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गुरुवार, 4 जुलाई 2019

जिन खोजा तिन पाईंयाँ....


स्कूल से आते ही बैग पटक दिया काया ने. मोजे कहीं, जूते कहीं . बड़बड़ाती माला ने सब चीजें ठिकाने रखीं और बैग से निकाल कर डायरी देखने लगी.
क्लास टीचर ने पैरेंट्स को मिलने का नोट डाला था. सिहर गई एकबारगी माला.
ओह! अब क्या गलती हुई होगी!
पिछले कुछ समय से स्कूल से आने वाली  शिकायतें उसे परेशान कर रही थी. अभी पिछले हफ्ते ही तो कॉपी किताबों के कवर फटे होने की शिकायत करते हुए कक्षा अध्यापिका ने बहुत भला बुरा कहा था उसे. शिकायतें सुनने उसके सामने अपराधी - सा उसे ही खड़ा रहना होता था. शेखर ऐसे समय में पीछा छुड़ा लेते किसी तरह.
तुम ही जाकर सामना करो. पता नहीं आजकल ध्यान कहाँ रहता है तुम्हारा. बच्ची पढ़ने में पिछड़ रही . न उनकी यूनिफॉर्म का ध्यान रहता है , न पढ़ने लिखने का . मैं दिन भर ऑफिस में काम करने के बाद क्या -क्या सँभालूँ?

माला को शेखर पर गुस्सा भी नहीं आता. वाकई लापरवाही उससे हो ही रही थी.

अभी पिछले महीने ही काया का रिजल्ट लेने जाने की तारीख भूल गई थी. असावधानीवश उसे एक दिन बाद की तारीख ध्यान में रही. दूसरे दिन स्कूल में भीड़भाड़ कम होने पर उसे शक तो हुआ मगर आ गये थे तो मिलना भी जरूरी है.  कक्षा अध्यापिका ने रिजल्ट देने से साफ मना कर दिया था. आखिरकार शेखर ने ही माफी माँगते हुए फिर कभी ऐसी गलती नहीं होने का आश्वासन दिया तब जाकर  उन्होंने चेतावनी देते हुए मार्कशीट सौंपी थी.  स्वयं की गलती के कारण शेखर को माफी माँगते देख माला ने जाने कितनी बार मन ही मन स्वयं को धिक्कारा होगा. पति पत्नी में आपस में कितनी भी नाराजगी और लड़ाई झगड़े होते हों  मगर किसी अन्य का अपने सामने ही पति को बुरा भला कहना माला सहन नहीं कर पाती. यह प्रेम था या संस्कार , माला इस पर पर्याप्त बहस भी मन ही मन कर लेती .

उस दिन रास्ते भर अपने गुस्से पर काबू रखते शेखर घर आते ही माला पर फट पड़ा.
क्या करती रहती हो दिन भर. अगली बार से मैं स्कूल हरगिज नहीं जाऊँगा. खुद ही संभालो यह सब.

मैं क्या करूँ. मैंने देखी तो थी डायरी. पता नहीं कैसे गलत तारीख ध्यान में रही. माला की शर्मिंदगी आँखों से गंगा जमना बन बह निकली.

इन आँसुओं से परेशान हो गया हूँ मैं. कितना समझाऊँ रोना बंद करो. घर में, बच्चे में मन लगाओ पर तुम समझती ही नहीं.
शेखर ने माला का हाथ पकड़ कर उसे करीब बैठा लिया. थोड़ी सी सहानुभूति और ढ़ेर सारे प्यार ने जैसे आँखों के बाँध को तोड़ कर रख दिया हो. हिचकियों सहित तेज हुई उसकी रूलाई से काया सहम कर पिता से लिपट गई.

मैं क्या करूँ. नहीं भूल पाती पिता को. किस तरह अपने पैरों से चलकर अस्पताल की सीढ़ियां चढ़ कर गये फिर  निढ़ाल हो गये. ऐसा कैसे हुआ. आपने कुछ क्यों नहीं किया. मैं कुछ क्यों नहीं कर पाई पापा के लिए...
रोते -रोते बेहाल हुई माला और गोद में काया को थपकियाँ देकर सुलाता शेखर किंकर्तव्यविमूढ़ हो उठा. मन ही मन खुद पर नाराज भी हुआ पर वह करे तो क्या. दिन भर ऑफिस का प्रतिस्पर्धी माहौल, छोटे बच्चे की जिम्मेदारी और माला की बढ़ती हुई बेख्याली. घरेलू कार्यों में भरसक सहायता करने के अलावा गृहस्थी की गाड़ी खींचने के लिए किये जाने वाले अतिरिक्त कार्य भी. अपनी जिम्मेदारियों की समझ उसे हौसला खोने भी नहीं देती थी. अधलेटा सा शेखर इन सब सोच में डूबा था कि दरवाजे पर खटखट ने उसको सजग किया. बचपन का मित्र कमल अपनी पत्नी विद्या के साथ  दरवाजे पर खड़ा था. उनको ड्राइंग रूम में बैठाकर शेखर ने माला को धीमे से जगाया. हाथ मुँह धोकर मुस्कुराहट लिए बैठक में आई माला हालांकि बिखरे बाल और सूजी आँखें उसके उदास मन की हालत बयां कर रहे थे. कुछ देर औपचारिकता में स्वागत अभिवादन के बाद
चाय बना लाती हूँ कहती माला रसोई  जाने केे लिए मुड़ी तो विद्या भी उसके साथ हो ली यह कहते हुए कि मैं भाभी की मदद करती हूँ.
आपके पापा के बारे में सुना था तबसे ही आपसे मिलने का मन हो रहा था. कैसे क्या हो गया था!
चाय की पतीली गैस पर रखते माला भीगी पलकों से सब बताती रही.
बहुत बुरा हुआ लेकिन पीछे रह जाने वालों को हिम्मत रखनी पड़ती है. चाय विद्या ने ही कप में छानी. बिस्किट, नमकीन करीने से प्लेट में रखते हुए माला फिर से सुबक पड़ी.
अपना ख्याल रखो भाभी. कितनी कमजोर हो गई हो.
नन्हीं काया भी तुम्हारे पास है. और देखो , हर समय रोते रहने से कुछ हासिल नहीं है. उलटा सामने वाला भी परेशान हो जाता है. स्वयं स्वस्थ न रहो तो कोई एक गिलास पानी भी नहीं पूछता. शेखर अकेले कितना और कब तक  ध्यान रखेगा..

ठीक कहती हो विद्या. मैं भी सोचती हूँ मगर...
दुख और शर्म की मिली जुली अनुभूति इंसान को कितना दयनीय बना देती है. सोचती हुई विद्या ने माला का हाथ पकड़ कर हौले से दबाया. दर्द को अनकही संवेदना ने चेहरे की स्मित मुस्कुराहट में बदल दिया.

चाय बन गई या कहीं बाहर से ही आर्डर कर दें .
उधर से हल्के ठहाके के साथ  कमल की आवाज आई तो दोनों चाय और नाश्ते के साथ बैठक में आ गईं. दोनों के साथ कुछ हल्की- फुल्की इधर उधर की बातों से माला भी सहज हो आई थी.

आज फिर से कक्षा अध्यापिका के बुलावे ने उसे चिंता में डाल दिया था. क्या कहेगी शेखर को, कैसे सामना करेगी उसका. जैसे अपने हाथों पैरों पर नियंत्रण न रहा उसका. साँसें जैसे डूबती सी जातीं थीं. दवाईयों के डब्बे से  ब्लड प्रेशर की दवा ढ़ूँढ़ कर ले ली मगर घबराहट पर काबू ही न था. अकेली क्या करेगी वह.
काया को गोद में उठाया और दरवाजे की कुंडी लगाकर पड़ोस के वर्मा जी के घर चली आई. मिसेज वर्मा उसकी मानसिक स्थिति समझती थीं. अपने काम निपटाकर माला के पास आ बैठतीं थी कई बार. उसके गोद से कायाको लेकर सुला दिया . माला वहीं सोफे पर पसर गई. अपनी घबराहट पर नियंत्रण न रख पाई और फूट फूट कर रो पड़ी. मिसेज वर्मा ने उसे पानी पिलाया और सिर पर हाथ फेरते बहुत समझाया भी.
दवा से कुछ फायदा नहीं हो रहा तो किसी पीर देवता से झाड़ा लगवा आयें या  फिर किसी देवी देवता को पूछ लेते हैं. अगली गली में वह कन्नू रहता है न , उस पर छाया आती है. कहते हैं सब सच बताता है. कुछ टोना टोटका  कर दिया हो किसी ने या कोई देवताओं का दोष हो. या फिर छोटा बाजार चल आयें . वहाँ फूली देवी में माता आती है. झाड़ा भी देती हैं और साथ ही देसी दवा भी . बहुत लोगों को फायदा होते देखा है.

