शुक्रवार, 29 जून 2012

बात तो दिमाग के खुलेपन की है ....

गत 25 माई को राजस्थान की एक  दिलेर जांबाज सुपुत्री  दीपिका राठौर ने एवरेस्ट पर फ़तेह हासिल कर इस स्थान पर झंडा फहराने वाली पहली राजस्थानी महिला होने का गौरव प्राप्त किया . भ्रूण हत्याओं , दहेज़ हत्याओं की  ख़बरों के बीच यह खबर एक सुखद बयार सी लगी . भ्रूण हत्याओं  के कारण लड़कियों की बीच घटती औसत जन्मदर के बावजूद  राजस्थान की बेटियों ने यूँ भी परचम कम नहीं लहराए हैं . इससे पूर्व राजस्थान की ही स्नेहा शेखावत ने 63वें गणतंत्र दिवस परेड में वायु सेना का नेतृत्व कर इतिहास रचा . गौरतलब हैं कि ये लड़कियां राजस्थान के छोटे कस्बे से निकल कर आये माता- पिता की संतान हैं . गाँवों में पाले बढे ये अभिभावक और इनकी संतान एक बेहतर उदाहरण है कि खुले दिमाग के लिए शहरी आबोहवा ही ज़रूरी नहीं है . इन अभिभावकों ने अपनी पुत्रियों को भी पुत्र की तरह ही आगे बढ़ने का अवसर प्रदान किया और परिणाम आज अपनी ख़ास राजस्थानी कुर्ती- कांचली में पूर्व मुख्यमंत्री के हाथों  मिठाई और बधाई प्राप्त करते उनके गर्वोन्मत्त चेहरे पर साफ़ नजर आता है .  




कुछ समय पूर्व ही एक राजपूत विवाह समारोह में जाना हुआ . जयमाल कार्यक्रम संपन्न हो चुका था, सामने स्टेज पर दूल्हा- दुल्हन को घेरे लम्बे घूंघट सहित राजपूती परिधान में बहुत सी महिलाओं के घेरे को देखते हुए पतिदेव ने मुझे ही वहां जाकर दुल्हन की माँ को लिफाफा दे आने के लिए कहा क्योंकि हमें एक और विवाह समारोह में भी शामिल होना था . चूँकि मैं उन महिला से कभी मिली नहीं थी , तो पतिदेव ने बताया कि तुम   उक्त महिला का नाम लेकर किसी से भी पूछ लेना. घूंघट वाली महिलाओं के झुण्ड के बीच उन महिला तक पहुँच उन्हें बधाई देकर जाने लगी तो वे पतिदेव से मिलने मेरे साथ ही आ गयी यह कहते हुए कि बिना भोजन किये नहीं जाए . इस बीच मैंने उन्हें पूछ ही लिया ,लम्बे  घूंघट में इन लोगों को परेशानी नहीं होती ,  दुल्हन के चेहरे पर भी  लम्बा घूंघट है , तस्वीरों में चेहरा भी नजर नहीं आएगा .वे सिर्फ मुस्कुरा कर रह गयी . बाद में पतिदेव ने बताया कि वे उनके कार्यालय में कार्यकुशल रौबदार  अधिकारी  हैं. 

विवाह के कुछ वर्षों बाद एक परिचित प्रधानाध्यापिका से एक इंटरव्यू के दौरान मिलना हुआ . उलटे पल्ले की साडी में उनके सादा सौम्य स्वभाव ने बरबस ही मोह लिया था . मेरी हिचकिचाहट को देखते हुए उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि तुम घर में घूंघट में रही हो , सिर्फ इसलिए मत सकुचाओ . तुम्हे पता है, जब मैं विवाह होकर ससुराल आई थी तो बहुत लम्बे घूंघट में रहना होता था . शादी के बाद ही मैंने बी एड किया , तब घर से परदे में निकालती थी और वापस घर लौट कर भी उसी परदे में रहना होता था . मगर इससे मेरी शिक्षा पर कोई असर नहीं हुआ. प्रधानाध्यापिका होने का आत्मगौरव उनके  चेहरे पर इसकी चुगली खा ही रहा था . हालाँकि छोटे बच्चों के कारण होने वाली असुविधा को देखते मैं उनके  प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर सकी , मगर एक अच्छी सीख तो मुझे उनसे मिल ही गयी कि ढके हुए सिर के भीतर भी खुले दिमाग हो सकते हैं . 

