गुरुवार, 27 अगस्त 2009

जिंदगी मुझसे यूँ मिली















जिंदगी बस उस दम ही लगी भली
जब मैं जिंदगी से मैं बन कर ही मिली

पसरा रहा दरमियाँ खुला आसमां
संकरी लगने लगी रिश्तों की गली

जज्बातों ने ले ली फिर अंगड़ाई
अरमानों की खिलती रही कली

पलकों की सीप में अटके से मोती
राह आने की तकती रही उसकी गली

दामन खींचती हवा चुपके से पूछ रही
आज किसकी है कमी तुझको खली

जिन्दगी पहले तो नही थी इतनी हसीं
आती जाती रही लबों पर जो इतनी हँसी

तुझसे मिलकर ही जाना जिन्दगी
तू है वही जो ख्वाब बनकर आँखों में पली

जिंदगी पहले कभी ना लगी इतनी भली
जब तलक उससे मैं मैं बनकर ना मिली

...................................................................................

29 टिप्‍पणियां:

  1. जज्बातों ने ली फिर अंगराई
    अरमानों की खिलती रही कली

    अच्छी लगी ये पंक्तियाँ। सुन्दर भाव वाणी जी। चलिए मैं भी सुर मिलाऊँ-

    अरमानों को पूरा करने
    भटकता रहा मैं गली गली

    उत्तर देंहटाएं
  2. पसरा रहा दरमियाँ यूँ खुला आसमां
    संकरी लगने लगी रिश्तों की गली
    और
    ज़िन्दगी पेहले कभी ना लगी इतनी भली
    जब तलक उससे मैं मै बन कर न मिली
    लाजवाब अभिव्यक्ति है बहुत सुन्दर रचना है बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुंदरतम अभिव्यक्ति. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर रचना..वाह!! बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्दर भावाभिव्यक्ति ,'जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है'

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुन्दर भावाभिव्यक्ति ,'जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है'

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुन्दर भावाभिव्यक्ति ,'जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है'

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपने आपसे मोहोबत्त की .........जिंदगी ऐसी ही मांग करती हैं हम सभी से .......खुबसूरत जिंदगी मुबारक ....आपसे पहली मर्तबा भेंट हो रही हैं पर सचमुच zindgi खुबसूरत लगी .........मैंने शेड्स हटा दिए हैं

    उत्तर देंहटाएं
  9. ज़िन्दगी पेहले कभी ना लगी इतनी भली
    जब तलक उससे मैं मै बन कर न मिली...bahut khoobsurat se dil ki baat kahi aapne.....

    उत्तर देंहटाएं
  10. सुन्दर! आपको ऑडियो रूपान्तर भी पोस्ट करने के प्रयोग करने चाहियें। नहीं?

    उत्तर देंहटाएं
  11. धन्यवाद, हौसला अफजाई के लिए..
    जिन्दगी में मैं से मैं का सफर सब कहा करते है??
    मालूम ही नहीं होता की ''हम'' क्या हैं???
    मैं से मैं तक की यात्रा कराने के लिए धन्यवाद..
    अच्छा लिखा.

    उत्तर देंहटाएं
  12. अगर यह गज़ल है तो छठवे शेर मे रदीफ और काफिये की गड़बड़ है ।

    उत्तर देंहटाएं
  13. Zindagi pehle kabhi na lagi itni bhali...


    ....sahi hi hai vaani ji.

    sach ka samna jab zindagi se ho to...

    ...aap zindagi ko aur zindagi aapko bhai hi lagti hai.

    "Daman kheenchti hawa...."
    bhi pasand aaya.

    उत्तर देंहटाएं
  14. sharad ji ye ghazal to kahin se bhi nahi hai...

    ...apne sahi kaha...

    par jo bhi hai bhav paksh bahut umda hai.

