बुधवार, 28 सितंबर 2011

श्री घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग शिवालय , शिवाड (राजस्थान)


श्री घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग
शिवालय , शिवाड (राजस्थान)

पिछले दिनों जयपुर लगभग 98 किलोमीटर दूर द्वादशवे ज्योतिर्लिंग श्री घुश्मेश्वर जाना हुआ . भव्य साज सज्जा से युक्त यह मंदिर भक्ति भाव युक्त दर्शनार्थियों के अलावा पर्यटन स्थल के रूप में भी विकसित हो रहा है .
दरअसल महाराष्ट्र के मनमाड के वेरुल स्थित ग्राम में विराजित ज्योतिर्लिंग को भी द्वादशवे ज्योतिर्लिंग ही माना जाता रहा है , मगर शिवाड स्थित मंदिर के शिलालेखों और प्राप्त ऐतिहासिक और धार्मिक दस्तावेजों से इस स्थान की द्वादाश्वे ज्योतिर्लिंग के रूप में मान्यता स्थापित होती है .

द्वादशवे ज्योतिर्लिंग श्री घुश्मेश्वर राजस्थान के शिवालय (शिवाड ) ग्राम में विराजमान है . यह ज्योतिर्लिंग स्वयम्भू है अर्थात यह किसी के द्वारा निर्मित नहीं किया गया , अपितु स्वयं उत्पन्न है . पुरातनकाल में इस स्थान का नाम शिवालय था जो अपभ्रंश होता हुआ , शिवाल से शिवाड नाम से जाना जाने लगाशिवाड स्थित ज्योतिर्लिंग मंदिर के दक्षिण में भी तीन श्रृंगों वाला धवल पाषणों का प्राचीन पर्वत है, जिसे देवगिरी के नाम से जाना जाता है . यह महाशिवरात्रि पर एक पल के लिए सुवर्णमय हो जाता है जिसकी पुष्टि बंजारे की कथा में होती है कि जिसने देवगिरी से मिले स्वर्ण प्रसास से ज्योतिर्लिंग की प्राचीरें एवं ऋण मुक्तेश्वर मंदिर का निर्माण प्राचीन काल में करवाया . १८३७ में ग्राम शिवाड स्थित सरोवर की खुदाई करवाने पर दो हजार शिवलिंग मिले जो इसके शिवलिंगों के आलय होने की पुष्टि करता है . मंदिर के परंपरागत पराशर ब्राह्मण पुजारियों का गोत्र भी शिवालय है .

कई विद्वान् , धर्माचार्य , पुरातत्वविद, शोधार्थी आदि इस स्थान की यात्रा कर इसे वास्तविक घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग होने की पुष्टि कर चुके हैं .

शिव पुराण कोटि रूद्र संहिता के अनुसार भक्तिमयी घुश्मा के पुत्र को उसकी बहन ने सौतिया डाह के कारण टुकड़े -टुकड़े करके उसी सरोवर में फेंक दिया था ,जिसमे घुश्मा प्रतिदिन एक सौ एक पार्थिव शिवलिंगों की पूजा कर विसर्जित करती थी . घुश्मा की अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर आशुतोष शिव ने उसके मृत पुत्र को जीवित कर दिया तथा घुश्मेश्वर नाम से इस स्थान पर अवतरित हुए .

ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बाद किशना एवं जानकी के पाषाण स्तंभों की परिक्रमा आवश्यक मानी जाती है . कहा जाता है कि शिवाल ग्राम के किशन खाती की गाय जंगल में ज्योतिर्लिंग पर खड़ी होती तो उसके दूध की धरा स्वतः बह ज़ाती थी. किशना ने गाय का पीछा कर यह प्रत्यक्ष देखा तो अज्ञानतावश शिवलिंग पर कुठार प्रहार किया , जिससे खून का फव्वारा फूट पड़ा . किशना भय के मारे कुछ दूर भागा तो पाषाण का हो गया . गाय किशना की पत्नी जानको को घटनास्थल पर लेकर आई . जानकी ने प्रभु से प्रार्थना की तो भगवान् ने किशना को पुनः शरीर देकर जानकी को आशीर्वाद दिया कि उसकी पूजा करने के बाद किशना जानकी की परिक्रमा अवश्य होगी .

