनी देर वहां बैठा रहना पड़ रहा था . बाहर कुछ क़दमों की आहट सुनकर बोला वीर , अंकल आ गये हैं शायद .
रेवती ख़ुशी से एकदम बाहर लपकने को हुई तो शर्मीला और वीर हँस पड़े .
क्या हम तुम्हे इतना बोर कर रहे थे .
अरे नहीं , झेंप गयी रेवती . बल्कि मैंने आप लोगों को इतना परेशान किया , इतना समय लिया . अच्छा लगा आप लोगो से ढेर सारी गप शप कर के .
रेवती , आ जाओ ... पापा आवाज़ लगा रहे थे . रेवती उन लोगों से इज़ाज़त लेकर बाहर आ गयी .

हॉस्टल में सन्डे यानि छुट्टी का दिन बहुत ख़ास होता है . बाथरूम के बाहर अपना टॉवेल ,ब्रश , बाल्टी ,मग और कपड़ों सी लदी फंदी लड़कियां लाईन लगाकर खड़ी थी. . आम दिनों से अलग आज देर से सोकर उठना, बालों में शैम्पू करना , कपड़े धोकर सुखाना, अपनी टेबिल , ब्रीफकेस में समान को करीने से रखना . और सबसे बड़ी तैयारी आउटिंग के लिए . रेवती का कोई लोकल गार्जियन नहीं था इस शहर में , इस लिया बहुत सी लड़कियों की तरह उसे किसी के आने का इंतज़ार नहीं था , ना ही आज कही बाहर जाने का मन था , इसलिए वह अपने बिस्तर में धंसी किताबों में डूबी थी .
तभी अचानक लड़कियों के झुण्ड में हलचल मची . बाथरूम में अपनी लाईन का झगडा भूल सब एक साथ बाहर की ओर लपक ली . उसकी रूममेट माया उसका हाथ खींचते हुए से बोली ," चल बाहर , वीर आये हैं "
कौन वीर , किसके भैया और तुम इतना उत्साहित क्यों हो रही हो ,तुम्हारे भी रिश्तेदार हैं ??
अरे नहीं पागल , वो तो उषा के चचेरे भैया , जो उसके लोकल गार्जियन है, उनके दोस्त हैं. हमारी ऐसी किस्मत कहाँ ! आह भरने का नाटक करते हुए माया ने कहा .
नौटंकी , अभी पूछ लो कि अकबर किसका पुत्र था तो याद नहीं आएगा , और लड़कों की दूर-दूर की रिश्तेदारी तक मालूम है .

रेवती बहुत खीजती है लड़कियों की इस आदत पर. किसी का भी कोई रिश्तेदार आ जाये , इनकी खिंचाई या ताकाझांकी से नहीं बच सकता . कौन कहता है ,लड़के ही छेड़ते हैं लड़कियों को , कोई इन गर्ल्स हॉस्टल के नज़ारे देखे , किसी भी स्टुडेंट का रिश्तेदार कोई हैंडसम लड़का अगर उससे मिलने आ गया तो उसकी खैर नहीं , सवाल कर के परेशान कर देती हैं , यहाँ आकर उनकी सारी हीरोगिरी हवा हो जाती है .
सुनो , तुम ही करो यह ताका झांकी.
रेवती अलग है इन लड़कियों से . इस उम्र में जहाँ लड़कियों के आदर्श सिनेमा के स्टार होते हैं , उनके चित्र टेबल और दीवारों पर सजाते हैं , उसकी टेबिल पर सजती हैं लतामंगेशकर की वह तस्वीर जो उसने धर्मयुग के बीच के पेज से निकाली थी .
अरे , चल ना एक बार देख तो कितने हैंडसम है वीर जी , उसके दुगुने कद और शरीर की माया उसका हाथ खींचते हुए बाहर ले आई . गेस्ट रूम के बाहर के लौंज में कुर्सी पर बैठे वे लोंग अपनी बहनों से बात कर रहे थे ,सामने खुले लॉन में बहुत सी लड़कियां अचानक ही पढ़ाकू बनी किताबों से जूझ रही थी . माया ने टोहका मारा , देख उस वनश्री की किताबें , उलटी पकड़ी हैं . दोनों ठहाका मारकर खूब हंसी, हँसते हुए ही अचानक उसकी नजर लाउंज में बैठे वीर की ओर देखा.
ओह ,ये वही वीर श्रीवास्तव है , जिनसे पिछले हफ्ते इतनी लम्बी बातचीत हुई थी. परिचय की एक झलक आँखों में देख कर कुछ कदम आगे बढती रेवती वही रुक गयी . यदि इन लड़कियों को पता चल गया कि उनके हीरो से, जिसकी एक झलक देखने के लिए वे लाईन लगा कर खड़ी रहती हैं , उसकी बहनों की खुशामद करती है कि वो आये तो उनको हमारा परिचय भी देना , उससे रेवती मिल चुकी है , इतनी देर तक गपबाजी कर चुकी है तो खोद -खोद कर सवालों की झड़ी लगा देंगी , और बिन बात की बात मशहूर हो जाएगी.
तुम ही मिलो इन लोगों से , मैं तो चली , माया से हाथ छुड़ा कर रेवती अपने कमरे की ओर बढ़ गयी .
बहुत लोगों के लिए ख़ास हो जाने वाली घटनाएँ किसी के लिए कितनी आम हो जाती है . या जीवन में जो साधारण घट जाता है , वह कितना असाधारण भी हो सकता है ! लौरिया के निकट स्थित अशोक स्तम्भ फिर से याद आया रेवती को !


