शनिवार, 19 अप्रैल 2014

रोशनी है कि धुआँ..... (7)





तेजस्वी के जेहन में कौंधी माँ की शंका जो उन्होंने सीमा की सगाई के समय व्यक्त की थी ," तुम्हे सीमा के ससुर का स्वभाव कैसा लगा ". सीमा कहते हुए कुछ देर के लिए रुकी थी और तेजस्वी सोच रही थी ये माताएं सचमुच अंतर्ज्ञानी होती है . बचपन में उनसे छिप कर की जाने वाली शरारतें भी वे झट से ताड़ लेती थी , किचन में से आवाज लगा लेती , तुम लोग सोफे पर क्यों उछल रहे हो , दूध का वेशिन में उड़ेल दिया न . बच्चे हर बार हैरान हो जाते , माँ , आप एक साथ क्या- क्या कर लेती हो , आपको सब कैसे पता चल जाता है . ममता से भरी माँ मुस्कुराती , बच्चों के जन्म के समय ईश्वर माँ की पीठ पर भी आँख उगा देते हैं और चार अदृश्य हाथ भी देते हैं . कुछ भी शरारत करते उन्हें याद रहता कि  माँ की पीठ पर लगी आँखें उन्हें देख रही है .

सीमा की आवाज जैसे किसी अंधे कुंए से आ रही थी . उसे ससुराल में अजीब सा भय लगने लगा था हालाँकि वह अपने आप को समझाती कि कही उसका भ्रम तो नहीं रहा , कही उनके स्नेह को उसने गलत अर्थ तो नहीं दिया.  यदि ऐसा हुआ तो कितना बड़ा पाप अपने सर पर ले रही है वह , हर समय कशमकश अथवा अपराधबोध  में घिरी रहती .. एक दिन बेडरूम से अटैच्ड बाथरूम से बाहर निकल बेध्यानी में साड़ी पहनते जब उसकी नजर दरवाजे पर गयी तो उढ़के दरवाजे के पास एक साया सा नजर आया . वह धीमे चलते कमरे से निकल कर किचन तक आई तो फ्रिज में ठन्डे पानी की बोतल निकलते उसके ससुर सास से चाय बनाने की फरमाईश करते नजर आये . वह घबराई पसीने से भरी उलटे पैरों  कमरे तक पहुंची और अनुमान लगाती रही कि उसके कमरे के सामने से होकर रसोई तक जाने में कितना समय लगता लगेगा!