११२१ में मंडावर के राजा शिववीर चौहान ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया तथा अखंड ज्योति एवं शिवरात्रि जागरण एवं मेला आरंभ किया जो आज तक निर्बाध रूप से जारी है .


इस स्थान की विशेषता है कि अधिकांश समय यहाँ ज्योतिर्लिंग जलहरी में जलमग्न रहता है. जलहरी का जल चमत्कारी माना जाता है. कहा जाता है कि पारे के सेवन से उत्पन्न डाह एवं सफ़ेद दाग इस जल के सेवन से प्रायः नष्ट हो जाते हैं . भारत वर्ष के कोने- कोने से यात्री अपनी वेदना , आशाओं को संजोये हुए इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने आते हैं .


किसी विशेष परिस्थिति में इसके जल स्तर के गिरने को किसी संकट के आगमन की पूर्व सूचना माना जाता है .
शिवाडस्थ ज्योतिर्लिंग के दक्षिण में स्थित देवगिरी पर्वत में ऊँचाई पर एक शक्तिपीठ स्थापित है , जो इस स्थान के प्राचीन होने का पुख्ता प्रमाण है . प्राचीन ग्रन्थ श्री घुश्मेश्वर महात्म्य के अनुसार प्राचीनकाल में ज्योतिर्लिंग क्षेत्र शिवालय में एक योजन विस्तार में चारों दिशाओं में चार द्वार थे जिनका नाम पूर्व में सर्प द्वार , पश्चिम में नाट्यशाला द्वार तथा उत्तर में वृषभ द्वार व दक्षिण में ईश्वरद्वार था तथा पश्चिमोत्तर में सुरसरि सरोवर था .
वर्तमान में ग्राम शिवाड स्थित ज्योतिर्लिंग क्षेत्र के चारों ओर पुरोक्त चारों द्वारों के प्रतिक चार गाँव हैं जो सारसोप (सर्व सर्प्द्वर ), नत्वादा (नाट्यशाला द्वार ), बहड़ (वृषम द्वार ), ईसरदा (ईश्वर द्वार ) के नाम से जाने जाते हैं . पश्चिमोत्तर में सिरस गाँव सुरसरि सरोवर के स्थान पर बसा हुआ है .

वाशिष्ठी नदी के किनारे बिल्व पत्रों एवं मंदार के वन ...

घुश्मेश्वर महात्म्य ग्रन्थ के अनुसार ज्योतिर्लिंग के शिवालय क्षेत्र में वाशिष्ठी नदी बहती थी , जिसके किनारे मंदारवन(आकड़ों का वन ) तथा बिल्वपत्रों के वन थे जिनसे घुश्मेश्वर की नित्य पूजा की जाती थी .
ग्राम शिवाड स्थित ज्योतिर्लिंग क्षेत्र के पास बनास नदी बहती है जो पूर्वकाल की वाशिष्ठी नदी ही है तथा इसके किनारे बिल्वपत्रों का वन आज भी विरल रूप में स्थित है . मंदार वन के स्थान पर मंडावर ग्राम है जहाँ आकडे (मंदार ) बहुतायत में उत्पन्न होते हैं .