    उत्तर देंहटाएं
  15. @शरद कोकास
    शरदजी,
    मैं खुद नहीं जानती यह गीत है या ग़ज़ल ..रदीफ़ और काफिये की भी मुझे कुछ समझ नहीं है..मैं बस वह लिखती हूँ जो मेरा मन कहता है ..
    आपने इस ओर ध्यान दिलाया..आपका बहुत धन्यवाद..अगर रदीफ़ और काफिये के समबन्ध में आप कुछ बता सके तो मेरे ज्ञान और समझ में वृद्धि होगी..आपका बहुत आभार.!!

    उत्तर देंहटाएं
  16. @ज्ञानदत्त पाण्डेय
    ज्ञानदत्तजी,
    आपका बहुत आभार ..ऑडियो रूपांतर पोस्ट करने की हिम्मत जुटा रही हूँ..देखूं यह कब तक संभव होगा...मैं बहुत अभिभूत हूँ आपके इस उत्साहवर्धन से..बहुत बहुत धन्यवाद और आभार..!!

    उत्तर देंहटाएं
  17. are bahut bahut bahut sundar bhai..
    zabardast likhte hai ladki...
    padh kar bas man balliyon uchhalne laga..
    azal-gazal hai ki nahi maro goli bas ham etne jaante hain bahut saara gazal FAIL hai iske saamne.
    Waah waah..
    U ka kahte hain...
    SUBHAN ALLAH !!!

    उत्तर देंहटाएं
  18. बहुत ख़ूबसूरत, शानदार और भावपूर्ण रचना के लिए बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  19. सच में जिंदगी के khwaab में ही तो जीवन है .............
    lajawaab sher हैं इस gazal के .....

    उत्तर देंहटाएं
  20. ज़िन्दगी बस उस दम ही लगी भली
    जब मैं ज़िन्दगी से मैं बन कर ही मिली

    वाह ....!!

    वाणी जी लाजवाब शे'र .....!!

    उत्तर देंहटाएं
  21. जिंदगी को भी तभी भला लगता है
    जब वह मिलती है भले से लोगों से!

    अत्‍यन्‍त भावप्रवण रचना जिसे पढ़कर सुख की अनुभूति होती है।

    उत्तर देंहटाएं
  22. लहरों सी गुनगुनाती रचना जी चाहता है स्वर दूं और गा उठूँ. बधाई .

    उत्तर देंहटाएं
  23. "जिन्दगी पहले कभी ना लगी इतनी भली
    जब तलक उससे मैं मैं बनकर ना मिली । "
    खासा प्रभाव महसूस कर रहा हूँ इन पंक्तियों का ।
    अर्थ के परावर्तन को पहचान रहा हूँ । ’मैं’ तो अहंकार है । इसकी खोज क्यों ? शुभ वाक्य तो कहते हैं - "तूँ तूँ करता तूँ भया, मुझमे रही न हूँ" । यदि इस ’हूँ ’ से जिन्दगी भली लगने लगे तो वह भलापन आभासी होगा । है न ?

    पर नहीं ! यहीं तो अर्थ परावर्तित हो गया । जो जीवन यूँ ही जीये जा रहीं थीं आप - संसार ने आपसे उसकी पहचान छीन ली थी । पता नहीं था आपको, खबर नहीं थी उसकी । वह तो ’वह’ का आपके जीवन में आगमन है जिसने आपको आपके गुह्यतम गुणधर्म से परिचित कराया । आप बहुमूल्य हो उठीं । आपको खुद का पता लगा । आप का ’मैं’ सँवर उठा । फिर तो आपके ’मैं’ के भीतर केवल ’मैं’ की उर्जस्वित पहचान रह गयी - उसका उच्छिष्ट बाहर निकल गया । तब ऐसा क्यों न हो कि जिन्दगी भली लगने लगे ।

    पूरी रचना का आभार । सुर में आये ऐसा कुछ तो शायद और सुघर हो !

    उत्तर देंहटाएं