 एक बार फिर उसने डरते हुए भी  स्वयम को धिक्कारा , नहीं , इस तरह की शंका फिजूल है . मगर मन में बैठे भय ने कमरे में रहते उसे दरवाजे की सांकल बंद रखने को मजबूर कर दिया , यदि दरवाजा खुला रहता तो हर समय सावधान रहने की उसकी कोशिश न उसे सोने देती , न ही किसी काम में मन लगा पाती . अपने मन की शंका को अपने साये तक से भी छिपा कर रखना और अपनी संभावित गलत दृष्टि के अपराधबोध  और चिंता में डूबे उसका स्वास्थ्य गिरता जाता था . आँखों के नीचे काले घेरे होने लगे . सीमा अपनी स्थिति का बयान किसी से नही कर सकती थी . घर में काम करते हर समय घबराए ,चौकस रहते उससे काम में गलतियाँ होती जाती , कभी कप गिलास टूट जांते, रसोई से डायनिंग टेबल तक लाते खाने के डोंगे गिर जाते , डोर बेल बजने पर हर प्रकार से निश्चिन्त होने पर ही खोलने की उसकी आदत , घर में अकेले न  रहने का इसरार , सास अब उससे नाराज रहने लगी थी .
छुट्टियों में कुछ दिनों के लिए सौरभ के घर आने से उसे कुछ राहत मिली क्योंकि वह ज्यादा समय घर में ही बिताता था. इस बार उसके व्यवहार में कुछ परिवर्तन भी था , देर से सही , कुछ खुशियाँ उसके हिस्से में आई तो . मगर जब छुट्टियों के बाद वह वापस काम पर जाने लगा तो सीमा ने उसके अच्छे मूड को ध्यान में रख कर अपनी पढाई मायके में रहकर पूरी करने की इच्छा प्रकट कर दी .
सौरभ इस पर सहमत नहीं था . उसके जाने के बाद मम्मी पापा के अकेले रह जाने की चिंता के साथ ही उनके बुरे मान जाने का भय भी था ,  फिर भी कुछ दिनों के अंतराल पर मायके आने जाने और रहने की स्वीकृति देते हुए उसने अपने माता पिता को भी सूचित किया . सास यह सुनकर थोड़ी नाराज हुई , क्या तकलीफ है यहाँ इसे , अपना कमरा , अपना घर , कोई पाबंदी नहीं . लोग सवाल भी करेंगे , मगर सौरभ ने नई ब्याहता पत्नी के बिगड़ते स्वास्थ्य और अनुरोध की लाज रखते हुए माँ को मना ही लिया . सौरभ के जाने के बाद कुछ दिनों के लिए सीमा मायके रह आई . दाम्पत्य प्रेम की आभा, दुश्चिंताओं से मुक्ति और आराम , उसके चेहरे पर पुरानी रंगत लौट आने लगी थी .
एक सप्ताह बात पुनः लौटी ससुराल तो सास ,ससुर दोनों ही चहक उठे .
सुनती हो , इसकी नजर उतार देना , और खूबसूरत हो आई हमारी बहू तो , उसके ससुर अपनी पत्नी को सम्बोधित कर रहे थे. सास स्नेह से मुस्कुराई  मगर सीमा के चेहरे पर भय और सकुचाहट एक साथ उजागर हो आई .
दुश्चिंता और शक एक बार मन में घर कर जाए तो .व्यक्ति की सोच घडी की सूई की उलटी दिशा में चल देती है , हर कथन अथवा कार्य अपने विपरीत अर्थ में भाषित हो मानसिक कष्ट देता प्रतीत होता है . कही दोष उसकी सोच का ही हो , सीमा स्वयं को यह समझा साहस बटोर लाती .
एक बरसात के दिन सीमा कॉलेज से लौटी . रेनकोट और हेलमेट ने उसे पूरा गीला होने से तो बचा लिया था मगर फुहार ने मन का मौसम सीला कर दिया था . अपनी मस्ती में गुनगुनाते अपने कमरे की ओर बढ़ते उसके कदम ठिठक से गए .
आज फिर उसके श्वसुर घर पर ही थे . झिझकते हुए उसने पूछ ही लिया , आप अभी घर पर कैसे . ऑफिस के काम से शहर से बाहर जाना है , पैकिंग के लिए जल्दी आना पड़ा . तुम थोड़ी देर आराम कर लो , फिर मदद कर देना .
मदद के नाम से सीमा की सिट्टी पिट्टी गुम थी . वह कमरे में गयी और तेजी से दरवाजा बंद कर लिया  . गीले कपडे तक बदलने की इच्छा नहीं हुई उसकी . घबराई सी बैठी थी वह कि कब वे उसे पुकार ले , क्या कहकर वह कमरे से बाहर आने से मना करेगी , यही सोचती डरती सिमटी बैठी रही . कुछ देर में अपने दरवाजे पर खटखट की आवाज़ से तीव्र हुई उसकी धडकनों के कारण पैरों तक ने जैसे उसका साथ छोड़ दिया . उसने दबे पाँव दरवाजे और खिड़की की सांकल अच्छी तरह चेक की और आँखें बंद कर लेटने का नाटक करने लगी . एक दो बार की खटखट के बाद दरवाजे पर आहट बंद हो गयी और सोने का नाटक करते जाने उसकी आँख कब लग गयी, उसे पता ही नहीं चला  .
नींद खुलने पर उसने देखा खिड़की से बाहर ,शाम का धुंधलका छाने लगा था . ओह , कितनी देर सोती ही रह गयी , साथ ही उसे अपना भय भी फिर से याद आने लगा .
नींद भी क्या अजब शै है. बड़े से बड़ा दुःख और भय नींद में महसूस नहीं होते , ऐसे समय में नींद आ जाना राहत देता है तन मन दोनों को , दुःख के हाथो कलेजे फटने से रह जाते है उनके जिन्हें नींद आ सकती हो , चिंता , आशंकाओ से घिरे भी नींद आ ही जाती है , मानव प्रजाति के लिए प्रकृति की यह महत्वपूर्ण देन है .

धीमे से द्वार खोल देखा उसने , किचन से खटर पटर आती आवाज ने उसे आश्वस्त किया कि सासू माँ लौट आई थी घर . कॉलेज से आकर भूखे ही सो गयी थी , भूख भी सताने लगी थी अब उसे , वह रसोई की ओर बढ़ गयी . सास के चेहरे पर नाराजगी साफ़ झलक रही थी , ऐसे भी क्या घोड़े बेच कर सोना आता है तुम्हे , घर में कोई आये कोई जाए , किसी से कोई मतलब नहीं . पापा ने कहा भी था मदद करने को मगर तुम अनसुनी कर जाकर सो गयी , ये क्या तरीका है . क्या कर रही थी तुम इतनी देर !
मुझे अकेले घर में डर लगता है .
अकेले कहाँ थी तुम , तुम्हारे ससुर थे न घर में . और अपने घर में किससे डर लगता है ! तुम्हे अपने मायके में डर नहीं लगता था कभी !
वह आगे कुछ न कह सकी , बस पैर से जमीन कुरेदती सी चुपचाप खड़ी रही . उन्होंने सीमा से यह पूछना भी उचित नहीं समझा कि उसने खाना खाया या नहीं . पेट में कुलबुलाते चूहों की अनदेखी कर वह रसोई में सास का हाथ बंटाने लगी . मगर अच्छा यह रहा कि दो तीन दिन के लिए उसे भय से राहत मिल गयी थी .

