बुधवार, 8 अप्रैल 2015

गाँव की छाँव में .....

एक घर के बाहर गाय भैंस बँधी देख कर बिलोनी की ताजा छाछ की खुशबू सी नथूनो से टकराई. वहीं मिट्टी में बर्तन साफ़ कर रही स्त्री से पूछा तो उसने ना में सर हिला दिया. साथ ही पास की कंटीली झाड़ियों  से घिरी बाड़ की ओर इशारा किया. मैं उधर बढ ही रही थी कि पास की दूसरी कोठरी से बच्चे को कांख में दबाये एक और स्त्री तेजी से पास आई.
 कुण न पूछो छ... (किसको खोज रहे हो )
किसी को नहीं. गाय भैंसे बँधी दिखी तो सोचा छाछ की पूछ लूँ.
अजी! आज तो म्हांक छाछ न लाध कोड़ई. संवारा बेगा आता तो फेर मिल जाती . मेलो भर लो नाप्ता म तो सब घरां म राबड़ी , पूआ , पकौड़ी  बण छ (आज तो हमारे यहाँ किसी भी घर में छाछ नहीं मिलेगी .सुबह जल्दी आते तो फिर भी मिल जाती . आज नापता में मेला भरेगा तो छाछ राबड़ी , पुआ पकौड़ी बना कर वहां ले जायेंगे.
अच्छा! फिर क्या करते हो .
मेला म खिना दया छ . भोग लाग लो उन्ड भैरुँजी क . खूब बढिया मेलो भर छ . थे भी देख र आजो घनो जोर को मेलो भर काईं चीज असी न मिल उन्ड. झूला भी (मेले में भेजेंगे . वहां भैरूं जी के भोग लगेगा . बहुत बढ़िया और बड़ा मेला होता है , ऐसी कोई चीज नहीं जो वहां नहीं मिले. झूला भी )
यह भोलापन ही तो ग्रामीणों का विशेष गुण  है . हालाँकि शहर की हवा का प्रभाव अब तक ग्राम और ग्रामीणों पर भी नजर आने लगा है मगर कुछ तो कहीं अब भी बचा ....
अच्छा और क्या होता है वहा अर थे क्युँ न गया...
उनकी जैसी ही मारवाड़ी बोलने की कोशिश करती हूँ
अब जान्व्ला. 4 बजे सिक जद मेलो जुड़ लो (हम चार बजे तक जायेंगे , जब मेला जुड़ेगा यानि भरेगा /लगेगा )
अंड स चार कोस ई छ . थे जार देख याओ .
ओह! मगर तब तक तो हमको लौट जाना होगा  हम तो अभी दो घंटे में वापस लौट जायेंगे , और मेला चार बजे भरेगा .
देख र जाजो . काल तो सन्वारा स ई जोर को भर लो(आप जरुर देखना . आज नहीं तो कल देख लेना , कल तो सुबह जल्दी ही भर जाएगा )
अब उसे  हमारे  लिए  थोड़ा दुःख  होने लगा कि हम मेला नही देख पायेंगे .

खैर!  घर की बिलोई हुई ताजा छाछ पीने की इच्छा मन में ही दबाये लौटने लगे थे कि एक और मकान के आगे गाय भैंसे बंधी हुई नजर आ गई . गाड़ी में पैर  धरते एक बार और आजमा लेने की सोच ही ली .
यहाँ खुले बड़े से मकान के अहाते में एक स्त्री तसले में राबड़ी ही खा रही थी .
छाछ मिल जायेगी क्या !
उसने अन्दर किसी अन्य स्त्री की ओर मुंह कर पूछा ... छाछ छ काईं (छाछ बची हुई है क्या उसका मतलब यह था ).
भीतर से स्वीकृति मिलने पर बेटी को दौड़ाया . गाड़ी में रखी पानी की एक बोतल खाली कर ले आई . छाछ का इन्तजार करते अपनी भी नजर दौड़ा ली चारों ओर. पक्के दो मंजिला मकान , मोटर साईकिलें ,, ट्रैक्टर , मार्शल गाड़ियाँ , कोटरियों में भरा अनाज , चारा समृद्धि की दास्ताँ स्वयम बयान कर रहा था . मगर रहन सहन वही खालिस देसी . ऊपर खिड़की से एक स्त्री मोटर साईकिल स्टार्ट कर रहे युवक को कुछ निर्देश दे रही थी कि पेट्रोल कितने का भरवाना है ... थोड़ी देर में उसी खिड़की पर दूसरी बुजुर्ग स्त्री का चेहरा नजर आया .
कुण ने पूछो छो!  (किसके लिए पूछ रहे हो मतलब कि क्या चाहिए  !! मैंने सोचा )
कांईं न ...(कुछ नहीं . भला हो इतने वर्षों में थोड़ी बहुत जयपुरी मारवाड़ी (ढूँढाढी) बोलना सीख गई हूँ .)
मैं आऊँ काईं (मैं आऊँ क्या )