हिंदी की एक विदुषी प्रोफ़ेसर जिनका स्टडी रूम  मूल्यवान साहित्यिक  कृतियों से सजा -धजा है , जब भी हमसे मिलने घर आती , अपने सास- श्वसुर  के सामने उन्हें सिर ढके हुए ही पाया . 
वाणिज्य की  गोल्ड मेडलिस्ट व्याख्याता , आयुर्वेद की जानी- मानी वैद्य , एल एल बी में अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण प्रतिभावान वकील , जाने कितनी महिलाओं से मिलना हुआ जो घर में सिर ढके हुए या घूंघट में मिली . 


सगाई के लिए ससुराल से आई महिलाओं के एक हाथ लम्बे घूंघट को देखकर मैंने पास बैठी ननद से धीरे से पूछ लिया ." आपके यहाँ इतना लम्बा घूंघट निकलते हैं " . वे मुस्कुराती हुई बड़े गर्व से बोली , हाँ.  स्वयं को बुद्धिजीवी मानने वाले इस दिल और दिमाग के कितने टुकड़े हुए, बता  नहीं सकती थी . मेरा मायका भी कोई आधुनिक बस्ती का जमावड़ा नहीं था , वहां भी महिलाएं  अपेक्षाकृत   कम परदे में मगर रहती तो थी और चूँकि विवाह की स्वीकृति भी उनके घर के रीति -रिवाज़ और संस्कारों को जानते हुए ही दी थी , इसलिए विरोध करने का कोई कारण भी नहीं बनता था . विवाह के बाद घर की बुजर्ग महिलाओं से भी लम्बे घूंघट निकलने की ताकीद मिली तो एक आह निकल कर रह गयी . बुजुर्ग महिलाओं के सामने पति से बात नहीं करना ,  जेठ- ससुर से पर्दा करना और  उनसे कुछ पूछना कहना हो तो एक मध्यस्थ की आवश्यकता ,  यदि  घर में कोई और नहीं हो तो क्या करें , कुछ समझ नहीं आता था .  
एक रिश्तेदार के साथ जब सिनेमा देखने निकले तो रास्ते में मुझसे बोली ." भाभी , आप ठीक से सिर नहीं ढकती है , किसी ने देख लिया तो घर पर शिकायत कर देगा ". मैंने बड़ी उलझन में कहा . अब क्या सिनेमा भी घूंघट निकाल कर देखा जाएगा और यहाँ इस भीड़ में मुझे कौन पहचानता है . 
विवाह के बाद के इन चौबीस वर्षों में बहुत कुछ बदला है . आज पारिवारिक कार्यक्रमों में वही परिचित महिला कहती नजर आती है ," अरे , छोडो ये सब घूंघट , आप लोंग तो जेठ -ससुर जी से बात किया करो , हम कब तक मध्यस्थ बने रहेंगे ". 

इसके विपरीत आजकल परिचित  अथवा  रिश्तेदार अपेक्षाकृत  कम पढ़ी-लिखी , आधुनिक महिलाओं से साक्षात्कार  कम नहीं होता  . सिर ढकना , घूंघट करना , बड़ों के पैर छूना जैसे कार्यों को दकियानूसी मानने वाली इन रूपसी सजी धजी महिलाओं से बात कर देख लो  तो उनकी आधुनिकता की पोल पट्टी दन से उघड जाती है . 