देवी देवता, झाड़ फूँक सुनते माला कुछ चौकन्नी सी हो गई. विज्ञान का ज्ञान उसे इन सब बातों पर विश्वास न करने देता था. मगर काया की तबियत खराब होने पर दवा देते हुए भी राई लूण करना नहीं भूलती थी. या फिर कपड़े की कतरनों से वारते हुए भी नजर उतारने का टोटका कर ही लेती थी. करने को कार्तिक में करवा चौथ पर चंद्रमा के दर्शन कर उसकी पूजा भी करती ही थी जबकि उसे स्कूल में पढ़े गये विज्ञान के सबक अच्छी तरह याद थे कि चंद्रमा एक उपग्रह मात्र ही है . उसकी रोशनी भी उसकी अपनी नहीं. वह सूर्य के प्रकाश से ही चमकता है. मगर कुछेक अवसरों पर दिमाग की खिड़कियों को बंद कर श्रद्धा के वशीभूत हो किये गये शुभ कार्य एक सुकून या प्रसन्नता का भाव उत्पन्न करने में सहायक होते हैं. पारिवारिक और सामाजिक मेलजोल के ये पर्व या व्रत त्योहार रूढ़ि में न बदलने तक एक प्रकार से दैनिक कार्यों जैसे आवश्यक से ही  हो जाते हैं और रससिक्त कर सुख और आनंद की अनुभूति देते हैं.

नहीं. अभी इसकी जरूरत नहीं. कुछ आराम मिला है मुझको.  यदि आवश्यक हुआ तो हम जरूर चलेंगे वहाँ.

अब तक पैर समेट कर आराम की मुद्रा में बैठती माला संयत हो चली थी. मिसेज वर्मा की बेटी शुभी चाय बना लाई थी. किशोरवय की उनकी पुत्री चपल और हँसमुख होने के साथ सुघड़ भी थी. काया के साथ खेलते बतलाते माहौल को सुखद बनाने में अपनी भूमिका में कुशल लगती थी वह.

अब चलती हूँ मैं. शेखर के आने का समय भी हुआ जा रहा. फिर इसका होमवर्क भी कराना है. काया की अँगुली पकड़ते वह  उठ खड़ी हुई . मगर घर की ओर मुड़ते कदम उसे फिर से चिंता में डाले जाते थे. क्या कहेगी शेखर को वह. क्यों बुलावा आया होगा स्कूल से...

अभी दरवाजे पर लगा ताला खोला भी न था कि पीछे से दौड़ती हाँफती शुभी उसकी साड़ी का पल्ला खींचते उसे जल्दी वापस उसके घर चलने को कहने लगी.
जल्दी चलिये . माँ ने बुलाया है. कहते उसने काया को गोद में उठा लिया.
अरे! घबराइये मत. कोई आया है घर पर. माँ आपसे मिलवाना चाहती है.
कौन होगा जिससे मिलवाना इतना जरूरी है कि उसके लिए शुभी इस तरह दौड़ती भागती चली आई. काया और शुभी को पीछे छोड़ लंबे डग भरती हुई माला अगले ही पल में मिसेज वर्मा के सामने थी.

आओ माला. कितनी अच्छी बात है न. अभी कुछ ही समय पहले इसकी बात कर रहे थे हम . तुम जैसे ही बाहर निकली इसका आना हुआ. जानती हो न इसको.

हाँ .  आपकी गली में बच्चों के साथ खेलते इसे कई बार देखा है. चेहरे से पहचानती हूँ.

अरे. यही तो है कन्नू जिसके बारे में मैं बता रही थी. वही जिस पर देवता की छाया है. आगे के शब्द फुसफुसाते से कहे थे उन्होंने.

जा शुभी. भैया के लिए पानी भर ला लोटे में. एक आसन भी दे जा बिछाने को.

अनमनी सी हो उठी थी माला. यह क्या कर रही हैं मिसेज वर्मा. उसे विश्वास नहीं इन ढ़कोसलों पर. कैसे कहे उसके सामने ही. मगर तब तक शुभी आसन बिछा चुकी थी. उसके सामने पानी का लोटा भी रख दिया गया था.

कैसे भागे यहाँ से सोच रही थी माला . शेखर को पता चला तो कितना गुस्सा होगा. तब तक कन्नू जी आसन पर जम चुके थे. हाथ पैरों को बल खाने की मुद्रा में लाते उसकी आँखें हल्की ललाई लिये थीं. आसन पर बैठे मरोड़े खाते देख मिसेज वर्मा उसके सामने जा बैठीं. इशारे से शुभी को काया को वहाँ से ले जाने को कहते हुए माला का हाथ खींचकर अपने पास ही बैठा लिया.

बोलो महाराज. क्या बात है. क्या कष्ट है!
मिसेज वर्मा की  उत्सुकता देखते बनती थी वहीं माला सकुचा रही थी. किस फेर में पड़ गई आज वह.
उधर कन्नू के शरीर के झटके बढ़ते जा रहे थे . नहीं के इशारे में जोर से गरदन हिलाते हुए वह छटपटाता सा दिख रहा था. कुछ कहने के लिए मुँह खोलता कि उढ़के से  दरवाजे पर जोर से खट की आवाज आई. वर्मा तेजी से घर में घुसे थे.

ये क्या हो रहा है यहाँ...
तत्क्षण ही तेजी से पानी का लोटा उठाकर गटकते कन्नू अपनी गरदन ढ़हाते जमीन पर लोट गया.  कुछ ही सेकंड में वापस अपनी स्वाभाविक स्थिति में उठ भी बैठा. सब कुछ इतने कम समय के अंतराल में हुआ कि माला समझ नहीं पाई कि आखिर हुआ क्या था.
कन्नू  वर्माजी  का अभिवादन करते हुए उठकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर जम चुका था.

वर्मा जी घर के भीतर चले गये  तो मिसेज वर्मा ने धीमे स्वर में माला से कहा... अभी देवता चले गये पर कुछ असर तो रहेगा. पूछती हूँ तुम्हारी समस्या के बारे में.

इनके पिताजी के देहांत के बाद इसकी तबियत ठीक नहीं रहती. पेट में अजीब सा दर्द बताती है. खाना पचता नहीं . दिन पर दिन कमजोर हुई जा रही. दवा लेते दो तीन महीने हुए. कुछ असर नहीं हो रहा. कहीं पैर तो नहीं पड़ गया इनका कहीं.

अब तक मिसेज वर्मा और माला भी कुर्सियों पर बैठ चुकी थीं.

  हम्म्म्... पिता जी के जाने के बाद.... एक जोर की साँस ली कन्नू ने और रूआँसी सी हुई माला की ओर देखा.

क्यों रोती हो इतना. किसके लिए रो रहे. क्या समझते हो . तुम अमर हो. ये जीवन है. इसका क्या भरोसा. सोचो कल ही तुम्हें कुछ हो गया तो.... तुम्हारा इस समय का रोना क्या काम आयेगा.

कान के पर्दे पर जैसे किसी तीक्ष्ण वस्तु का वार हुआ. भय से सिहर उठी माला. पाँच वर्ष की नन्ही सी काया , अकेले पड़ता शेखर... इतनी सी देर में क्या- क्या नहीं सोच लिया उसने.

मैं चलती हूँ. शेखर परेशान होंगे. काया को गोद में उठाये माला दौड़ती सी घर आ पहुँची. शेखर घर आ चुका था. स्कूटर भीतर रखने के लिए मेनगेट पूरा खोलता हुआ रूक गया.

कहाँ गई थीं. अब क्या हो गया. उसके मुरझाये
हतप्रभ चेहरे को देखते कहा उसने.

कुछ नहीं. काँपते हाथों से दरवाजे का ताला खोला माला ने. काया को गोद में लिए हल्की सिसकियों से शुरू हुई उसकी रूलाई जल्दी ही चीख कर रोने में बदल चुकी थी.  शेखर और काया को अंक में समेटे कुछ देर फूट फूट कर रोती रही माला. होठों में ही अस्पष्ट शब्दों में बुदबुदाती.  काया के उलझे बालों की लटें, तुड़ी मुड़ी सी यूनिफार्म को अँगुलियों से सही करते हुए . वह इतनी निर्दयी कब और कैसे हुई. पिता का जाना उसे  इतना व्यथित कर रहा कि उसने पाँच वर्ष की नन्हीं काया के बारे में भी नहीं सोचा. अपने आपको इतना कमजोर कैसे कर सकती थी वह. उसके और काया के अच्छे भविष्य के लिए खटते शेखर के प्रति इतनी लापरवाह कैसे हो सकती थी वह. अपनी जिम्मेदारियों से कैसे भाग सकती थी. क्या उसका अपना दुख इस दूधमुंही काया के दुख से भी बढ़कर था...
उसके बालों में अँगुलियाँ फेरते शेखर ने उसे जी भर रो लेने दिया.

