सोमवार, 23 दिसंबर 2013

रोशनी है कि धुआँ ….. (3)

अब तक …
 अपने सपने की तलाश ने तेजस्वी को " वायब्रेंट मिडिया हाउस "पहुंचा दिया है।   

पत्रकारिता को अपना जूनून माने वाली तेजस्वी  को आखिर अपनी पसंद का कार्य मिल  ही गया।  घर -बाहर , आसपास उसके उत्साह पर चुनातियों के छींटे दस्तक  देने लगे हैं , ना जाने कौन -सा रंग होगा इनका .... 

अब आगे ……


कैसा रहा आज का दिन।  माँ उसका रास्ता ही देख रही थी। 
बहुत अच्छा , थकान हो रही है लेकिन अब।  
फ्रेश होकर थोड़ी देर  आराम कर लो ,  खाना बन रहा है. साथ ही  खायेंगे .  

होती  रहेंगी परीक्षाएं  … हाथ -मुंह धोकर  फ्रेश होने से काउच पर चैन से पसरते शब्द उसके कानों में गूंजते रहे। माँ  छोटी बहन मनस्वी के साथ टेबिल पर खाना लगाकर सबको बुला  रही थी। चार लोगो के छोटे से  परिवार में रात  खाना एक साथ ही करने का एक अलिखित नियम सा था। भाई   मयूर और उसके पिता भी पहुँच चुके थे डाइनिंग टेबिल तक।  

माँ , लोग बेटियों को क्यों पढ़ाते हैं , बस एक अच्छा रिश्ता मिल जाए , सिर्फ इसलिए ही। तेजस्वी के  दिन भर के अनुभव के बारे में कोई उससे पूछे, उससे पहले ही वह अपने सवाल के  साथ तैयार थी। 

मकसद यही हो , जरुरी नहीं।  मगर अच्छा रिश्ता हो जाए , यह तो सभी माता- पिता चाहते होंगे।

उसने सीमा के बारे में बताया , सीमा बीटेक  के आखिरी वर्ष में थी।  

मुझे पता है , लड़के ने भी अभी बीटेक किया है , कैम्पस सलेक्शन हो चुका  है। लड़के के माता -पिता दोनों ही सरकारी सेवा में हैं , उसकी बड़ी बहन विदेश में सैटल है।  उन्हें सीमा के आगे पढ़ने में भी कोई समस्या नहीं है।  इस रिश्ते में कोई समस्या मुझे नजर नहीं आती।  

मगर माँ , सीमा की परीक्षाएं हैं , शादी के कुछ दिन बाद ही। 

मुहूर्त नहीं था आगे का , लड़के की बहन भी अभी ही आ सकती थी विदेश से। उनके नजरिये से भी देखो। 

खाने के समय हम क्यों उलझ रहे हैं दूसरों की जिंदगियों से। तुम बताओ , सब ठीक रहा आज। पिता ने हस्तक्षेप करते हुए बात को बहस में बदलने से रोका  . खाना खाते हुए वे दिन  भर  के कार्यकलापों पर बातचीत करते रहे। 

दिन पर दिन गुजरते  रहे।  आलिया  के साथ उसके साथियों की मीटिंग होती , लक्ष्य निर्धारित होते   .  स्त्रियों की शिक्षा व  सुरक्षा से सम्बधित योजनाओं और कानून की जानकारी एकत्रित करने के लिए स्त्रियों से जुड़े कई समाजसेवी संगठनों से मिलना , विभिन्न आंकड़े एकत्रित करना , साक्षात्कार लेना  ,रिपोर्ट तैयार करना ,  उनको आलेख अथवा समाचार में बदलना , कार्य के ढेर में ढेर होते तेजस्वी अपने कार्य में प्रवीण होती जा रही थी। 