मुहूर्त मार्तंड ज्योतिष ग्रन्थ के अनुसार ग्रन्थ में प्रसिद्ध ज्योतिष ग्रन्थ के रचनाकार पंडित नारायण ने ग्रन्थ के संक्रांति प्रकरण के अंत में निम्न प्रकार अपने वंश , जनक , जन्मस्थान का उल्लेख किया है ---

" जिन्होंने विष्णु के चरणों में अपनी आत्मा को अर्पित किया है , ऐसे विष्णु चरणों से पवित्र कौशिक वंश में द्विजश्रेष्ठ श्री हरि, जिनसे शम , दम , तप , अध्ययन , जितेन्द्रियता , उदारता आदि गुणों से अलंकृत ब्राहमणों से पूजित अनंत नाम द्विज श्रेष्ट उत्पन्न हुए , उनके पुत्र नारायण ने मुहूर्तों के भण्डार इस मुहूर्तमार्तंड ग्रन्थ की रचना की जो पुराण प्रसिद्ध देवगिरी पर्वत के पास उत्तर में स्थित शिवालय सरोवर के उत्तर की ओर स्थित टापर ग्राम में रहता है .
ग्राम तापर , शिवाड स्थित ज्योतिर्लिंग के उत्तर में यथास्थान स्थित है तथा अनेक महान विभूतियों की जन्मभूमि और कर्मभूमि रहा है .

विक्रम संवत १०८१ (वर्ष 1023) में महमूद गजनवी के सिपहसालार मसूद द्वारा इस स्थान का विध्वंस किया गया . इस मंदिर के प्रांगन में मिले प्रस्तर खंड , मूर्तियाँ आदि अवशेष सातवीं शताब्दी के आसपास निर्मित मंदिरों की शैली के हैं , हरा -नीलापन लिए इन बलुआ पत्थरों पर भी युगल देव मूर्तियाँ उत्कीर्ण है .

मंदिर का वास्तुशिल्प पाणिनी के अष्टांगिक योग पर आधारित है . इस शिल्पकला में समाधि प्रिय शिव का सानिध्य योग बल से ही संभव मान कर निर्माण किया जाता है . इस मंदिर में यम एवं नियम की पांच- पांच सोपान (सीढियाँ ), नंदी (आसन ), पवनपुत्र (प्राणायाम ), कछुआ (प्रत्याहार ), गणेश (धारणा ), माता पार्वती (ध्यान ), भगवान् शंकर (समाधिस्थ ) विराजमान है जो कि अष्टांगिक योग पर आधारित वास्तुकला की पुष्टि करते हैं . १९९८ में खुदाई पर मिली कश्यपावतार की समुद्र मंथन मूर्ति अष्टांगिक योग में प्रत्याहार का प्रतिनिधित्व करती है .

सवाई माधोपुर होकर जयपुर आने वाली रेलवे लाईन पर ईसरदा स्टेशन से उतरकर बस या तांगे द्वारा शिवाड पहुंचा जा सकता है .


रविवार, 11 सितंबर 2011

आप क्यों जुड़े हैं इन नेट्वर्किंग साईट्स से !!!

एक दिन एक ब्लॉगर का सवाल था -  भारतीय संस्कृति को मानने वाले लोग फेसबुक पर क्या कर रहे हैं...
सोचा , मगर इस पर  आपत्ति का कोई कारण मुझे समझ नहीं आया.
फेसबुक या ऐसी और सोशल नेट्वर्किंग साईट्स देश- विदेश से लोगों को एक मंच पर जुड़ने की सुविधा देती हैं .इसका किसी संस्कृति से क्या लेना- देना हो सकता है !
बड़े लोगों की वे जाने ,मैं अपनी बात रख दूं ...