इसका मतलब यह हरगिज नहीं है कि पर्देदार महिलाएं सब सुसंस्कृत ही होती है और आधुनिकाएं बिगडैल या दिमाग से पैदल . गज भर घूंघट में चपड़ -चपड़ कर लडती महिलाएं भी नजर आ जायेंगी तो  वहीं बिना परदे आँखों की शर्म लिए सभ्य महिलाएं भी .   
यह सब लिखते हुए दिमाग में हलचल भी हो रही है , सिर्फ महिलाओं के लिए ही क्यों है यह सब , आँख में लज्जा , जुबान में मिठास ...मैं यह सब क्यों लिख रही हूँ . हम लोंग पुरुषों के लिए क्यों नहीं सोचते ...वे क्या पहने , कैसे बोले , उनके संस्कार , आदर्श , लिहाज़ ,इन पर इतनी कम बात क्यों होती है . 
खैर , फिलहाल इस दिमागी हलचल को एक तरफ रख कर अपने दिल और दिमाग की  सम्मिलित संतुलित पुकार को ही सुन लेती हूँ ....
विगत वर्षों  में यह अच्छी तरह जान लिया है कि  घूंघट या पर्दा तो एक आवरण भर है .   स्त्री -पुरुष के विभेद के बिना यह निष्कर्ष तो निकल ही आया है  कि ढके हुए सिर के भीतर खुले दिमाग भी हो सकते हैं , और उघाड़े माथे के भीतर सब कुछ खाली भी हो सकता है .   

इस लिहाज़ से यह  पुरानी पोस्ट भी ताज़ा ही है ..

57 टिप्‍पणियां:

  1. @ हम लोग पुरुषों के लिए ... ,

    अजी सोचिये ना , सोचने पे कोई बैन थोड़े ही है :)

    @ घूंघट के पट ,
    यही सही है कि दिमाग का घूंघट के पट अपट से कोई वास्ता नहीं :)

    @ अच्छा या बिगडैल ,
    अब देखिये ना मिठाई खाने और खिलाने वाले में फर्क कीजिये :)

    @ आप ,
    आप अपनी सुसराल में घूंघट की ओट से दो अँगुलियों की गुलेल बनाकर बाहर की दुनिया देखा करती थीं याकि नहीं :)
    उस दौर में पति देव और आपका मध्यस्थ कौन था ?

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    1. @ मध्यस्थ कौन... ननद से बेहतर कौन :)
      @सोचने पे कोई बैन थोड़े ही है ...हाँ , सोच ही सकते हैं !
      @ अँगुलियों की गुलेल बनाकर बाहर की दुनिया.... घूंघट का मतलब पर्दा ही समझती थी इसलिए कई रिश्तेदारों को आज भी नहीं पहचानती हूँ :)

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  2. देश,काल, परिस्थिति के अनुसार रिवाज बनते और बिगड़ते हैं।

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  3. अंतर्वस्तु और प्रस्तुति तो वैसी ही है ....
    बहुत कुछ तेजी से बदल रहा है जो किसी के वश का नहीं है -आगे आगे कल्पनाओं ,अटकलबाजी ,माथापच्ची का स्कोप बहुत कम होता जाएगा -सब कुछ सामने अनावृत ...घूंघट और चोली के पीछे के सवाल गुम हो जायेगें!

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  4. भारत के कठिनतम समय में राष्ट्रीय गौरव बनाये रखने के काम में राजस्थान के स्त्री-पुरुष अग्रणी रहे हैं। ज़ाहिर है कि अस्थाई रूप से कई कुप्रथाओं के आने के बावजूद लिंगभेद के बिना मानवमात्र का समुचित सम्मान करने वाले परिवारों की वहाँ कोई कमी नहीं है। पर्दा आदि प्रथायें धूल की अस्थाई चादर जैसी हैं जिन्हें छाँटने के लिये समझ की एक बारिश ही काफ़ी है। समय के साथ जो भी होगा वह और अच्छा ही होगा।

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    1. परिवर्तन की बयार सकारात्मक दिशा में शुभ हो !

