गुरुवार, 4 जुलाई 2019

जिन खोजा तिन पाईंयाँ....


स्कूल से आते ही बैग पटक दिया काया ने. मोजे कहीं, जूते कहीं . बड़बड़ाती माला ने सब चीजें ठिकाने रखीं और बैग से निकाल कर डायरी देखने लगी.
क्लास टीचर ने पैरेंट्स को मिलने का नोट डाला था. सिहर गई एकबारगी माला.
ओह! अब क्या गलती हुई होगी!
पिछले कुछ समय से स्कूल से आने वाली  शिकायतें उसे परेशान कर रही थी. अभी पिछले हफ्ते ही तो कॉपी किताबों के कवर फटे होने की शिकायत करते हुए कक्षा अध्यापिका ने बहुत भला बुरा कहा था उसे. शिकायतें सुनने उसके सामने अपराधी - सा उसे ही खड़ा रहना होता था. शेखर ऐसे समय में पीछा छुड़ा लेते किसी तरह.
तुम ही जाकर सामना करो. पता नहीं आजकल ध्यान कहाँ रहता है तुम्हारा. बच्ची पढ़ने में पिछड़ रही . न उनकी यूनिफॉर्म का ध्यान रहता है , न पढ़ने लिखने का . मैं दिन भर ऑफिस में काम करने के बाद क्या -क्या सँभालूँ?

माला को शेखर पर गुस्सा भी नहीं आता. वाकई लापरवाही उससे हो ही रही थी.

अभी पिछले महीने ही काया का रिजल्ट लेने जाने की तारीख भूल गई थी. असावधानीवश उसे एक दिन बाद की तारीख ध्यान में रही. दूसरे दिन स्कूल में भीड़भाड़ कम होने पर उसे शक तो हुआ मगर आ गये थे तो मिलना भी जरूरी है.  कक्षा अध्यापिका ने रिजल्ट देने से साफ मना कर दिया था. आखिरकार शेखर ने ही माफी माँगते हुए फिर कभी ऐसी गलती नहीं होने का आश्वासन दिया तब जाकर  उन्होंने चेतावनी देते हुए मार्कशीट सौंपी थी.  स्वयं की गलती के कारण शेखर को माफी माँगते देख माला ने जाने कितनी बार मन ही मन स्वयं को धिक्कारा होगा. पति पत्नी में आपस में कितनी भी नाराजगी और लड़ाई झगड़े होते हों  मगर किसी अन्य का अपने सामने ही पति को बुरा भला कहना माला सहन नहीं कर पाती. यह प्रेम था या संस्कार , माला इस पर पर्याप्त बहस भी मन ही मन कर लेती .

उस दिन रास्ते भर अपने गुस्से पर काबू रखते शेखर घर आते ही माला पर फट पड़ा.
क्या करती रहती हो दिन भर. अगली बार से मैं स्कूल हरगिज नहीं जाऊँगा. खुद ही संभालो यह सब.

मैं क्या करूँ. मैंने देखी तो थी डायरी. पता नहीं कैसे गलत तारीख ध्यान में रही. माला की शर्मिंदगी आँखों से गंगा जमना बन बह निकली.

इन आँसुओं से परेशान हो गया हूँ मैं. कितना समझाऊँ रोना बंद करो. घर में, बच्चे में मन लगाओ पर तुम समझती ही नहीं.
शेखर ने माला का हाथ पकड़ कर उसे करीब बैठा लिया. थोड़ी सी सहानुभूति और ढ़ेर सारे प्यार ने जैसे आँखों के बाँध को तोड़ कर रख दिया हो. हिचकियों सहित तेज हुई उसकी रूलाई से काया सहम कर पिता से लिपट गई.