अपने कार्य के प्रति समर्पित तेजस्वी  अपने अन्य साथियों के मुकाबले विनम्र और हंसमुख होने के कारण सभी से घुली मिली रहती। आलिया का उस पर यकीन  बढ़ता  जाता था।  एक दिन आलिया ने उसे केबिन में बुलाकर शक्ति  सदन की रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा। शक्ति  सदन के फाउंडर ,सदस्यों ,  प्रताड़ित स्त्रियों की कानूनी सहायता करने , उन्हें आवास उपलब्ध कराने , आर्थिक मदद हेतु कार्य की व्यवस्था , कार्य निष्पादन मूल्यांकन  करने तथा उनसे सम्बंधित विभिन्न आंकड़े जुटाने थे.  इस कार्य के विस्तार और समय के तकादे के मद्देनजर आलियां ने तेजस्वी को एक और साथी को इस प्रोजेक्ट से जोड़ लेने के निर्देश भी दिए। 

सिमरन प्रशिक्षण अवधि में उसकी  साथी थी।   उनकी अच्छी मित्रता भी  हो चली  थी. तेजस्वी ने इस कार्य के लिए सिमरन के नाम की सिफारिश की। एक ही साथ कार्य करते दोनों आपस के अनुभव बांटती। जब -तब सिमरन उसके पास आ कर बैठ जाती और विभिन्न विभागों के हर व्यक्ति से जुडी ख़बरें सुनाती रहती।  पता नहीं वह इतनी सूचनाएं कहाँ से जुटाती थी। काम के बीच सर जुड़ाए खुसर- पुसर करते ,  देख दूसरे साथी बहुत चिढ़ते कि आखिर  ये यहाँ क्या करने आई हैं  मगर सिमरन पर कुछ असर न होता। 
कार्य के बीच चर्चा , विमर्श के दौरान जब भी वे लोग अन्य साथियों के साथ होते ,  सिमरन तेजस्वी की प्रशंसा ही करती  नजर आती।    तुम कितनी सुन्दर हो , तुम लिखती कितना अच्छा हो , .कितनी मेहनती  हो।  तेजस्वी विनम्रता से अपनी प्रशंसा सुनते हुए थोडा सकुचाती .  वह कई बार दबी जुबान में उसे मना  भी करती। 

अब सिमरन और तेजस्वी को अपने इस कार्य की रिपोर्ट वायब्रेंट  मिडिया हाउस  की विभागीय प्रभारी सुचित्रा को देनी थी।  स्त्रियों से जुड़े  सभी विषयों को  सुचित्रा ही देखती थी।  आलिया  से बिलकुल विपरीत  सुचित्रा अत्यंत सख्त मिजाज थी। अपने विषय में निष्णात सुमित्रा को  स्त्री इनसायक्लोपीडीया भी कहा जाता था।  तेजस्वी नोट करती कि उनके चेहरे पर एक मुस्कराहट भी अतिरिक्त नहीं होती थी , बल्कि शायद उसने उन्हें कभी मुस्कुराते हुए भी नहीं देखा था।  स्त्रियों से जुडी शिकायतों में वे हमेशा स्त्री के पक्ष में ही रहती।  इस मामले में उन्हें जरा भी लापरवाही पसंद नहीं थी। यदि किसी भी रिपोर्ट में स्त्री पर  आरोप सही  साबित होने की स्थिति में होता  , तब वे उस पर गहन  छानबीन करती ,कई फेरबदल करवाती  , यहाँ तक कि कई बार रिपोर्ट ख़ारिज ही कर देती।


कानून की अवधारणा की तर्ज पर ही उनका अजेंडा था कि कई दोषी स्त्रियां बच निकलें तो कोई बात नहीं , मगर एक भी निर्दोष स्त्री  उपेक्षा अथवा  गलतबयानी की शिकार न हो। उनके स्त्रियों  से जुड़े मामलों पर  अतिवादी रुख तथा  तीव्र प्रतिक्रिया से  आतंकित पुरुष साथी घबराये से रहते। उनके सौंपे गए कार्य  जल्दी से निपटाकर भागने की कोशिश में रहते। पीठ पीछे लोग उन्हें हिटलर अथवा कुंठित स्त्री का खिताब देते नजर आते , यहाँ तक कि  सिमरन भी अन्य साथियों के साथ मिलकर अक्सर सुचित्रा का उपहास करती   हालाँकि उनके सामने कुछ कहने की हिम्मत किसी में भी नहीं होती थी।  कभी -कभी इस छींटाकशी से   तेजस्वी व्यथित भी होती। वह मानती  थी  कि  उनके इस रूखे व्यवहार के पीछे कुछ तो गम्भीर वजह अवश्य रही होगी।