तुम बहुत साहसी हो और हम दोनों का संबल भी. शेखर समझा रहा था और माला कल के नये सूर्य के साथ अपने भीतर ऊर्जा भरते हुए जिंदगी की ओर बढ़ रही थी. दर्द वहीं था अभी, अफसोस भी परंतु उसके साथ अपने उत्तरदायित्व को अच्छी तरह निभाने,का हौसला भी...।

कितनी दवाईयाँ, कितनी किताबें और कितने मनोवैज्ञानिक नहीं समझा सकते थे जिसे , एक अल्पशिक्षित अज्ञानी ने अनजाने में समझा दिया था उसे। देवी देवता के आने जाने  का पता नहीं और न कभी वह इस पर विश्वास भी कर पायेगी मगर जीवन मजबूती से चलते रहने का नाम है, दुर्लभ है . यह जरूर समझ चुकी थी माला. कमर कस कर आने वाली चुनौतियों से लड़ने को तैयार.

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

टोटा.... लघु कथा


ये ले सुगनी! कल से काम पर मत आना.

उसके हाथ में रुपये ठूँसती मालकिन बोली!

पूर्व  सूचना के बिना छुट्टी कर दिये जाने से सहसा हतप्रभ हुई सुगनी मगर जल्दी ही समझ गयी.

अच्छा! माँ जी आने वाली हैं!

मालकिन भी कम विस्मित न हुई. मन ही मन सोचा इसे पता कैसे चला . फोन तो कल रात ही आया था.

अरे नहीं! कुछ समय से साहब का हाथ तंग है. खर्चा नहीं निकलता.

कुछ बोली नहीं सुगना मगर जानती थी कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ था. 

गाँव में बड़े अफसर की पत्नी बड़ी मालकिन को सब सुख सुविधाएं प्राप्त थीं. अवकाशप्राप्ति के बाद आराम से रहने के लिये शहर में मकान बना लिया था जहाँ रह कर बेटा पढ़ा लिखा और अब विवाह के बाद पत्नी के साथ रह रहा था. 

जानती थी सुगनी कि बड़ी मालकिन यह असुविधा नहीं झेल पायेंगी . फिर उनके कहने पर उसे बुलाया जायेगा और घर खर्च चलाने , बहू की बहन की शादी में होने खर्चों के साथ उसकी एक दो महीने की तंख्वाह भी वही देंगी . तब तक बहू का हाथ तंग ही रहने वाला है!

बुधवार, 22 मई 2013

लरजती उम्मीद ...फौलादी विश्वास



"जल्दी उठो ...रामपतिया आई नहीं अभी तक , मसाला भी पिसा नहीं , आटा भी नहीं गूंधा हुआ ...अब खाना कैसे बनेगा ...मुझे देर हो रही है ...तुम जाकर देख आओक्यों नहीं  रही है।"

तेजी से घर में घुसते हुए नीरा के कदम रुक गए ।

मतलब महारानी अभी भी सो ही रही है ...

पड़ोस में ही रहने वाली अपनी सहेली सीमा से मिलने आई नीरा ने जा कर उसे झिंझोड़ दिया .


तुम्हे कोई शर्म है या नहीं ...इतने दिनों बाद लम्बी छुट्टियों में आई हो और पसरी रहती हो इतनी देर तक , ये नहीं कि आंटी की थोड़ी हेल्प ही कर दो ।

कभी -कभी ही तो आती हूँ...तो आराम से नींद तो पूरी कर लूं ...अपना वॉल्यूम कम करो तो ....कुशन से अपने कान ढकती सीमा महटियाने लगी .


अब तुम ही संभालो इसे , मैं तो भाग रही हूँ ...पहले ही लेट हो गयी हूँ .

आप जाईये आंटी ...इसको तो मैं देखती हूँ ...

नीरा रसोई में घुस गयी.

महारानी , उठो अब ...चाय पी लो ...आंटी स्कूल गयीं ...दुबारा कोई चाय नहीं बनाने वाला है . 


थैंक यू ,
दोस्त हो तो ऐसी ....चाय का गरमागरम कप हाथ में लेते सीमा उठ गयी .

"इस रामपतिया को क्या हो गया , आ नहीं रही ४ दिन से ...सब काम मुझे ही देखना पड़ रहा है "

कही गाँव चली गयी हो .

अरे नहीं , अभी तो ज्यादा समय नहीं हुआ उसे गाँव से आये ...उसका बेटा आने वाला था ...शहर में कोई अच्छी नौकरी मिली है उसे .

दोनों सहेलियां चाय सुड़कते बाहर बरामदे में आ बैठी।

बरामदे से सटे बगीचे में गुडाई करते किशन को सीमा ने आवाज़ लगाई ...


" किसना ...तनी रामपतिया का खबर लेके आओ तो ...काहे नईखी आवत ...4 दिन भईल ...जा दौड़ के देख तो ..."
चाय पीकर दोनों बतियाते हुए 
बरामदे से सटे  बगीचे में टहलती रही .

दीदी जी , दीदी जी ...किशन की आवाज सुनकर दोनों दौड़कर बरामदे में आई तो सामने बदहवास हांफता किशन नजर आया .

का भईल रे ...

उ दीदी जी ...उहाँ ढेर लोंग रहे ....का जाने का बात बा ...पुलिसवा भी रहे ... हम तो भागे आईनी .

चल , देख कर आते हैं ...क्या बात है !

किसी अनहोनी की आशंका में दोनों सहेलियाँ साथ लपक ली ।

रामपतिया के घर का नजारा देख दोनों स्तब्ध रह गयी ...पुलिस वाले बता रहे थे ...बुखार था इसे दो -तीन दिन से ....पेट में कुछ अन्न नहीं गया ...पहले से हड्डियों का ढांचा भूख बर्दाश्त नहीं कर पाया ..कल से बेहोश पडी थी .
ओह! धम से बैठ गयी नीरा वहीँ ...

३-४ घरों में काम करके कमाने वाली रामपतिया ने अपनी मेहनत की कमाई से बेटे को पढने लिखने शहर भेजा ...इतनी स्वाभिमानी कि काम करके लौटते गृहस्वमिनियाँ खाना खाने को कहती तो साफ़ मना कर देती ...
" ना ...बहुरिया ...भात पका के आईल बानी "

रात दिन कुछ न कुछ मांग कर ले जाने वाली अन्य सेविकाओं के मुकाबले उसे देखना सीमा और नीरा को सुखद आश्चर्य में डालता था । भीड़ को हटा और पुलिस वाले को विदा कर दोनों उसे रिक्शे में लेकर डॉक्टर के पास भागी  ग्लूकोज़ की दो बोतलों ने शरीर में कुछ हरकत की 

नीरा बिगड़ने लगी थी उस पर ...
का जी ...बीमार थी तो कहलवा नहीं सकती थी ... जो प्राण निकल जाता तो पाप किसके मत्थे आता ...उ जो बेटा लौटने वाला है शहर से ...सोचा है ...का होता उसका ।

बबी ...गुस्सा मत कीजिये .... कहाँ बुझे थे कि ऐसन हो जाएगा ...हमसे उठा ही नहीं गया कि कुछ बना कर खा लेते ...और प्राण कैसे निकलता ...बिटवा जो आये वाला है ।

उन लरजती पलकों में हलकी सी नमी के बीच ढेर सारी उम्मीद लहलहा रही थी। सीमा और नीरा उसके जज्बे के आगे नतमस्तक थी । हड्डियों का वह ढांचा अचानक उन्हें फौलादी लगने लगा था ।




वटवृक्ष
 से प्रकाशित .....



शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

नैतिकता का पाठ !



बोलो बच्चों. आज की कहानी से क्या सबक सीखा ?

डस्टर  से  ब्लैकबोर्ड साफ़ करते मास्टरजी ने कक्षा में बच्चों की ओर मुख करते हुए पूछा .

उत्साहित मोहन ने हाथ खड़ा कर कहा  - सर ! मैं बताऊँ !!

हाँ हाँ .बताओ मोहन ...उसका उत्साह बढ़ाते हुए सोहनलाल जी ने पूरी कक्षा को चुप रह कर सुनने का आदेश दिया . 
जी सर!  हमने इस कहानी से सीखा कि जो आपको ईश्वर ने दिया है  उससे संतुष्ट रहना चाहिए . लालच  नहीं करना चाहिए . कभी किसी का धन चुराने की इच्छा भी नहीं रखनी चाहिए .

पास की सीट पर बैठा रोहित   बोल उठा -  सर ! ये झूठ बोल रहा है. कल इसने मेरे टिफिन में से खाना चुरा  कर खा लिया था .

चुराया कब था ? टेबल पर टिफिन बॉक्स रखा था . मैंने उठा कर खा लिया .ये क्या चोरी हुई . नहीं ना सर !....

अनुमोदन के लिए चमकदार हो उठी उसकी आँखे और मुंह बनाते मोहन को देख शिक्षक मुस्कुरा दिए .बचपन कितना भोला और निष्कपट होता है  . क्या होता जो बच्चे हमेशा बच्चे ही रह जाते . सोचते हुए  वे कुछ जवाब देते  इससे पहले ही घंटी की आवाज़ आयी और सभी बच्चे अपना बैग सँभालते उठ खड़े हुए . मोहन और रोहित कक्षा से बाहर निकलते हुए एक दूसरे का हाथ पकडे थे . 

कक्षा से बाहर निकलते हुए सोच रहे थे सोहनलाल जी  . बच्चे भी कितना कुछ सिखा देते हैं . शब्दों और भाषा की सजावट के बिना भी!!

