सोमवार, 31 जनवरी 2011
वही कटा हाथ.....
भूत- प्रेत आदि की कहानियों से बच्चे डर जाते हैं लेकिन इन कथाओं का रोमांच उन्हें आकर्षित करता है , इसलिए डरते हुए भी वे बार -बार ऐसी ही कहानियां सुनने की जिद भी करते हैं ...एक कहानी हमने भी सुनी अपने बचपन में ....जरुर आपने भी सुनी होगी ... कटे हाथ की कहानी ....
एक आदमी देर रात फिल्म का आखिरी शो देख कर घर लौट रहा था ....उसे रास्ते में झाड़ियों के बीच कुछ अजीब सी चीज चलती नजर आई ....उसने पास जाकर देखा , झाड़ियों में एक कटा हाथ रेंग रहा था ... डर के मारे उसकी घिग्घी बंध गयी ... अकेले पैदल ही घर लौटते वह व्यक्ति बहुत भयभीत हो चुका था ....मुख्य मार्ग पर अपने आगे चलते एक व्यक्ति को देखकर उसे कुछ राहत मिली ....तेज कदम से उसकी और अपनी दूरी को कम करते हुए वहां तक पहुंचा और उस व्यक्ति के कंधे पर हाथ रख दिया ....
पास जाने पर देखा कि उसके बाएं कंधे पर झोला लटक रहा था ...कुछ कदम ही साथ चले थे कि राहगीर ने उस व्यक्ति की बेचैनी को भांपते हुए उससे पूछ ही लिया ," क्या बात है ,बहुत घबराये हुए हो " ....
उस व्यक्ति ने डरते हुए झाड़ियों में कटे हाथ को चलता देखने की घटना का वर्णन कर दिया ... राहगीर सुनकर मुस्कुराने लगा ...उसने अपने झोले में हाथ डाला और जब वापस बाहर निकाला तो उसके हाथ में वही कटा हाथ था ....दिखाते हुए उसने पूछा ," कही यही हाथ तो नहीं था " ...
भय से कंपकंपाते वह व्यक्ति वहां से भाग छूटा ...
कुछ दूर चलने पर उसे एक रिक्शावाला नजर आया ...घबराहट में रिक्शा रुकने से पहले ही वह उस पर चढ़ बैठा ..." क्या बात है भाई , इतनी जल्दी क्या है ...अभी गिर पड़ते , चोट लगती "
तुम यहाँ से जल्दी से चलो , मार्ग में सारी बात बताऊंगा ...
रिक्शा चल पड़ा ...चलते चलते उसने झाड़ियों के बीच कटे हाथ को देखने और फिर उस राहगीर के पास भी वैसा ही हाथ देखने की घटना बयान कर दी ....अब रिक्शे वाले ने पीछे मुड कर देखा और उसकी सीट से कुछ निकालकर उसे दिखाया ,' कहीं यही तो नहीं है !'
अब तक उस व्यक्ति का डर और घबराहट से बुरा हाल हो चुका था .....गनीमत थी कि तब तक रिक्शा उसके घर तक पहुँच चुका था ...दरवाजे को जोर -जोर से पीटने की आवाज़ सुनकर उसकी माँ किवाड़ खोल कर बाहर आई ...घबराते ,कांपते वह व्यक्ति धम्म से बिस्तर पर जा बैठा और माँ को पूरी कहानी सुनाने लगा ....कहानी समाप्त होते- होते उसकी माँ ने मुस्कुराते हुए उसे कुछ दिखाया ...." यही हाथ तो नहीं था "
अब तो उस व्यक्ति के मुंह में झाग आ गए और बेहोश हो कर गिर पड़ा ....
आपको नहीं लगता वही कटा हाथ कहानियों से निकल कर ,कई हजार कटे हाथ बनकर अखबार , टी वी , इन्टरनेट तक फ़ैल चुका है ...!
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शुक्रवार, 21 जनवरी 2011
भैंस पसरी पगुराय ......