31 टिप्‍पणियां:

  1. कहानी पढ़ ली ..अच्छी लिख लेती हैं कहानियाँ -एक जगहं लडकी लकड़ी हो गयी है -जो अक्सर हो ही जाती है -सुधार लें!

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  2. कभी-कभी ऐसा भी होता है।

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  3. बिना बात की बात में कितनी सारी बातें

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  4. जीवन में जो साधारण घट जाता है , वह कितना असाधारण भी हो सकता है।
    बिल्कुल ऐसा भी होता है ......

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  5. साधारण सी बात से असाधारण का जुड जाना ..और एक जिज्ञासा पैदा कर जाना कि फिर आगे क्या हुआ ? अंत में क्रमश: भी नहीं मिला ..कहानी यूँ ही समाप्त नहीं होती न ... इसके आगे का सोच रही हूँ ... इंतज़ार रहेगा

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  6. बहुत खास रचना।
    सच बड़ी-बड़ी हवेलियां एकान्त रहने के लिए अभिशप्त होती हैं।
    जब एक ही कॉलेज के पढ़े हुए दो मिल जाएं तो बातों का सिलसिला थमता नहीं।
    कहाने के साथ ऐतिहासिक चिन्ह का बिम्बात्मक प्रयोग बहुत भाया।

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  7. कुछ बातें जो किसी के लिए बहुत ख़ास और किसी के लिए आम सी ही हो जाती है . रेवती का वीर से मिलना , घंटों बाते करना और कतार में खड़ी लड़कियों का एक झलक पाने को तरसना , बस यही कहानी है !कहानी में आगे कुछ भी नहीं है. इसलिए इसका शीर्षक एक अकहानी भी लिखा था , फिर बदल दिया !

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  8. जीवन में जो साधारण घट जाता है , वह कितना असाधारण भी हो सकता है

    पूरी कहानी का निचोड़ कर दिया आपने..वाह

    नीरज

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  9. बहुत अच्छी कहानी,सार्थक व भावपूर्ण !

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  10. रोचकता से भरपूर आपकी यह बिना बात की बात ... ।

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  11. संगीता स्वरुप ( गीत ) ने आपकी पोस्ट " बिना बात की बात ... " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    साधारण सी बात से असाधारण का जुड जाना ..और एक जिज्ञासा पैदा कर जाना कि फिर आगे क्या हुआ ? अंत में क्रमश: भी नहीं मिला ..कहानी यूँ ही समाप्त नहीं होती न ... इसके आगे का सोच रही हूँ ... इंतज़ार रहेगा !

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  12. मनोज कुमार ने आपकी पोस्ट " बिना बात की बात ... " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    बहुत खास रचना।
    सच बड़ी-बड़ी हवेलियां एकान्त रहने के लिए अभिशप्त होती हैं।
    जब एक ही कॉलेज के पढ़े हुए दो मिल जाएं तो बातों का सिलसिला थमता नहीं।
    कहाने के साथ ऐतिहासिक चिन्ह का बिम्बात्मक प्रयोग बहुत भाया।

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  13. Arvind Mishra ने आपकी पोस्ट " बिना बात की बात ... " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    कहानी पढ़ ली ..अच्छी लिख लेती हैं कहानियाँ!

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  14. रोचक मगर एक सीख भी देती हुई।

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  15. हर तथ्य के अपने सन्दर्भ होते हैं जिनके आधार पर वो अतिसाधारण, साधारण अथवा असाधारण के रूप में चीन्हा जाता है ! पिता के सलाहकार अधिवक्ता के परिजन और हास्टल में रहने वाली किसी लड़की के लोकल गार्जियन को भी इसी एंगल से देखा जाये !

    लौरिया का अशोक स्तंभ रेवती के लिए असाधारण है तो उसके संरक्षण के लिए उत्तरदाई माने जाने वाले पुरातत्व विभाग को उसकी कोई कद्र नहीं !