सायकिल पर तेजी से पैडल मारते हुए सोहन लाल जी  को थोड़ी दूर पर काले बैग सी चमकती कोई चीज नजर आयी . पास जा कर देखा तो किसी का बटुआ जमीन पर गिरा  पड़ा था . इधर उधर नजर दौड़ते हुए सोहनलाल जी ने बटुए को खोल कर देखा . तीन- चार हजार रूपये , फोटो , कार्ड जैसी कई वस्तुएं उस बटुए में थी . सोहन लाल जी ने एक बार फिर इधर- उधर देखा . बटुए में से पैसे निकाल कर जेब के हवाले किये और पुनः बटुए को सड़क पर  फेंक दिया .

सोहनलाल जी की नजर नहीं पड़ी.  उनके पीछे साईकिल पर चलते मोहन और रोहित बहुत हैरानी से उन्हें ही देख रहे थे।   

सोहनलालजी को मिल गये आत्माराम जी भी पीछे आते हुए ...

क्या सोहनलाल जी!!
बच्चों को नैतिक शास्त्र पढ़ाते हो और स्वयं पाठ भूले हो .

ओहो ! आत्माराम जी . आप भी ...
बताईये  क्या करता इस बटुए का . पुलिस वाले के पास जमा  करता तो क्या जरुरी था कि  उक्त व्यक्ति को उसकी रकम मिल ही जाती.  व्यक्ति का नाम -पता ढूंढ कर उस तक पहुंचाता तो जाने कैसा व्यक्ति होता!!  कही मेरे गले ही पड़ जाता तो . कही मुझ  पर उसमे ज्यादा रकम होने का इलज़ाम लगा देता तो जेब से या जेल में भुगतनी पड़ती ईमानदारी की सजा . नैतिकता के पाठ जो भी पढाये जाए  उनको समयानुसार बदलाव के साथ स्वीकारने में ही भलाई है .

कहते तो ठीक ही हैं सोहनलाल जी.  आत्मारामजी अपनी राह चलते सोच रहे थे .


क्या आप भी सोहनलाल जी की राय से इत्त्तिफाक रखते हैं , हमसे मत पूछियेगा , इस पर एक संस्मरण अलग से लिखा जाएगा .

सोमवार, 23 जुलाई 2012

लड़कियां इतनी खुश कैसे रह लेती !!


एक ज़माने में सभी लड़कियां खूबसूरत थी या नहीं  रोती बहुत थी. चक्की चलाते आटा पिसती , तेज धूप में मीलों सिर पर पानी की गागर उठाये चलती , कपास कातती, खेतों से सिर पर मनों वजन उठाये उबड़ खाबड़ सड़क पर लड़खड़ा कर  चलते सहमकर बातें करती , हंसती मुस्कुराती यूँ कि जैसे रोती थी .
वक़्त से पहले झुकती कमरें , चेहरों की झुर्रियों वाली उन रोती हुई उदास स्त्रियों में से ही किसी एक ने रची एक कहानी , यह सोच कर कि उनकी बेटी को भी यूँ ही रोना ना पड़े ....
ठुड्डी पर दोनों हाथ टिकाये एक उदास बच्ची को उसकी माँ ने पास बुलाया , गुदगुदाया ...क्या हुआ ?
कुछ नहीं ...अनमनेपन से नहीं कहते हुए  उसकी आँखों के पीछे उदासियों का शुष्क समंदर लहराया ... 
हूँ ...माँ की आँखों में प्रश्न नहीं थे ! वह भी कभी एक ऐसी ही उदास बच्ची थी , उसकी नानी भी , दादी भी ....
मगर उस माँ को इन उदासियों को यही रोक देना था ...
तुम्हे पता है , मैं जब छोटी थी मेरे माँ ने मुझे एक कहानी सुनायी थी , तुम सुनोगी ...
हाँ हाँ, क्यों नहीं . मगर परियों वाली , सफ़ेद घोड़े के राजकुमार की कहानी तो तुम मुझे कई बार सुना चुकी ....अब लड़की की आँख में आकाशदीप झलका.
कहानी तो सुनायी मैंने  लेकिन कहानी कहते हुए माँ ने जो कहा  मैंने नहीं सुनाया ...
तुम्हे पता है जिस वक़्त परमात्मा ने सृष्टि रची स्त्री को बनाया . उसी समय उस ने किसी को उसके लिए बनाया जो उसे हर समय प्रेम करता है , हर स्थिति में , उसके होने में , ना होने में ! अच्छे- बुरे होने में , सफल -असफल होने में ! वह उसे कभी मिलता है  कभी नहीं मिलता है , कभी दिखता है  कभी नहीं दिखता है ...मगर वह होता है या होती भी है !   

ऐसा हो सकता है मां , ऐसा होता है !! 

हाँ. होता है ना . वह हमेशा सफ़ेद घोड़े पर आने वाला राजकुमार ही नहीं होता . हाथ पकड़कर पुल पार कराने वाला पिता भी हो सकता है . चोटी खींच कर भाग जाने वाला भाई  रूठ कर मनाने वाली बहन चिढाते रहने वाला मित्र  कोई भी हो सकता है ...वह दृश्य हो या अदृश्य , मगर वह होता जरुर है ! 

लड़की की आँखों के शुष्क समंदर में आशाओं का पानी उतर आया था ...

तुमने मुझे बताया , मगर सब उदास बच्चों को कैसे पता होगा ....
तुम उनको यही कहानी सुनाना !

लड़की ने इस कहानी के आगे सोचा ... कहानी सुनाने के साथ वह स्वयं भी तो वैसी ही हो जाए तो , जैसे कि किसी को ईश्वर ने किसी के लिए बनाया , उसे भी बनाया ...
आँचल के साए में घेर लेने वाली मां , अनुशासन में सुरक्षित  रहने की सीख देता पिता , उसकी पसंद की चीज बहुत खिझा कर देने वाला  वाला स्नेहिल भाई या बहन , सन्मार्ग को प्रेरित करता मित्र , कंटीली राहों पर क़दमों के नीचे फूल बिछाने वाला प्रेमी या हाथ पकड़कर हर मुश्किल में साथ रहने वाली प्रेमिका ....
वह जितनी अपने करीब आती गयी वैसी ही होती गयी  जैसे कि ईश्वर ने उसे किसी के लिए बनाया . 

उस लड़की ने कहानी में सब कहा  जोड़ा और स्वयं भी वैसी हो गयी . जब वह लड़की बड़ी हुई . माँ हुई तब उसने अपनी बेटी को सुनायी  यही कहानी ... पीढ़ी दर पीढ़ी सब कहते सुनते गये . खुशहाल होते गये ....

वरना ऐसा कैसे हो सकता था कि लड़कियां इतनी खुश रह लेती !!!!

बुधवार, 3 अगस्त 2011

भगवान बचाए ऐसे भाई- बहनों से ...

नौकरीशुदा इंसान की सबसे बड़ी ख्वाहिश होती है कि वह अपने सेवाकाल में ही बच्चों की शिक्षा , विवाह के साथ ही एक नीड़ का निर्माण भी कर ले ताकि वृद्धावस्था आराम से कटे . पिता ने भी इस शहर में मकान लेते समय यही सोचा था हालाँकि होनी को कुछ और ही मंजूर था . अपनी व्यस्त दिनचर्या के कारण स्वयं तो गिनती के दिन ही गुजारे होंगे इस मकान में मगर अपनी पत्नी और बेटों के लिए रहने का इंतजाम कर गये . मकान के उपरी हिस्से की छत डली हुई थी , बल्ली फंटों के बीच उस हिस्से को अँधेरे में सिर्फ एक नजर ही देख पाए थे , खैर ...
उनकी मृत्यु के बाद माँ अपने कुनबे सहित यही बस गयीं . शुरू से शुगर मिल कोलोनी में रही माँ को आस- पास के लोगों से अच्छा व्यवहार रखने की आदत पडी हुई है . ऐसी कॉलोनियों में हर धर्म और जाति के लोंग आपस में मिलजुल कर रहते हैं और एक दूसरे के सुख दुःख में काम आते हैं . जब सबके पति ऑफिस में होते हैं तो ये महिलाएं साथ मिल कर पापड़ , बड़ी , अचार आदि बनाने से लेकर मूवी देखना , खरीददारी तक भी साथ ही करती हैं . पूरा मोहल्ला एक कुनबा ही बन जाता है . तारक मेहता का उल्टा चश्मा देखते हुए मुझे वो कोलोनी बरबस ही याद आ जाती है .
माँ की वही आदत यहाँ भी बनी रही . पड़ोसियों के दुःख दर्द में काम आना , किसी की पतोहू की जचगी में उनके साथ अस्पताल में रहना , तो किसी की बेटी की पसंद के कपड़े खरीदने साथ जाना , किसी नई बहू को अचार बनाना सिखाना , किसी अकेली वृद्धा को खुद खाना बना कर पहुँचाना आदि . उनके बेटे -बेटी- बहुएं सब नाराज होते हैं उनसे इस समाज सेवा को लेकर , क्योंकि कई बार इसमें उन्हें पैसे और सम्मान का नुकसान भी उठाना पड़ता है , मगर उनकी आदत है, जो है ...

