सोमवार, 17 मई 2010

ईस्ट इंडिया कंपनी जी , आओ नी सा ....पधारो म्हारा और म्हारा पड़ोसिया का देस

परदेसी थारी ओल्यु घणी आव , पागल मन न कुण समझाव

(परदेसी तुम्हारी बहुत याद आती है , पागल मान को कौन समझाए )

ईस्ट इंडिया कंपनी जी , आओ नी सा ....पधारो म्हारा और म्हारा पाड़ोसिया का देस

क्यूंकि म्हाका माजना अस्या ही है ...
(
क्योंकि हम इसी लायक हैं )

जो विष बीज थे बार गया अब फल फूलां से लद गा । आर देखो तो सही थांकी बोयोडी फसल कसी लहलहा गयी है थानको बोयोड़ो आर थे ही काट ले जाओ.... ...थे तो दो टुकड़ा करना की ही सोच्या , अब तो इत्ता टुकड़ा होण लग्या है कि थांकी तो पौ बारह हो जायेगी ...सौ सालं री गुलामी करार थे म्हाँकी असी आदत बिगाड दी कि अब तो म्हें स्वतंत्र रह ही कोणी सका ...

(जो विषबीज आप बोकर गए थे , अब फल और फुल्लों से लड़े पेड बन चुके हैं ...आकर देखो तो सही , आपकी बोई हुई फसल कैसी लहलहा गयी है ।, आपका बोया आप ही काट कर ले जाएँआपने तो दो टुकड़े करने की ही सोची थी अब तो इतने टुकड़े होने लगे हैं कि आपकी तो पौ बारह हो जाएगीसौ साल की गुलामी देकर हमारी आदत इतनी बिगड़ दी कि अब हम स्वतंत्र रहने के काबिल ही नहीं रहे )

म्हाका माथा कोई परेशानी ना पड़ा तो म्हें एकजुट हो ही कोणी सकां ...थे आओगा ....थान्को लगायोड़ो बोर्ड जगामगाव्गो " इंडियंस एंड डॉग्स र नोट अलावुड" थोडा हंटर चालोग , नीलां की खेती करोगा , जद तो जार थोड़ी हलचल होवागी , पण अबकी थान अत्ति परेशानी कोणी उठानी पडसी ....क्यूंकि एक होर लड़ने मरण जस्सी अबो हवा तो अब म्हांका रही कोणी ...तो फेर अत्तो कईं सोच्नो लाग्यो हा ....आर थांकी सत्ता संभालो ....

(जब तक हमारे सर पर मुसीबत नहीं हो , हम हिन्दुस्तानी एक जुट नहीं हो सकते , आप आयेंगे , पके लिखे बोर्ड जगमगायेंगे " इंडियंस एंड डॉग्स नोट अलावुड" , नील की खेती होगी , हंटर चलेंगे , तब जाकर थोड़ी हलचल मचेगी , मगर अब आपको इतनी परेशानी नहीं होगी हमें तोड़ने में , क्यूंकि एक होकर लड़ने मरने जैसे आबो हवा अब हमारे देश में नहीं रही , तो अब इतना क्या सोचना है , आकर अपनी सत्ता संभालें )

हाँ ...पहलि का जियां हीरा जवाहरात का लालच में मत आजो ...अब अठा कोणी लाधगो , कचरों घनो ही मिल जावगो , भाषा , बोली , जात , धरम का झगडा सा उपज्यो कचरों , भर भर थाल ले जाओ थांका देस.....

(हाँ , पहले की तरह हीरे जवाहरात के लालच में यहाँ मत आना , यहाँ नहीं मिलेगा , भाषा जाति, धर्म बोली के झगडे से उपजा कचरा ही मिलेगा , जिसे बेशक आप थाली भर कर ले जाएँ अपने देश )

ओर अबका आण म तो अब तो थाना रास्ता ढूंढना की जरुरत भी कोणी पडसी ....देस क हर कोना पर थांका आण की जगह बना राखी ह ... जो रास्तो थानों आसान लाग आपकी मर्जी स चुन र आ सको हो ...म्हांका सिपाही खुद थान इज्ज़त स्यूं लेर सिंहासन तक पहुंचा देसी ..बस अब ज्यादा मत सोचो , आ ही जाओ , पण म्हास पेली म्हांका पाड़ोसियाँ का आजो ....