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  5. पुरातन काल में संस्‍कार पुरुषों को ही दिए जाते थे लेकिन वर्तमान में पुरुष को संस्‍कारहीनता की ओर बढाया जा रहा है। घुंघट में रहने से कोई जाहिल नहीं होता। राजस्‍थानी सभ्‍यता पर एक फिल्‍म बनी थी "पहेली", वह फ्ल्मि समाज की सच्‍चाई को व्‍यक्‍त करती थी। उसमें पुरातन सभ्‍यता में जी रहे लोग अन्‍य पुरुष के प्रेम को भी स्‍वीकार करते हैं। राजपूतों में आज भी घूंघट की परम्‍परा है लेकिन उनकी महिलाएं विदुषी हैं।

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    1. बिज्जी की कहानी पर बनी यह फिल्म कला और व्यवसाय दोनों ही रूप में बेहतरीन रही . वहीं आजकल "दिया और बाती हम" धारावाहिक भी ठेठ राजस्थानी संस्कृति को पेश कर रहा है .

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  6. बहुत सार्थक पोस्ट है वाणी जी ...बहुत कूछ याद दिला दिया आपने ...एह्सास हो चला कि जीवन कितना आगे बढ़ गया है ...!!सब कुछ बदला सा जगता है अब ...पुरानी बातों की अपनी ही अधारभूत सकारात्मक मान्यतायें थीं...!!

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  7. nice post
    dont know what else to write

    mind set is changing and now the process is going to be faster

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    1. परिवर्तन शुभ की ओर हो तो स्वागत है :)

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    2. vani ji
      parivartan , parivartan hi hotaa haen is mae shubh ashubh nahin hotaa
      pasand , naa pasand m achchha bura mehaj ham apni suvidha sae jod daetae haen


      koi ghughat kartaa haen usko achchha samjhtaa haen koi nahin kartaa usko achchha samjhaegaa

      lekin dono samay apni marzi honi chahiyae koi baadhytaa nahin ki naari kae liyae yae sahi aur purush kae liyae wo sahii

      samaaj kae banaye niyam sae upar haen kanun aur samvidhaan , uskae niyamo kaa palan jis din samaj karegaa us din sae hi badlaav ko ek disha milagi aur kam sae 50 saal ke baad us par koi aur behas kar raahaa hoga

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  8. सबसे पहली बात , सोचिए जी जरूर सोचिए मर्दों के बारे में भी और ऐसा ही लिखिए भी ..अभी दूसरी टीम की परफ़ार्मेंस भी देखन है ।

    घूंघट की अच्छी याद दिलाई आपने । श्रीमती जी आजन्म राजधानी दिल्ली में ही रही , पली बढी , अब तक जब भी मेरे साथ गांवं गई हैं ये गज भर की घूंघट डाले , हमारे सामने डोलती रहीं , जबकि परिवार में इतनी सख्ती नहीं थी मां चाचियों की तरफ़ से लेकिन वो खुद नहीं मानती थीं ..आज हमारे साथ कंधे से कंधा मिला कर हमारी सहकर्मी भी हैं । सो बंद घूंघटों का मतलब बंद हौसले नहीं होता ॥

    रोचक पोस्ट है और आनंद तब और आता है जब आप महिलाएं इन विषयों पर अधिकारपूर्वक बात रखती हैं ...दिलचस्प पोस्ट । कुछ कहने को प्रेरित करती हुई

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    1. आपकी श्रीमतीजी के बारे में जानना अच्छा लगा . आप दोनों का इसी प्रकार सामंजस्य बना रहे . शुभकामनायें !
      आभार !