मैं क्या करूँ. नहीं भूल पाती पिता को. किस तरह अपने पैरों से चलकर अस्पताल की सीढ़ियां चढ़ कर गये फिर  निढ़ाल हो गये. ऐसा कैसे हुआ. आपने कुछ क्यों नहीं किया. मैं कुछ क्यों नहीं कर पाई पापा के लिए...
रोते -रोते बेहाल हुई माला और गोद में काया को थपकियाँ देकर सुलाता शेखर किंकर्तव्यविमूढ़ हो उठा. मन ही मन खुद पर नाराज भी हुआ पर वह करे तो क्या. दिन भर ऑफिस का प्रतिस्पर्धी माहौल, छोटे बच्चे की जिम्मेदारी और माला की बढ़ती हुई बेख्याली. घरेलू कार्यों में भरसक सहायता करने के अलावा गृहस्थी की गाड़ी खींचने के लिए किये जाने वाले अतिरिक्त कार्य भी. अपनी जिम्मेदारियों की समझ उसे हौसला खोने भी नहीं देती थी. अधलेटा सा शेखर इन सब सोच में डूबा था कि दरवाजे पर खटखट ने उसको सजग किया. बचपन का मित्र कमल अपनी पत्नी विद्या के साथ  दरवाजे पर खड़ा था. उनको ड्राइंग रूम में बैठाकर शेखर ने माला को धीमे से जगाया. हाथ मुँह धोकर मुस्कुराहट लिए बैठक में आई माला हालांकि बिखरे बाल और सूजी आँखें उसके उदास मन की हालत बयां कर रहे थे. कुछ देर औपचारिकता में स्वागत अभिवादन के बाद
चाय बना लाती हूँ कहती माला रसोई  जाने केे लिए मुड़ी तो विद्या भी उसके साथ हो ली यह कहते हुए कि मैं भाभी की मदद करती हूँ.
आपके पापा के बारे में सुना था तबसे ही आपसे मिलने का मन हो रहा था. कैसे क्या हो गया था!
चाय की पतीली गैस पर रखते माला भीगी पलकों से सब बताती रही.
बहुत बुरा हुआ लेकिन पीछे रह जाने वालों को हिम्मत रखनी पड़ती है. चाय विद्या ने ही कप में छानी. बिस्किट, नमकीन करीने से प्लेट में रखते हुए माला फिर से सुबक पड़ी.
अपना ख्याल रखो भाभी. कितनी कमजोर हो गई हो.
नन्हीं काया भी तुम्हारे पास है. और देखो , हर समय रोते रहने से कुछ हासिल नहीं है. उलटा सामने वाला भी परेशान हो जाता है. स्वयं स्वस्थ न रहो तो कोई एक गिलास पानी भी नहीं पूछता. शेखर अकेले कितना और कब तक  ध्यान रखेगा..

ठीक कहती हो विद्या. मैं भी सोचती हूँ मगर...
दुख और शर्म की मिली जुली अनुभूति इंसान को कितना दयनीय बना देती है. सोचती हुई विद्या ने माला का हाथ पकड़ कर हौले से दबाया. दर्द को अनकही संवेदना ने चेहरे की स्मित मुस्कुराहट में बदल दिया.

चाय बन गई या कहीं बाहर से ही आर्डर कर दें .
उधर से हल्के ठहाके के साथ  कमल की आवाज आई तो दोनों चाय और नाश्ते के साथ बैठक में आ गईं. दोनों के साथ कुछ हल्की- फुल्की इधर उधर की बातों से माला भी सहज हो आई थी.

आज फिर से कक्षा अध्यापिका के बुलावे ने उसे चिंता में डाल दिया था. क्या कहेगी शेखर को, कैसे सामना करेगी उसका. जैसे अपने हाथों पैरों पर नियंत्रण न रहा उसका. साँसें जैसे डूबती सी जातीं थीं. दवाईयों के डब्बे से  ब्लड प्रेशर की दवा ढ़ूँढ़ कर ले ली मगर घबराहट पर काबू ही न था. अकेली क्या करेगी वह.
काया को गोद में उठाया और दरवाजे की कुंडी लगाकर पड़ोस के वर्मा जी के घर चली आई. मिसेज वर्मा उसकी मानसिक स्थिति समझती थीं. अपने काम निपटाकर माला के पास आ बैठतीं थी कई बार. उसके गोद से कायाको लेकर सुला दिया . माला वहीं सोफे पर पसर गई. अपनी घबराहट पर नियंत्रण न रख पाई और फूट फूट कर रो पड़ी. मिसेज वर्मा ने उसे पानी पिलाया और सिर पर हाथ फेरते बहुत समझाया भी.
दवा से कुछ फायदा नहीं हो रहा तो किसी पीर देवता से झाड़ा लगवा आयें या  फिर किसी देवी देवता को पूछ लेते हैं. अगली गली में वह कन्नू रहता है न , उस पर छाया आती है. कहते हैं सब सच बताता है. कुछ टोना टोटका  कर दिया हो किसी ने या कोई देवताओं का दोष हो. या फिर छोटा बाजार चल आयें . वहाँ फूली देवी में माता आती है. झाड़ा भी देती हैं और साथ ही देसी दवा भी . बहुत लोगों को फायदा होते देखा है.

