बुधवार, 26 सितंबर 2012

अपने पैसे से उत्कृष्ट साहित्य संग्रहों में अपनी रचनाएँ छपवाने में असहजता का क्या कारण हो सकता है !!

सबसे पहले तो स्वयं को बधाई दे दूं कि बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं . अब लिखा नहीं तो इसमें बधाई देने की क्या बात है !  अकारण व्यर्थ प्रलाप करने का हमें कोई शौक नहीं है , वजन होता है हमारी बात में , इसलिए इस बधाई का भी उचित कारण ही  है . लिख नहीं पा रहे ,  मतलब  साफ़ है कि हम भी राईटर ब्लाक से गुजर रहे हैं , जिससे बड़े -बड़े रचनाकार गुजरा करते हैं . यानि कि  यह तो साबित हो गया ही हम भी लेखक /लेखिका कहलाने योग्य हो चुके हैं , वरना राईटर ब्लाक जैसे साहित्यिक बीमारी से कैसे प्रभावित हो सकते थे !!


अब बात मुद्दे की , लम्बे अरसे से नया कुछ लिखना हो नहीं रहा . कई बार इस स्थिति से हम सब गुजरते हैं . परिस्थितिवश कई बार भावनाओं या विचारों का तीव्र अव्यवस्थित प्रवाह अभिव्यक्ति को अवरुद्ध करता है , वह लेखन की हो या मौखिक !  जो लिखने की इच्छा है लिखना नहीं चाहती हूँ , ऐन वक्त पर दिल और दिमाग में रस्साकसी आरम्भ हो जाती है कि आखिर हमारा ब्लोगिंग में होने का उद्देश्य क्या है . एक कशमकश सी रहती है कि व्यर्थ वाग्जाल में फंसकर अपनी साहित्यिक अभिरुचि को बाधित करना क्या उचित है , वही वाद विवाद में पड़ने  से बचने के लिए कुछ   प्रश्नों /आरोपों का प्रत्युत्तर नहीं देकर बच निकलने जैसी अनुभूति कही स्वयं एवं दूसरों को भी दिग्भ्रमित नहीं करे . जब कुछ कहानी /लेख /संस्मरण नहीं लिखा जा रहा है तो क्यों ना कुछ विचार ही बाँट लिए जाएँ . गृहिणियां रसोई में दाल- सब्जी की छौंक के साथ विचारों का तड़का भी बखूबी लगा सकती है . 

पिछले वर्ष अखबार में लिखे/ छपे   एक आर्टिकल पर सम्बंधित पक्ष की प्रतिक्रिया यूँ मिली " आपने इतनी जल्दी इस विषय पर कैसे लिख दिया , लोंग हमसे पूछ रहे थे कि ख़बरें पैसे देकर लिखवाई जाती हैं " . उस व्यक्ति के लिए यह विश्वास करना जरा मुश्किल था कि मुझे लिखने के लिए पैसे खर्च नहीं करने पड़े थे , बल्कि मुझे पारिश्रमिक दिया गया था . सच कहूं तो उस व्यक्ति द्वारा दी गयी खबर से ही मैंने जाना कि ख़बरें या आर्टिकल पैसे खर्च करके भी लिखवाए/छपवाए  जा सकते हैं . 
 इन दिनों विभिन्न पत्रिकाओं , पुस्तकों या काव्य संग्रहों में पैसे लेकर या देकर कवितायेँ या अन्य रचनाएँ छपवाने के बारे में कई ब्लॉग्स और फेसबुक स्टेटस  में पढ़ा. 
हिंदी ब्लोगिंग के अपने तीन वर्षीय अनुभव में मैंने अनुभव किया कि यहाँ साहित्यिक अभिरुचि रखने वाले वाले प्रतिभाशाली ब्लॉग लेखक /लेखिकाओं या पाठकों की कमी नहीं है . अपनी रचनाओं को ब्लॉग पर लिखने के अलावा पत्र -पत्रिकाओं /पुस्तक रूप में देखने की इच्छा  भी स्वाभाविक ही है . ब्लॉगर्स की  दिन दूनी रात चौगुनी बढती संख्या में से कम ही सौभाग्यशाली रचनाकार होते हैं जिन्हें पत्र- पत्रिकाओं में छपने का मौका मिल पाता है . अक्सर प्रकाशन समूह अपने प्रतिष्ठित रचनाकारों को ही छपने के अधिक अवसर प्रदान करते हैं . कई प्रकाशन समूहों की अपनी तयशुदा नीतियाँ  या मजबूरियां होती है जिसके तहत विशेष विषय की  उत्तम रचनाओं को भी अपनी पत्र- पत्रिकाओं में छापने में असमर्थ होते हैं . रचनाकारों की प्रकाशन - समूहों और संपादकों की मेहरबानी पर  निर्भरता ब्लॉग लेखकों /लेखिकाओं की  निष्पक्ष बेलाग अभिव्यक्ति पर एक बंधन -सी होती है . क्योंकि ब्लॉग पर लिखते समय प्रत्येक रचनाकार अपनी अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्र होता है , चाहे जो लिखे . इसके अलावा यदि कहीं रचना भेजी भी तो छपने में , अस्वीकृत होने की अवस्था में जवाब पाने में बहुत समय लगता है .

प्रकाशन समूहों की अपनी मजबूरी है . बढती महंगाई के इस दौर में जब आम आदमी के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण जरूरते रोटी , कपडा , मकान जुटाना मुश्किल हो रहा हो तो अपनी मानसिक खुराक के लिए किताबें / पत्रिकाएं आदि खरीदने की हिम्मत कहाँ से जुटा पायेगा . ईमानदारी से बताये कि पढने के शौक़ीन मध्यमवर्गीय  समाज   में से कितने प्रतिशत लोंग अपने पैसे खर्च कर किताबें खरीद पाते हैं!! 