एक दिन अपने केबिन में उन्हें अकेला पाकर उनके सामने की कुर्सी पर डट गयी।  
सुचित्रा का रुखा सा प्रश्न  था - कुछ काम था मुझसे !
नहीं , बस यूँ ही। आपको अकेले देखा तो बात करने की इच्छा हुई।

 मन में सोच रही थी तेजस्वी कि सख्त मिजाज लोगों के आँखों पर चश्मा ना हो तो उनका सामना बड़ा मुश्किल  हो जाता है।

क्यों , आज तुम्हे कोई काम नहीं है! 
थोडा ही बाकी है। क्या आप कभी हंसती मुस्कुराती नहीं है !
उनके रूखेपन को नजरअंदाज करते हुए तेजस्वी ने कहा।

मैं ऑफिस काम करने के लिए आती हूँ ,  यह कोई मनोरंजन का स्थान नहीं है , जहाँ हंसी -मजाक  कर दिल बहलाया जाए। 
नहीं … मतलब काम तो किया जाना चाहिए … मगर  … बस ऐसे ही … आपको कभी हँसते नहीं देखा … बस इसलिए ही  … अटकते ,झिझकते , डरते तेजस्वी ने कह ही दिया।

अपने काम से काम रखने की सलाह देने की मंशा रखते हुए  सुचित्रा ने एक बार गम्भीर मुद्रा में उसकी ओर  देखा। मगर तेजस्वी के भोले सहमे चेहरे और कागज-पेन  को हाथ में पकड़कर भागने की मुद्रा में देख  रोकते रुकते भी सुचित्रा के मुख पर हलकी-सी मुस्कान आ ही गयी। 

अरे बाबा , मैं हंसती भी हूँ और मुस्कुराती  भी हूँ , मगर उचित कारणो से ही।  बेवजह हंसी -दिल्लगी में मेरी कोई रूचि नहीं है।  तुम्हारी रिपोर्ट कहाँ तक पहुंची , तुम्हे पता है न मुझे काम समय पर चाहिए।

जी , रिपोर्ट लगभग पूरी हो चुकी है , कुछ थोडा- सा कार्य ही अभी बाकी है।

सुचित्रा के रूखे रौबीले व्यवहार से थोडा आहत होते हुए  तेजस्वी को सुखद अनुभूति भी हुई। उसने सुचित्रा को मुस्कुराते हुए देखा  और आँखों में छिपी कही स्नेह की छाया भी अवतरित हुई।

विरोधाभास मूलतः इंसानी प्रवृति ही नहीं , प्रकृति में ही निहित है. बर्फ से ढकी चादर से ढका है गुनगुने पानी का अस्तित्व , नारियल के सख्त आवरण में है सफ़ेद झख मुलायम गिरी , कछुए के कड़े खोल में छिपा है एक नरम वजूद ।  सुचित्रा  और तेजस्वी भी इसी विरोधाभाषी व्यक्तित्व अथवा अनुभूति की प्रतीक दिख पड़ी।

अगले दिन तेजस्वी ऑफिस में पहुंची तो फिजां में तनाव साफ़ नजर आ रहा था। सुचित्रा आज समय से पहले ऑफिस में मौजूद थी।  फक्क पड़े कुछ चेहरों को देखते डेस्क तक पहुची तेजस्वी तो सिमरन   दोनों हाथ बांधे विचारमग्न मुद्रा में खड़ी नजर आई.