देवी देवता, झाड़ फूँक सुनते माला कुछ चौकन्नी सी हो गई. विज्ञान का ज्ञान उसे इन सब बातों पर विश्वास न करने देता था. मगर काया की तबियत खराब होने पर दवा देते हुए भी राई लूण करना नहीं भूलती थी. या फिर कपड़े की कतरनों से वारते हुए भी नजर उतारने का टोटका कर ही लेती थी. करने को कार्तिक में करवा चौथ पर चंद्रमा के दर्शन कर उसकी पूजा भी करती ही थी जबकि उसे स्कूल में पढ़े गये विज्ञान के सबक अच्छी तरह याद थे कि चंद्रमा एक उपग्रह मात्र ही है . उसकी रोशनी भी उसकी अपनी नहीं. वह सूर्य के प्रकाश से ही चमकता है. मगर कुछेक अवसरों पर दिमाग की खिड़कियों को बंद कर श्रद्धा के वशीभूत हो किये गये शुभ कार्य एक सुकून या प्रसन्नता का भाव उत्पन्न करने में सहायक होते हैं. पारिवारिक और सामाजिक मेलजोल के ये पर्व या व्रत त्योहार रूढ़ि में न बदलने तक एक प्रकार से दैनिक कार्यों जैसे आवश्यक से ही  हो जाते हैं और रससिक्त कर सुख और आनंद की अनुभूति देते हैं.

नहीं. अभी इसकी जरूरत नहीं. कुछ आराम मिला है मुझको.  यदि आवश्यक हुआ तो हम जरूर चलेंगे वहाँ.

अब तक पैर समेट कर आराम की मुद्रा में बैठती माला संयत हो चली थी. मिसेज वर्मा की बेटी शुभी चाय बना लाई थी. किशोरवय की उनकी पुत्री चपल और हँसमुख होने के साथ सुघड़ भी थी. काया के साथ खेलते बतलाते माहौल को सुखद बनाने में अपनी भूमिका में कुशल लगती थी वह.

अब चलती हूँ मैं. शेखर के आने का समय भी हुआ जा रहा. फिर इसका होमवर्क भी कराना है. काया की अँगुली पकड़ते वह  उठ खड़ी हुई . मगर घर की ओर मुड़ते कदम उसे फिर से चिंता में डाले जाते थे. क्या कहेगी शेखर को वह. क्यों बुलावा आया होगा स्कूल से...

अभी दरवाजे पर लगा ताला खोला भी न था कि पीछे से दौड़ती हाँफती शुभी उसकी साड़ी का पल्ला खींचते उसे जल्दी वापस उसके घर चलने को कहने लगी.
जल्दी चलिये . माँ ने बुलाया है. कहते उसने काया को गोद में उठा लिया.
अरे! घबराइये मत. कोई आया है घर पर. माँ आपसे मिलवाना चाहती है.
कौन होगा जिससे मिलवाना इतना जरूरी है कि उसके लिए शुभी इस तरह दौड़ती भागती चली आई. काया और शुभी को पीछे छोड़ लंबे डग भरती हुई माला अगले ही पल में मिसेज वर्मा के सामने थी.

आओ माला. कितनी अच्छी बात है न. अभी कुछ ही समय पहले इसकी बात कर रहे थे हम . तुम जैसे ही बाहर निकली इसका आना हुआ. जानती हो न इसको.

हाँ .  आपकी गली में बच्चों के साथ खेलते इसे कई बार देखा है. चेहरे से पहचानती हूँ.

अरे. यही तो है कन्नू जिसके बारे में मैं बता रही थी. वही जिस पर देवता की छाया है. आगे के शब्द फुसफुसाते से कहे थे उन्होंने.

जा शुभी. भैया के लिए पानी भर ला लोटे में. एक आसन भी दे जा बिछाने को.

अनमनी सी हो उठी थी माला. यह क्या कर रही हैं मिसेज वर्मा. उसे विश्वास नहीं इन ढ़कोसलों पर. कैसे कहे उसके सामने ही. मगर तब तक शुभी आसन बिछा चुकी थी. उसके सामने पानी का लोटा भी रख दिया गया था.

कैसे भागे यहाँ से सोच रही थी माला . शेखर को पता चला तो कितना गुस्सा होगा. तब तक कन्नू जी आसन पर जम चुके थे. हाथ पैरों को बल खाने की मुद्रा में लाते उसकी आँखें हल्की ललाई लिये थीं. आसन पर बैठे मरोड़े खाते देख मिसेज वर्मा उसके सामने जा बैठीं. इशारे से शुभी को काया को वहाँ से ले जाने को कहते हुए माला का हाथ खींचकर अपने पास ही बैठा लिया.