मैं एकबारगी सोच में पड़ गई कि कहीं हमारा इस तरह वहां खड़े होकर चारों ओर देखना कहीं उसे बुरा लग रहा हो . फिर भी मैंने कह ही दिया कि आ जाओ .
वो फटाफट चलती हुई आईं .
फिर मैंने उन्हें विस्तार से बताया कि हम यहाँ पास के कॉलेज में आये थे . काम होने में अभी कुछ समय लगेगा इसलिये पास के गाँव में घूम रहे हैं . बड़ी प्रसन्न हो गईं . बेटी के सर पर हाथ फेरते उसकी पढाई के बारे में पूछने लगीं .
तब तक बोतल भर छाछ आ गई थीं . मगर उनकी बातें ख़त्म नहीं हो रहीं थीं .
अजी थान जिम्याँ बिना कोणी जाबा देता पण आज तो म्हांक पुआ पकौड़ी कोणी बनाया . म्हारा जेठुता की तबियत भौत ख़राब छ . स जना जैपर डागखाना लेर गया छ .
(हम आपको खाना खाए बिना नहीं जाने देते मगर आज हमारे यहाँ पुआ पकौड़ी नहीं बनी . क्योंकि मेरे जेठुते की तबियत ठीक नहीं है . उसे जयपुर दवाखाना लेकर गए हैं .)
डागखाना को मैंने डाकघर समझा मगर उलझन थी कि वहां क्यों . फिर सोचा शायद कोई हॉस्पिटल पोस्ट ऑफिस के पास होगा . मगर जब पतिदेव को बताया तो उन्होंने समझाया कि ये डागखाना दवाखाना को कह रही हैं .
मैं मोबाइल से एक दो फोटो खिंच रही थी तो देख कर बड़ी खुश हो गई .

फोटो लेओला काईं . (फोटो खिंचोंगे क्या )
 बड़ी ख़ुशी से खाट पर जा बैठीं . पास ही उनकी दोनों बहुएं भी खड़ी थीं जो हमारी बातचीत में शामिल हो गईं थी . तीनों ने बड़े उत्साह से फोटो खिंचवाई . एक बहु तो फोटो के लिए स्वेटर उतार कर आईं .


खटिया पर बैठी वे एक किस्सा भी सुना रही थी. कुछ समय पहले जयपुर से कुछ जने यहाँ जमीन खरीदने आये थे . अपने पैसों का बैग यहीं भूल गए . उनके जाने के बाद हमने देखा तो जीप को दौड़ाया उनके पीछे . पुलिया पर जाकर उनको पकड़ा . वे लोग वापस लौट कर आयी और हमारे लिए तालियाँ बजा कर ख़ुशी प्रकट की .
काफी देर हो चुकी थी . चतुराई , मक्कारी, स्वार्थपन शहर से गाँव की ओर बढ़ तो रहे हैं मगर फिर भी अभी कहीं कुछ भोलापन , आत्मीयता बची रहने की आश्वस्ति के साथ हम लौट पड़े .
 मन में विचार भी चल रहा था कि आस पास के गाँव तेजी से शहर की जद में आ रहे हैं . जाने अगली बार आना हो तो इस गाँव की सूरत क्या हो ....

(अहा ! ग्राम्य जीवन )

सोमवार, 9 मार्च 2015

यह नंबर अस्तित्व में क्यों नहीं है ....


रोज सुबह की तरह ही मोबाइल का अलार्म बजा और श्रीमान जी ने झट से दबा दिया बटन कि  अभी बस बजता ही जाएगा . अलसाया मन अलार्म की एक क्लिक पर कहाँ उठता है . कुछ मिनट के अंतर पर कई बार मधुर ध्वनि सुन लेने के बाद ही सुप्रभात संभव है . मगर आज अलार्म बंद करते ही अचानक  चौंकते हुए उठे . जिसको अलार्म समझ कर बंद किया , वह मोबाइल की रिंग टोन थी . किसका फोन आ रहा था इतनी सुबह . घड़ी में समय देखा तो सुबह के तीन बजकर अठावन मिनिट हुए थे . 