सप्ताहांत का दिन उसके लिए मनहूस होने वाला था, उसने सोचा नहीं होगा . कॉलेज से लौटी ड्राइंगरूम में टीवी देखते सोफे पर ही  लेटी सीमा को नींद आ गयी थी . मेनगेट का दरवाजा कब खुला , कौन अन्दर दाखिल हुआ उसे कुछ खबर ही नहीं रही . गालों पर कुछ सरसराहट से चौंक कर उसकी नींद खुली तो स्तब्ध सीमा को कुछ सोचने में भी वक्त लगा . सोफे पर उसके करीब कोई बैठा था जिसकी गोद में उसका सर था. घबराकर तेजी से उठते हुए वह स्वयं से बहुत नाराज थी , इतनी निश्चिंतता से वह सो कैसे सकती थी . स्थिति समझ में आते ही अपना आपा खोकर उसकी चीख निकल पड़ी  , आप यहाँ क्या कर रहे हैं , दरवाजा बंद था,  भीतर कैसे आये .
चाबी थी मेरे पास , बेल की आवाज पर किसी ने दरवाजा नहीं खोला तो लॉक खोलकर अन्दर आ गया , मगर तुम इतना घबरा क्यों गयी . तुम्हे सोते देख उठाना उचित नहीं समझा . तुम आराम करो .
अपना बैग उठाकर वे अन्दर चले गए. मगर सीमा के लिए अब इस स्थिति में उस घर में अकेले रहना संभव नहीं था . हर समय भय के साये में रहना उसे मानसिक रूप से थका रहा था . उसी शाम सौरभ भी लौटा . मगर सीमा को समझ नहीं आ रहा था कि किस प्रकार वह अपना भय सौरभ के आगे प्रकट करे . यदि उनसे उस पर विश्वास नहीं किया , यदि उसका भय भी बेबुनियाद रहा , भ्रम रहा हो तो वह स्वयं से कैसे नजरें मिलाएगी . मन को मजबूत कर उसने सिर्फ सौरभ से अपने मायके में या उसके साथ ही जाने की बात की तो सौरभ का सौम्य दिखने वाला चेहरा गुस्से से तमतमा उठा .
क्या मतलब है तुम्हारा , क्यों जाना है तुम्हे मायके रहने या मेरे साथ . यही रहना होगा तुम्हे मेरे मम्मी पापा के साथ . क्या परेशानी है तुम्हे यहाँ ! सौरभ के तेज चीखने की आवाज सुन उसके माता पिता भी वहीँ आ गए थे . एकांत में कही अपनी बात  पर तेज चीख कर हंगामा करते देख सीमा अपमान और ग्लानि से भर  उठी .
क्या बात है सौरभ , इतना क्यों चीख रहे हो , क्या हुआ .
कुछ नहीं माँ , ये अपने मायके रहना चाहती है या मेरे साथ .
सौरभ की माँ को बुरा लगाना स्वाभाविक था . थोड़ी नाराजगी भरे शब्दों में वे बोली ,  घर में कुल तीन प्राणी है , काम का कोई दबाव नहीं है , कॉलेज जाने की छूट है , पूछो इससे ये फिर भी ये ऐसा चाहती है .
हाँ , बताओ क्या परेशानी है तुम्हे यहाँ . क्या कहती सीमा.
परेशानी कुछ नहीं है  , मैं आपके साथ रहना चाहती हूँ.