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  9. एक प्रेरणा देता स्पष्ट विवेचन जो कई मिथक भी तोड़ता नज़र आया..... बहुत उम्दा

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  10. वैसे ये बात तो सही हैं कि किसी महिला की समझदारी से पर्दे या घूँघट का कोई लेना देना नहीं हैं.मैं भी पहले दादाजी के साथ क्षत्रिय महासभा में जाया करता था वहाँ बहुत सी महिलाओं को सिर पर पल्लू लिए और जोशीले भाषण देते हुए भी सुना हैं बल्कि वो वहाँ बडे आसानी से बडे बडे नेताओं मंत्रियों की बातें भी काट दिया करती हैं.शहरी महिलाएँ जहाँ कई बार दबी सहमी रहती हैं वहीं गाँव की महिलाएँ ज्यादातर विद्रोही तेवरों वाली होती हैं वो घूँघट में ही उमडती घुमडती रहती हैं.
    लेकिन फिर भी घूँघट से परेशानी तो होती ही होगी.घूँघट वाली महिलाएँ जल्दी से किसीसे सहज होकर मिल जुल भी नहीं पाती.यदि कोई मुझसे रोल रिवर्स की बात करे और महिलाओं की सामाजिक जिम्मेदारियाँ निभाने की बात करे तो मैं सबके लिए थोडी परेशानी के साथ ही सही तैयार हो जाऊंगा जैसे किचन के सभी काम या बच्चों को संभालना आदि लेकिन घूँघट या सिर पर पल्लू?
    नहीं बिल्कुल नहीं.पता नहीं महिलाएँ कैसे रह लेती हैं.यहाँ तो अपनी ही सुरक्षा के लिए कुछ मिनटों के लिए हेलमेट लगाने में ही जोर आता है.

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    1. मुश्किल तो होती है , मगर आदत हो जाती है. जैसा कि मैंने कहा ही , समय बदल रहा है . घूंघट /. परदे अब अनिवार्य नहीं रहे हैं .

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  11. ढके हुए सिर के भीतर खुले दिमाग भी हो सकते हैं , और उघाड़े माथे के भीतर सब कुछ खाली भी हो सकता है .
    अक्षरश: सही कहा है आपने ... बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ..आभार

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  12. राजस्थान ने देश का गौरव हर क्षेत्र में बढ़ाया है इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता ... आधुनिकता के साथ आज भी अगर संस्कृति धरोहर की बात की जाती है तो राजस्थान का नाम ही सबसे आगे रहता है ... परदे में रहना न रहना अपना व्यक्तिगत निर्णय भी हो सकता है इसका समझदारी से कोई लेना देना नहीं है ...

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  13. आज की लड़कियां कई नए आयाम स्थापित कर रही हैं .... फिर भी न जाने क्यों कन्या भ्रूण हत्या बंद नहीं हो रही ...

    ढके हुए सिर के भीतर खुले दिमाग भी हो सकते हैं , और उघाड़े माथे के भीतर सब कुछ खाली भी हो सकता है .

    बिलकुल सही .... घूँघट तो अपनी परम्पराएँ मानने की बात है ..... बदलाव आ रहा है ...

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  14. न घूंघट चरित्र का मापदंड होता है न आधुनिकता दुश्चरित्रता की .
    समय के साथ बदलने से ही मनुष्य का विकास हुआ है . आगे भी होता रहेगा .

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  15. सत्य है की बात तो दिमाग के खुलेपन की ही है कई खुद को आधुनिक कहने दिखने वालो की सोच भी जाहिलो जैसी होती है | आप ने ये भी सही कहा की बड़ो का सम्मान देना तो दिल से होता है उसमे घुघंट का क्या काम फिर घर आई बहु के सुविधा का भी ख्याल क्यों ना रख जाये , मुंबई में तो कोई पर्दा प्रथा नहीं है देखा ही कितने ही छोटे घरो में ससुर जेठ के साथ महिलाए आराम से रहती है पर्दा करने लगे तो रहना मुश्किल हो जाये , यहाँ तक की अब मारवाणी परिवारों में भी कोई पर्दा नहीं होता है मेरी सारी मित्र सभी आधुनिक कपडे पहनती है और साफ कहती है की जब तक उनके बच्चो की शादी नहीं हो जाती वो संयुक्त परिवार में सास ससुर देवर देवरानी सभी के साथ ही रहेंगी क्या खराबी है इसमे |

