बुधवार, 25 अप्रैल 2012

मातृत्व की गरिमा बढ़ा देते हैं " पीले -पोमचे " ...राजस्थानी संस्कृति में परिधान (3)


प्रकृति द्वारा इस सृष्टि की सम्पूर्णता के लिए दिए गये अनुपम उपहारों में  नर और नारी भी सम्मिलित हैं .प्रकृति ने ही उसी नारी को मातृत्व का सुख ,अधिकार और गरिमा के अनूठे उपहार से नवाज़ा है !
कहा भी जाता है कि ईश्वर सब जगह उपस्थित नहीं हो सकता , इसलिए उसने माँ को बनाया . हर  इंसान के पास और कुछ हो न हो , एक माँ जरुर होती है . मातृत्व एक अनोखा अनुभव या उपहार है जो स्त्री को सम्पूर्ण करता है . इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि जो स्त्री माँ नहीं बन सकी वह सम्पूर्ण नहीं , बल्कि मातृत्व की भावना है जो उसे सम्पूर्ण बनाती है .स्त्री जब  अपनी कोख में अपने रक्त से सींच रही अपने अंश से पुलकित काया एक अनूठे आत्मसंतोष और गर्व से भरी होती है , यह तेज उसके मुखमंडल को दिव्य और आभामय बनाता है . माँ बनने वाली  स्त्री एक ख़ास देखरेख में होती है , अचानक ही परिवार और समाज में उसको विशेष तवज्जो मिलने लगती है जो उसकी शारीरिक और मानसिक अवस्था के लिए आवश्यक भी है .  
बच्चे के जन्म से पहले के बाद के ख़ास दिनों में बच्चे के साथ ही नव प्रसूता माँ का ख़ास ध्यान रखा जाता है . इन दिनों में नसीहतों की भरी भरकम पोटलियों  के साथ सेहत के लिए  घरेलू   भरपूर घी डाले सौंठ , अजवाईन , गोंद -गिरी के लड्डू तथा अन्य शक्तिवर्धक घरेलू औषधियां,  घी अथवा तेल से मालिश , भरपूर आराम ,गोद में नन्हे -मुन्ने की किलकारियों के बीच हर स्त्री मातृत्व की गरिमा और अभिमान से सिंचित खूबसूरत हो जाती है , ना सिर्फ तन से , मन से भी !
हमारी सांस्कृतिक परम्पराएँ उनके इन ख़ास पलों को अविस्मर्णीय बना देती हैं  हैं. 
राजस्थान में बच्चे के जन्म के बाद लगातार भीतर ही रह रही स्त्री को सूर्य दर्शन की मनाही होती है .बच्चे के जन्म के दसवें दिन जच्चा -बच्चा को विशेष प्रसूति स्नान करवाया जाता है. इसे नामकरण संस्कार के रूप में भी जाना जाता है . उसके बाद  ही वे सूर्य की पूजा कर उनका दर्शन करती हैं , इसके अलावा जल से भरे बर्तन को कुएं का प्रतीक मानकर पूजा की जाती है . चालीस दिनों बाद सम्पूर्ण शुद्धि और स्नान के पश्चात् जलवा पूजन पर बड़ी धूम धाम से कुँए पर जाकर पूजन किया जाता है.  
सूर्य पूजन के समय बच्चे का नए वस्त्रों के साथ नवप्रसूता को मायके से भेजा गया  लिए विशेष परिधान  " पीला " पहनना आवश्यक होता है, जो उनके चेहरे की पीतवर्ण आभा को और अधिक सुवर्णमय बनाता है . माँ बनने के सार्वजानिक परिसाक्ष्य/गवाही देता यह परिधान साडी अथवा ओढ़नी के रूप में होता है . पीले अथवा नारंगी रंग की पृष्ठभूमि के साथ लाल बौर्डर इस परिधान की विशेषता है . इस पर भी आरी तारी की कढ़ाई के साथ बेल बूटे होते हैं. जगमग बेल बूटों की  कढ़ाई के साथ लाल और पीले रंग में रंग पीला साडी या ओढ़नी पहनकर जच्चा जब गोद में बच्चे को लेकर पूजन करती है तो उसके चेहरे पर वात्सल्य की आभा और अभिमान की छटा देखते ही बनती है ! इसके बाद अन्य पूजन अथवा शुभ कार्यों में माएं चुन्दडी के स्थान पर पीले का प्रयोग भी करती हैं .  