एक बार छुट्टियों में बच्चों के साथ मैं भी दो-चार दिनों के लिए रहने गयी . एक ही शहर में होने का सबसे बड़ा नुकसान मुझे यही लगता है कि मायके में ज्यादा दिन रहना संभव नहीं हो पाता . माँ के आँचल में तो इस उम्र में भी बच्चों जैसा ही लगता है . सुबह की चाय के साथ अखबार पढ़ते हुए बाहर गेट पर किसी महिला द्वारा मम्मी कह कर पुकारे जाने पर बाहर जाकर देखा तो सामने बने आधे -अधूरे मकान में से कोई महिला माँ को आवाज लगा रही थी । पीछे पीछे माँ भी चली आई . माँ को देखते ही वह महिला दौड़ी चली आई ," अच्छा , दीदी आई हुई हैं " कह कर गले लगने लगी . मेरी बहुत बुरी (?) बुरी आदत है , मैं जल्दी से किसी अनजान को गले लगाना तो क्या हाथ भी नहीं मिलाती , इस पर चाहे कोई मुझे नकचढ़ी कहे या घमंडी !
मैंने पीछे हटते हुए माँ से थोड़े नाराजगी भरे लफ्जों में पूछा ." अब ये नई बहन कहाँ से आ गयी मेरी ". तब तक वह महिला मां के गले में लटक चुकी थी " अरे , सामने ही रहती है , कुछ ही दिन हुए है आये हुए ." तब तक उसके गेट पर कोई युवक आ पहुंचा . माँ से यह कहते हुए कि उसके देवर आये हैं , वह महिला खिसक ली .

अब मैं माँ पर बिगाड़ने लगी । तुम यूँ ही किसी पर विश्वास कर लेती हो , पता नहीं कौन है , क्या है , बेटी बना लिया ...

अरे , गरीब मजदूर है बेचारी , मम्मी -मम्मी करते हुए आ जाती है तो कैसे परे धकेलूं । देख कितनी मुश्किल में रह रही है , घर में लाईट भी नहीं है , इसका आदमी भी कहीं बाहर नौकरी करता है .ये भी पास ही फैक्ट्री में काम करती है .

माँ तुम भी ना ....जानती हूँ , कितनी भोली हैं , जरा सा कोई आँख से आंसूं टपका दे , अपनी परेशानियों का रोना रो दे , बस झट से पिघल जाती हैं , कितना ही समझा लो कि माँ , ये तुम्हारी मिल कोलोनी नहीं है , ये शहर है , यहाँ लोगों को पहचानना इतना आसान नहीं है , नहीं मानती है !

तीन चार दिन तक मैं रही वहां और देखती रही कि उसके घर जाने कैसे अजीब से लोंग आते हैं , जब भी माँ पूछती तो यही जवाब कि मेरा देवर है. मैं माँ पर झुंझला रही थी ," कितने देवर हैं इसके , हर बार कोई नई शकल नजर आती है " .
मेरी भोली माँ समझाती मुझे ," इसके ससुराल का बहुत बड़ा परिवार है , मौसी , मामा , चाचा आदि के लड़के आते रहते हैं यहाँ मिलने "
मैंने माँ को टोका , मुझे ठीक नहीं लग रहा , कभी कोई महिला तो नहीं आती इससे मिलने ..और देवर हैं ,अभी घर में लाईट नहीं है तो इस अँधेरे में अकेले क्या करते हैं घर में ...
अभी कुछ दिन पहले आई थी इसकी मौसी सास ,मेहमान को चाय- नाश्ता नहीं बना कर खिलायेगे क्या , गरीब है इसलिए तुम लोंग हर वक़्त इस पर अंगुली उठाते रहते हो ...
मेरी माँ तो पुरानी हिंदी फिल्मों वाली टिपिकल मां है !
खैर , मैं घर लौट आई वापस अपनी गृहस्थी में मगन , मगर मुझे बार -बार वह महिला ध्यान आती रही । लगभग एक सप्ताह बाद माँ का फोन आया ." तुझे पता है , वो सामने रहती है न मीना, वो बहुत बुरी औरत निकली , कोलोनी वालों ने उससे तुरंत मकान खाली करवा लिया है और आस पास दिखाई भी नहीं देने की चेतावनी दी है .

अब बोलो माँ , तुम कैसी महिला को मेरी बहन बना रही थी .भगवान् बचाए ऐसे भाई -बहनों से !

मन खराब हो गया था ।छत पर यूँ ही टहलते देखा किसामने तीन मंजिला बिल्डिंग के फ़्लैट की बालकनी में एक आधुनिका स्ट्रिप वाली ड्रेस पहने अपने लैपटॉप से उलझी पड़ी मुस्कुरा रही थी . कल ही उनकी पड़ोसन बता रही थी ,पता नहीं कौन है , अकेले रहती है , संडे को अक्सर कोई आता है , तेज संगीत के साथ नाचने- गाने की आवाजें आती हैं , देखते हैं एक दो दिन नहीं तो इसके मकान मालिक से शिकायत करनी पड़ेगी .

मुझे फिर वही मीना याद आ गयी , क्या पता चलता है , किस भेस में कौन मिल जाए !!

सोच रही हूँ जब वास्तविक दुनिया में इंसानों को पहचानना इतना आसान नहीं है तो अंतरजाल पर तो ??

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

कैसे होते हैं ये रिश्ते ....




एक शहर में कही भाई- बहन रहते थे ...सुबह सवेरे की फुर्सत में दोनों कई बार गप लड़ाते ,लड़ते झगड़ते ...बहन अपनी घर गृहस्थी में मगन आजकल सुबह भाई से मिल नहीं पाती ...भाई की व्यस्तताएं भी बढ़ गयी थी ...दोनों अपनी ही दुनिया में बहुत व्यस्त ...नगर के बीच बने पार्क में कभी कभी एक दूसरे को नजर आ जाते ...एक दूसरे को स्वस्थ मस्त देख कर मन में तसल्ली होती मगर जल्दी में होने के कारण कतरा कर निकल जाते....इसी बीच भाई का जन्मदिन आया ...बहन उसे विश नहीं कर पाई , व्यस्तता के कारण भूल गयी थी और शायद कही कोई नाराजगी भी ...इतने दिन तक भाई ने भी तो खबर नहीं ली थी ...

जन्मदिन के दूसरे दिन भाई को सुबह- सवेरे फिर नजर आई बहन ....उसने अपनी बहन को जन्मदिन पर बधाई देने के लिए धन्यवाद कहा ....बहन असमंजस में थी कि क्योंकि वह वाकई भूल गयी थी ...

" पर मैंने तो तुम्हे विश ही नहीं किया , सॉरी ...मुझे याद नहीं था "....उसने कहा
"नहीं ...आपने किया तो था...

बहन को शंका हुई कि उसने तो विश नहीं किया , कही उसके नाम से किसी और ने तो भाई को बधाई नहीं दे दी ...उसे विश्वास दिलाने के लिए भाई ने उसके हाथ में कार्ड थमा दिया ...वाकई कार्ड बहन के नाम से ही दिया गया था ..उसने उलट पुलट कर देखा ....तारीख को गौर से पढ़ा ...वह कार्ड पिछले वर्ष का था ...

"यू इडीअट , ये कार्ड तो पिछले वर्ष का है "...बहन ने प्यार से उसके सर पर चपत लगाई .

"होगा , मैंने उसकी तारीख नहीं देखी "....भाई ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया !

निष्छल प्रेम की तारीख वर्षों तक नहीं बदलती ...या वह तारीख के साथ नहीं बदलता !

छोटे भाई ने अपनी बड़ी दीदी को समझा दिया था ....हमेशा बड़े ही समझदार नहीं होते ....!




चित्र गूगल से साभार !
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सोमवार, 31 जनवरी 2011

वही कटा हाथ.....

सर्दी के मौसम में रजाई में ठण्ड और भय से सिकुड़ते सिमटते कांपते हममे से बहुतों ने भूत- प्रेत की कहानिया अपनी दादी , नानी , मौसी आदि से सुनी होंगी ...हमारे बचपन के जमाने में माँ कहानियां नहीं सुनाया करती थी ..."माँ" लोगों को घर गृहस्थी के कामों से ही फुर्सत नहीं हुआ करती थी , सो कहानियां सुनाने का जिम्मा दादी -नानी का ही हुआ करता था ....

भूत- प्रेत आदि की कहानियों से बच्चे डर जाते हैं लेकिन इन कथाओं का रोमांच उन्हें आकर्षित करता है , इसलिए डरते हुए भी वे बार -बार ऐसी ही कहानियां सुनने की जिद भी करते हैं ...एक कहानी हमने भी सुनी अपने बचपन में ....जरुर आपने भी सुनी होगी ... कटे हाथ की कहानी ....