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  16. घूंघट/परिधान से चारित्रिक विश्लेषण संभव नहीं है. सूत्र वाक्य तो आपने दे ही दिया है 'कि ढके हुए सिर के भीतर खुले दिमाग भी हो सकते हैं , और उघाड़े माथे के भीतर सब कुछ खाली भी हो सकता है .'

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  17. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (01-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  18. महत्वपूर्ण तो ये है कि दिमाग के अंदर क्या है....फिर सर के ऊपर घूँघट रहे या ना रहे...फर्क नहीं पड़ता...
    पर घूँघट असुविधाजनक तो बहुत है..अच्छा है..धीरे-धीरे प्रचलन कम होता जा रहा है..

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  19. महिलाओं के बारे में सोचना बहुत ज़रूरी है। पुरुषों के बारे में बहुत कुछ सोचा गया है।
    जब कोई महिला एवरेस्ट फ़तह करती हैं या इंदलिश चैनेल पार करती हैं तो सिर गर्व से ऊंचा होता है। यह भी सिद्ध होता है कि वे किसी क्षेत्र में पुरुष से कम नहीं हैं।

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    1. स्त्रियों के बारे में सकारात्मक सोचा जाए , स्वयं स्त्रियों के द्वारा भी ...असंतुलन ना रहे !

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  20. आधुनिका की परिभाषा भी मर्यादित हो..

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  21. दिमाग का खुलेपन बहुत बड़ा सवाल है पर ढक्‍कन लोगों का कोई क्‍या करे (जि‍नका काम ही बंद रखना होता है)

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  22. .
    .
    .

    स्त्री -पुरुष के विभेद के बिना यह निष्कर्ष तो निकल ही आया है कि ढके हुए सिर के भीतर खुले दिमाग भी हो सकते हैं , और उघाड़े माथे के भीतर सब कुछ खाली भी हो सकता है .

    नहीं वाणी जी, असहमत हूँ आपसे यहाँ पर... खुला दिमाग इसीलिये तो खुला कहलाता है कि वह किसी दकियानूसी रस्मो-रवायत या धार्मिक विश्वास के चलते अपने चेहरे या सर को ही ढंकने की अनिवार्यता को नहीं मानता, फेंक देता है किसी कूढ़ेदान में... यह ढके सिर समझौतापरस्तों के हैं, या उन के जिनको इस प्रचलन में भी कुछ अच्छाई दिखती है... रही बात उघाड़े माथे की, भले ही सब कुछ खाली हो पर आप द्वारा बताई स्थितियों में उघाड़ा माथा रखने वाला कम से कम साहसी तो कहलायेगा ही...



    ...

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    1. यूँ तो इस विषय पर आई टिप्पणी में ही आपका जवाब भी शामिल है .
      फिर भी ---साहसी होने के अपने मापदंड हैं ... राजपूताने की वीरांगनाएँ साहस के लिए अपनी परिभाषाएं खुद चुनती हैं . सेना , शिक्षण ,प्रबंधन, वकालत आदि कार्य करने वाली स्त्रियाँ अपने कार्यस्थल पर परदे में नहीं रह सकती , घर पर उन्हे कैसा रहना है , यह उनका अपना चुनाव है . इन्होने अपनी ऊर्जा सिर ढके या नहीं के प्रश्न में व्यर्थ नहीं गंवाई . जितना जैसा मौका मिला उन्होंने उसका भरपूर सही दिशा में लाभ उठाया . और यह भी है बदलते समय के अनुसार उनकी संतानें अपने लिए क्या तय करे , इसका अधिकार भी वे उन्हें देंगी , यह निश्चित है .
      आपके अनुसार स्वतत्रता संग्राम में हिस्सा लेने वाली स्त्रियाँ भी साहसिक नहीं रही होंगी , शायद ही कोई महिला उन दिनों बिना सिर ढके नजर आती थी .
      जिनको सिर्फ गाली गलौज कर लेने/सकने वाले , अंग प्रदर्शन करने वाले लड़के /लड़कियां , स्त्रियाँ /पुरुष ही साहसी नजर आते हो , उनके नजरिये पर क्या कहा जाए !