विद्वान् नगर एक कुनबा-सा है . समाज है धुरंधरों का ...एक से एक बड़े डॉक्टर , इंजिनियर ,वैज्ञानिक , सैनिक अधिकारी , राजपत्रित अधिकारी , तकनीकी विशेषज्ञ , शिक्षाविद , मिडिया पर्सन , लेखक , साहित्यकार , संपादक ......कौन विद्वान नहीं है यहाँ... अपने अपने क्षेत्रों के महारथी ...मगर यहाँ बस वे लेखन का कार्य करते हैं या कर सकते हैं ... इनकी अपनी अभिरुचियों के अनुसार विद्वमंडल हैं ..... एक साथ कई भाषाओँ के जानकार जब धाराप्रवाह लिखते हैं तो दूसरों की आँखें फटियाई रहती है . पहले तो जड़ स्तब्ध -सी, फिर एक चोर नजर खुद पर डाल लेते हैं - उनकी लिखाई मेरी लिखाई से चमकदार कैसे !
ऐसे विद्वजनों के नित्य आवागमन वाले मार्ग में एक भैंस का जम जाना ....कुफ्र की बात ही थी ...कुछ देर /दिनों मेहमानों का स्वागत करने जैसी औपचारिकता निभाने वाले हम भारतीय पशुओं का भी निरादर नहीं करते ...तभी तो हर चौराहे पर कुत्ते , सूअर आदि घूमते दिखाई दे जाते हैं ...पेट्रोल के बढ़ते दामों से अपनी जेब पर पड़ते असर से चिंतित लोगों के लिए कभी- कभी ईर्ष्या का सबब हो जाते हैं ...इन्हें आवागमन की कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती इसलिए बड़े मजे से धरती नाप लेते हैं ...कभी कभी गायें और बछड़े भी इसी तरह सडक किनारे पड़े कचरे में मुंह मारते दिख जाते हैं मगर इस बार तो भैंस थी . और वो भी सड़क किनारे कचरे में मुंह डालने वाली नहीं व्यस्ततम मार्ग पर पसरी हुए जुगाली करती ...
इसकी ज्यादा देर अनदेखी नहीं की जा सकती थी ...अफरातफरी मची हुई थी . विद्वमंडल की बैठक जुटी .. ये क्या हो रहा है ! हम विद्वानों के बीच एक भैंस . अब इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा . हटाना होगा इसे यहाँ से ....कहाँ हम लोग अपने क्षेत्र के गंभीर विमर्श करने वाले उच्च शिक्षित लोग और कहाँ यह अनपढ़ भैंस जो जुगाली के सिवा कुछ नहीं जानती ...इसे हटाना होगा यहाँ से वर्ना हमारी साख मिट जायेगी .
तय किया गया की सभी विद्वान भैंस के पास जायेंगे और उससे विनम्र निवेदन करेंगे की वह यह स्थान छोड़ कर चली जाए क्योंकि यह स्थान सिर्फ विद्वानों के लिए हैं ....सभी सूटेड बूटेड लोग गए भैंस के पास निवेदन लेकर ...सब अपने अपने तर्क देकर भैंस को समझाने लगे , अब चूँकि सभी विद्वान् थे और सबके विभिन्न मत ...अस्तव्यस्तता हो गयी...जब वे खुद ही एक दुसरे को समझा नहीं पा रहे थे तो फिर भैंस तो आखिर भैंस है ....जिसके आगे कोई कितनी बीन बजाये मगर वो मस्त पगुराए ....विद्वानों के सर पर पसीना चुहचुहाने लगा ....शोध ,लेखन , सड़केंब नाना , नक़्शे बनाना , नियम कानून बनाना ये सब तो वे जानते थे लेकिन भैंस को कैसे हटाया जाए तत्वज्ञ विद्वान् किसी भी पुस्तक में इसका तरीका नहीं खोज पाए थे ... सामूहिक रूप से कुछ कहने पर तो इसे कुछ असर नहीं हो रहा क्योंकि सब अपने अलग राग में गा रहे थे तो उन्होंने आपस में तय किया की हममें से एक -एक व्यक्ति बारी- बारी से अपने अर्जित विद्या ज्ञान का उपयोग करते हुए भैंस को समझाएगा की ये स्थान उसके लिए नहीं है ....पहले कौन जाएगा ....लॉटरी निकाली गयी ...एक वैज्ञानिक महोदय के नाम से पर्ची निकली ...भैंस को वहां से हटाने का जुगाड़ करना अब उनकी जिम्मेदारी थी ....