मैं एक सामान्य मध्यम वर्गीय गृहिणी हूँ जो ज्यादा समय घर में ही बिताती है . स्वाभाविक तौर पर हमारा मेल मिलाप भी ऐसे ही परिवारों में अधिक रहा है या हो सकता है, जहाँ स्त्रियाँ इकट्ठी होती है तो उनकी बहस और बातचीत का केंद्र धार्मिक परम्परायें ,कर्मकांड , व्रत- त्यौहार , कपड़े , गहने , परिवार ही होता है . परंतु जो  स्त्रियाँ कर्म क्षेत्र घर ही होने के बावजूद कुएं का मेंढक नहीं बने रहना चाहती हैं  और देश- विदेश की संस्कृतियों की जानकारी में रुचि रखती हैं , आस- पास या दूर देश की दुनिया में क्या घट रहा है की जिज्ञासा रख  जागरूक रहना चाहती हैं , उनके लिए इन्टरनेट कम कीमत पर अधिक जानकारी देने वाला एक  साधन है .
यहाँ कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है कि यदि सिर्फ जानकारी के लिए इन्टरनेट से जुड़े हैं तो सोशल नेट्वर्किंग की जरुरत क्या है. यह सही है कि प्रचुर मात्रा में सामग्री है इन्टरनेट पर  परंतु हर कोई इतना जानकार नहीं हो सकता है . भाषा के अल्पज्ञान के कारण, वायरस आदि की जानकारी हो या जो लिखा है उसको उसी तरह समझ पाना , सबके लिए इतना आसान नहीं होता . यह भी सही है कि यहाँ किसी की पहचान और इरादों को समझना मुश्किल है . आप जिसे अपना समझकर अपने विचार या समस्या बाँट रहे हैं  वह कब आपको दूसरों की नजरों में उपहास का पात्र बना दें , कहना मुश्किल है  परंतु यह समस्या तो सामान्य जीवन में भी कम नहीं है .
सोचें, वास्तविक जीवन में भी रिश्तेदारों या आपके आस- पास रहने वाले लोगों में भी अवांछित तत्त्व होते ही हैं . आखिर उनका सामना भी करना ही होता है .  कम से कम इन्टरनेट यह सुविधा तो देता है कि जिसको आप नापसंद करते हैं , उससे दूर रह सकें या उनको उचित जवाब दे सकें . ब्लॉक या इग्नोर करने की सुविधा/असुविधा वास्तविक जीवन में कहाँ है !!!
ये सोशल नेट्वर्किंग साईट्स ना सिर्फ विभिन्न परिवेश के लोगों को जानने और समझने का एक जरिया बनते हैं, बल्कि दूर प्रदेश या विदेश में रहने वाले आपके परिचितों /रिश्तेदारों या अनजान लोगों से भी जुड़े रहने का भी एक सहज और सस्ता माध्यम बनते है . इन साईट्स के माध्यम से मैं स्वयं अपने सहपाठी , मित्र ,ब्लॉगर्स आदि के अलावा परिवार /खानदान के उन लोगों से भी जुडी हुई हूँ ,दूरियों के कारण जिन्हें मैंने कभी देखा भी नहीं. किसकी जिंदगी में क्या चल रहा है से परिचित होने के के अतिरिक्त  एक दूसरे के सुख- दुःख से भी जुड़ना होता है !
किसी भी संस्कृति या अपसंस्कृति से इसका सम्बन्ध मैं नहीं जोड़ पा रही हूँ .
आप क्यों जुड़े हैं इन नेट्वर्किंग साईट्स से !!!
व्यर्थ वाद- विवाद में उलझने जितना समय ,सामर्थ्य या शक्ति मुझमे नहीं है . यह समझते हुए सार्थक , विवादरहित , मुद्दों से जुडी टिप्पणी करना चाहते हैं तो आपका स्वागत है !

रविवार, 4 सितंबर 2011

प्रथम गुरु को प्रणाम !

किसी भी मनुष्य की पहली पाठशाला उसका घर है . परिवार के विभिन्न सदस्यों के आपसी व्यवहार का असर उसके पूरे जीवन पर होता है . लेकिन जब थोडा बड़ा होने पर घर से बाहर की दुनिया में जहाँ वह प्रवेश लेता है ,जहाँ व्यक्तित्व निर्माण की महत्वपूर्ण प्रक्रिया प्रारंभ होती है , वह है उसका विद्यालय ... जो सबक विद्यालय और घर में सीखे जाते हैं , व्यस्क होने पर बाहरी दुनिया में पैर रखने पर वही आजीवन काम आते हैं ...वास्तव में सीखने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती , हम जीवन भर कुछ न कुछ सीख लेते रहते हैं और दिन प्रतिदिन परिपक्व होते हैं , लेकिन हमारे सबसे पहले गुरु को हम कभी नहीं भूला सकते हैं , यदि उन्होंने हमारे जीवन को सही दिशा दी हो .