इतनी सुबह फ़ोन और वह भी किसी के लैंड लाईन नंबर से . चिंता स्वाभाविक थी . आखिर इस समय कोई फ़ोन क्यों करेगा . किसी मदद की जरूरत थी  या कोई जरुरी सूचना थी . क्या सोचता होगा वह इंसान कि मैंने मदद के समय फोन काट दिया. जाने क्या -क्या विचार मन में डोलते रहे . थोड़ी देर इन्तजार होता रहा कि देखें , कहीं अगला दुबारा ही फ़ोन मिला ले . मगर लगभग दस पंद्रह मिनिट तक फ़ोन नहीं आने पर एक विचार मन में बना कि क्यों ना इसी नम्बर पर फोन कर पूछ लिया जाए . अब तो मोबाइल क्या लैंड लाईन फ़ोन पर भी इनकमिंग नंबर  दर्ज होने से मिस कॉल की सारी डिटेल मिल जाने की सुविधा रहती है . कही किसी ने गलती से ना मिला दिया हो., थोडा झिझकते हुए पुनः उसी नम्बर पर फोन किया तो उधर से आवाज़ आयी- यह नम्बर अस्तित्व में नहीं है!   
अब तो होश फाख्ता होने ही थे . एक तो अनजान नंबर लैंड लाईन का और वह  भी इतनी सुबह और वह नम्बर अस्तित्व में ही नहीं है . कुछ वर्षों पूर्व ऐसी घटना की बहुत चर्चा रही थी कि कुछ ख़ास नंबर से फ़ोन पर किसी महिला के रोने , सिसकने की आवाज़ आती थी  मगर उसी नम्बर पर फ़ोन करने पर सुनाई देता था कि  यह नम्बर अस्तित्व में नहीं है . भय और रोमांच मिश्रित एक सिहरन सी हुई . रहस्यमय कथाएं या फ़िल्में इसी प्रकार तो देखी - सुनी जाती हैं . भटकती आत्मा से दूरभाष पर साक्षात्कार का एक अविस्मरणीय पल घटे बिना  रह गया .
अनजाने ही सही क्या जरुरत थी बिना सुने ही कॉल ऑफ करने की . बार -बार यही अफ़सोस सताता रहा .
ओह ! हम भी किसी ऐसी रहस्यमय घटना के साक्षी होते रह गए क्या . हालाँकि यह जानकारी तो थी कि कुछ वी आई पी नम्बर भी सिर्फ सुने जा सकते हैं. उन पर कॉल बैक नहीं किया जा सकता है. फिर भी रहस्य तो था ही कि आखिर यह फ़ोन हमारे पास क्यों आया . 

कैसे पता करें! किसका फोन नम्बर है! पड़ताल करते श्रीमान जी  बी एस एन एल की  वेबसाइट पर पहुंचे . यह भी अच्छा हुआ कि लैंड लाईन नंबर था वर्ना मोबाइल नम्बर की तो डाइरेक्टरी भी उपलब्ध नहीं होती . सर्च करने पर पता चला कि उक्त नम्बर उनके दफ्तर के सामने स्थित किसी सरकारी भवन का है। अब चिंता का पहाड़ बढ़ता ही जा रहा था. जरुर किसी ने मदद के लिए फोन घुमाया होगा. मगर यदि ऐसा है तो नम्बर अस्तित्व में नहीं है क्यों सुन पड़ रहा है . छुट्टी का दिन था वरना ऑफिस जाकर ही माजरा जान आते . अब सोमवार का इन्तजार करने के सिवा चारा नहीं था . मगर दिन भर दिमाग में  यही उधेड़बुन चलती रही  . इतनी सुबह किसका फोन था , नम्बर क्यों नहीं लग रहा आदि -आदि . कई बार बच्चों से भी इस पर चर्चा हुई . अचानक शाम को चार बजे मोबाइल की आवाज़ पर बेटी ने उछलते हुए कहा - पापा , यह तो फिर से वही नंबर  है . सुबह से इतनी पड़ताल हो चुकी थी कि फोन नम्बर रट ही गया था . हम सब उत्सुकता भरी निगाहों से जानना चाह रहे थी कि आखिर यह रहस्यमय कॉल किसकी है .  किसकी हो सकती है। 
श्रीमान जी ने कॉल सुनते ही स्पीकर ऑन कर दिया . " यदि आपको जुखाम के साथ तेज बुखार ,सर में दर्द है तो स्वाईन फ्लू की जांच अवश्य करवा ले ".  कम्प्यूटराईज्ड ध्वनि में  स्वास्थ्य विभाग की जनहित चेतावनी जारी हो रही थी .  इस नंबर के अस्तित्व में नहीं होने की वज़ह समझ आ गयी .