बोलो महाराज. क्या बात है. क्या कष्ट है!
मिसेज वर्मा की  उत्सुकता देखते बनती थी वहीं माला सकुचा रही थी. किस फेर में पड़ गई आज वह.
उधर कन्नू के शरीर के झटके बढ़ते जा रहे थे . नहीं के इशारे में जोर से गरदन हिलाते हुए वह छटपटाता सा दिख रहा था. कुछ कहने के लिए मुँह खोलता कि उढ़के से  दरवाजे पर जोर से खट की आवाज आई. वर्मा तेजी से घर में घुसे थे.

ये क्या हो रहा है यहाँ...
तत्क्षण ही तेजी से पानी का लोटा उठाकर गटकते कन्नू अपनी गरदन ढ़हाते जमीन पर लोट गया.  कुछ ही सेकंड में वापस अपनी स्वाभाविक स्थिति में उठ भी बैठा. सब कुछ इतने कम समय के अंतराल में हुआ कि माला समझ नहीं पाई कि आखिर हुआ क्या था.
कन्नू  वर्माजी  का अभिवादन करते हुए उठकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर जम चुका था.

वर्मा जी घर के भीतर चले गये  तो मिसेज वर्मा ने धीमे स्वर में माला से कहा... अभी देवता चले गये पर कुछ असर तो रहेगा. पूछती हूँ तुम्हारी समस्या के बारे में.

इनके पिताजी के देहांत के बाद इसकी तबियत ठीक नहीं रहती. पेट में अजीब सा दर्द बताती है. खाना पचता नहीं . दिन पर दिन कमजोर हुई जा रही. दवा लेते दो तीन महीने हुए. कुछ असर नहीं हो रहा. कहीं पैर तो नहीं पड़ गया इनका कहीं.

अब तक मिसेज वर्मा और माला भी कुर्सियों पर बैठ चुकी थीं.

  हम्म्म्... पिता जी के जाने के बाद.... एक जोर की साँस ली कन्नू ने और रूआँसी सी हुई माला की ओर देखा.

क्यों रोती हो इतना. किसके लिए रो रहे. क्या समझते हो . तुम अमर हो. ये जीवन है. इसका क्या भरोसा. सोचो कल ही तुम्हें कुछ हो गया तो.... तुम्हारा इस समय का रोना क्या काम आयेगा.

कान के पर्दे पर जैसे किसी तीक्ष्ण वस्तु का वार हुआ. भय से सिहर उठी माला. पाँच वर्ष की नन्ही सी काया , अकेले पड़ता शेखर... इतनी सी देर में क्या- क्या नहीं सोच लिया उसने.

मैं चलती हूँ. शेखर परेशान होंगे. काया को गोद में उठाये माला दौड़ती सी घर आ पहुँची. शेखर घर आ चुका था. स्कूटर भीतर रखने के लिए मेनगेट पूरा खोलता हुआ रूक गया.

कहाँ गई थीं. अब क्या हो गया. उसके मुरझाये
हतप्रभ चेहरे को देखते कहा उसने.

कुछ नहीं. काँपते हाथों से दरवाजे का ताला खोला माला ने. काया को गोद में लिए हल्की सिसकियों से शुरू हुई उसकी रूलाई जल्दी ही चीख कर रोने में बदल चुकी थी.  शेखर और काया को अंक में समेटे कुछ देर फूट फूट कर रोती रही माला. होठों में ही अस्पष्ट शब्दों में बुदबुदाती.  काया के उलझे बालों की लटें, तुड़ी मुड़ी सी यूनिफार्म को अँगुलियों से सही करते हुए . वह इतनी निर्दयी कब और कैसे हुई. पिता का जाना उसे  इतना व्यथित कर रहा कि उसने पाँच वर्ष की नन्हीं काया के बारे में भी नहीं सोचा. अपने आपको इतना कमजोर कैसे कर सकती थी वह. उसके और काया के अच्छे भविष्य के लिए खटते शेखर के प्रति इतनी लापरवाह कैसे हो सकती थी वह. अपनी जिम्मेदारियों से कैसे भाग सकती थी. क्या उसका अपना दुख इस दूधमुंही काया के दुख से भी बढ़कर था...
उसके बालों में अँगुलियाँ फेरते शेखर ने उसे जी भर रो लेने दिया.