क्रमशः
विद्वान् भैंस को अपने स्थान से हटा पाने में सफल रहे या नहीं ...अगले अंक में ...
बुधवार, 5 जनवरी 2011
हमारे संस्कार बन गए हैं उनकी मौज मस्ती ....!
कड़ाके की ठंड पड़ रही है इन दिनों ...शादियों का मौसम भी कुछ समय लिए थमा हुआ है ....हिन्दू समाज में मल मास में शादियाँ या अन्य शुभ कार्य नहीं किये जाते हैं ...मौसम के मिजाज़ को देखते हुए यह ठीक भी है ....
मेरी बात इस समय से कुछ पहले की है यानि जब शादियों का मौसम अपनी पीक पर था ....इस सीजन में कुछ शादियों में सम्मिलित होने का अवसर प्राप्त हुआ जो सामान्य से लेकर थीम पर आधारित भी थी ...ये संयोग ही रहा कि कुछ दिनों के अंतराल पर एक राजपूत परिवार के विवाह समारोह में शामिल हुए , तो दूसरी ओर एक राजपूताना थीम पर आधारित ....जहाँ एक विवाह में लोंग मदिरा और सामिष भोजन के आगे ढेर हुए पड़े थे , वही दूसरी सौम्य सभ्य, जहाँ मधुर गीतों की स्वरलहरियों के साथ वर- वधु ,घराती और बाराती सभी आनंदित हो रहे थे ....यही फर्क होता है थीम और आम विवाह समारोह में ....मगर औपचारिक होते जा रहे समारोहों में कुछ नजदीकी रिश्तेदारों के अलावा अन्य लोगों की भागीदारी सिर्फ भोजन करने और लिफाफा पकड़ने तक ही सीमित रह गयी है ....कई विवाह समारोहों में तो आगंतुकों ने दूल्हा- दुल्हन को देखा भी नहीं होता है ...बस खाना खाया , लिफाफा पकडाया और चल दिए ...कई बार हम भी ऐसा ही कर देते हैं ...
एक विवाह कजिन के ससुराल में था ...कजिन दौड़ी चली आई ....मेरे ब्लॉग की नियमित पाठक भी है ...कहने लगी कि ध्यान रखना पड़ता है ....लिखने वालों का क्या भरोसा ...कुछ भी लिख दे और हम साथ हँस पड़े ...सत्य ही लिखने वालों से डरना पड़ता है ...बस फर्क यही रह गया है कि भय सिर्फ आम लोगों के साथ जुड़ गया है ....जिन्हें डरना चाहिए वे ही नहीं डरते हैं ...आप लाख कलम घसीट लें ....
विवाह समारोहों के इस मौसम में एक विवाह के टूटने की खबर भी छाई रही ...अरुण नायर और लिज़ हर्ली के विवाह-विच्छेद की खबर बहुत चर्चा में रही ... वे विवाह बंधन में पहले ही बंध चुके थे मगर हिन्दू तरीके से विवाह का लुत्फ़ उठाने के लिए ही उन्होंने इस धरती को उत्सव का एक और अवसर दिया ....हम उत्सव प्रेमी भारतीय जो सप्ताह के सात दिन व्रत कर उन्हें भी उत्सव की तरह ही मना लेते हैं , विदेशियों के लिए खासी ईर्ष्या का सबब बन जाते हैं ....मार्च २००७ में धूम धाम से हुए इस भव्य विवाह समारोह को अभी लोंग भूला नहीं पाए होंगे कि उनका विवाह टूटने की खबर भी आ गयी ....विदेशियों के लिए यह कुछ अचंभित करने जैसा मुद्दा नहीं है ....उनके यहाँ विवाह जन्मों का बंधन नहीं , एक औपचारिक रस्म भर है ....