(और इस बार आपको आने के लिए रास्ते ढूँढने की जरुरत नहीं होगी देश के हर कोने में आपके लिए रास्ते खुले हैं , अपनी मर्जी से जो आसान लगे, चुन लें , हमारे गद्दार साथी खुद आपको इज्ज़त से सिंहासन तक पहुंचा देंगे , बस अब ज्यादा मत सोचो , ही जाओ , पर हमसे पहले हमारे पड़ोसियों के आना )




(पहली बार राजस्थानी भाषा में लिखने का प्रयास किया है .... वैसे इतना मुश्किल भी नहीं है इसे पढना मगर रंजनाजी और अदाजी के सुझाव के अनुसार देवनागरी में भी लिख दिया है )

29 टिप्‍पणियां:

  1. परयास तो चौखो करयो थे और बातां भी साँची लिखी |

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  2. नहीं नहीं हम आपस में बात चीत से मामला सलटा लेगें ,उन्हें तो नहीं ही बुलाईये ...राजस्थानी भाषाई रंग बिखेरती रचना ..पधारो म्हारे देश .......

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  3. "म्हाका सिपाही थाने आप ही थाने इज्जत स्युं लेर सिंहांसन तक पहुंचा देसी।"
    थ्हे चोखी बात कही, आ तो पैहलां भी होयोड़ी है,म्हारा देश में जयचंदा री कमी कोनी,हर जुग मै कोई ना कोई तो मिल ही ज्यासी।

    म्हाने थारी राजस्थानी में लिख्योड़ी बातां चोखी, कदे फ़ेर लिखि्यो।

    राम राम सा

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  4. पसंद रो एक चटको भी लगा दियो हे।

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  5. रंग अनूठा। अच्छा लगा।
    व्यंग्य की धार लोकभाषा में और चोखी हो गई है। मुबारकाँ जी।

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  6. नहीं बिल्कुल भी मुश्किल नहीं था पढना और समझना । सामयिक बात है और बिल्कुल सटीक भी ..........धार अच्छी है

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  7. ये नया रंग चटकदार है....अच्छे से समझ आ गया...पर पड़ोस तक ही ठीक है उनको बुलाना ....
    वैसे बात सटीक कही है...कितने भेद भाव उपज आये हैं देश में...

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  8. अभी कोशिश कर रहा हूँ पढ़ने का , ,,,,,,,,

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  9. ओ काम आप जोर को कर्या छो, जो मायड भासा माय अतरी तीखी बाता सूं आपका मन की भड़ास काड्या. अर इन्ग्रेजा न बुलाबा की कायी जरुरत छ, आपा पहली सूं ही गुलाम तियार बैठ्या छा, देखर्या छो क गुलाम-मंडल देसा को आयोजण की कतरी तियारी चालरी छ. भोत खूब लिख्या छो सा

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  10. यह तो बढ़िया बात कह दी है आपने इस रचना में!

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  11. अलग ही लोकरंग लिए हुए हैं यह रचना...और सटीक भी....किसी आंचलिक भाषा की खुशबू हमेशा अच्छी लगती है.

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  12. अरे वाह वाणी जी ! कमाल कर दिया आपने ...राजस्थान कि मिट्टी कि खुशबू यहाँ तक फैला दी ..बहुत ही सटीक और सुन्दर रचना हुई है...

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  13. राजस्थानी भाषा में एक अजीब सा सोंधापन होता है। सुंदर।

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  14. padharo maharo desh.......itni hi rajasthani aatee hai mere ko.......lekin bhasa ki khubsurati khushi de rahi hai........:)

    mere blog pe mere naye post ko dekhen.....plz!

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  15. ६०% समझ आ गया,बाकी अंदाजा लगा लिया...और बस आपकी बातों अंदाज ने सम्मोहित कर लिया...
    बहुत सही कहा...काश कि जैसे पहले सोने चांदी लूटा था उन्होंने,अब कूदा कचड़ा लूट जाते...
    सचमुच हम्मे यह समझ नहीं आई है कि हम स्वतंत्रता का मान कर सकें या उसका महत्व समझ सकें...इससे बेहतर है परतंत्र और अनुशाषित रहना...


