गुरुवार, 18 मार्च 2010

काँधे मेरे तेरी बन्दूक के लिए नहीं है .....

ऐसे ही कुछ अटपटे शब्द ....





मैं
नादान
नाजुक
कमजोर
हताश
मायूस
तुम्हे लगती रहू
मगर
याद रख
कांधे मेरे
तेरी बन्दूक के लिए नहीं है ....

छोटे हाथ मेरे
नाजुक अंगुलियाँ
भले होंगी मेरी
भार उठाएंगी
खुद इनका
जरुरत हुई तो ....

जीतना मैं भी चाहूं
तू भी
बस जुदा है
रास्ता तेरा - मेरा
जीतना चाहती हूँ मैं
सम्मान से सम्मान को
प्रेम से प्रेम को .....
जीत स्थायी वही होती है
जो
मिले
दिलों को जीत कर
युद्ध शांति का पर्याय कभी नहीं होता
देख ले
इतिहास के पन्ने पलट कर

आखिर महाभारत से किसने क्या पाया
क्या सच ही....
शांति ....??
कलिंग जीत कर भी
अशोक क्यों चला
शांति की ओर
लाशों के ढेर
कभी आपको नहीं दे सकते
सम्मान ,शांति और प्रेम ...

सिर्फ दे सकते है
घिन
वितृष्णा
नफरत ...
और घबरा कर जो बढ़ेंगे कदम
तो तय करेंगे
राह
सिर्फ
प्रेम और शांति की ही ...

32 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ,आज वाणी जी तो अपने पूरे तेवर में हैं सहज और अपनी पूरी अर्थवता और वजूद के साथ मुखर !
    सदवाणी की मुखरता बड़े बड़ों का शीश झुकाती आयी है -हम भी नमन करते हैं देवि-शांति शांति !
    और निश्चय ही प्रेम सर्वोपरि है -युद्ध के पहले और युद्ध के बाद भी
    आज तो आपने महाभारत से लेकर कलिंग युद्ध और टालस्टाय की युद्ध और शांति तक की याद दिला दी .!

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  2. खरी बात...सीधी सपाट...उम्दा तरीके से. बधाई!!

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  3. यह सत्‍य है कि प्रेम से ही शान्ति मिलती है। बंदूके कभी भी किसी समस्‍या का हल नहीं होती। बढिया रचना, बधाई।

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  4. स्वयं में विश्वास कि चेतना जगाने वाली अच्छी रचना....बधाई

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  5. एक दौर आता है जब मानव की मूर्खताएँ अपनी हद तक आ जाती हैं और महाभारत, विश्वयुद्ध होते हैं।
    प्रेम और शांति की महत्ता इसमें है कि वे मानव को पुन: निर्माण की ओर ले जाते हैं। अजीब विसंगति है कि निर्माण का दौर एक और भयानक विध्वंस के सामान भी इकठ्ठा करता चलता है ...

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  6. बेहतरीन,शांति का सन्देश देती रचना.

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  7. बहुत खरी और सटीक संदेश देती रचना.

    रामराम.

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  8. वाह वाह बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति।

    सत्य प्रेम और अहिन्सा ही तो हमारा ध्येय रहा है हमेशा से।

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  9. और घबरा कर जो बढ़ेंगे कदम
    तो तय करेंगे
    राह
    सिर्फ
    प्रेम और शांति की ही ...
    -----------
    क्या बतायें, हमारे मन में अलहदा ही विचार आता है।
    शान्ति हो या क्रान्ति, सब को सलीब अपना, खुद उठा चलना होता है।

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  10. वाणी जी बहुत ही अच्छी बात कह दी आज आपने ..सछ क्या उद्देश्य है इन लड़ाई झगड़ों का और क्या नतीजा ..? बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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  11. बहुत ही सुदर कविता...पलट कर सोचने पर मजबूर करती हुई...क्या मिलता है युद्ध से ..अहम् की संतुष्टि?..पर किस बिना पर...?
    खोते तो सब हैं...जीतने वाला भी...हारने वाला भी..

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  12. बहुत ही सरल शब्दों में आपने सन्देश भी दे दिया
    और रचना भी गढ़ दी!
    बहुत सुन्दर!