एक आदमी देर रात फिल्म का आखिरी शो देख कर घर लौट रहा था ....उसे रास्ते में झाड़ियों के बीच कुछ अजीब सी चीज चलती नजर आई ....उसने पास जाकर देखा , झाड़ियों में एक कटा हाथ रेंग रहा था ... डर के मारे उसकी घिग्घी बंध गयी ... अकेले पैदल ही घर लौटते वह व्यक्ति बहुत भयभीत हो चुका था ....मुख्य मार्ग पर अपने आगे चलते एक व्यक्ति को देखकर उसे कुछ राहत मिली ....तेज कदम से उसकी और अपनी दूरी को कम करते हुए वहां तक पहुंचा और उस व्यक्ति के कंधे पर हाथ रख दिया ....

पास जाने पर देखा कि उसके बाएं कंधे पर झोला लटक रहा था ...कुछ कदम ही साथ चले थे कि राहगीर ने उस व्यक्ति की बेचैनी को भांपते हुए उससे पूछ ही लिया ," क्या बात है ,बहुत घबराये हुए हो " ....

उस व्यक्ति ने डरते हुए झाड़ियों में कटे हाथ को चलता देखने की घटना का वर्णन कर दिया ... राहगीर सुनकर मुस्कुराने लगा ...उसने अपने झोले में हाथ डाला और जब वापस बाहर निकाला तो उसके हाथ में वही कटा हाथ था ....दिखाते हुए उसने पूछा ," कही यही हाथ तो नहीं था " ...

भय से कंपकंपाते वह व्यक्ति वहां से भाग छूटा ...

कुछ दूर चलने पर उसे एक रिक्शावाला नजर आया ...घबराहट में रिक्शा रुकने से पहले ही वह उस पर चढ़ बैठा ..." क्या बात है भाई , इतनी जल्दी क्या है ...अभी गिर पड़ते , चोट लगती "

तुम यहाँ से जल्दी से चलो , मार्ग में सारी बात बताऊंगा ...

रिक्शा चल पड़ा ...चलते चलते उसने झाड़ियों के बीच कटे हाथ को देखने और फिर उस राहगीर के पास भी वैसा ही हाथ देखने की घटना बयान कर दी ....अब रिक्शे वाले ने पीछे मुड कर देखा और उसकी सीट से कुछ निकालकर उसे दिखाया ,' कहीं यही तो नहीं है !'

अब तक उस व्यक्ति का डर और घबराहट से बुरा हाल हो चुका था .....गनीमत थी कि तब तक रिक्शा उसके घर तक पहुँच चुका था ...दरवाजे को जोर -जोर से पीटने की आवाज़ सुनकर उसकी माँ किवाड़ खोल कर बाहर आई ...घबराते ,कांपते वह व्यक्ति धम्म से बिस्तर पर जा बैठा और माँ को पूरी कहानी सुनाने लगा ....कहानी समाप्त होते- होते उसकी माँ ने मुस्कुराते हुए उसे कुछ दिखाया ...." यही हाथ तो नहीं था "

अब तो उस व्यक्ति के मुंह में झाग आ गए और बेहोश हो कर गिर पड़ा ....

आपको नहीं लगता वही कटा हाथ कहानियों से निकल कर ,कई हजार कटे हाथ बनकर अखबार , टी वी , इन्टरनेट तक फ़ैल चुका है ...!





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रविवार, 5 दिसंबर 2010

मेंम साहब की कुतिया ......






में साहब की पामेरियन


कुत्तों के लगातार भौंकने की आवाज़ और गाड़ी के होर्न , कारिंदों की चहल -पहल से अनुमान लगाया कांता ने कि नगरनिगम की गाडी आ गयी है ...आवारा कुत्तों को पकड़ने के लिए ...

बोरी उठाये गली के कुत्तों के पीछे दौड़ते कर्मचारी और उनसे बच निकलने की कोशिश कुत्तों की ...बिल्ली चूहे या चोर पुलिस के खेल सा दृश्य दृष्टिगोचर होने लगता है ...आजादी की कीमत तो ये कुत्ते भी खूब समझते हैं .... गली के कोने पर कूं - कूं करता पड़ा हुआ टौमी कराह रहा था ..पूरे दो दिन से वही एक जगह पड़ा हुआ ....कुछ दिन पहले उसकी पीठ पर घाव का निशान देखा था कांता ने ...दूसरी गली के कुत्तों के साथ जंग में घायल हो गया था बेचारा ...उसके होते किसकी मजाल थी कि किसी दूसरी गली का कुत्ता आये और भौंक कर चला जाए ...मगर इस बार घाव गहरा था ....अब तो बिलकुल ही हिलना डुलना मुश्किल था ...

पिछले कई महीनों से देख रही थी कांता इसे ...आस पास के घरों से रोटी मिल जाती थी और गली के कोने में ऐसे अलसाया पड़ा रहता , मगर जैसे ही कोई अजनबी नजर आता कान खड़े हो जाते उसके , दौड़ा भगा चलता आता ...भोंक भोंक कर नाक में दम कर देता ...कई बार कांता जब सब्जी लेने या किसी काम से घर से निकालती तो वह भी साथ हो लेता ...बाकायदा गली के आखिरी छोर तक उसके साथ चलता ....बच्चे हँसते थे उसपर ...बौडीगार्ड है आपका ....मोहल्ले वाले उसकी वफ़ादारी से बहुत प्रसन्न थे यहाँ तक कि कांता की कर्कशा पड़ोसन भी जो जब तब हर किसी से भिड जाती थी ...माली , सब्जी वाला , पेड -पौधों वाला , मोची ... ..मजाल है जो आजतक किसी को उसने वाजिब कीमत दी हो ..काम पूरा करवाने के बाद थोड़े बहुत पैसे बहुत एहसान के साथ पकड़ा देती इन लोगों को और यदि किसी ने साहस कर लिया पूरी कीमत मांग लेने का तो फिर उसकी खैर नहीं ....ऐसी महिला यदि किसी कुत्ते से खुश है , टिके रहने देती है गली में तो उसमे कुछ न कुछ ख़ास तो पक्का ही है ...

मगर घाव खाया टौमी ( नाम कांता ने ही दिया था ) जब से बीमार पड़ा है , उसके घाव में कीड़े पड़ गए हैं , वही महिला हाय तौबा मचाये रखती है ....जब भी कांता नजर आ जाती है उसे तो तीखा बोले बिना नहीं रहती ..." रोटी दे दे र हिला लियो ...कत्तो बास मार है ...लोगां ना कियां क्यां काम सूझ ...आपक घर में क्यूँ ना राख लेव " (रोटी खिला कर मुंह लगा लिया इसे ...कितनी बदबू मार रहा है ...लोगों को भी क्या क्या काम सूझते हैं , अपने घर में क्यूँ नहीं रख लेते )....

टौमी


आखिर कांता ने नगरनिगम के पशु विभाग में फ़ोन कर बीमार कुत्ते की इत्तला कर दी ...और वही गाडी आ पहुंची थी उसे लेने ....इस हालत में टौमी भाग नहीं सकता था इस लिए आसानी से गिरफ्त में आ गया ....उसे ले जाते देख कांता को थोडा दुःख तो हुआ मगर उसे संतोष था कि पशु चिकित्सालय में उसका ठीक से इलाज़ हो सकेगा ...कम से कम उम्मीद तो यही थी ...

सुनो , रामलीला मैदान में सहकार मेला लगा है , तिब्बती मार्केट भी लगा हुआ है ...आज फ्री हूँ ...जो लाना है चल कर ले आओ ...फिर मुझे समय नही होगा तो जान खाओगी ...गाड़ी की धुलाई करते हुए कांता के पति ने पत्नी और बच्चों को कहा ...
दोनों बच्चे बड़े खुश हो गए ...हाँ हाँ, पापा चलिए , मुझे नयी डिजाईन की जैकेट लानी है ...शायद तिब्बती मार्केट में मिल जाए ...
व्यस्ततम बाजार में गाडी पार्क करते एक बड़ी सी गाडी पर कांता की नजर ठहर गयी ...उसकी खिड़की से एक सफ़ेद झक पामेरियन कुतिया झाँक रही थी ..."बेबी , मुंह अन्दर करो , डोंट क्राई"...उसकी मोटी -सी मालकिन गोदी में लेकर लाड़ दुलार कर रही थी ....बेबी के लिए एक अच्छा सा ब्लैंकेट देखना है , बहुत ठण्ड हो गयी है ..अपने पास बैठे व्यक्ति से कहा उसने ....
कांता को एकदम से टौमी याद आ गया ....देशी कुत्तों को कहाँ यह सब नसीब है ...बेचारे गली -गली भटकते रहते हैं , अक्सर दुत्कारे जाते हैं ...कोई तरस खाकर कुछ खिला दे तो ठीक वरना ....

