शनिवार, 17 सितंबर 2016

लेखन के अपने अभिनय.....

लेखक अपनी मर्जी से तथ्यों को तोड़ता मरोड़ता है ही कहानी को अपने मन मुताबिक लिख पाने के लिए !
एक पहलू यह है कि कई लेखकों को देखा है जो वो लिखते है , वो स्वयं हैं नहीं ...इसलिए मेरा तर्क होता है कि यह कत्तई आवश्यक नहीं कि लेखक के आचरण का असर उसके लेखन पर भी हो ...
दूसरा पहलू देखे तो कहीं न कही लेखक उस जैसा ही हो जाना चाहता है , जो वह लिखता है ! जैसा वह नहीं है ,वैसा नहीं हो पाने की पीड़ा में वह वही रचता है जो वह हो जाना चाहता है ...
यही हमारी आँख भी करती है ...कई बार वही दिखाती है जो हम देखना चाह्ते हैं !
सकारत्मक पक्ष यह भी है कि मुस्कुराने का अभिनय करते- करते मुस्कराहट सच्ची हो जाती है !

अभिनय की भी अनगिनत परतें होती हैं।  हो सकता है जो आपको सच्चा /तेजस्वी नज़र आ रहा हो उसके व्यक्तित्व के छिलके किसी अन्य के सामने उधड़े हुए हों।  भारत का दिन अन्य महाद्वीपों में रात भी हो सकता है !
व्यक्ति के सापेक्ष भी विचार /अनुभव बनते बिगड़ते हैं और यह लेखन में भी दृष्टिगोचर होता है।

सौम्य विचार लिखते लिखते मैं अपने मनोबल को मजबूत करता रहा हूँ। जैसे निरंतर के व्यायाम से आपका शरीर स्वस्थ और सुदृढ़ होते जाता है ठीक वैसे ही वैचारिक अभ्यास से आपका मनोबल भी सुदृढ़ होते जाता है। (हंसराज सुज्ञ)

15 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा लिखते-अच्छे हो जाने की संभावना बढ़ जाती है।

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  2. अच्छा लिखते-अच्छे हो जाने की संभावना बढ़ जाती है।

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  3. एक हद तक ही तथ्यों को तोडा और मरोड़ा जा सकता है

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (19-09-2016) को "नमकीन पानी में बहुत से जीव ठहरे हैं" (चर्चा अंक-2470) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "छोटा शहर, सिसकती कला और १४५० वीं ब्लॉग बुलेटिन“ , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  6. मेरा मेरे पिताजी से इसी बात को लेकर मतान्तर था... उन्हें एक लेखक के आचरण और लेखन में अंतर दिखाई देता था, इसलिए उनका लेखन पसंद करते हुए भी वे उन लेखक को पसंद नहीं करते थे. जबकि मेरा कहना था कि एक अच्छा लेखक अपने क्रितित्वा के कारण अच्छा है.
    खैर वैसे भी यह सब सापेक्ष है.

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  7. हरि अनंत हरि कथा अनंता की तरह हर लेखक अपने आप में अपनी मिसाल होता है..जैसा वह है उसका लेखन वैसा भी होगा, जैसा नहीं है पर दिखना चाहता है वैसा भी और जैसा है उसका विपरीत भी..मन की हजार परतें हैं न जाने कितने जन्मों के संस्कार भीतर हैं, जो कभी-कभी उसे स्वयं को अचंभित करते हुए कलम से उतर जाते हैं..कभी-कभी भविष्य भी अदृश्य राहों से प्रकट हो जाता है

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  8. ज़रूरी नहीं, कि जो लिखा जाए उसे जीया भी जाए ... पर मैं वही लिखती हूँ, जो मैं जीती हूँ
    शब्द ही जीने के बाद मिलते हैं उमड़ती भावनाओं को

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  9. जगत की सुंदरता विरोधाभास में ही है जिससे कोई भी अछूता नहीं है ।

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  10. ये विरोधाभास रहता है और सदा रहेगा ... क्योंकि हमारे देखने का भी दृष्टिकोण भी बदलता रहता है ...

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  11. सकारत्मक पक्ष यह भी है कि मुस्कुराने का अभिनय करते- करते मुस्कराहट सच्ची हो जाती है !
    लेखक लिखता तो अपने ही विचार है इसलिए कुछ तो उसका आचरण उसके लेखन में झलकता ही होगा .

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  12. सही कहा आपने! अच्छा लिखने की कोशिश में लेखक स्वयं भी अच्छा होने लगता है।

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