मैं यह ऑफिस छोड़ रही हूँ।  
क्यों , क्या हुआ , ऐसे अचानक , तेजस्वी परेशान थी। 
कारण तो तू  सुचित्रा से ही पूछ लेना  , बस तुझे विदा कहने को ही रुकी थी। मुझे जल्दी ही कहीं जाना है।  तेजस्वी की किसी भी प्रतिक्रिया का  इन्तजार किये  बगैर ही सिमरन तीर की तरह दरवाजे से बाहर निकल गयी।

अगले ही पल तेजस्वी सुचित्रा के केबिन में थी। 
मैम , सिमरन ऑफिस छोड़ कर जा रही है , ऐसा क्या हुआ। उसके चेहरे पर उलझन , खिन्नता , परेशानी स्पष्ट पढ़ी जा सकती थी। 
सुचित्रा ने अपनी उसी सख्त रौबदार मुद्रा में उसे बैठने का इशारा करते हुए एक कागज उसके सामने  बढ़ा दिया। 
हलकी सी सिहरन के साथ कागज़ सँभालते तेजस्वी की आँखें तरल हो आई थी।  वह कागज सिमरन के "सुकेत  एक्टिविस्ट" होने की पुष्टि कर रहा था।

क्या तुम्हे पता नहीं है , इस ग्रुप से सम्बन्ध रखने वाले किसी व्यक्ति को हम अपने विभाग में नियुक्ति नहीं दे सकते हैं। यह एक्टिविस्ट ग्रुप हमारे प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मिडिया कम्पनी का ही एक हिस्सा है।

मुझे इस सम्बन्ध  में कोई जानकारी नहीं है, जैसा कि आप जानती है यह  मेरा पहला कार्य ही है।

जिसे किसी प्रोजेक्ट में आप साथ लेते हैं , मित्र बनाते हैं , उसकी जानकारी तो आपको होनी चाहिए। सञ्चालन दृष्टि से दृश्य -श्रव्य माध्यम किसी भी तरह कॉर्पोरेट संस्था से भिन्न नहीं है,  यहाँ भी उतनी ही सतर्कता आवश्यक है।  तुम्हे इसका ध्यान रखना चाहिए था।

सुचित्रा के कमरे से निकलते तेजस्वी अनमयस्क सी थी।  उसने फ़ोन मिलाया सिमरन को ," तूने अपने एक्टिविस्ट होने की बात मुझसे क्यूँ छिपाई। 
मैंने कुछ नहीं छिपाया , मुझे स्वयं ही नहीं पता कि कब उन्होंने मुझे सदस्य बना लिया . मैं मना  कर पाती , इससे पहले ही मेरा नाम सार्वजानिक कर  दिया गया। चल , मैं तुझसे बाद में बात करती हूँ।  
सिमरन ने  बड़ी बेरुखी से अपनी बात समाप्त करते हुए फोन काट दिया।

तेजस्वी अचानक हुए इस घटनाक्रम से बुरी तरह परेशान थी।  शक्ति सदन की उसकी रिपोर्ट भी अधूरी पड़ी थी , उससे सम्बधित  सामग्री भी सिमरन के पास ही थी। उसका किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था। बेखयाली में दो- तीन दिन गुजर गए , मगर उसका कार्य पूरा नहीं था।  अनुशासन की पाबंद सुचित्रा समय में लापरवाही और छूट बर्दाश्त नहीं कर सकती थी, उसने तेजस्वी को इस प्रोजेक्ट  से अलग कर दिया।
अपने पहले बड़े प्रोजेक्ट को अधूरा छोड़ने की कसक तेजस्वी के चेहरे और  कार्यशैली पर स्पष्ट नजर आती थी।  मगर आलिया का व्यवहार अब भी उसके साथ स्नेहपूर्ण ही था। आलिया के निर्देशानुसार अब उसे भारतीय संस्कृति, परंपरा  ,व्रत- त्योहार जैसे विषय पर कार्य प्रारम्भ करना था मगर तेजस्वी का उत्साह क्षीण हो चुका  था।
 कई बार  स्वयं को समझाती तेजस्वी अपने कार्य में मन लगाने का भरपूर प्रयास करती। समय अपनी रफ़्तार से बीतता ही है , मनःस्थिति किस प्रकार  की भी हो। 