पीले जैसा ही एक परिधान पोमचा भी कहलाता है , हालाँकि आम बोलचाल में दोनों को एक ही समझा जाता है .  इसमें  बारीक -सा अंतर ओढ़नी के  बीच  बने लाल गोले की आकृति का होता है .  पोमचे में बीच के बड़े गोले के स्थान पर  छोटी आकृतियाँ होती है . पहले ज़माने में जब लड़कियों का जन्म कोई विशेष उत्साह का कारण नहीं होता था , लड़कियों के जन्म पर ना थालियाँ बजती थी , ना कुआँ पुंजन ही होता था ,  तब भी सांस्कृतिक परंपरा में लड़कियों के जन्म पर पोमचा पहनाये जाने की रीत थी . शिक्षा और जागरूकता ने लड़के और लड़कियों के भेद को लगभग मिटा दिया है इसलिए बच्चा लड़का हो या लड़की , एक जैसे ही परिधान और रीति रिवाजों का पालन किया जाता है .   


पीला  

पीला ओढ़नी में 
पीला का मुख्य रंग 
                                            


पाँच मोहर को साहिबा पिळो रंगावो जी
हाथ बतीसी गज बीसी गाढा मारू जी
पिळो रंगावो जी

दिल्ली सहर से साईबा पोत मंगावो जी
जैपर का रंगरेज बुलावो गाढा मारू जी
पिळो रंगावो जी

पिला तो पल्ला साईबा बन्धन बन्धाऊँ जी
अध बीच चाँद चपाऊँ गाढा मारू जी
पिळो रंगावो जी

रंग्यो ऐ रंगायो जच्चा होया संजोतो जी
पण बेरे माएं पकडायो जी गाढा मारूं जी
पिळो रंगावो जी

पिळो तो औढ़ म्हारी जच्चा पाटे पर बैठी जी
दयोराणी जेठाणी मुखड़ो मोड्यो गाढा मारूं जी
पिळो रंगवो जी

पिळो तो औढ़ म्हारी जच्चा सर्वर चाली जी
सारो ही सहर सरायो गाढा मारू जी
पिळो रंगावो जी




राजस्थानी पीले के कुछ और रंग यहाँ भी 

29 टिप्‍पणियां:

  1. विशिष्ट परम्पराओं से जुड़े वस्त्रों के बारे में पहली बार इतना सब पढा। मातृत्व (बल्कि पितृत्व भी) वाकई ऐसी दैवी अनुभूति है जो किसी पत्थर हृदय को भी प्रेम का स्रोत बना देती है। इस कोमल भावना को स्वयं माँ-बाप बने बिना महसूसना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है। भावमय आलेख के लिये बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  2. पोमचा परिधान के बारे में पहली बार जाना ...
    वैसे नवजात को अब सूर्य के प्रकाश से लम्बे समय तक दूर रखना
    चिकित्सा विज्ञान के अनुसार ठीक नहीं है -
    कई नवजात पहले से ही जांडिस के शिकार होते हैं -जांडिस पीले रंग से जुड़ा है -
    क्या पीले जांडिस की काट पीले रंग -यानी पोमचे से करने की पुरानी सूझ के
    चलते ही यह परिधान तो अस्तित्व में नहीं आया -यह शोध का विषय है !

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. वाकई ...
      शोधकर्ताओं के लिए अच्छा विषय होगा !

      हटाएं
  3. रोचक और ज्ञानवर्द्धक आलेख ..

    परंपराओं में कुछ न कुछ वैज्ञानिकता तो ेहोगी ही ..
    हमारे यहां भी मां बच्‍चे दोनो को पहला वस्‍त्र पहनाया जाता है !!

    उत्तर देंहटाएं
  4. मातृत्व , परम्परा , और एक सजीव दृश्य ..... कमाल का लिखा है . पढ़ते हुए कई एहसास इससे अलग उठते गए

    उत्तर देंहटाएं
  5. परम्पराओं की बड़ी ही रोचक जानकारी।

    उत्तर देंहटाएं
  6. संस्कृति और विरासत को समेटे उत्तम लेख !

    उत्तर देंहटाएं
  7. रोचकता लिए हुए मनभावन प्रस्‍तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  8. रोचक और सांस्कृतिक विरासत को समेटे हुये अच्छा लेख ... वैसे कुछ परम्पराओं में वैज्ञानिकता होती है जिन्हें आज हम मात्र परंपरा मान लेते हैं

    उत्तर देंहटाएं
  9. रोचक जानकारी समेटे बहुत बढिया आलेख ………

    उत्तर देंहटाएं
  10. पीले रंग का तो हमारी संस्कृति में ख़ास महत्त्व है...बिहार में भी...बच्चे के जन्म के छः दिन बाद जो उत्सव होता है..उसमे माँ और बच्चे को पीले रंग के वस्त्र ही पहनाये जाते हैं.
    शादी के समय भी कन्या को पीली साड़ी ही पहनाई जाती है.
    पोमचा के विषय में पहली बार जाना.
    उपयोगी आलेख.