तभी देखा उसने एक गन्दा सा लड़का , मिट्टी में सना कपड़े से उस महिला की गाडी साफ़ करता रिरिया रहा था.....दो रूपये दे दीजिये ...अपने पप्पी के मुंह में महंगे बिस्किट ठूंसती महिला ने मुंह फेर कर अपने ड्राईवर से कहा ," अरे , हटाओ इसे ...गाड़ी साफ़ कर रहा है या और गन्दी कर देगा ...हटाओ इसे यहाँ से "

कांता की उदासी बढती गयी ....नर्म बिस्तर , ममतामयी गोद , गरम कपड़े ,महंगा खाना .... देशी कुत्ते ही क्यों , बिना घर बार वाले अनाथ बच्चों , या घर -बार होकर भी मांगने को विवश बच्चों से भी अच्छे हैं ...विदेशी कुत्तों के नसीब.......एक गहरी सांस लेकर खुद को सामान्य रखने की कोशिश करती मेले की ओर बढ़ चले कांता के कदम ...






चित्र गूगल से साभार ....

रविवार, 29 अगस्त 2010

एक प्रेम कथा ऐसी भी ....

एक प्रेम कथा ऐसी भी ....

 मैं तुझे इतनी अच्छी लगती हूँ . मेरे चेहरे पर झुर्रियां हैं. काले धब्बे हैं. उम्र भी बहुत हो गयी है.
फिर भी !!

हाँ . तू मुझे बहुत बहुत अच्छी लगती है .मुझे तेरी उपरी सुन्दरता से क्या मतलब. खूबसूरत तो मन होना चाहिए . मेरी नजरों में तू सबसे अधिक कीमती है.

आँखें बंद कर इत्मिनान से कंधे पर सर टिकाते दुर्लभ रक्त ग्रुप की वह स्वस्थ स्त्री उस कुटिल मुस्कान को नहीं देख पायी .

प्रेमी मानव अंगों का व्यापारी था ....!

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

धुन्धलाया सूरज

सुबह सबेरे उगता सूरज कितना प्यारा लगता है ...अंधियारे को चीरता सतरंगी किरणें बिखेरता ...सब कुछ धुला धुला सा , पाक साफ़ सा ..
नहा धो कर पूजा की थाली लिए मंदिर की ओर जाती अर्चना के पैर थम से गए ...पार्क से होकर गुजारने वाले रास्ते पर एक मकान के बाहर महिलाओं का एक झुण्ड खड़ा था ...मेन गेट के पास एक दो महिलाएं मकान मालिक से उलझ रही थी ।उस मकान के निचले हिस्से में एक तरफ ब्यूटी पार्लर बना हुआ था जब कि उसके दूसरे हिस्से में एक जालीदार पार्टीशन के साथ दो किरायेदार रहते थे । सोमवार का दिन होने के कारण मंदिर में भीड़ बढ़ जाने की चिंता में अपनी पूरी उत्सुकता को समेटे अर्चना मंदिर की ओर ही बढ़ ली ...मगर पूजा अर्चन करते समय ध्यान वही अटका रहा। उसकी उत्सुकता का कारण मकान मालिक और किरायदार दोनों से उसका परिचय होना था ...अभी कुछ दिनों पहले ही उसकी सिफारिश पर यह मकान उसकी सहेली को किराये के लिए उपलब्ध हुआ था ..उसकी किस्मत की मारी सहेली के परिवार मालिक में अब वे माँ -बेटी ही बची थी ... महानगर की ओर बढ़ते इस शहर में बढ़ते अपराधों और घटती सुरक्षा के कारण कोई बिना किसी जानपहचान के किरायेदार नहीं रखता । ब्यूटी पार्लर की मालकिन अर्चना की परिचित थी इसलिए थोड़ी ना नुकुर के बाद उसने इन माँ बेटिओं को निचली मंजिल पर एक कमरा किराये पर देने को राजी हुई थी ...अर्चना घर लौटते दुबारा वहां पहुंची तो भीड़ छंट चुकी थी ...दोनों माँ बेटी कुछ सहमी सी अपने कमरे में बैठी थी । उन्होंने जो बताया एक बारगी तो अर्चना के रोंगटे खड़े हो गए ... उसकी सहेली के कमरे से लगे दूसरे कमरे में मकान मालिक के कॉलेज का एक विद्यार्थी रहता था । उन दोनों कमरों के बीच सिर्फ एक जालीदार दरवाजा था जिसे दोनों तरफ परदे लगा कर वे वे अपनी प्राईवेसी बनाये रखे हुए थे . आज दोपहर को जब दोनों माँ बेटी स्कूल से लौट कर आराम कर रही थी की अचानक उस तरफ कैमरे की फ्लैश लाईट और फुसफुसाहट भरी आवाज़ ने उनका ध्यान आकर्षित किया . चूँकि उनके कमरे में अँधेरा था इसलिए दूसरी ओर से उन्हें देखा नहीं जा सकता था ..मगर साथ वाले कमरे में कैमरे की रौशनी के कारन हुए हलके उजाले में अस्पष्ट से दृश्य नजर आ रहे थे जिसे देखखर माँ बेटी दोनों घबरा गयी . चुपचाप धीरे से कमरे से बाहर निकलते उन्हें याद आया की मकान मालकिन तो अपनी जचगी के लिए मायके गयी हुई है . उपरी मंजिल पर अपने कमरे में लेटे मकान मालिक को वे किस तरह उस घटना का ब्यौरा देंगी ..यह सोचकर उनके कदम वहीँ रुक गए ...मगर इस तरह खामोश होकर बैठे रहना उनकी अंतरात्मा को गवारा नहीं था और कुछ भय भी था ...उन्होंने चुपके से पड़ोस के उस कमरे की कुण्डी बाहर से बंद कर दी और दबे पाँव वे पड़ोस के मकान में अपनी परिचित के पास पहुँच गयी और उन्हें पूरी घटना का ब्यौरा दिया . मामले की गंभीरता को देखते हुए उस परिचित ने आस पास की कुछ और महिलाओं को इकठ्ठा किया और वापस उस मकान में पहुच कर तेज स्वर में मकान मालिक को आवाज़ देने लगी . कुछ नाराजगी भरे अंदाज़ में वह व्यक्ति सीढियों से उतर कर उनके पास पहुंचा तो एक महिला ने उसे लताड़ते हुए उस बंद कमरे की कुण्डी खोलने को कहा . हिचकते और खीझते उस व्यक्ति ने जब कमरा खोला तो उसकी ऑंखें फटी रह गयी ...सभी महिलाओं ने उस लड़के को पुलिस में रिपोर्ट की धमकी देते हुए खूब भला बुरा कहा.. घबरा कर वह लड़का पहली और आखिरी गलती का वास्ता देकर उनके हाथ पैर जोड़ने लगा ..उसके साथ की लड़की शायद नशे के प्रभाव में थी ..

दूसरे दिन सुबह दूध की डेयरी के पास उसकी मायूस सहेली मिल गयी ...वह उससे नया कमरा ढूंढ देने की विनती कर रही थी ...पता चला की उसकी मकान मालकिन रात में घर लौट आयी थी ...साथ ही उस लड़के के अभिभावक भी ...उनके बीच क्या मंत्रणा हुई भगवान् जाने ... अब मकान मालिक उसकी सहेली को दो दिन के भीतर घर ख़ाली करने का नोटिस दे चुका था .आँखें मल कर कई बार देखने पर भी अर्चना को आज सूरज धुन्धलाया सा क्यों लग रहा था ...

रविवार, 13 जून 2010

अम्माजी का लचीलापन (लघु कथा )





अम्माजी की तीखी आवाज़ घर से सटे छोटे से किचन गार्डेन से पार होती हुई पूजा करती हुए शुभी के कानों तक पहुंची । कल ही गाँव से आई है अम्माजी और आज सुबह सुबह पूरे घर की व्यवस्थाओं का जायजा लेते हुए किचन गार्डेन तक पहुँच गयी । करीने से बनी हुई क्यारियों में ताजा हरी पालक , भिन्डी , हरी मिर्च , बैंगन , टमाटर आदि के छोटे -छोटे कच्चे हरियाये पौधों से उल्लासित अम्माजी गाँव की खुशबू को जी लेती हैं । अपने बेटे गिरीश के लिए शुभी को पसंद करने के निर्णय पर नाज होता है उन्हें । परम्पराओं और आधुनिकता का मेल है शुभी। घर को खूब अच्छी तरह संभाल रखा है । मन ही मन खुश होती हुई अम्माजी की नजर अचानक सलीके से बनी प्याज की क्यारियों पर जा कर अटक गयी । गार्डेन में काम करते माली पर चीख पड़ी ...
" तुम्हे प्याज लगाने को किसने कहा , पता नहीं है तुम्हे हम वैष्णवी प्याज़ लहसुन खाना तो दूर ,स्पर्श तक नहीं करते "

" बाबा और बेबी तो प्याज के बिना सलाद को छूते भी नहीं "....माली कहते कहते रुक गया गलियारे के गेट से आती हुए शुभी के इशारे को देख कर "

" जी, अम्माजी , नयी सब्जियां लगाने के समय मैं कुछ दिन घर से बाहर रही, इस नए माली को पता नहीं था । इसने बाकी सब्जियों के साथ प्याज भी लगा दिया । वापस लौटी तो नन्हे- नन्हे पौधे तैयार हो चुके थे । अब लगभग तैयार हो गयी है पौध तो माली को कह देती हूँ निकाल कर ले जाएगा । आप जानती हैं ना इनका भोजन तो प्याज और लहसुन के बिना पूरा नहीं होता ।

अम्माजी ने पूरी क्यारी का मुआइना किया ..." कितने किलो हो जायेंगे "

" यही कोई30-35किलो "

" तुम इतने सारे प्याज उठाकर इसको दे दोगी " बहू को घूरती हुई अम्माजी बोली.