इन परिस्थितियों के मद्देनजर यदि  कोई प्रकाशन समूह उन ब्लॉग लेखकों /लेखिकाओं की  रुचियों और सुविधा को ध्यान में रखकर कुछ सहयोग राशि  पर उनकी रचनाओं को पत्रिकाओं अथवा पुस्तक के रूप में  सहजने का जिम्मा लेता है तो इसमें परेशानी क्या है . अपराध तब माना जा सकता है जब किसी से धोखे से पैसे ऐंठे गये हो , या उन पर दबाव बनाया गया हो  . यदि कोई रचनाकार असहज मसूस करता भी है तो पुनः इस प्रकार के प्रकाशन में रूचि नहीं लेगा . ब्लॉग रचनाकारों से स्वविवेक की अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि वे अपनी रचनाएँ  किस प्रकार और किस कीमत पर सहेजना चाह्ते हैं . मुझे इसमें कुछ बुराई नहीं लगती , कम से कम अपने पैसे देकर आत्मसंतुष्टि के साथ अपना स्वाभिमान तो बना ही रहता  है . जब लोंग अपने पैसे को मन मुताबिक कपड़ों , किताबों , मनोरंजन , कुत्ते- बिल्लियों के रखरखाव,  दारूबाजी  आदि पर खर्च करने में सहज है तो अपने पैसे से उत्कृष्ट साहित्य संग्रहों में अपनी रचनाएँ छपवाने में असहजता का क्या कारण हो सकता है !!   

कुछ कहना है आपको भी ???

54 टिप्‍पणियां:

  1. वाणी जी
    हिंदी की किताबे , कहानी , कविता और भी बहुत कुछ सब सहयोग की राशि से ही छप रहा हैं , कम से कम पिछले २० साल से तो मै अपने आस पास देख रही हूँ . कारण ये नहीं हैं की प्रकाशक के पास क़ोई आर्थिक संकट हैं . कारण ये हैं की पाठक नहीं हैं जो किताब को खरीद कर पढ़े , विश्विद्यालय में लाइब्ररी के पास फंड नहीं होते , जगह नहीं होती सो वहाँ भी बिक्री कम ही हैं , अब या तो सरकारी अनुदान मिलता हैं और किताब छपती हैं { इसके लिये तगड़ा पी आर चाहिये और ये जाना माना तथ्य हैं की अनुदान राशि में कुछ उसका होता हैं जो अनुदान दिलवाता हैं } सहयोग से प्रकाशक छपता हैं पर बेचता नहीं हैं . ये भी काम लेखक का हैं . जब तक आप में सामर्थ्य हैं आर्थिक आप ये कर सकती हैं , इस में कुछ भी गलत नहीं हैं , छप जाए तो लोगो को बाँट सकती हैं सब कहेगे , मेरी प्रति कहां हैं , यानी अगर आप ने ५००० की न्यूनतम राशि दी हैं और बदले में १०० किताब आप को मिल गयी हैं तो आप को बस एक ही सुख हैं लोगो को किताब गिफ्ट करने का आप को क़ोई आर्थिक लाभ नहीं हैं , जबकि पब्लिशर के पास जो प्रतियां बचती हैं और अगर वो उनको बेच लेता हैं तो ये उसकी कमाई हैं . ज्यादा तर पूरा खर्चा आप की दी राशि से ही निकल आता हैं
    किताब छप कर प्रिंट मीडिया में आने से एक अचीवमेंट की अनुभूति होती हैं जो अपने आप में बहुत हैं , लेकिन किताब की शेल्फ लाइफ बहुत कम हैं . अगर आप भी क़ोई किताब खरीद कर लाती हैं कितनी बार पढती हैं , फिर उसका क्या करती हैं ? मेरे घर हिंदी पुस्तकों की एक लाइब्ररी थी , माँ - पिता की बनाई हुई , कहां कहां की किताबे नहीं हैं , फिर वो लाइब्ररी से एक अम्बार होगया , अब एक ढेर हैं अलमारी में बंद . और जानती हूँ एक दिन केवल और केवल कबाड़ की तरह बेचना पड़ेगा मुझे . बहुत कष्ट होगा पर क्या ऑप्शन हैं मेरे पास ? मेरा विषय हिंदी नहीं है , क़ोई लाइब्ररी लेने को तैयार नहीं हैं , जिन विषयों पर वो किताबे हैं वो विषय आज कल छात्र नहीं पढते . कितने लोगो से में संपर्क कर चुकी एक ही जवाब होता हैं घर में इतनी जगह ही नहीं हैं . एक और परिवार के पास भी इसी तरह से एक अम्बार हैं , गठरी बना टांड पर चढ़ा .

    बस एक बात और
    @कशमकश सी रहती है कि व्यर्थ वाग्जाल में फंसकर अपनी साहित्यिक अभिरुचि को बाधित करना क्या उचित है .
    हिंदी ब्लॉग लेखन हिंदी साहित्यकारो का अड्डा ना बने तब ही सार्थक ब्लॉग लेखन होगा , हिंदी साहित्यकारों में कितना वाद विवाद हैं और कितनी रंजिशे होती हैं पता नहीं हैं आप कितना जानती हैं , सबको लगता हैं वो सबसे अच्छा लिखते हैं . ब्लॉग पर साहित्य लिखिये , जरुर लिखिये , क्युकी इस फ्री मीडियम के जरिये आप अपनी किताब , इ बुक बना सकती हैं , कोशिश करिये की आप पढने के लिये पाठक से एक राशि ले .
    पर ब्लॉग लेखन को "व्यर्थ वाग्जाल" कह कर उन सब को अपने से { यानी वो सब जो अपने को हिंदी का साहित्यकार मानते हैं और ब्लॉग पर हिंदी सुधारने और उसको आगे बढ़ाने और दूसरे ब्लोग्गर की हिंदी सही करने , के लिये ही ब्लॉग लेखन करते हैं } छोटा ना माने .