    वीर को एक लड़की (रेवती ) किसी एक सन्दर्भ में जानकर साधारण माने और दूसरी लड़की किसी दूसरे सन्दर्भ में जानकर असाधारण और निज नायक के तौर पर संरक्षण योग्य माने ! यही ज़िन्दगी है ! प्रघटनाओं से सम्बंधित निर्णयों में सातत्य ऐसे ही खोजे और देखे जाते हैं ! जैसा आपकी 'अकथा' में किया गया है !


    वैसे ये रेवती है कौन :)

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  16. मन में समत्व बना रहने से असाधारण भी साधारण लगता है।

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  17. जब पढ़ता था, या ताजा ताजा नौकरी में गया था को कोई रेवती छाप नहीं मिली! :-(

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  18. Gyandutt Pandey ने आपकी पोस्ट " बिना बात की बात ... " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    जब पढ़ता था, या ताजा ताजा नौकरी में गया था को कोई रेवती छाप नहीं मिली! :-(

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  19. पूरी कहानी में एक बड़ा खूबसूरत बहाव था । लेकिन अंत में अचानक सब कुछ ख़त्म सा हो गया ।
    असल जिंदगी में भी ऐसा ही होता है ।

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  20. .
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    "परिचय की एक झलक आँखों में देख कर कुछ कदम आगे बढती रेवती वही रुक गयी . यदि इन लड़कियों को पता चल गया कि उनके हीरो से, जिसकी एक झलक देखने के लिए वे लाईन लगा कर खड़ी रहती हैं , उसकी बहनों की खुशामद करती है कि वो आये तो उनको हमारा परिचय भी देना , उससे रेवती मिल चुकी है , इतनी देर तक गपबाजी कर चुकी है तो खोद -खोद कर सवालों की झड़ी लगा देंगी , और बिन बात की बात मशहूर हो जाएगी.
    तुम ही मिलो इन लोगों से , मैं तो चली , माया से हाथ छुड़ा कर रेवती अपने कमरे की ओर बढ़ गयी ."

    नहीं, वीर भी आवाज लगा सकता था, पहचान तो वह रहा ही था, मुझे लगता है कि रेवती वीर की ओर से पहल चाहती थी वह नहीं हुआ इसलिये बात वहीं पर खतम हो गई... :)


    ...

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  21. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  22. बेहतरीन प्रस्तुति। बहुत विस्‍तार से समझाया है आपने।

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  23. @ praveen shah ji ,

    चूँकि कहानी मैंने लिखी है इसलिए अपने पात्र की बात मैं जानती हूँ . यहाँ पहल जैसी कोई बात या रिश्ता नहीं था . शायद वीर को रेवती याद भी नहीं रही हो , पहचान की एक झलक का मतलब यह है कि वीर को ऐसा लगा हो कि कही देखा है शायद ! उनके बीच पहल करने को ना कुछ था , ना इसकी कोई सम्भावना थी ,ना कहानी इसे साबित करना चाह रही है . यहाँ बिना बात की बात बनने की सम्भावना की बात हो रही है !

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  24. @ अली जी ,
    रेवती मेरी कहानी का एक पात्र है !

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  25. बिना बात की बात में ढेरों काम की बातें .

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  26. हॉस्टल जीवन का बहुत ही जीवंत चित्र खींचा है....सब कुछ घूम गया आँखों के सामने....लड़कियों की खी खी की आवाजें भी सुनायी पड़ने लगीं...
    'चक दे ' फिल्म का वह सीन भी याद आ गया...जब उनकी साथी हॉकी प्लेयर के हैंडसम मंगेतर को देखने के लिए सारी लडकियाँ टेरेस पर इकट्ठी होती हैं

    सुन्दर कहानी

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  27. idhar udhar ki baaton me kuchh gambheer baaten bhi kitni saralta se likh di gayi hain.

    sach yahi hai ki u lagta he ye aam baat nahi thi kahani me kuchh aur ant tha jo lagta hai mano lekhika chhupa gayi.

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  28. @बहुत लोगों के लिए ख़ास हो जाने वाली घटनाएँ किसी के लिए कितनी आम हो जाती है. या जीवन में जो साधारण घट जाता है, वह कितना असाधारण भी हो सकता है

    सच है! ऐसा न होता तो दुनिया काफ़ी नीरस होती शायद।

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  29. मेरी टिप्पणी यहाँ से भी ग़ायब हो गयी शायद।

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  30. क्रिस्प कहानी। धर्मयुग का युग तो बीत गया, न जाने अशोक स्तम्भ किस हाल में होगा अब!

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  31. आपके उत्‍कृष्‍ठ लेखन का आभार ।

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