    (एक निवेदन है - जब भी ऐसा कुछ लिखें तो उसका हिन्दी अनुवाद भी लेख के नीचे दे दें...थोडा श्रम लगेगा आपको लेकिन इससे विषय/आलेख को पूरी तरह समझ पायेंगे लोग)

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  16. वाणीजी
    बहुत ही मीठा लगा ये व्यंग्य |हे भगवान मेरी एक आंख फोड़ना और पड़ोसी की मेरे से ज्यादा |
    वैसे उन्हें बुलाने की जरूरत ही कहाँ है वो तो राजनेताओ की रग रग मेंरचे बसे है|
    घणो आनंद आयो (मालवी )

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  17. अजी कम्पनी को छोडो इन मुये अग्रेजो को ही बुला लो, अब तो हम सब अग्रेजी भी बोलने लग गये है, उन्हे ज्यादा मुश्किल नही होगी.... क्या बात है आप ने मजाक मजाक मै कितनी गहरी बात कह दी. धन्यवाद

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  18. अंग्रेजों के मानस पुत्रों पर तगड़ा प्रहार
    क्या जागेगी उनकी सोयी आत्मा शायद कभी तो जागे

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  19. अरे...बाबा हम ठहरे निपट अनाड़ी, अनपढ़, गँवार.....ई भाषा हमरे पल्ले नाही पड़ी ...बड़ी मुस्किल से ४० % बुझाया है....अब इसपर कमेन्ट का करें....ई तो वोही हाल हुआ कि...अंग्रेजी फिल्म देख रहे हैं...सब हंस रहे हैं तो हमहूँ हंस रहे हैं...हमसे नहीं होगा ई सब....
    झूठ काहे कहें...
    छापना है छापो नहीं तो मत छापो ...आज कल वैसे भी.....उनकी कविता , मेरी कविता ...चल रहा है...और हमसे मुंह फुलाये बैठी हो....
    हाँ नहीं तो...!!
    और आज कल very good का मौसम बहुत जोर-शोर से चल रहा है ...का बात है....जाने दो

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  20. waah !!
    ye hui na baat...seedha prahaar hai...lekin unhein aane ki kya zaroorat hai unki nazayaz aulaadein to thok ke bhav mein baithi hain yahin...aur har din kai baar bech rahin hain, desh, dharm, jaatiwaad ka kachraa....tabhi to kachraa hi kachraa faila pada hai....wo aa bhi gaye to apni kheti ko itna lahlahaata paakar khud hi doob marenge.....
    kyonki wo ab itne ghatiya nahi ban sakte jitni ghatiya unki kheti hain...
    zabardast...
    badhaii..

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  21. यह अच्छा प्रयास है देज भाषा में लिखने का।
    पता नहीं, फिरन्गी जी को समझ आयेगा या नहीं!

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  22. राजस्थानी का अंदाज़ अलग ही छटा बिखेरता है। याद आ गया अपनी दस साल पहले की पोस्टिंग जैसलमेर के रेगिस्तान में....

    रचना का कटाक्ष बेधता हुआ...

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  23. राजस्थानी की चौंक देखकर म्हारो मन खुश हो गयो !
    देशज संस्कार में ढली और भी प्रविष्टियों की दरकार है आपसे ! आभार !

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  24. ऊपर की टीप में 'चौंक' को छौंक पढ़ा जाय | एतदर्थ क्षमाप्रार्थी हूँ |

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  25. यह अलग रंग/कौशल दिखा आपका !
    देशज सुगंध सदैव ही आकर्षित/आप्लावित करती है !
    फिर-फिर लिखिए ऐसी ही बहुत सी प्रविष्टियाँ !

    आजकल अमरेन्द्र भाई का कीबोर्ड आपके ब्लॉग पर टिप्पणी में एकाध अक्षर इधर-उधर कर ही दे रहा है ! बाद में सुधारते हैं भी हैं । यह भी अदा है क्या !

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