    ब्लॉग मीडियम विचारों की अभिव्यक्ति हैं , बहुत से लेखक और अपने को साहित्यकार समझने वाले लोग इस से केवल इस लिये जुड़े हैं क्युकी उनको कहीं क़ोई जानता ही नहीं हैं .

    हैरी पोट्टर की लेखिका रोव्लिंग कभी एक ऐसी गृहणी थी जो पैसे पैसे को मुहताज थी , अपनी पहली पाण्डुलिपि एक रेस्तोरांत में बैठ के लिखी थी , छप गयी आज करोडो में खेल रही हैं , पहली , व्यस्को के लिये , किताब उनकी आज आ रही हैं और पहले ही बेस्ट सेलर हो चुकी हैं . साहित्यकार फिर भी नहीं समझी जाती हैं .
    हिंदी में क़ोई ऐसा लेखक आप बता सकती हैं जिसकी किताब की प्रतियां , बिना मार्केट में आये ही बिक चुकी हो ???


    मुद्दा किताब छापने से नहीं ख़तम होता हैं , मुद्दा है क्या आप के पास ऐसे पाठक हैं जो आप के लिखे को खरीद कर पढ़े . ????
    अन्यथा वो ५००० हज़ार जो आप खर्च कर रही उस से मिली १०० प्रतियां आप कहां रखेगी , उसकी जगह बनाये और अगर विमोचन इत्यादि करवाना हो तो भी पैसे तैयार रखे , हाँ दोस्तों की पार्टी भी बनती हैं किताब छपने के बाद , सो मेरा निमंत्रण भेजना ना भूले और ज्यादा लिखे को कम समझे :)

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    1. just wanted to add that on blog we have a publisher Arun Roy , Jyoti parv prakashan , many bloggers have got book published from him

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    2. अब हर लेखक /लेखिका जयशंकर प्रसाद या महादेवी वर्मा तो हो नहीं सकता कि लोंग उनकी किताबें खरीद कर पढ़ें :)
      @ किताब छप कर प्रिंट मीडिया में आने से एक अचीवमेंट की अनुभूति होती हैं जो अपने आप में बहुत हैं ...यह भी क्या कम है !!
      @ व्यर्थ वाग्जाल में उलझने से मतलब है कि उस वाद विवाद का क्या फायदा जिसका कोई हल नहीं निकले , कुछ ठोस सार्थक किया जा सके तो उचित लगता है , वरना व्यर्थ ही है ! घूम फिर कर वही बातें एक उकताहट सी देती हैं , फिर आपको अपनी प्राथमिकतायें भी देखनी होती है ! जो किसी एक के लिए सहज सरल है , वह अन्य के लिए भी इतना ही सहज हो आवश्यक नहीं , इसमें किसी को छोटा या बड़ा मानने जैसी बात नहीं है .
      @ विमोचन करवाना , दोस्तों को निमंत्रण ...फिलहालऐसा कोई इरादा नहीं है :)

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    3. @ उस वाद विवाद का क्या फायदा जिसका कोई हल नहीं निकले
      कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥



      क्युकी ब्लॉग प्रिंट मीडिया से फरक माध्यम हैं इस लिये यहाँ संवाद { आप जिसे वाद विवाद कह रही हैं } की छुट हैं
      प्रेमचंद , महादेवी वर्मा , महाश्वेता सबने ही समाज की उन्नति { नारी आधारित विषयों } पर काम किया हैं इनकी कहनियो में उस समय की परेशानियां हैं और इनका लेखन फुचारिस्टिक था क्युकी उन्होने वो बदलाव इंगित किया जो आज दिख रहा हैं .और इसलिये ही ये साहित्यकार हैं . इनकी किताबो की चर्चा जब इनके समय में हुई थी तब ये साहित्यकार नहीं थे , महज लेखक थे .


      दिस्क्लैमेर मैने नारी आधारित विषय कहा हैं क्युकी ब्लॉग पर विवाद इस विषय से ही सब से ज्यादा होता हैं और लोग कहते हैं ये अंत हीन हैं , इसके इतर इस बात का क़ोई भी मतलब ना समझा जाये

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    4. संवाद से तो कभी इनकार किया ही नहीं जा सकता . मेरी कई प्रविष्टियाँ इस पर केन्द्रित रही हैं .

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    5. उलझन संवाद के विषय को लेकर है !

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    6. विषय का निर्णय जो विषय चुन रहा हैं उस पर हैं , आप की किताब का नाम क्या होगा ये आप पर निर्भर हैं , आप की किताब किस विषय पर होगी ये भी आप पर ही निर्भर
      मेरा कमेन्ट देने का कारण महज इतना हैं की पोस्ट के एक भाग में मुझे लगा की आप को ब्लॉग लेखन निम्न स्तर का लेखन लगता हैं और हिंदी के प्रखंड साहित्यकार यहाँ बोर हो जाते हैं सो मैने इस पर लिखा . ब्लॉग मीडियम किताब से ज्यादा सशक्त हैं क्युकी इसकी पहुच दूर तक हैं , किताब की पहुँच तब ही हो सकती हैं जब लेखक इतना सशक्त हो की उसके विचारों को दूसरो तक पहुचाने के लिये पब्लिशर एक माध्यम बनने में फक्र महसूस करे और उसकी किताब को अपने पैसे छाप कर कॉपी राईट का अधिकार लेखक का ही माने . बाकी किताब छापना एक उपलब्धि हैं किसी भी तरह से और पोस्ट लिखना भी आसन नहीं हैं . पोलिटिक्स दोनों जगह बस यहाँ मीडियम फ्री हैं वहाँ आप अपना पैसा लगाते हैं