सौरभ की माँ दुःख और क्षोभ में भर उठी , इतने चाव से बहू लेकर आये थे , मगर पता नहीं था कि उसे हमारी आवश्यकता नहीं , वह हमारे साथ नहीं रहना चाहेगी . कुछ महीनो की ही गृहस्थी हुई है अभी और इनके अलग रहने के ख्वाब जाग उठे हैं . उनकी आँखों से बहते आंसूं ने सीमा को अपराधबोध से भर दिया . विवाह से पहले सौरभ के माता- पिता के व्यवहार से प्रभावित सीमा ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उसे इन परिस्थितियों का सामना करना होगा . अपने छोटे से घर में अपने पति और उसके माता -पिता के साथ रह उनकी खुशियों और दुखों को जीना और साझा करना ही ध्येय समझा था उसने . मगर अब हर समय इस भय के साये में सौरभ के बिना उसका उस घर में रहना असंभव था . सौरभ के मना करने के बावजूद उसके जाने के बाद अपना बैग उठाकर वह मायके चली आई थी . सौरभ को यह पता चला तो वह सीमा को फ़ोन कर उसने अपनी नाराजगी प्रकट की  और कभी घर वापस न लौटने का फरमान सुना दिया था .
उधर सौरभ को  बहुराष्ट्रीय कम्पनी में कार्य करने के प्रयास में अंततः दुबई में नौकरी मिल गयी थी . दुबई जाने की तैयारियों के लिए हालंकि वह कुछ दिन के लिए अपने शहर आया मगर सीमा से मिलने या उसको बुलाने की कोई कोशिश नहीं की . सीमा को इस खबर का पता उसके किसी मित्र से तब पता चला जब वह दुबई जा चुका था .
सौरभ के बिना उसे ससुराल जाना मंजूर नहीं था और उसके दुबई चले जाने के बाद वैसे भी उसके रास्ते बंद हो चुके थे . मिसेज वालिया ने सीमा को समझाने की बहुत कोशिश की कि उसे ससुराल में रहना चाहिए , अपने सास ससुर के साथ , मगर सीमा के लिए नहीं जाने का कारण बताना इतना आसान नहीं था . बेटी की जिद के आगे मजबूर उन्होंने एक दो बार उसके सास ससुर से मिलकर बात करने की कोशिश की , मगर वे इसे पति -पत्नी के बीच का मामला बताकर दूर हो गए . अब जो भी बातचीत हो सकती थी , वह सौरभ के दुबई से लौटने पर ही संभव थी . सौरभ के लौटने का इन्तजार करते सीमा ने अपनी पढाई पर पूरा ध्यान केन्द्रित किया ,  फाइनल सेमेस्टर की तैयारी में उसने रात दिन एक कर दिए .

क्रमशः .... अपने भय से मुक्ति पाने के लिए  लिए सीमा के उठाये कदम उसके लिए कितने घातक होंगे , वह स्वयं नहीं जानती थी , कौन उसके साथ होंगा , कौन नहीं !

चित्र गूगल से साभार ....

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार (20-04-2014) को ''शब्दों के बहाव में'' (चर्चा मंच-1588) में अद्यतन लिंक पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. ऐसे हालातों में जब अपने ही साथ छोड़ देते हैं लड़ाई बड़ी मुश्किल हो जाती है ......

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  3. चलती हुई गाड़ी के सामने फिर से स्पीडब्रेकर..!
    आभार।

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  4. जहाँ ज्यादा गुड़ होता है वहीँ चींटियाँ आती हैं वैसे भी हर स्त्री की छटी इन्द्रिय उसे पहले ही सचेत कराती रहती है लेकिन बिना सबूत के सीमा सौरभ से कुछ कह भी नहीं सकती थी यह उसकी विवशता थी । अपनों से ही लड़ाई ऐसी स्थिति में दुष्कर हो जाती है । देखते हैं कि तेजस्वी क्या कर पाती है .....

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  5. मैं मूक हूँ
    देखा है ऐसा आदमी
    शब्द नहीं दे सकती

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  6. एक लड़ाई की शुरुआत।। उसे अकेले ही लड़ना होगा शायद।
    @बच्चों के जन्म के समय ईश्वर माँ की पीठ पर भी आँख उगा देते हैं ... Best :)

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  7. आने वाले खतरे को सीमा शायद समझने लगी थी ... पर भविष्य में क्या लिखा है ये कौन जानता है ...
    कहानी रोचक होती जा रही है ...

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  8. पहले की सारी कड़ियाँ पढ़े बिना टिप्पणी करना मुझे अनुचित लग रहा था ! अभी सारी कहानी आरम्भ से पढ़ी है और विश्वास के साथ कह सकती हूँ कि आप अपनी लेखनी के पाश से पाठकों को अभिमंत्रित कर लेने की अद्भुत क्षमता रखती हैं ! कहानी मन मस्तिष्क को मथ रही है ! अपने ही घर परिवार में इस तरह नारी का शोषण अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है ! अगली कड़ी की प्रतीक्षा उत्सुकता के साथ रहेगी !

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  9. ओह ! मन भारी हो गया पढ़कर ...ऐसी घटनाएं अनसुनी तो नहीं हैं ,पर हम कान बंद कर लेते हैं .
    अगली कड़ी की प्रतीक्षा .

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  10. ऐसा भी होता है। रक्षक ही भक्षक बनें और सुनने वाला कोई ना हो तो कैसे और क्या करे कोई।

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