सर्दियों में खिडकियों से ताक झांकी कर लेने वाला चाँद या गर्मियों में छत पर टहलते चौदस और पूर्णिमा का चन्द्रमा जाने कितनी बार किस- किस तरह न मोह लेता है .
हलकी बहती ठंडी हवा , दूर तक शांत माहौल और उस पर धीमी आवाज़ में रेडियो पर बज रहे रात का समां झूमे चन्द्रमा , खोया -खोया चाँद , ये हवा ये रात ये चांदनी जैसे गीतों का सम्मोहन दूर बचपन से लेकर बुढ़ापे की और बढ़ते जस का तस है . मोहक वातावरण की खुमारी में बस ख़ामोशी से सुनते इन गीतों के साथ ओस की बूंदों सा भीगता मन अम्बर के जाने किस रहस्यमय लोक में भ्रमण कर आता है।
चाँद अपने आप में विशिष्ट है . नाम में भी स्त्रीलिंग या पुल्लिंग का भेद नहीं .. शशि , इंदु है तो सुधांशु , हिमांशु , मृगांक, मयंक भी . श्रापित हो शिव के सर चढ़ उन्हें शशिधर बनाता है. स्वयं घटते- बढ़ते संदेसा भी देता है . कुछ भी स्थिर नहीं , ना सुख , ना दुःख ...सुख गया तो दुःख भी जाएगा ! अँधेरी रातों को जगमग करता एक चन्द्रमा सितारों के घने झुरमुट पर भारी है . बुझे मनों में भ्रम या आस जो कहे जगाये रखता है . अमावस की रात कितनी लम्बी हो , पूर्णिमा भी होगी !
बदली कितनी घनी हो , फाड़ कर आसमान का सीना झलक दिखला देता है अक्सर!
किसी प्रिय ने चाँद के हाथों अपने प्रियतम को संदेसा भेजा तो कोई बहन भाई की राह तकते चाँद को उसे राह दिखने की फ़रियाद करती है .
किसी ने माशूक को कहा चाँद तो किसी का लाल हो गया उसका चाँद . किसी भूखे पेट बच्चे को रोटी सा नजर आया चाँद तो किसी का मामा बन गया . कितने गीत लिखे गए , तस्वीरें ली गयी , चित्र बनाये गए , परंतु वह खूबसूरती आंकी ना जा सकी .
यह तो हुई भावुक दिलों , संवेदनशील कलम या मन की दास्ताँ . खुश होकर कुछ देर गा ले इंसान - आजकल पाँव जमीन पर नहीं पड़ते मेरे .
कल्पना या खवाबों की उड़ान में बेशुमार विचर आये मन मगर भावुकता से परे एक कठोर धरातल भी है जिसपर हर इंसान को चाहे /अनचाहे पैर टिकाने ही पड़ते हैं . आखिर तो हम इंसान हैं . पक्षी तो है नहीं कि पर फैलाये आसमानी बादलों को निहारते तो कभी गर्दन झुक कर नीचे पृथ्वी के नदी , झरने ,पहाड़ों को निरखते मीलों उड़ते रहो . थक जाओ तो कही किसी पेड़ , मकान , तारों की छत पर दो मिनट सुस्ता लिए और फिर वही उन्मुक्त उड़ान .
चाँद को करीब से देखने की चाहत में विज्ञान ने भी क्या नहीं किया . बरसों बरस दूरियां आंकी , अनुमान लगाते गणनाएं की जो जान लें की कितनी दूरी है इस चाँद और हम इंसान के बीच . दूरबीन से न हुआ तो टेलिस्कोप लगा कर देख लिया .और जब देखा तो कितने भरम टूटे होंगे ...
कि चाँद की धरती तो बड़ी उबड़- खाबड़ है . बड़े गड्ढे हैं वहां . चाँद से पृथ्वी को देखे तो वह भी चाँद सी ही नजर आये जिसे पृथचन्दा कहते हैं यानि की इसी अन्तरिक्ष में हमारी धरती भी किसी के लिए चाँद सी है . वह " किसी " अभी हम सबसे अनजाना है हालांकि किस्से कहानियों में जाना- पहचाना भी !
कुछ वैज्ञानिको ने तो यह शोध भी किया कि यदि चाँद से धरती की दूरी कम हुई तो धरती पर प्रलय जैसी स्थितियां हो सकती है . माने कि चाँद टंगा रहे वही दूर , हम पृथ्वीवासियों के लिए यही ठीक है .
चाँद पर पहुंचे एक चंद्रयात्री का अनुभव तो यही बताता है कि कोई नहीं , पहुंचे चाँद पर तो ठीक था . वहां से देखने वाले दृश्य साफ़गोई से तो न बताते वह भी तब जब की प्रोग्राम लाईव हो .
लेखकों /कवियों / कवयित्रियों के लिए अत्यधिक आवश्यक है की विज्ञान और विज्ञान की छात्रों /छात्राओं की ओर से आँखें मूंदे ही रहे वर्ना चाँद से उनकी तुलना पर क्या न भुगतना पड़ जाए . चाँद से तुलना के खतरे हजार है .
जाहिर है किसी खगोलशास्त्री को आपने कह दिया कि मुखड़ा चाँद सा है तो वह लट्ठ लेकर ना पीछे पड़ जाए . बन्दे/बंदी ने टेलिस्कोप से चाँद को बहुत करीब से बार -बार देखा है. आपकी तारीफ़ को जाने क्या समझ ले!
वर्षों पुरानी पत्नी (पुरानी तो पत्नी ही होगी न , प्रेमिका तो होने से रही ) को चाँद कह दिया तो तड़ से जवाब मिल जाए - जानती हूँ तुम्हारे इरादे . अब वहीँ आसमान में टंगे देखना चाहते हो पर मैं तुम्हारी यह चाहत पूर्ण नहीं होने दूँगी . यही रहूंगी तुम्हारी छाती पर मूंग दलते !
कई समझदार टाईप के पति /प्रेमी गा -गा कर कहते नजर आते हैं - चाँद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था .
कई समझदार टाईप के पति /प्रेमी गा -गा कर कहते नजर आते हैं - चाँद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था .
सोचो तो... जो बेचारी भोली -भाली माशूकाओं को असल बात पता चले तो के जी , सानू चंगी तरह मलुम है साडी इन्नी बढिया किस्मत कित्थों हुई " अपणी किस्मत में तो तू ही सी !!
समझ भी लो उनके दुख/ दर्द को . 😝
साहित्यकार और कवि के लिए चाँद महबूबा , माशूका , प्रेमिका कुछ भी हो , कुछ भी कहें परंतु
किसी भूखे गरीब को चाँद दिखा दिया तो उसे चाँद में रोटी- सा गोल होने के अतिरिक्त क्या नजर आयेगा .....