तुम बहुत साहसी हो और हम दोनों का संबल भी. शेखर समझा रहा था और माला कल के नये सूर्य के साथ अपने भीतर ऊर्जा भरते हुए जिंदगी की ओर बढ़ रही थी. दर्द वहीं था अभी, अफसोस भी परंतु उसके साथ अपने उत्तरदायित्व को अच्छी तरह निभाने,का हौसला भी...।

कितनी दवाईयाँ, कितनी किताबें और कितने मनोवैज्ञानिक नहीं समझा सकते थे जिसे , एक अल्पशिक्षित अज्ञानी ने अनजाने में समझा दिया था उसे। देवी देवता के आने जाने  का पता नहीं और न कभी वह इस पर विश्वास भी कर पायेगी मगर जीवन मजबूती से चलते रहने का नाम है, दुर्लभ है . यह जरूर समझ चुकी थी माला. कमर कस कर आने वाली चुनौतियों से लड़ने को तैयार.

20 टिप्‍पणियां:

  1. मनोविज्ञान पर आधारित बढ़िया कहानी का ताना बाना . जहाँ ज़िम्मेदारियों की व्यवहारिक समझ होती है वहां जीवन में अव्यवस्था नहीं आती .
    कहानी के पात्रों के नाम कहीं शेखर के स्थान पर विरल और कृति के स्थान पर काया पढ़ने को मिले . स्पष्ट करें

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  2. मतलब आपने पूरी पढ़ी और सराहा.
    पात्रों के नाम पसंद नहीं आ रहे थे तो बदलने में एडिटिंग की कमी रह गई.
    त्रुटियां स्मरण रखने और बताने का भी बहुत आभार !

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  3. बात सच में देवी-देवता के आने की नहीं। किस उम्र में कौन किस सोच से गुजरता है - इसे समझना कठिन है। एक नन्हीं उम्र का बच्चा भी अपने परिवेश के शून्य से जुड़ता है, और कुछ ऐसी बात कह जाता है, जो ज़िन्दगी बदल दे। मुमकिन है, उस वक़्त होनी उसके मन, उसकी जिह्वा पर हो। ..
    इतना तो हमसब मानते हैं कि बिना प्रयोजन कुछ नहीं होता !

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    1. सच है. कब कौन सी बात क्लिक कर जाये, कोई नहीं कह सकता!

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  4. ज्यादातर लोगों की समस्या है यह आजकल. यह कहानी सबको पढ़नी चाहिए.

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    1. वाकई...
      शुक्रिया दोस्त पढ़ने और समझने के लिए भी.

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  5. जय मां हाटेशवरी.......
    आप को बताते हुए हर्ष हो रहा है......
    आप की इस रचना का लिंक भी......
    08/07/2019 को......
    पांच लिंकों का आनंद ब्लौग पर.....
    शामिल किया गया है.....
    आप भी इस हलचल में......
    सादर आमंत्रित है......

    अधिक जानकारी के लिये ब्लौग का लिंक:
    http s://www.halchalwith5links.blogspot.com
    धन्यवाद

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  6. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (07 -07-2019) को "जिन खोजा तिन पाईंयाँ " (चर्चा अंक- 3389) पर भी होगी।

    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है

    ….
    अनीता सैनी

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  7. बिना ओझा गुनी के उलझनों में फँसाये ज्ञान करा देना बहुत अच्छा लगा
    शानदार कहानी

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  8. वाह!!बहुत खूब !! एक अल्पशिक्षित ,अज्ञानी जीवन की इतनी बडी सच्चाई आसानी से समझा गया ....! वाह!

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  9. पिता के वियोग में विक्षप्त एक बेटी की मनोदशा का बेहतरीन चित्रण ,सादर

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  10. वाणी जी बहुत प्रेरक और सत्य के करीब है आपकी कहानी। कई बार ऐसा होता है कि बहुत करीबी के जाने से व्यक्ति को इतनी गहरी ठेस लगती है कि वो अवसाद में ये तक भूल जाता है कि जो मौजूद हैं उसके अपने, जो जाने वाले के तुल्य ही प्रिय हैं पर उपेक्षा के भागीदार बन रहे हैं। और जो है उसे संभालना ज्यादा जरूरी है।
    कंई बार ऐसी हालत में वो घर परिवार का बड़ा नुकसान कर बैठता है और कई बार विवेक को एक सकारात्मक झटका व्यक्ति को अपनी सही मनोदशा में ले आता है।
    असाधारण कथा।

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