खैर बात यहाँ भव्य विवाह समारोहों की हो रही है ...चूँकि अधिकांश भारतीयों के लिए विवाह मात्र एक रस्म नहीं है , एक संस्कार है जो ना सिर्फ स्त्री पुरुष को आजीवन बंधन में बांधता , बल्कि दो परिवारों को भी आपस में जोड़ता है ...और अपने या अपने परिवारजन के जीवन के लिए अनमोल पल होता है इसलिए इस महत्वपूर्ण पल को यादगार बनाने के लिए भरसक प्रयत्न होता है ...विवाह की भव्यता और ताम झाम इसी विश्वास से प्रेरित हैं ...
हमारे विवाह पद्धति का आकर्षण इसलिए ही विदेशियों को खींच लाता है ...वे हमारी विवाह पद्दति के उद्देश्य से सर्वथा अनजान होते है , बस इसका ग्लैमर ही प्रभावित करता है ..विवाह भी उनके पर्यटन का एक अंग बन गया है ...दोष इन विदेशी सैलानियों का नहीं है ...हम अधिकांश भारतीय भी विवाह में होने वाली विभिन्न रस्मों सिर्फ को मौज मस्ती की तरह ही लेने लगे हैं ...ना तो विवाह करवाने वाले पंडित इन रस्मों की महत्ता बताने में रूचि रखते हैं और ना ही अन्य लोग जानने में ...और इसका परिणाम ही है तलाकशुदाओं की बढती संख्या ... चूँकिहिन्दू विवाह पद्धति में विवाह सिर्फ दो व्यक्तियों का बंधन नहीं अपितु दो परिवारों का सम्बन्ध है इसलिए विवाह के टूटने पर दोनों पक्षों के माता -पिता और अन्य सम्बन्धी भी प्रभावित होते हैं ...बच्चे तो खैर सर्वाधिक पीड़ित पक्ष में आते हैं ...
हिन्दू विवाह पद्धति में विवाह शर्तों पर आधारित नहीं होता है .... यह हमारा धार्मिक संस्कार और संकल्प है दो इंसानों के एक साथ मिलकर चलने के लिए ...सप्तपदी में लिए जाने वाले सात वचन जो कन्या/वधु अपने पति /वर से लेती है वे इस प्रकार है ....
१. बिना किसी कारण से तुम रात बाहर नहीं बीताओगे। बाहर भोजन भी नहीं करोगे।’
२. तुम्हारे सुखदुःख, भाईबंधु अब मेरे होंगे। मेरा पालनकर्ता बनकर तुम मेरी सब जरूरतें पूरी करना।
३. ‘मैं तुम्हारी शक्ति लेकर अपनी शक्ति ब़ढाऊंगी।’
४. ‘मैं तुम्हारी खातिर जिऊंगी। तुम मेरी चिंता करना।’
५. मैं रूठूं, झगडूं, तब भी तुम शांत रहना। बुरा मत मानना।’
६. मेरे मातापिता ने पालपोस कर कन्यादान किया है, उन्होंने कुछ दिया न दिया, तुम कभी ताना मत मारना।’
७. ‘हवन, यज्ञ और सभी धार्मिक कार्यों में मैं तुम्हारी भागीदार रहूंगी, परंतु तुम्हारे पाप कार्य में मैं भागीदार नहीं रहूंगी। मैं अपना धर्म भी नहीं बाटूंगी । तुम पराई स्त्री का संसर्ग कभी नहीं करोगे।’
इन वचनों /कसमों /प्रतिज्ञाओं को समझे बिना ही सिर्फ अग्नि के सात फेरे लेना ही विवाह नहीं है ....ये सात वचन हमारी विवाह पद्धति की मुख्य रस्मे हैं जिन्हें हम कम से कम महत्व देते हुए अपना पूरा ध्यान अच्छे खाने , नाच गाने पर केन्द्रित करते हैं ....
विदेशियों से तो हम शिकायत कर भी ले , मगर अपने लोगों का क्या करें ... !!!!!