" जी अम्माजी , बच्चे सलाद में लेते हैं कभी कभार । पर आप तो इसे छू भी नहीं सकती । इसलिए इन्हें रखने से क्या फायदा "

" ऐसा करो , इन्हें आँगन में बने लकड़ीघर में रखवा देना । इतने सारे प्याज एकदम से यूँ ही बाँट दोगी क्या , आँगन में ही खाना खिला दिया करना बच्चों को " नफा- नुकसान का हिसाब लगाती हुई अम्माजी बोली ।

अम्माजी के आने से पहले प्याज लहसुन को घर से बाहर का रास्ता दिखा देने वाली शुभी हैरान थी । अभी पिछली बार अचानक पहुंची अम्माजी रसोई के बाहर छोटी टोकरी में प्याज देखकर आपे से बाहर हो गयी थी , और पूरी रसोई को गंगाजल से पवित्र करने के बाद ही भोजन करने को तैयार हो पाई थी ।

अम्माजी का यह बदलाव नयी पीढ़ी के साथ सामंजस्य की शुरुआत थी या प्याज की बढ़ी हुए कीमतें और माली को मुफ्त दिए जाने की नागवारी .....शुभी सोच विचार में लगी थी।

रविवार, 13 दिसंबर 2009

सपूत......एक लघु कथा

पुराने ज़माने की बात है ....तब आज की तरह पानी के लिए नल और बोरिंग जैसी सुविधा नही थी ....सिर पर कई घड़ों का भार लिए स्त्रियाँ कई किलोमीटर दूर तक जा कर कुओं या बावडियों से पानी भार कर लाती थी
एक बार इसी तरह तीन महिलाएं घर की जरुरत के लिए पानी भार कर ला रही थी ...
तीनों ने आपस में बातचीत प्रारम्भ की ...
पहली महिला ने कहा ..." मेरा पुत्र बहुत बड़ा विद्वान् है ....शास्त्रों का विषद ज्ञान रखता है ...आज तक कोई भी उसे शास्त्रार्थ में नही हरा सका है ....."

दूसरी महिला भी कहाँ पीछे रही ..." हाँ , बहन ...पुत्र यदि विद्वान् हो तो पूरा वंश गौरान्वित होता है ...मेरा पुत्र भी बहुत चतुर है ...व्यवसाय में उसका कोई सानी नही ....उसके व्यवसाय सँभालने के बाद व्यापार में बहुत प्रगति हुई है ..."

तीसरी महिला चुप ही रही ....
" क्यों बहन , तुम अपने पुत्र के बारे में कुछ नही कह रही ...उसकी योग्यता के बारे में भी तो हमें कुछ बताओ ..." दोनों गर्वोन्मत्त महिलाओं ने उससे कहा .....

" क्या कहूँ बहन , मेरा पुत्र बहुत ही साधारण युवक है ....अपनी शिक्षा के अलावा घर के काम काज में अपने पिता का हाथ बटाता है ...कभी कभी जंगल से लकडिया भी बीन कर लाता है ..."

सकुचाते हुए तीसरी महिला ने कहा ...

अभी वे थोड़ी दूर ही चली थी की दोनों महिलाओं के विद्वान् और चतुर पुत्र साथ जाते हुए रास्ते में मिल गए ...दोनों महिलाओं ने गदगद होते हुए अपने पुत्र का परिचय कराया ....बहुत विनम्रता से उन्होंने तीनो माताओं को प्रणाम किया और अपनी राह चले गए....

उन्होंने कुछ दूरी ही तय की ही थी कि अचानक तीसरी महिला का पुत्र वहां आ पहुँचा ...पास आने पर बहुत संकोच के साथ उस महिला ने अपने पुत्र का परिचय दिया ....

उस युवक ने सभी को विनम्रता से प्रणाम किया ....और बोला ...
" आप सभी माताएं इस तपती दुपहरी में इतनी दूरी तय कर आयी है ....लाईये , कुछ बोझ मैं भी बटा दू ..."
और उन महिलाओं के मना करते रहने के बावजूद उन सबसे एक एक पानी का घड़ा ले कर अपने सिर पर रख लिया ....

अब दोनों माताएं शर्मिंदा थी ...

" बहन , तुम तो कहती थी तुम्हारा पुत्र साधारण है ....हमारे विद्वान् पुत्र तो हमारे भार को अनदेखा कर चले गए ...मगर तुम्हारे पुत्र से तो सिर्फ़ तुम्हारा...अपितु हमारा भार भी अपने कन्धों पर ले लिया ...बहन , तुम धन्य हो , तुम्हारा पुत्र तो अद्वितीय असाधारण है...सपूत की माता कहलाने की सच्ची अधिकारिणी तो सिर्फ़ तुम ही हो ......"

साधारण में भी असाधारण मनुष्यों का दर्शन लाभ हमें यत्र तत्र होता ही है ...हम अपने जीवन में कितने सफल हैं ....सिर्फ़ यही मायने नही रखता .....हमारा जीवन दूसरों के लिए कितना मायने रखता है....यह अधिक महत्वपूर्ण है ......!!

किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार ...किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार ...जीना इसी का नाम है .....


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बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

यह कैसी समाज सेवा .....!!

डोर बेल की आवाज सुनकर घर के भीतर हलचल हुई ...दो छोटी बच्चियां भागती हुयी आयीं ...
" बुआ गयी ...दीदी को नही लाई ...." कहती हुई कविता से लिपट गयी।
हाँ ...बेटा ...मैं तो इधर मार्केट आयी थी ...सोचा तुम लोगों से मिलती चलूँ ...मम्मी और दादी कहाँ है ...दोनों भतीजियों को साथ लिए कविता ड्राइंग रूम में कदम रख चुकी थी ।
किचन में बर्तनों की खडखडाहट कुछ समय के लिए रुक गयी ...हाथ पोंछते हुए माँ भी ड्राइंग रूम तक पहुँच गयी थी ...
"आज अचानक कैसे "....कविता को पास बैठाते हुए माँ बोली ...
"बस ...ऐसे ही तुम लोगों की बहुत याद रही थी ...भाभी कहाँ है ..."
"वो अपने कमरे में दो बच्चियों को पढ़ा रही है...अपनी महरी की बेटियाँ हैं...वो किसी मार्केटिंग वाली कंपनी का टास्क जो पूरा करना है" ...
वाह ...ये तो बहुत बढ़िया काम है .... काम भी और समाज सेवा भी ...
"हाँ ..वो तो है ....तू बैठ ...मैं जरा दो बर्तन सलटा दूँ ..चाय बनाती हूँ ".....कुछ अनमनी सी माँ बोली...
"नही माँ रहने दो ...अभी मार्केट में जूस पी लिया था ...लाओ बर्तन मैं करा दूँ ..."
"नही बेटा मैं कर लूंगी ...तू थोडी देर के लिए ही तो आयी है ...बैठ आराम से ..."
"और बच्चा पार्टी तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है ...इस एक्जाम के बाद रिपोर्ट कार्ड गया क्या ..
दिखाना मुझे " ....
"नही बुआ ....रिजल्ट तो गया पर रिपोर्ट कार्ड लेने कोई गया ही नही ...पैरेंट्स के हस्ताक्षर के बिना देते नही है और पापा मम्मी को फुरसत ही नही मिली "...
" कोई बात नही ...अब ले आयेंगे ...क्या परसेंटेज रही " ...
" अरे पढ़ती कहाँ है दोनों ...बहुत ख़राब मार्क्स आए हैं "..बीच में ही बच्चों की दादी बोल पड़ी ...
" बुआ ...ट्यूशन वाले सर पढाते हैं ...कुछ समझ ही नही आता ...दुबारा पूछो तो डांटने लग जाते हैं " ...

"आज के लिए इतना बहुत है ...अब कल पढ़ना "...
बोलती हुई भाभी महरी की बच्चियों के साथ बाहर आ गयी ...
"अरे कविताजी ...आप कब आयी ....मुझे तो पता ही नही चला ....और तुम दोनों कब से खेल रही हो ...जाओ अपने कमरे में पढो "....
" मम्मी , ये सवाल समझ नही रहा जरा समझा दो इसे "...
" अभी थोडी देर फुरसत मिली है मुझे ...तुम्हारे ट्यूशन सर से पूछ लेना ...जाओ ...मुझे तंग मत करो "...
रुआंसी सी दोनों बच्चियां अपने कमरे में चली गयी ......
कविता वापसी में सारे रास्ते रुआंसी भतीजियों और माँ के मलिन चेहरे के बीच भाभी की समाजसेवा के औचित्य के बारे में ही सोचती रही ...यह कैसी समाजसेवा ....!!


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