धत्त तेरे की ...सारे रहस्य की ऐसी -तैसी हो गई . 

अब हमारी सरकार की मुस्तैदी का जवाब क्या है! भोर के चार बजे फोन से नागरिकों को स्वाईंन  फ्लू के खिलाफ चेता  रही है. सही भी है बीमारियाँ भोर अथवा शाम का समय देख कर थोड़े आती है . राहत भी हुई कि जनता को जागरूक करने के  सरकारी काम भी इतनी चुस्ती -फुर्ती से होते हैं . 
 पुरानी रहस्यमय घटनाओं के सन्दर्भ और स्रोत भी समझ आ गए कि  उक्त रहस्यमय घटनाओं  के पीछे किसी स्त्री की दारुण व्यथा नहीं बल्कि उनके लिए ऐसे किसी नम्बर का प्रयोग कर शरारत ही रही होगी .

रहस्यमय संसार अचानक ही सामान्य सा लगने लग गया. ये भी कोई बात है भला !! 

सोमवार, 3 नवंबर 2014

भीष्म पंचक (पंचभीकू ) लोककथा ....

पवित्र कार्तिक मास के आखिरी पांच दिन " भीष्मपंचक" (पंचभीकू )कहलाते हैं।  धार्मिक मान्यता में ये पांच दिन वे हैं जब बाणों की सरसैया पर लेते भीष्म पितामह ने पांडवों को उपदेश दिए थे।
 मगर लोक मान्यता में विभिन्न पर्व /व्रत  आदि के  नाम के बदलाव के साथ ही इससे जुडी  कथाएँ भी भिन्न हो जाती है।   सामाजिक , धार्मिक महत्व जो भी रहा हो इन लोक कथाओं का , मगर मनोवैज्ञानिक रूप से भी ये विलक्षण होती हैं।   कल्पनाशीलता की सजावट के साथ मनुष्य के मनोभावों , आदतों और व्यवहार पर तीक्ष्ण दृष्टि और समाधान रखती हैं ये लोककथाएं। किस प्रकार इन कथाओं के माध्यम से सामाजिक , मानसिक समस्याओं के विभिन्न पहलू  को प्रतीकात्मक रूप  उजागर कर समाधान ढूंढने का प्रयत्न
किया जाता रहा , विचारणीय है।