 कुछ समय बीते  एक दिन सुचित्रा के केबिन के आगे से गुजरते चिरपरिचित आवाज ने उसके क़दमों को रोक लिया।  केबिन में  झाँक कर देखा तो उसकी हैरानी और ख़ुशी का  ठिकाना न था।  सुचित्रा के सामने कुर्सी पर बैठी सिमरन बहुत बेतकल्लुफी से आपस में विमर्श कर रही थी। उसने दोनों को टोका नहीं और अपनी सीट पर लौट आई।
 उस दिन के  बाद सिमरन से उसकी बात भी नहीं हो पाई थी।    उसे  पूरा यकीन था कि सिमरन तेजस्वी से मिलकर ही  जायेगी , बल्कि तेजस्वी को गहन उत्सुकता थी कि नाराजगी में संस्थान छोड़ने वाली सिमरन को सुचित्रा से आखिर क्या काम रहा होगा। सिमरन का इन्तजार करते अपने काम से फारिग होकर नजरें उठाई  तो अचानक ही सामने से अनजान बन कर गुजरती सिमरन पर उसकी नजर पड़  गई। उसने पीछे से पुकारा भी मगर जाने उसकी आवाज सिमरन के कान तक नहीं पहुंची अथवा उसने जानबूझकर नहीं सुना।

 तेजस्वी देर तक  अजीबोगरीब व्यवहार पर  सोचती रही मगर उसे कोई  सिरा नजर नहीं आया।  उसने सर झटक कर कई बार स्वयं को समझाया शायद  जल्दी में रही होगी , कोई आवश्यक कार्य रहा होगा , सोचते उसका सिर  भारी हो गया।

इसी उधेड़बुन के बीच घर पहुंची  तो माँ सजी- धजी सीमा की  मेहंदी और  महिला संगीत में जाने के लिए तैयार उसका इन्तजार कर रही थी।

19 टिप्‍पणियां:

  1. प्रकृति सदा ही ऐसी परिस्थितियाँ रखती है कि हमें कुछ सोचना पड़ता है, कुछ खोना पड़ता है, कुछ पाना पड़ता है।

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  2. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार २४/१२/१३ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी,आपका वहाँ हार्दिक स्वागत है।

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  3. कहानी का प्रवाह .... और सुमित्रा,तेजस्वी के मध्य मेरी सोच -
    जो व्यक्ति गम्भीरता में तथ्य देख ले,आगे बढ़ते क़दमों के साथ डर मिश्रित साहस भी देख ले - उसकी दृष्टि अचूक है और समाज के विभिन्न पहलुओं पर वह बखूबी अपनी अभिव्यक्ति दे सकता है
    जैसे तुम !!!

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  4. कब कौन मित्र और मित्र अनजान बन जाए ..... ज़िन्दगी में ऐसे अनुभव अक्सर होते हैं .... रोचक कहानी ....

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  5. धाराप्रवाह रोचक कहानी...

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  6. जाने अनजाने रिश्तों के बीच उलझी तेजस्वी की रोचक आत्मकथा ... अखरता है तो बस इंतज़ार अगली कड़ी का ...

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  7. दिल से लिखी सुंदर कहानी...आगे का इंतज़ार ..

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  8. यह उपन्यासिका नारी मन के और गह्वरों को प्रकाशित करे यही उत्कंठा है!

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  9. इसके पहले के अंश नहीं पढ़ पायी थी .... अब तो इतनी प्रलोभन हो रहा है जाती हूँ बाकी भी पढ़ने :)

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  10. कहाँ ले जाकर रोका है अब तो अगली किश्त जल्दी लगाना

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  11. मैं, भी ... अब पहले के अंश ढूँढने पड़ेंगे !!

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  12. एक ही साँस में तीनो किश्त पढ़ गई ले किन फिर इतजार ?बहुत सरे विषयो को साथ लेकर चल रही है अतयंत रोचक कहानी।

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  13. रोचक चल रही है कहानी ,
    लड़की चाहे कितना पढ़-लिख जाएँ , नौकरी करे.....माता-पिता की बस यही चिंता रहती है कि अब बस उसका घर बस जाए .
    सिमरन के इस अजनबी व्यवहार के राज का इंतज़ार पाठकों को भी है .
    जल्दी से अगली कड़ी पोस्ट करो .

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