      हटाएं
    2. .
      .
      .
      @ जिनको सिर्फ गाली गलौज कर लेने/सकने वाले , अंग प्रदर्शन करने वाले लड़के /लड़कियां , स्त्रियाँ /पुरुष ही साहसी नजर आते हो , उनके नजरिये पर क्या कहा जाए !

      वाणी जी,

      क्षमा चाहूँगा, पर खुला दिमाग रखने वाला कोई शख्स असहमति पर इस तरह का संदर्भरहित वार नहीं करता...

      खैर, मैं हमेशा से मानता हूँ कि हर कोई अपनी अपनी समझ व सुविधा के अनुसार नतीजे निकालने के लिये स्वतंत्र है... इसलिये आपकी इस राय का भी मैं सम्मान ही करूंगा... :)




      ...

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    3. मैंने आपकी असहमति पर सन्दर्भ रहित वार नहीं किया है . सन्दर्भ ब्लॉग जगत में बिखरे पड़े हैं , मैं दे नहीं पाई,लिंक खोंजने में व्यर्थ समय लगता . आपके विचार पर मैंने अपनी राय दी , यह वार नहीं है , मान्यवर :)
      सादर!

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  23. सकारात्मक संदेश देती सार्थक पोस्ट
    काश लोग अनुकरण भी करें..

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  24. बहुत ही अच्छा सन्देश देती पोस्ट है...
    बेहतरीन.....
    :-)

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  25. ढके हुए सिर के भीतर खुले दिमाग भी हो सकते हैं , और उघाड़े माथे के भीतर सब कुछ खाली भी हो सकता है .
    अक्षरश: सही कहा है आपने ... बात सीरत की होती है सूरत तो ढक लेती हैं पर सीरत भांडा फोड़ देती है शर्म आँखों की होती है परदे से नहीं पर्दा स्त्री की तरक्की में बहुत रूकावट है इस बात को आज के लोग धीरे धीरे समझने लगे हैं गाँव में भी पर्दाप्रथा ख़त्म हो रही है पर पर्दा उतर गया तो संस्कारों को तो मन के परदे में छुपा होना ही चाहिए उनको तो नहीं उतार कर फेंक देना चाहिए राजस्थान की संस्कृति को आलेख के माध्यम से बहुत सुन्दरता से दिखाया ....बहुत अच्छा अप्रतिम आलेख बहुत पसंद आया

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    1. संस्कार नहीं उतारे जाने चाहिए , सार्थक सन्देश !

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  26. परिधान या रिवाजों से कोई आधुनिक या पुरातनपंथी नहीं होता ..खुलापन दिमाग में होना चाहिए ..एकदम सही. सहमत हूँ. परन्तु अगर यह सब असुविधाजनक हो तो..जबर्दास्त्ती इनका पालन करने को कहना ..यह मुझे ठीक नहीं लगता.

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  27. बात परिवेश से जितना हो सके, सामान्जस्य बना कर चलने की है...

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    1. जितना संभव हो सके ...वास्तव में !