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  2. चिंतन शीलता सृजनात्मक लेखन का स्वाभाविक गुण है . यह नहीं कि ऐसा लेखन दर्शन बोध से जुड़ा होता है या किसी विषय विशेष में अपनी जड़ें जमाये होता है |
    सृजनात्मकता कि यह शर्त कतई नहीं होती... ऐसी स्थिति में सृजनात्मकता का काफी हद तक ह्रास ही होता है , तब रचना बोझिल , एकांगी और पूर्वाग्रह पूर्ण हो जाती है |
    वैसे देखा जाए तो... सृजनात्मकता में एक प्रकार का पूर्वाग्रह मिलता ही है लेकिन वह पूर्वाग्रह हो - सच्चाई को सामने लाने का, उसके सही परिप्रेक्ष्य में... बेशक यह काम बहुत आसान नहीं क्योंकि इसमें. निस्संगता के साथ साथ साहस अपेक्षित है , दूसरे शब्दों में सच्चाई को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने का साहस सृजनात्मक रचना शीलता कि मुख्य शर्तों में से प्रमुख है... इस साहस के लिए रचनाकार को कई बार "दाम" भी चुकाने पड़ते हैं ; लेकिन अगर सच्चाई बयाँ हो जाए तो "दाम" कभी महंगे नहीं होते... अब ये दाम कुछ भी हो सकते हैं....:)
    सादर....

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  3. आप से सहमत हूं की यदि कोई चाहता है की पैसे दे कर अपनी रचनाए प्रकाशित करे तो उसमे कोई बुराई नहीं है , हा बस इस बात को स्वीकार करे या ना करे पर कम से कम ये ना कहे की उसकी रचनाओ को बहुत अच्छे होने के कारण प्रकाशक ने प्रकाशित किया है और अब वो बहुत बड़ा साहित्यकार बन गये है | ब्लॉग जगत में बहुत से ऐसे लोग है जिन्हें इस बात पर कोई आपत्ति नहीं है की उनके पोस्ट को विभिन्न समचार पत्रो में बिना उनसे पूछे ही प्रकशित कर दिया जाता है और कोई पैसे भी नहीं दिये जाते है , जबकि कुछ लोगों को है , तो अपनी अपनी सोच अपनी अपनी मर्जी | वैसे ब्लॉग केवल साहित्यकारों का ही अड्डा नहीं होना चाहिए यहाँ सभी के लिए जगह है और सभी के लेखन के अपने पाठक |

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  4. शोध पुस्तकें छपवाने में पैसे खर्च होते हैं ये तो मैं जानती थी लेकिन पिछले दिनों मुझे भी ये पता चला कि अपने पैसे देकर साहित्यिक रचनाएँ भी साहित्य-संग्रहों में छपवाई जा सकती हैं.
    मुझे भी इसमें कोई हर्ज नहीं लगता क्योंकि आजकल छपना सभी चाहते हैं, पर पढ़ना कोई नहीं चाहता. ऐसे में प्रकाशक बेचारा क्या करे?

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  5. आपके ब्‍लाग पर हवामहल का इतना सुन्‍दर चित्र लगा है कि मन अभिभूत हो गया। जो नवीन लेखक हैं उन्‍हें छपने का शौक होता ही है इसलिए यदि पैसा देकर छप जाते हैं तो कुछ बुराई नहीं है। वैसे अभिव्‍यक्‍ि陑ࠀ_ के लिए ब्‍लाग सही प्‍लेटफार्म हैं।

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    1. पतिदेव का कुछ तो सहयोग ले ना ब्लोगिंग में :)

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  6. पुस्तक के रूप में अपनी रचनाओं को संग्रहीत करना आत्मसुख के अतिरिक्त और कुछ नहीं .... लेकिन आत्मसुख मिल जाये यह भी कम नहीं ... क्यों कि रचनाकार की यही तो एक धरोहर है ... यह भी एक शौक है जिसे यदि पूरा करने में कुछ धन खर्च भी होता है और खुशी ज्यादा मिलती है तो इसमें कोई बुराई नहीं है .... सार्थक मुद्दा ॥विचार करने योग्य ।

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  7. सबसे पहले तो रायटर बनने के लिए बधाई... जल्दी ही ब्लाक ख़त्म होगा:)
    अब जहाँ तक छपने की बात .... छपने से पहले कौन सा साहित्य संग्रह उत्कृष्ट के श्रेणी में आ पायेगा, हम नहीं कह सकते... पर फिर भी मैं अपने नजरिये से कह रहा हूँ... मुझे कभी भी छपने से परहेज नहीं रहा और सच कहूँ तो अपनी जेब ढीली कर के भी मेरी दिली इच्छा रहती है, मैं प्रिंट मीडिया में नजर आ पाऊं ... और हर समय मुझे लगता है अपनी अकेले की काव्य संग्रह के तुलना में
    साझा काव्य संग्रह बेहतर तरीका है खुद को लोगो के समक्ष आगे आने के लिए ....
    क्योंकि अगर २० लोगो का कोई साझा संग्रह है और इसमें आप भी शामिल हैं तो उन २० लोगो में से हर एक का पाठक वर्ग आपसे परिचित होता है,... और अगर आपके रचना में दम है तो आप खुद उन २० में से आगे निकलते हो...
    रही बात इन संग्रह में आप कैसे और कितने पैसे दे कर छपते हो... या आप और उस संपादक/प्रकाशक के बीच का विषय है... और इस पर छपने से पहले बात होनी चाहिए... मैंने सामान्यतः लोगो को संग्रह में आने के बाद कहते सुना है..... मुझे ठग लिया गया... या मेरे से जायदा पैसे लिए गए... ये साहित्य में एक घटिया स्तर की बात है... आप पहले तो बहुत खुश होते हैं की , चलो हमें एक प्लेटफोर्म मिल रहा, और ख़ुशी ख़ुशी मेहनत के पैसे देने को राजी हो जाते... पर बाद में हल्ला मचाते हैं...!! प्रकाशन से पहले ही, सारे शर्त बयाँ हो जाने चाहिए ... और बाद में सिर्फ और सिर्फ उस पुस्तक के बेहतरी की बात होनी चाहिए...