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  13. jeet sthaai wahi hoti hai jo do dilon ko jeetkar milti hai.........prem ka swargik viram hai in bhawnaaon me

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  14. बहुत ही सधी हुई बात कही है...
    यह सत्‍य है कि प्रेम से ही शान्ति मिलती है। बंदूके कभी भी किसी समस्‍या का हल नहीं होती। बढिया रचना, बधाई...!!

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  15. vani ji kitni hairani ki baat hai na ki hamare paas anmol cheez hai 'PREM' jis se dil to kya sansaar jeeta ja sakta hai...aur shayed yahi ek anmol cheez hai hamari jiski vajeh se hamare desh ne baaki desho ki nazer me samman aur vishwas paya hai...

    lekin kitni badi vidambana bhi hai ki ham aaj ise prayog karne ki bajaye...hathiyaro ki bandooki ki baat karte hai...inke bal par shanti kayam karne ki umeed karte hai...

    kash sab iski mehatta ko jane,samjhe aur kare.

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  16. आज शब्द नहीं...केवल शान्ति....शान्ति...शान्ति....

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  17. जब हम एक व्यक्ति से प्यार करते है तो वह प्रेम कहलाता है और जब अनेक लोगो से प्रेम करते है तो वः धर्म बन जाता है पता नही ?हम सब इस धर्म को छोड़कर नफरत कि शिक्षा क्यों पा रहे है ?
    बहुत ही प्यारी लगी आपकी यह रचना एक सुन्दर संदेश देती हुई अच्छी रचना |

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  18. हां बंदूकें कभी किसी बात का हल नहीं होती ...मगर अक्सर कंधों पर बढते बोझ का असर जब दिल दिमाग तक पहुंचता है ...तो उन्हीं कंधों पर बंदूक लदते देखा है ...बहुत प्रभावित करने वाले शब्द
    अजय कुमार झा

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  19. यह अतपटे नही बहुत महत्वपूर्ण शब्द है अनेक अर्थ देते हुए ।

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  20. प्यार बांटते चलो, प्यार बांटते चलो,
    क्या हिंदू, क्या मुसलमां, क्या सिख, क्या ईसाई,
    प्यार बांटते चलो...

    जय हिंद...

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  21. सच कहा आपने, हर युद्ध का अंत एक विनाश के साथ होता है, पर समस्या नहीं सुलझती. समस्याएँ दूर होती हैं शान्ति से, सन्धि से, बातचीत से. बहुत ही सार्थक कविता है.

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  22. Kewal ek shabd..wah!
    Aapko agali tippanee me chand panktiyan nazar karna chahti hun...

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  23. चूड़ियाँ टूटी कभी,
    पर मेरी कलाई नही,
    सीता सावित्री हुई,
    तो साथ चान्दबीबी,
    झाँसीकी रानीभी बनी...
    isse pahlekee chand panktiyan baadme deti hun!

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  24. उठाये तो सही,
    मेरे घरकी तरफ़
    अपनी बद नज़र कोई,
    इन हाथोंमे गर
    खनकते कंगन सजे,
    तो ये तलवारसेभी,
    तारीख़ गवाह है,
    हर वक़्त वाकिफ़ रहे !

    Aapki rachana mujhe apni yah panktiyan yaad dila gayi...

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  25. मै आपके ब्लॉग पर पहली बार आया हूँ
    अच्छा लगा मूल्यवान रचाओं को पढ़ कर

    प्रासंगिक और सटीक रचना है ...
    भाव और शिल्प दोनों की दृष्टि से उत्तम
    बधाई

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  26. बहुत सुन्दर वाणी जी. युद्ध समस्या का समाधान नहीं वरन स्वयं में एक समस्या है.

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  27. बहुत खूब ....वाणी जी .......!!

    ठकाठक .....ठकाठक ......!!

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  28. वाणी जी
    प्रेम से बड़ी और प्रभावी चीज दुनिया में है ही नहीं.........स्नेह और अहिंसा हमारी पहचान है......इसी पहचान को मद्देनज़र रखते हुए आपकी यह कविता वाकई बहुत अद्भुत है........सुन्दर लेखन के लिए बधाई.......!

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