 पांच दिनों के इस व्रत अनुष्ठान के साथ लोकमानस में प्रचलित कथा इस प्रकार है -




एक साहूकार की बहू पंचभीकू का व्रत स्नान नियम से करती थी। तारों की छाँव में ही स्नान पूजन की कामना से गंगा स्नान को जाती स्त्री प्रार्थना करती  " गंगा -जमना -अड़सठ तीर्थ थारी पैड़ी पग  धरूं , मेरे सत (सतीत्व ) राखे" . और स्नान के बाद नहा धोकर , पीपल , केला , तुलसी , आवला और ठाकुर जी की पूजा करती। एक दिन स्नान के बाद अपनी माला और  मोचड़ी (जूतियां ) वहीँ भूल आई. राजा का बेटा गंगा किनारे जल पीने आते पशु पक्षियों का शिकार करने के लिए आया तो मोचड़ी देख मन में विचार किया कि जिसकी मोचड़ी इतनी सुन्दर है , वह स्त्री भी अवश्य सुंदर होगी। उसने साहूकार की बहू से मिलने का  प्रण किया और उसके घर बुलावा भेजा।  साहूकार और उसकी पत्नी भयभीत हुए कि अब क्या होगा।  राजा का आदेश टाला भी नहीं जा सकता और घर की बहू बेटी की सुरक्षा और इज़्ज़त का भी सवाल है।  बहू ने सुना तो ससुर जी को कहला दिया  कि वे चिंता न करें।  उधर राजा के बेटे को कहलवा दिया कि पांच दिन सुबह अँधेरे  ही वह गंगा स्नान को आएगी , वह उससे वहीँ मिल ले।  राजा के बेटे को चैन कहाँ।  वह रात में ही पहुँच गया नदी किनारे , रात भर उसके इन्तजार में जागता बैठा रहा , मगर सुबह  अँधेरे ही उसकी आँख लग गयी।  साहूकार की बहू गंगास्नान को आई , प्रार्थना करती " गंगा जमना अड़सठ तीर्थ थारी पैड़ी पग धरूँ , मेरा सत रखे। अपने नित्य कर्म किये।  अपने साथ वह तोते को लेकर आई जिसे साक्षी धरते हुए कह गयी ,  सुआ थारी साख धरुं , कह देना उस पापी हत्यारे को मेरी एक रात पूरी हुई !
जैसे ही साहूकार की बहू वहां से निकली ,  राजा के बेटे की आँख खुली तो सबेरा हो चूका था।  उसने देखा वहां कोई नहीं था , बस एक तोता था जो राजा के बेटे को देखकर हँसा कि  वह तो गई।  राजा के बेटे ने पूछा , कैसी थी !
सुआ बोला , "आभा की सी बिजळी , मोतिया सी झळ   " (उसकी आभा मोतियों की तरह थी जिसकी चमक बिजली जैसी हो )
अब तो राजा का बेटा बहुत पछताया।  दूसरे दिन प्रण कर बैठा वहीँ नदी किनारे कि आज तो देखकर ही रहूँगा।  मगर वही साहूकार की बहू के आने का समय हुआ और उसकी आँख लग गयी।  साहूकार की बहू ने अपने नित्य कर्म धर्म किये और तोते को साक्षी धर कह गयी , " सुआ ,  तेरी साख धरूं , कह देना उस पापी हत्यारे से मेरी दो रात पूरी हुई।  तीसरे दिन राजा के बेटे ने शूलों (काँटों ) की चौकी पर बैठा कि देखूं ,आज कैसे नींद आएगी।  मगर फिर वही साहूकार की बहू के आंने का समय हुआ और उसकी आँख लग गई।  सुबह जाते फिर साख भरा गयी कि  आज  तीन रात पूरी हुई।  चौथे दिन राजा अंगुली काटकर उस पर नमक छिड़क कर बैठा,  पांचवे दिन आँख में मिर्च डालकर सारी रात जागा मगर फिर उसे फिर भी आँख लग गई।  पांचवे दिन जाते जाते कह गयी - सुआ कह देना उस कामी लोभी को , मेरी पांच रात पूरी हुई। मेरी माला मोचड़ी मेरे घर पहुंचा दे। उसने एक स्त्री का सत बिगाड़ने की कोशिश की , सो उसे भगतना पड़ेगा।
राजा का बेटा निराश होकर महल चला गया।  घर पहुंचा तो देखा कि उसके सर पर गूमड़ हो गया है।  चार पांच दिन में गूमड़ बढ़ते हुए सींग बन गए।  अब तो वह छिप कर रहने लगा कि सब लोग उसे चिढ़ाएंगे कि उसके सर पर सींग निकल आये। राजा ने वैद्य बुलवाया मगर उन्होंने इलाज में असमर्थता व्यक्त करते हुए ज्योतिषी से पत्रा दिखाने को कहा. ज्योतिषियों ने उसका हाल देख बताया कि पराई स्त्री पर बुरा मन करने से उसकी यह दशा हुई है। वह पांच दिनों तक साहूकार की बहू के नहाये हुए जल से स्नान करे , तब ही उसकी बीमारी दूर होगी।  राजा  स्वयं साहूकार के घर गया और अपने पुत्र की करनी की माफ़ी मांगते हुए उनकी सहायता मांगी।  साहूकार की बहू ने  महल में जाने से इंकार कर दिया , राजा के बहुत विनती करने पर साहूकार ने कहा कि सुबह जब बहू स्नान करेगी तो छत के नाले से बहते पानी के नीचे राजा के बेटे को खड़ा किया जाए।  थक हार कर राजा को बात माननी पड़ी।  राजा के बेटे ने इस प्रकार स्नान किया तो उसके सींग झड़ गए।

(यह कथा थोड़ी बहुत फेरबदल के साथ भिन्न परिस्थितियों के अनुरूप कही जाती है )
इसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण मुझे तो यही लगा कि मन के विकार तन को भी बीमार करते हैं।  यदि मन की शुद्धता का उपाय किया जा सके तो तन भी स्वस्थ होगा !! बाकी मनोविश्लेषकों से प्रार्थना है यदि वे इस कथा की व्याख्या कर सके.

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नोट - चित्र गूगल से साभार ! आपत्ति होने पर हटा लिया जाएगा