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    1. Dada (mukesh kumar sinha ji) mai aapse bilkul sahmat hun.... chhapne ka shauk hota hai aur sajha sangrah sach me achchha tareeka hai apni rachnaye auron tak pahuchane ka...

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  8. सबको समुचित अवसर नहीं मिल पाता है पत्रिका में अवसर पाने का । ब्लॉग एक सशक्त माध्यम है, स्वयं को व्यक्त करने का, सबके लिये उपस्थित ।

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  9. paise de kar apni rachnaayen chhapwana ya pustak roop dena koi burayi nahi...ant-tah lekhak ki hi marzi se ye sab hota hai aur uske chhap jane uprant jo sukoon milta hai vo be-mol hota hai....lekin jitni dhan rashi kharch hone wali hai uska poorn byora pahle se hi diya jana chaahiye....chhap jane ke baad aur kharche bata kar paise ainthna galat hai..jo asahjta ka karan ban jata hai.

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  10. ब्लॉग एक बेहतरीन माध्यम है अभिव्यक्ति का. सर्व सुलभ. प्रकाशन एक आत्म संतुष्टि देता है. और बाकी शौकों की तरह अगर धन देकर यह पूरा हो तो मुझे भी कोई बुराई इसमें नहीं लगती.

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  11. हाँ आपका हैडर बहुत खूबसूरत लग रहा है:)

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    1. पतिदेव की फोटोग्राफी है , फायदा हमने ले लिया :)

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    2. अभी कुछ मास पहले इसके नीचे से गुज़र रहा था! ओरिजिनल से भी बेहतर लग रहा है।
      शिखा जी ने जो बात कही है, कई दिनों से कहने का मन कर रहा था। :)

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  12. बिना किसी की टिप्पणी पढ़े इस विषय पर अपना मत दे रहा हूं, ताकि अन्य लोगों की कही बातों से प्रभावित न हो जाऊं।

    अपने अनुभव से बात शुरू करता हूं, और शुरू में ही कह दूं कि ये मेरे निजी विचार हैं, मैं इसे किसी पर थोपना नहीं चाहता।
    जिस अनुभव की बात करने जा रहा हूं, उसे कभी ‘फ़ुरसत में ...’ डालता लेकिन अब आज आपने यहां चर्चा छेड़ ही दॊ है तो ...

    नया-नया ब्लॉग जगत में आया था। कई वर्षों से लिखना लगभग बंद ही कर रखा था, कारण आपने कई गिनाए हैं अपने इस लेख में, जो साहित्य जगत में हो रहा है, उन्हीं में से एक था।

    @ कई प्रकाशन समूहों की अपनी तयशुदा नीतियाँ या मजबूरियां होती है जिसके तहत विशेष विषय की उत्तम रचनाओं को भी अपनी पत्र- पत्रिकाओं में छापने में असमर्थ होते हैं . ...

    मेरी स्वीकृत रचनाएं (५-६), इसलिए लौटा दी गईं कि एक रचनाकार के लेख की हमने आलोचना कर दी थी।

    जब ब्लॉग जगत में आया तो यहां की धारा में खुद को बहा दिया। शुरुआती दिनों की बात थी। ज़्यादा परिचित नहीं था। एक प्रतियोगिता में भाग लिया। मेरी रचना को पुरस्कृत किया गया। और दो महीने के बाद मेल आया कि आप इतना रुपए ख़र्च कीजिए हम इसे एक पुस्तक में छाप देंगे। हमने कहा कि सब जगह तो पारिश्रमिक मिलता है, मैं क्यों पॉकेट से ख़र्च करूं।

    वह रचना एक श्रेष्ठ पत्रिका में छपी और हजार रुपए का पारिश्रमिक भी मिला।

    ब्लॉग पर लिखते-लिखते एक पुस्तक के प्रकाशन का भी मन बन गया है। अगर कोई मेरी शर्तों पर छाप देगा तो वाह वाह, नहीं तो मेरा क्या घाटा है, मेरी आजीविका पुस्तक या लेखन नहीं है। अपन ब्लॉग पर लिख कर और पाठकों की त्वरित प्रतिक्रिया से रू-ब-रू होकर जो मानसिक संतोष धन लूट रहें है उसका कोई मुकाबला है क्या? न छपा तो मेरा तो नहीं, हो सकता है साहित्य जगत को कुछ घाटा हो जाए।

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  13. मेरी टिप्पणी क्या स्पैम में चली गई है?