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  28. घूँघट करना, सिर ढंकना, डर का प्रतीक नहीं, सम्मान का प्रतीक होता है...लम्बा घूंघट करने के पक्ष में, मैं बिल्कुल नहीं हूँ...लेकिन ससुराल में बड़ों के सामने सिर ढंकने के पक्ष में हूँ..और अगर मेरे ऐसा करने से बड़े-बुजुर्गों को ख़ुशी मिलती है, वो सम्मानित महसूस करते हैं, तो फिर बुराई क्या है ?
    मैं मंदिर में सिर ढंकती हूँ, अपने जेठ के सामने सिर ढंकती हूँ..पहले अपने सास-ससुर के सामने सिर ढंकती थी, इसलिए नहीं कि मुझे इनसे डर था/है, मैं ऐसा सिर्फ़ इसलिए करती थी/हूँ, क्योंकि मैं इनको सम्मान देती हूँ..सिर उधाड़ कर मंदिर में हम कौन सा भगवान् के सामने साहस दिखा लेंगे...
    आपने कई तसवीरें देखी होंगी, इंदिरा गाँधी, जैसी और भी बड़ी बड़ी हस्तियों की...क्या हम सोच भी सकते हैं कि, उनके भेजे में कुछ नहीं है/था..या फिर वो किसी से डर कर अपना सिर ढकती रही हैं/थीं...

    बढ़िया लिखा है...
    आभार..

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    1. सही कहा ...सम्मान के लिए सिर ढक लेने से क्या फर्क पड़ जाता है , सम्मान ही नहीं हो तो सिर ढ़को या नहीं क्या फर्क पड़ता है !

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  29. हर चीज की प्रासंगिकता समय के साथ जानी जाती है
    ऐसा ही घूंघट के साथ है

    लेकिन सम्मान भी, समय के साथ बने रहना चाहिए

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  30. ढके हुए सिर के भीतर खुले दिमाग भी हो सकते हैं , और उघाड़े माथे के भीतर सब कुछ खाली भी हो सकता है .

    समय और स्थिति के साथ हमें सब चीजों की महता का पता होना चाहिए ....वर्ना हम जो हैं वह नहीं कहे जायेंगे ...!

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  31. बहुत अच्छा विषय उठाया है, अपनी परम्पराओं को लेकर हम प्रगति कर ही न पायें ये तो संभव ही नेहं है. इस स्थिति को मैंने भी देखी है. शायद ये हमारे संस्कारों में बसा होता है. आज भी मैं अपने जेठ जी के सामने सर पर पल्ला रखती हूँ आई आई टी में काम करते हुए भी नहीं लगता है कि मैं कहीं कुछ बंधन में हूँ. घूंघट करने या न करने से कोई फर्क नहीं पड़ता है. सोच छोटी जगह या बड़ी जगह से भी प्रभावित नहीं होती. बस लड़कियों को एक सही दिशा मिल जाए तो वे आसमान तक छू लेती हें.

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  32. सबसे पहले क्षमाप्रार्थी हूँ देर से आने के लिए ! इतने सारे विद्वान जनों ने इतना कुछ कह दिया है कि अब मेरा कुछ भी कहना दुहराव मात्र होगा ! लेकिन इतना अवश्य कहना चाहूँगी कि शादी विवाह या किसी धार्मिक अनुष्ठान के अवसरों पर अपने घर परिवार की पारंपरिक वेशभूषा में सजने और रीति रिवाजों को मनाने को मैं रूढिवादिता या दकियानूसीपन से जोड़ कर नहीं देखती ! इसे मैं अपनी संस्कृति और परम्परा के प्रति सम्मान और अगाध प्रेम के रूप में ही परिलक्षित करती हूँ और इस भावना का आदर भी करती हूँ ! यह भावना जबरन किसी पर थोपी नहीं जाती यह तो स्वयं ही मन में प्रस्फुटित होती है और इस मन:स्थिति में परम्पराओं का निर्वहन कर लोग शर्मिन्दा नहीं होते वे गर्व का अनुभव करते हैं और आनंदित होते हैं ! साभार !

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  33. बहुत बढ़िया पोस्ट ..
    पारिवारिक सामंजस्य आवश्यक है !
    आभार

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  34. अच्छी पोस्ट है। समय के साथ चीजें काफ़ी बदल रही हैं।

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