    उत्तर देंहटाएं
  11. हमारे यहाँ भी नयी माँ को सोंठ-गुड़ आदि से बना व्यंजन दिया जाता है, जिसमें खूब मेवे वगैरह होते हैं. परिधान के विषय में तो मुझे कुछ खास नहीं मालूम.
    राजस्थानी संस्कृति मुझे बहुत आकर्षित करती है. मेरा शोध-कार्य समाप्त होते ही सबसे पहले आपकी ये लेखमाला और रश्मि दी की कहानियाँ पढूँगी.

    उत्तर देंहटाएं
  12. इस तरह के आलेख ब्लॉग जगत की धरोहर होने जा रहे हैं। आपने-अपने प्रदेश की सांस्कृतिक परंपराओं को आगे लाने का काम जो किया जा रहा है वह नायाब तोहफ़ा है। हम सब की न सिर्फ़ जानकारी में इजाफ़ा हो रहा है बल्कि इन सब परंपराओं से खुद को जुड़ा भी महसूस करते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  13. मान हो आता है हमारी इन परम्पराओं पर ..... मेरे तो पीला,पोमचा चुनरी सब साथ ही रहते है....

    उत्तर देंहटाएं
  14. भारतीय संस्‍कृति में स्‍त्री की मान्‍यता मातृस्‍वरूप में ही है इसी कारण मातृत्‍व प्राप्ति पर विशेष ध्‍यान दिया जाता है।

    उत्तर देंहटाएं
  15. बहुत सी बल्कि अधिकतर हमारी परम्पराएं ऐसी हैं जिनका आमजन को औचित्य नहीं मालूम लेकिन वे स्वास्थ्य और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अपना बहुत महत्व रखती हैं| संस्कृति और परम्पराओं पर प्रकाश डालती जानकारी भरी पोस्ट| सार्थक ब्लॉग्गिंग के अभाव का रोना रोने वालों को ऐसी पोस्ट्स दिखनी चाहियें|

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. "सार्थक ब्लॉग्गिंग के अभाव का रोना रोने वालों को ऐसी पोस्ट्स दिखनी चाहियें|" मेरी भी सम्मति।

      हटाएं
  16. इस शृंखला के माध्यम से इतना कुछ जानना समझना, दोहराना बढ़िया अनुभव है।
    आभार आपका।

    उत्तर देंहटाएं
  17. ब्लॉग बुलेटिन में एक बार फिर से हाज़िर हुआ हूँ, एक नए बुलेटिन "जिंदगी की जद्दोजहद और ब्लॉग बुलेटिन" लेकर, जिसमें आपकी पोस्ट की भी चर्चा है.

    उत्तर देंहटाएं
  18. रुचिपूर्ण व ज्ञानवर्द्धक दोनों! आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  19. Pomcha naam pahali baar suna ..par prasuta ke liye pila pahnava dekha hai ....badhiya janakari...geet bahut umda...

    उत्तर देंहटाएं
  20. शिशु राम को भी पीला वस्त्र पहनाया गया है -
    पीत झगुलिया तन सोहे....पीला एक शुभ और अनुष्ठानिक रंग है !
    दूल्हे दुल्हन की पियरी तो प्रसिद्ध ही है .....
    पियरी का मतलब यह भी है जो प्रिय लगे ...
    हल्दी लगाने की रस्म ही है ....

    उत्तर देंहटाएं
  21. बहुत ही रोचक और उपयोगी पोस्ट...आभार...

    उत्तर देंहटाएं
  22. सच कहा आपने...जिसके भी मन में ममत्व भाव बोध हो ,वह माता होती है, केवल बच्चे को जन्म देने वाली ही माता नहीं...

    आज आपकी राजस्थानी संस्कृति को उकेरे तीनों पोस्टों को एकसाथ ही पढने का सौभाग्य मिला..सच कहूँ तो अजीब से रोमांच की स्थिति बन गयी..

    हमारे पुरखे राजस्थान से आकर ही बिहार में बसे थे..अपनी संस्कृति को बचाए रखने का कितना प्रयास उन्होंने किया होगा अनुमानित किया जा सकता है..हालाँकि पूरा का पूरा तो नहीं, पर अभी तक काफी कुछ विद्यमान है..

    संभवतः यही कारन है की आज भी वहां का खान पान बोली भाषा, पहनावा हमें बरबस ही अपनी और खींच लेता है...

    आपका ह्रदय से आभार इस सुन्दर पोस्ट श्रृंखला के लिए...

    उत्तर देंहटाएं
  23. हम तो धन्य हुए ..यह सब जानकार ...!

    उत्तर देंहटाएं
  24. पोमचा ...
    मातृत्व और स्नेह प्रेम से जुड़े इस पीत परिधान के बारे में पहली बार ही जाना ...
    आपका आभार है इस बेजोड जानकारी के लिए ..

    उत्तर देंहटाएं