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  14. हवामहल का फोटो बहुत सुन्दर है.....भई 'अहं' की पुष्टि के लिए ही सब कुछ चल रहा है अपना तो ये मानना है.....लेखिकाओं की जमात में शामिल होने की बधाई.....क्या फर्क पड़ता है की आप सफ़ेद पन्नो पर स्याही से छपते हैं या वेब पेज पर ब्लॉग के माध्यम से ...... जो लिखा गया है मूल्यांकन उसका होता है....अच्छा लिखती रहें बस यही बहुत है :-)

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  15. @व्यर्थ वाग्जाल में फंसकर अपनी साहित्यिक अभिरुचि को बाधित करना क्या उचित है ,

    वाग्जाल भी कभी व्यर्थ नहीं होता...कई बातें निथर कर आती हैं और दिमाग की खिड़कियाँ खुलती हैं ..अपनी सोच भी विस्तृत होती है,नए अनुभव होते हैं और लोगों की पहचान भी हो जाती है..जो लेखन (साहित्यिक अभिरुचि ) में हमेशा सहायक ही होता है.

    जहाँ तक पैसे देकर पुस्तकें प्रकाशित करवाने की बात है..यह तो अपनी अपनी सोच है...गलत वे भी नहीं...जो पैसे देकर छपवाते हैं...और गलत वे भी नहीं...जिन्हें इस से इनकार है.

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  16. यह तो बहुत पुराना तरीका है। जब ब्लॉग नहीं थे तब भी कुछ लेखकों ने मिलकर अपना संग्रह अपने पैसे से प्रकाशित करवाया है। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। सभी के प्रयास से बिक जाय, यह और भी अच्छा। गड़बड़ी बस इतनी है कि हम अपने मित्रों, परिचितों की किताब को खरीद कर नहीं पढ़ना चाहते। चाहते हैं मुफ्त में मिल जाय। जबकि खरीदें, तो पढ़ें। पढ़ें, तो आलोचना या प्रशंसा करें। बिना आलोचना और प्रशंसा के कोई किताब चर्चित नहीं होती। हम खुद अपने मित्र साहित्यकारों का सम्मान नहीं कर पाते और अपेक्षा करते हैं कि आम जनता पुस्तक खरीद कर पढ़े। आम जनता तो चर्चित पुस्तकें ही खरीद कर पढ़ना चाहती है।

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    1. इहे बात है बस, जब कोई ख़रीदे तो पढ़े . नहीं तो घर की मुर्गी दाल बराबर समझ लेते है . जेब से पैसे लगवाकर छपवाने से साहित्य , सस्ता नहीं हो जाता, बल्कि उसमे बुद्धि के साथ अर्थ भी जुड़ जाता है .

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  17. विरोध के स्वर का कोई अर्थ नहीं,.... मैं स्वयं प्रकाशित होने में भी सुखी हूँ,क्योंकि यूँ लगता है कि कहीं खुद को हाथ में लेकर पढ़ने के लिए स्वतंत्र हूँ...मुश्किल से ही सही,कुछ परिपक्व रचनाकारों को अपने दम पर सम्पादित करके सबके बीच लाना भी सुखद है, आरम्भ में आपसी सहयोग से संपादन किया....कोई देने को बाध्य नहीं है,एक 'ना' सबके हाथ में है. अफवाहों,आलोचनाओं में बर्बाद होते वक़्त को सार्थक दिशा में लगाना उत्तम है.
    देवेन्द्र जी ने सही कहा कि हम १०० रूपये तक में पुस्तक लेकर पढ़ना पसंद नहीं करते और मुझे लगता है कि जो लिखते हीं,उनकी रूचि पढ़ने में अवश्य होती है. दिनकर,पन्त ने कभी नहीं कहा कि हमें पढ़ो .... रूचि है तो पढ़ा.पुस्तक बाज़ार में कम लालच नहीं होता

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  18. आपका यह आलेख एक साथ कई सारी खूबियो को समेटे हुये है ... आभार

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  19. . जब लोंग अपने पैसे को मन मुताबिक कपड़ों , किताबों , मनोरंजन , कुत्ते- बिल्लियों के रखरखाव, दारूबाजी आदि पर खर्च करने में सहज है तो अपने पैसे से उत्कृष्ट साहित्य संग्रहों में अपनी रचनाएँ छपवाने में असहजता का क्या कारण हो सकता है !!

    आपकी कही इस बात से मैं १००% सहमत हूँ

    मैं बस इतना ही कहूँगी कि अपनी आत्मसंतुष्टि से ऊपर कुछ भी नहीं ...

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  20. बात तो आप बिलकुल सही कह रही हैं :)

    यह टिप्पणी पहले वाली टिप्पणियां पढ़े बिना ही कर रही हूँ - अभी अभी आ पायी इस ब्लॉग पर. mobile पर खुल नहीं रही थी टिप्पणी खिड़की :(

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  21. @ इलेक्ट्रोनिक बनाम प्रिंट माध्यम ,
    जब इंटरनेट के पैसे अपनी पाकेट से देकर आलेख लिखने /अभिव्यक्त होने और पाठक तलाशने में कोई हर्ज़ नहीं तो फिर अपनी ही पाकेट की दमपे किसी और माध्यम से ऐसा करने में हर्ज़ क्या है ! प्रिंट माध्यम में जो खर्चा एक बार है इलेक्ट्रोनिक माध्यम में वो खर्चा किश्तों में है लगातार है ! पाठकों की कमी या ज्यादती मुद्दा नहीं है मुद्दा है हमें पाठक चाहिए ही वर्ना हम अभिव्यक्त भी क्यों होंगे?
    बहरहाल अभिव्यक्ति के प्लेटफार्म जो भी हों खर्चा तो कमोबेश अपनी ही पाकेट से निकलता दिखाई दे रहा है जुगाड़ हो ( आप मेरिट कहलें ) तो कोई पब्लिशर इस खर्चे की भरपाई कर देता हो , तो वो निज हित में आफिस के इंटरनेट का इस्तेमाल करने जैसा है :)

    सुझाव ये कि छपने वाले को कैसा लगता ये बात ज्यादा अहम है बजाये इसके कि मैं कहूँ खुद के खर्च पे किताब ? क्या बकवास / क्या बात है :)

    @ हेडर ,
    आपके पतिदेव का योगदान सुन्दर तो है पर वजनीला बहुत हो गया है इसकी वज़ह से पेज का बैलेंस बिगड़ रहा है ! क्या इसे ऊपर से नीचे यानी कि नोर्थ से साउथ में छोटा नहीं किया जा सकता ? सलाह अगर बुरी लगे तो फ़ौरन वापस कर दी जाए !

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  22. विषय बड़ा रोचक बना गया है. वैसे इस विषय में अंजू की राय से पूरी तरह से सहमत हूँ. हम अपने मन से जो अच्छा लगता है पैसे खर्च करके ले लेते हें चाहे किताब ही क्यों न हो? फिर अपने को संग्रह में शामिल करवाने में कोई हर्ज नहीं है. ऐसा नहीं है कि पत्र पत्रिकाओं में छपते नहीं रहे हें बल्कि वर्षों से स्तरीय पात्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हें लेकिन अब न तो उनके मानकों के नुसार लिखने का समय मिलता है और न अब कोई टाइप करवा कर या प्रिंट आउट निकलवाएँ फिर भेजें तो उससे बेहतर है कि टाइप करें और ब्लॉग पर पोस्ट कर दें. अपने पैसे से किताब छपवाना अपने लिखे को औरों तक पहुंचना है भले ही वे पुस्तकें हम अपने परिचितों को ही दें लेकिन एक पहचान तो अपने उस दायरे में बन जाती है जो आपको पहले से जानता है और ब्लॉग से परिचित नहीं है.

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  23. वाणीजी
    मेरे तो जीवन के तीन सपने थे |एक बार मदर टेरेसा के होम में उनके द्वारा संचालित सरे कार्य देखना जो की कलकता की यात्रा में पूरा हो गया औ आंशिक रूप में अपने जीवन में भी उन कार्यो को करने का प्रयास भी किया , ,दूसरा रंगमंच पर अभिनय करना भले ही विशाल स्टेज न मिला हो किन्तु महिला मंडल के माध्यम से वो भी पूरा हुआ और तीसरे अपना कविता संग्रह छपवाना जो की साझा माध्यम से पूरा हुआ जिसकी ख़ुशी सिर्फch महसूस ही की जा सकती है |और अपना कविता संग्रह भी अपने पैसे से छपवाया जिसे उपहार देकर आत्म संतुष्टि मिलती है |अब जिसे उपहार में किताब दी है वो" न " पढ़े तो "उत्तम "और पढ़े तो "अति उत्तम "|

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  24. अभिव्यक्ति के लिए हर माध्यम के अपने मायने हैं ..... ब्लॉग पर प्रकाशन और रचनाओं के संग्रह का पुस्तक के रूप में प्रकाशन दोनों अलग अलग हैं..... जिसे जो बेहतर लगे अपनाने ले

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  25. जिस देश में पैसे देकर कोई भी काम हो जाता है, वहाँ पैसे देकर प्रकाशन में कैसी असहजता? मेरी नज़र में एक प्रतिप्रश्न भी होना चाहिये (बल्कि "बिना मेहनत बेरोज़गारी मिटायें" शृंखला की मेरी अगली बेस्टसेलर का शीर्षक भी हो सकता है) -
    बेकार कृतियों को असम्पादित रूप से अनेक त्रुटियों के साथ छापकर पैसे कैसे कमायें?

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    1. काव्य संग्रह अथवा सद्साहित्य छपवाना घूस देने जैसा थोड़े ना है !! इसमें कैसी आपत्ति !!

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    2. वही तो - प्रश्न की दिशा दूसरी होनी चाहिये। उत्कृष्ट रचनायेंकैसे भी हों छपनी चाहिये, लेकिन पैसा होना भर किसी को साहित्यकार बनाने या दुकानदारी की कला भर होना किसी को सम्पादक बनाने के लिये नाकाफ़ी होना चाहिये।

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    3. और हाँ, आपकी रचनाओं के प्रकाशन की बधाई! आपकी कवितायें पढता रहा हूँ - उन्हें छपना ही चाहिये।

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  26. आपने ऐसा विषय चुना है जिस पर सभी का अपना-अपना मत हो सकता है वैसे मैं शिखा जी कि बात से सहमत हूँ मगर पैसे देकर अपनी रचना छपवाने में मुझे संतुष्टि नहीं मिली। एक बार यह भी कर के देख चुकी हूँ मैं, और अब यह निर्णय लिया कि दुबारा पैसे देकर रचना कभी नहीं छपवाउंगी। इसलिए नहीं की इसमें कोई बुराई है बल्कि इसलिए की इसमें कोई आत्मसंतुष्टि जैसा भाव नहीं है और दूसरी बात अब ज़माना वो भी नहीं है कि सभी आपके लिखे का मानदेय दें, मैं यह नहीं कहती कि मैं बहुत अच्छी लेखिका हूँ मैं केवल एक साधारण सी लेखक हूँ खुद को लेखक इसलिए कह सकती हूँ क्यूंकि लिखना मुझे पसंद है फिर चाहे वो ब्लॉग पर ही क्यूँ ना लिखना हो। मेरी भी अब तक बहुत सी रचनाएँ पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। लेकिन मुझे आज तक कभी कोई मानदेय नहीं मिला, मगर मैं फिर भी अपनी रचनाएँ किसी पत्रिका के संपादक के द्वारा मांगने पर उन पत्रिकाओं के लिए दे देती हूँ क्यूंकि मुझे मानदेय का लालच नहीं बस लिखने का शौक है और मेरी बात ज्यादा-ज्यादा से लोगों तक पहुंचे लोग उसे पढ़ें और उस पर अपने विचार प्रस्तुत करें बस यही मेरा उदेश्य रहा है क्यूंकि इससे लिखने का बढ़वा मिलता है एक सार्थक टिप्पणी भी लिखने का उत्साह बढ़ा देती है।

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    1. पल्लवी!! जहाँ तक मुझे जानकारी है.. आपकी सिर्फ एक पुस्तक आयी है और वो मेरे सह-संपादन में "कस्तूरी" साझा काव्य संग्रह ! जिसके लिए हमने किसी से भी अब तक कोई पैसे नहीं लिए, अगर आपसे इसके लिए पैसे लिए गए हैं, तो बहुत गलत हुआ आपके साथ, और अगर नहीं लेने पर भी आप ऐसा लिख कर लोगो को confuse करना चाह रही तो ये और भी गलत बात है ! हमने दो complementary प्रति की बात की थी, और आपको समय पर भेज दी गयी आपके भारत प्रवास के दौरान ! आपको इसके अलावे पांच और प्रति की आवश्यकता थी, और उसके लिए आपने 875/- रूपये जमा करवाए थे, जबकि हमें कुरिएर चार्जेस ही 300 या 400 के करीब लग गया... जो आपको अलग से जमा करवाना था, पर अब तक वो नहीं भेजा... क्या ये अलग से प्रतियाँ खरीदना investment है ? कम से कम ये तो सोचना चाहिए की आपकी बातों से किसी के इमेज को धक्का पहुँचता है !

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    2. मुकेशजी मेरा कमेंट "कस्तूरी" से कहीं भी संबन्धित नहीं है इसे आप अन्यथा ले रहे हैं और लोगों को confuse कर रहे हैं।

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  27. ओह एक बड़ा पूरा कमेन्ट उड़ गया ....
    उफ़ ....फिर कोशिश करता हूँ...
    मुझे आज से तीस वर्ष से ऊपर ही अपनी रचनाओं का अच्छा ख़ासा पारिश्रमिक मिलता था -तब किसी ने पूछा था कि मुझे उन रचनाओं के छपवाने के लिए कितना देना पड़ता है -मैं अवाक! मैंने उसे बताया कि मुझे तो मिलते हैं तो वह अवाक!
    लोगों के परसेप्शन जानकारी के अभाव में ऐसा ही है ...
    प्रकाशक को पैसे देकर रचनायें /संकलन छपवाना मुझे बहुत ख़राब लगता है .....यह तो अन्यायपूर्ण उपली बात हुयी -रचनकार के श्रम का शोषण ! इसके औचित्य को लेकर कोई दलील मुझे कतई स्वीकार्य नहीं है -आखिर ब्लॉग इन्ही दुष्प्रवृत्तियों पर अंतिम कील है न !
    आज के अंतर्जाल युग में जब अपनी बात कहना और साझा करना इतना आसान हो गया है तो एक सर्वथा अनुचित बात का समर्थन बस हास्यास्पद ही है ..
    कितनी भोली हैं आप :-)

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  28. मैं अनुराग जी की ही बात दोहराना चाहूँगा - "पैसा होना भर किसी को साहित्यकार बनाने या दुकानदारी की कला भर होना किसी को सम्पादक बनाने के लिये नाकाफ़ी होना चाहिये"।

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  29. अपनी अपनी प्राथमिकता की बात है। कुछ लोग पैसे दे कर छपवाना चाहें, वह भी ठीक। कुछ लोग सरोगेट राइटिंग अपने नाम से करवाना चाहें, वह भी ठीक!
    पैसे से बहुत कुछ हो सकता है।

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  30. ab har koi galib ya premchand bankar nhi janm leta .......... waqt ke sath sath unke lekhan mei sudhar aata hain ... shuruwati dor mai agar unko pahchaan milti hain to achcha hi lagta hain ek motivation milta hain unko ........ baki bat apne man ki hain man kare to pay karo warna baki kai sadhan hain .................

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  31. ब्लोगिंग एक सशक्त माध्यम है अपने विचार प्रकट करने का ....किन्तु अगर कुछ पैसे देकर किताबों मे रचनाएँ छपवाई जाएँ और उससे खुदकों संतुष्टि मिले ...तो उसमे कोई हर्ज़ नहीं ...आखिर हम लिखते तो इसीलिए हैं कि कोई पढे ...

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  32. अब अपना पैसा खर्च करके किताबें छपवाने की आवश्यकता नहीं है। इंटरनेट पर "हिंदी" की अनेक साईट उपलब्ध हैं। जहाँ आप अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाते रहे और नेट पर जुड़े अपने साहित्यिक मित्रों से राय लेते रहें। जो कमियां लगें उन्हें निसंकोच दूर करें। बड़े से बड़े रचनाकार अपने दौर के अन्य रचनाकारों से सलाह मश्विरा लेते रहे हैं। मिर्ज़ा ग़ालिब भी "मोमिन" को अपना कलाम दिखवाते थे। और उन्होंने एक भी ग़ज़ल तब तक अपने दीवान में न रखी। जब तक "मोमिन" को पसंद नहीं आती थी। बकौल हाली इस बात का खुलासा उनकी किताब "यादगारे ग़ालिब" में होता है। निरंतर अभ्यास और अपने क्षेत्र के दिग्गजों को पढ़ते रहने से भी लेखन परिपक्व होता है। शरद जोशी ने नाटक तभी लिखे जब उन्होंने साल भर में १०० से ज़ियादा नाटकों की किताबें नहीं पढ़ ली।

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