आज शिक्षक दिवस पर मैं भी अपने प्रथम गुरु श्री राजकुमार भाटिया जी को याद कर रही हूँ . गुरु या शिक्षक शब्द सुनते ही सबसे पहले मुझे उनका ही स्मरण होता है . श्री राजकुमार भाटिया सर का जन्म लाहौर में 7 जुलाई 1935 को हुआ था .वे निहायत सादी वेश भूषा में उच्चतम संस्कारों की प्रतिमूर्ति थे. हिंदी , अंग्रेजी और संस्कृत साहित्य के प्रकांड विद्वान श्री भाटिया सर अपनी उच्च शिक्षा की बदौलत किसी बड़े शहर या महानगर में रहने और अपनी प्रतिभा का दोहन कर बहुत नाम और यश हासिल कर सकते थे , मगर उन्होंने बिहार के बहुत ही छोटे से गाँव को अपनी कर्मभूमि बनाया और अपनी छोटी बहन सरोज भाटिया के साथ अपने छोटे से विद्यालय से बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया .

वे अद्भुत स्मरण शक्ति के धनी थे. मुझे आज भी याद है कि जब वे कक्षा में पढ़ाने आते तो उनके स्वयं के हाथ में किताब कम ही होती थी . बिना किताब आँखे बंद कर वे हमें बताते कि अमुक किताब का अमुक चैप्टर अमुक पेज पर है , और उसके इस पैराग्राफ की पंक्तियाँ इस प्रकार हैं .

उनकी सिखाई ही प्रार्थना की कुछ पंक्तियाँ ही याद है अब , मगर हमारे जीवन जीने का मूल मंत्र आज भी वही हैं ...
" जी रहे जहान में तो खान- पान चाहिए ,
नित्य निवास के लिए हमें मकान चाहिए
चाहिए हज़ार सुख मगर ना दान चाहिए "

आजीवन अविवाहित सर को जब हम बच्चों के जन्मदिन पर निमंत्रित किया जाता तो वे सहर्ष उपस्थित होते थे . सर के माता -पिता पूरे कस्बे में चाचाजी और चाचीजी के नाम से ही जाने जाते थे . हर विद्यार्थी की घरेलू समस्या उनकी अपनी होती थी . कोई बच्चा कुछ दिन विद्यालय नहीं आ पाया हो तो उसका हालचाल पूछने उसके घर पहुँच जाते थे और यथासंभव उसकी मदद भी करते थे . आज उनके पढाये हुए छात्रा /छात्राएं देश -विदेश में विभिन्न कम्पनियों में उच्चतम पदों पर कार्यरत हैं .

जीवन भर किसी के सामने सर नहीं झुकाने वाले आर्यसमाजी श्री भाटिया सर को अंतिम समय में काल के वशीभूत हो अपनी बीमारी से परास्त होना पड़ा और एक सप्ताह पहले 31 अगस्त को उनका देहावसान हो गया .
शांति निकेतन , पंडित जवाहर लाल नेहरु , जानकी वल्लभ शास्त्री , रामधारी सिंह दिनकर ,आदि के साथ बिताये अविस्मर्णीय पलों को लिपिबद्ध कर पुस्तक का रूप देने की इच्छा अधूरी ही रह गयी !
वे जहाँ भी हो , उनके विद्यार्थियों की स्मृतियों में हमेशा जिन्दा रहेंगे ..

" गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुर्साक्षात्‌ परमब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवैनमः॥"

सभी शिक्षकों को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !