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शनिवार, 5 जून 2021

खजांची बाबू का पेड़...

 


बिहार के एक छोटे से गाँव में थी हमारी आधुनिक कॉलोनी परंतु पर्यावरण के मापदंडों पर खरी उतरती.  जैसेा  सामान्य तौर पर घर होते थे - हर घर (मकान/झोंपड़ी कुछ भी हो)  के बाहर बगीचा, बारामदा जहाँ आने वाला प्रत्येक अतिथि आराम पाता था. वहीं पड़ी बेंच पर बैठे सुबह अनूप जालोटा को चिड़ियों की चहचहाहट के बीच सुनते रहे थे. और उसके बाद भीतर बड़ा/छोटा सा आँगन जहाँ भरी सर्दियों में खटिया पर पड़े गुनगुनी धूप का आनंद लेते -दिल ढ़ूंढ़ता है फिर वही रात दिन की पृष्ठभूमि बनती थी.

गाँव के बाहर की टूटी फूटी सड़कों, कच्चे रास्तों के विपरीत कॉलोनी की अच्छी डामर वाली सड़कों के दोनों ओर आम, शहतूत, फालसा और खुद के घर में इलाहाबादी लाल अमरूद आदि के घने पेड़ होते थे जो गरमियों की भरी दुपहरी में  भी हमें घर के भीतर आराम न लेने देते.  

याद है मुझे सावधान करते सायरन की आवाज से  कॉलोनी के बीच में बने मंदिर के पास इकट्ठा हुए थरथर काँपते बच्चे और चिंतातुर माताओं के  चेहरे जो कॉलोनी के एक किनारे वाली दिवार के बाहर के हिस्से से रोने चिल्लाने की आ रही आवाजों से भयभीत थे. एक दो बार गोली चलने की आवाज भी सुन पड़ी थी. पता चला कि कहीं डाका पड़ रहा था. कॉलोनी के सभी पुरूष बाउंड्री के चारों ओर अलर्ट की मुद्रा में बंदूकें ताने सिक्योरिटी गार्ड के साथ खड़े दिख रहे थे. कुछेक घरों में सुरक्षा कारणों से संकलित छोटी पिस्तौल, लाठी, भाले आदि भी निकाल लिए थे. बात यह थी कि कॉलोनी के बाहर एक बस्ती में डाकूओं ने धावा बोल दिया था. 

जैसे-तैसे शोर कम होने की आवाज सुनाई दी यानि डकैत अपना काम करके लौट गये थे. धीरे-धीरे सब लोग भी  अपने घरों में लौट गये. कॉलोनी के बाहर घुप्प अँधेरों में किसी ने बाहर जाकर स्थिति का आकलन करना उचित नहीं समझा था. कई- कई दिनों तक बिजली रानी की और हमेशा के लिए पुलिस व्यवस्था के लापता रहने की बात आम ही थी वहाँ .  

उस डरावनी रात के गुजर जाने के बाद जब मालिक लोग अपने सिक्यूरिटी प्रबंधक व अन्य अफसरों के साथ कॉलोनी की सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेने निकले तब  उन्हें बाउंड्री की ऊँची दिवारों  से लगे हुए उनसे भी  कहीं बहुत ऊँचे वृक्षों को देखकर चिंता हुई. शंका थी कि उन पेड़ों की लंबी शाखाओं का  सहारा लेकर चोर / डाकू कॉलोनी में कूद सकते थे.  तय किया गया कि बाउंड्री से लगने वाले घने पेड़ों को काट दिया जाये. दुख तो सबको होना ही था पर सुरक्षा व्यवस्था के लिहाज से जरूरी भी था.

हमारे घर के पीछे वाली पंक्ति के मकानों के मुँह बाउंड्री की दीवार की तरफ थे और वहाँ लगे आम , फालसा आदि के बड़े पेड़ों पर भी उनका अधिकार- सा था. पेड़ काटते हुए मजदूर जब एक घर के सामने पहुँचे तो उस घर की हट्टीकट्टी स्वामिनी बाहर निकल आईं और पेड़ के सामने हाथ फैला खड़ी हुईं. 

मैं नहीं काटने दूँगी यह पेड़.

मजदूरों से होती हुई बात सिक्योरिटी अफसर पहुँच गईं पर माताजी न मानी तो नहीं ही मानी. पेड़ की रक्षा के लिए उसके नीचे खटिया बिछाकर बैठ गईं. सिक्योरिटी अफसर के मार्फत मालिकों तक भी बात पहुँची होगी. वहीं से फरमान जारी हुआ किसी भी तरह समझा बुझा कर पेड़ काट देने का.

मजदूर कुल्हाड़ी उठाकर पहुँचे ही थे वृक्ष पर प्रहार करने की स्वामिनी की दर्द भरी आवाज गूँजी- इस पेड़ को काटोगे मतलब खजांची बाबू (उनके पति इसी नाम /काम से पहचाने जाते थे ) को काटोगे. 

 वहाँ उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति सन्न रह गया. मजदूरों के हाथ भी न उठें और उस पूरी पंक्ति में सिर्फ एक पेड़ जीवनदान पाकर वर्षों झूमता रहा, फल देता रहा. बहुत बाद में खजांची बाबू न रहे. उनका परिवार भी अपने पैतृक स्थान पर चला गया मगर वह पेड़ खजांची बाबू के पेड़ के नाम से गर्वोन्मत्त होकर सिर ऊँचा उठाये अपनी भुजाएं फैलायें आश्रय देता रहा.

गुरुवार, 4 जुलाई 2019

जिन खोजा तिन पाईंयाँ....


स्कूल से आते ही बैग पटक दिया काया ने. मोजे कहीं, जूते कहीं . बड़बड़ाती माला ने सब चीजें ठिकाने रखीं और बैग से निकाल कर डायरी देखने लगी.
क्लास टीचर ने पैरेंट्स को मिलने का नोट डाला था. सिहर गई एकबारगी माला.
ओह! अब क्या गलती हुई होगी!
पिछले कुछ समय से स्कूल से आने वाली  शिकायतें उसे परेशान कर रही थी. अभी पिछले हफ्ते ही तो कॉपी किताबों के कवर फटे होने की शिकायत करते हुए कक्षा अध्यापिका ने बहुत भला बुरा कहा था उसे. शिकायतें सुनने उसके सामने अपराधी - सा उसे ही खड़ा रहना होता था. शेखर ऐसे समय में पीछा छुड़ा लेते किसी तरह.
तुम ही जाकर सामना करो. पता नहीं आजकल ध्यान कहाँ रहता है तुम्हारा. बच्ची पढ़ने में पिछड़ रही . न उनकी यूनिफॉर्म का ध्यान रहता है , न पढ़ने लिखने का . मैं दिन भर ऑफिस में काम करने के बाद क्या -क्या सँभालूँ?

माला को शेखर पर गुस्सा भी नहीं आता. वाकई लापरवाही उससे हो ही रही थी.

अभी पिछले महीने ही काया का रिजल्ट लेने जाने की तारीख भूल गई थी. असावधानीवश उसे एक दिन बाद की तारीख ध्यान में रही. दूसरे दिन स्कूल में भीड़भाड़ कम होने पर उसे शक तो हुआ मगर आ गये थे तो मिलना भी जरूरी है.  कक्षा अध्यापिका ने रिजल्ट देने से साफ मना कर दिया था. आखिरकार शेखर ने ही माफी माँगते हुए फिर कभी ऐसी गलती नहीं होने का आश्वासन दिया तब जाकर  उन्होंने चेतावनी देते हुए मार्कशीट सौंपी थी.  स्वयं की गलती के कारण शेखर को माफी माँगते देख माला ने जाने कितनी बार मन ही मन स्वयं को धिक्कारा होगा. पति पत्नी में आपस में कितनी भी नाराजगी और लड़ाई झगड़े होते हों  मगर किसी अन्य का अपने सामने ही पति को बुरा भला कहना माला सहन नहीं कर पाती. यह प्रेम था या संस्कार , माला इस पर पर्याप्त बहस भी मन ही मन कर लेती .

उस दिन रास्ते भर अपने गुस्से पर काबू रखते शेखर घर आते ही माला पर फट पड़ा.
क्या करती रहती हो दिन भर. अगली बार से मैं स्कूल हरगिज नहीं जाऊँगा. खुद ही संभालो यह सब.

मैं क्या करूँ. मैंने देखी तो थी डायरी. पता नहीं कैसे गलत तारीख ध्यान में रही. माला की शर्मिंदगी आँखों से गंगा जमना बन बह निकली.

इन आँसुओं से परेशान हो गया हूँ मैं. कितना समझाऊँ रोना बंद करो. घर में, बच्चे में मन लगाओ पर तुम समझती ही नहीं.
शेखर ने माला का हाथ पकड़ कर उसे करीब बैठा लिया. थोड़ी सी सहानुभूति और ढ़ेर सारे प्यार ने जैसे आँखों के बाँध को तोड़ कर रख दिया हो. हिचकियों सहित तेज हुई उसकी रूलाई से काया सहम कर पिता से लिपट गई.

मैं क्या करूँ. नहीं भूल पाती पिता को. किस तरह अपने पैरों से चलकर अस्पताल की सीढ़ियां चढ़ कर गये फिर  निढ़ाल हो गये. ऐसा कैसे हुआ. आपने कुछ क्यों नहीं किया. मैं कुछ क्यों नहीं कर पाई पापा के लिए...
रोते -रोते बेहाल हुई माला और गोद में काया को थपकियाँ देकर सुलाता शेखर किंकर्तव्यविमूढ़ हो उठा. मन ही मन खुद पर नाराज भी हुआ पर वह करे तो क्या. दिन भर ऑफिस का प्रतिस्पर्धी माहौल, छोटे बच्चे की जिम्मेदारी और माला की बढ़ती हुई बेख्याली. घरेलू कार्यों में भरसक सहायता करने के अलावा गृहस्थी की गाड़ी खींचने के लिए किये जाने वाले अतिरिक्त कार्य भी. अपनी जिम्मेदारियों की समझ उसे हौसला खोने भी नहीं देती थी. अधलेटा सा शेखर इन सब सोच में डूबा था कि दरवाजे पर खटखट ने उसको सजग किया. बचपन का मित्र कमल अपनी पत्नी विद्या के साथ  दरवाजे पर खड़ा था. उनको ड्राइंग रूम में बैठाकर शेखर ने माला को धीमे से जगाया. हाथ मुँह धोकर मुस्कुराहट लिए बैठक में आई माला हालांकि बिखरे बाल और सूजी आँखें उसके उदास मन की हालत बयां कर रहे थे. कुछ देर औपचारिकता में स्वागत अभिवादन के बाद
चाय बना लाती हूँ कहती माला रसोई  जाने केे लिए मुड़ी तो विद्या भी उसके साथ हो ली यह कहते हुए कि मैं भाभी की मदद करती हूँ.
आपके पापा के बारे में सुना था तबसे ही आपसे मिलने का मन हो रहा था. कैसे क्या हो गया था!
चाय की पतीली गैस पर रखते माला भीगी पलकों से सब बताती रही.
बहुत बुरा हुआ लेकिन पीछे रह जाने वालों को हिम्मत रखनी पड़ती है. चाय विद्या ने ही कप में छानी. बिस्किट, नमकीन करीने से प्लेट में रखते हुए माला फिर से सुबक पड़ी.
अपना ख्याल रखो भाभी. कितनी कमजोर हो गई हो.
नन्हीं काया भी तुम्हारे पास है. और देखो , हर समय रोते रहने से कुछ हासिल नहीं है. उलटा सामने वाला भी परेशान हो जाता है. स्वयं स्वस्थ न रहो तो कोई एक गिलास पानी भी नहीं पूछता. शेखर अकेले कितना और कब तक  ध्यान रखेगा..

ठीक कहती हो विद्या. मैं भी सोचती हूँ मगर...
दुख और शर्म की मिली जुली अनुभूति इंसान को कितना दयनीय बना देती है. सोचती हुई विद्या ने माला का हाथ पकड़ कर हौले से दबाया. दर्द को अनकही संवेदना ने चेहरे की स्मित मुस्कुराहट में बदल दिया.

चाय बन गई या कहीं बाहर से ही आर्डर कर दें .
उधर से हल्के ठहाके के साथ  कमल की आवाज आई तो दोनों चाय और नाश्ते के साथ बैठक में आ गईं. दोनों के साथ कुछ हल्की- फुल्की इधर उधर की बातों से माला भी सहज हो आई थी.

आज फिर से कक्षा अध्यापिका के बुलावे ने उसे चिंता में डाल दिया था. क्या कहेगी शेखर को, कैसे सामना करेगी उसका. जैसे अपने हाथों पैरों पर नियंत्रण न रहा उसका. साँसें जैसे डूबती सी जातीं थीं. दवाईयों के डब्बे से  ब्लड प्रेशर की दवा ढ़ूँढ़ कर ले ली मगर घबराहट पर काबू ही न था. अकेली क्या करेगी वह.
काया को गोद में उठाया और दरवाजे की कुंडी लगाकर पड़ोस के वर्मा जी के घर चली आई. मिसेज वर्मा उसकी मानसिक स्थिति समझती थीं. अपने काम निपटाकर माला के पास आ बैठतीं थी कई बार. उसके गोद से कायाको लेकर सुला दिया . माला वहीं सोफे पर पसर गई. अपनी घबराहट पर नियंत्रण न रख पाई और फूट फूट कर रो पड़ी. मिसेज वर्मा ने उसे पानी पिलाया और सिर पर हाथ फेरते बहुत समझाया भी.
दवा से कुछ फायदा नहीं हो रहा तो किसी पीर देवता से झाड़ा लगवा आयें या  फिर किसी देवी देवता को पूछ लेते हैं. अगली गली में वह कन्नू रहता है न , उस पर छाया आती है. कहते हैं सब सच बताता है. कुछ टोना टोटका  कर दिया हो किसी ने या कोई देवताओं का दोष हो. या फिर छोटा बाजार चल आयें . वहाँ फूली देवी में माता आती है. झाड़ा भी देती हैं और साथ ही देसी दवा भी . बहुत लोगों को फायदा होते देखा है.

देवी देवता, झाड़ फूँक सुनते माला कुछ चौकन्नी सी हो गई. विज्ञान का ज्ञान उसे इन सब बातों पर विश्वास न करने देता था. मगर काया की तबियत खराब होने पर दवा देते हुए भी राई लूण करना नहीं भूलती थी. या फिर कपड़े की कतरनों से वारते हुए भी नजर उतारने का टोटका कर ही लेती थी. करने को कार्तिक में करवा चौथ पर चंद्रमा के दर्शन कर उसकी पूजा भी करती ही थी जबकि उसे स्कूल में पढ़े गये विज्ञान के सबक अच्छी तरह याद थे कि चंद्रमा एक उपग्रह मात्र ही है . उसकी रोशनी भी उसकी अपनी नहीं. वह सूर्य के प्रकाश से ही चमकता है. मगर कुछेक अवसरों पर दिमाग की खिड़कियों को बंद कर श्रद्धा के वशीभूत हो किये गये शुभ कार्य एक सुकून या प्रसन्नता का भाव उत्पन्न करने में सहायक होते हैं. पारिवारिक और सामाजिक मेलजोल के ये पर्व या व्रत त्योहार रूढ़ि में न बदलने तक एक प्रकार से दैनिक कार्यों जैसे आवश्यक से ही  हो जाते हैं और रससिक्त कर सुख और आनंद की अनुभूति देते हैं.

नहीं. अभी इसकी जरूरत नहीं. कुछ आराम मिला है मुझको.  यदि आवश्यक हुआ तो हम जरूर चलेंगे वहाँ.

अब तक पैर समेट कर आराम की मुद्रा में बैठती माला संयत हो चली थी. मिसेज वर्मा की बेटी शुभी चाय बना लाई थी. किशोरवय की उनकी पुत्री चपल और हँसमुख होने के साथ सुघड़ भी थी. काया के साथ खेलते बतलाते माहौल को सुखद बनाने में अपनी भूमिका में कुशल लगती थी वह.

अब चलती हूँ मैं. शेखर के आने का समय भी हुआ जा रहा. फिर इसका होमवर्क भी कराना है. काया की अँगुली पकड़ते वह  उठ खड़ी हुई . मगर घर की ओर मुड़ते कदम उसे फिर से चिंता में डाले जाते थे. क्या कहेगी शेखर को वह. क्यों बुलावा आया होगा स्कूल से...

अभी दरवाजे पर लगा ताला खोला भी न था कि पीछे से दौड़ती हाँफती शुभी उसकी साड़ी का पल्ला खींचते उसे जल्दी वापस उसके घर चलने को कहने लगी.
जल्दी चलिये . माँ ने बुलाया है. कहते उसने काया को गोद में उठा लिया.
अरे! घबराइये मत. कोई आया है घर पर. माँ आपसे मिलवाना चाहती है.
कौन होगा जिससे मिलवाना इतना जरूरी है कि उसके लिए शुभी इस तरह दौड़ती भागती चली आई. काया और शुभी को पीछे छोड़ लंबे डग भरती हुई माला अगले ही पल में मिसेज वर्मा के सामने थी.

आओ माला. कितनी अच्छी बात है न. अभी कुछ ही समय पहले इसकी बात कर रहे थे हम . तुम जैसे ही बाहर निकली इसका आना हुआ. जानती हो न इसको.

हाँ .  आपकी गली में बच्चों के साथ खेलते इसे कई बार देखा है. चेहरे से पहचानती हूँ.

अरे. यही तो है कन्नू जिसके बारे में मैं बता रही थी. वही जिस पर देवता की छाया है. आगे के शब्द फुसफुसाते से कहे थे उन्होंने.

जा शुभी. भैया के लिए पानी भर ला लोटे में. एक आसन भी दे जा बिछाने को.

अनमनी सी हो उठी थी माला. यह क्या कर रही हैं मिसेज वर्मा. उसे विश्वास नहीं इन ढ़कोसलों पर. कैसे कहे उसके सामने ही. मगर तब तक शुभी आसन बिछा चुकी थी. उसके सामने पानी का लोटा भी रख दिया गया था.

कैसे भागे यहाँ से सोच रही थी माला . शेखर को पता चला तो कितना गुस्सा होगा. तब तक कन्नू जी आसन पर जम चुके थे. हाथ पैरों को बल खाने की मुद्रा में लाते उसकी आँखें हल्की ललाई लिये थीं. आसन पर बैठे मरोड़े खाते देख मिसेज वर्मा उसके सामने जा बैठीं. इशारे से शुभी को काया को वहाँ से ले जाने को कहते हुए माला का हाथ खींचकर अपने पास ही बैठा लिया.

बोलो महाराज. क्या बात है. क्या कष्ट है!
मिसेज वर्मा की  उत्सुकता देखते बनती थी वहीं माला सकुचा रही थी. किस फेर में पड़ गई आज वह.
उधर कन्नू के शरीर के झटके बढ़ते जा रहे थे . नहीं के इशारे में जोर से गरदन हिलाते हुए वह छटपटाता सा दिख रहा था. कुछ कहने के लिए मुँह खोलता कि उढ़के से  दरवाजे पर जोर से खट की आवाज आई. वर्मा तेजी से घर में घुसे थे.

ये क्या हो रहा है यहाँ...
तत्क्षण ही तेजी से पानी का लोटा उठाकर गटकते कन्नू अपनी गरदन ढ़हाते जमीन पर लोट गया.  कुछ ही सेकंड में वापस अपनी स्वाभाविक स्थिति में उठ भी बैठा. सब कुछ इतने कम समय के अंतराल में हुआ कि माला समझ नहीं पाई कि आखिर हुआ क्या था.
कन्नू  वर्माजी  का अभिवादन करते हुए उठकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर जम चुका था.

वर्मा जी घर के भीतर चले गये  तो मिसेज वर्मा ने धीमे स्वर में माला से कहा... अभी देवता चले गये पर कुछ असर तो रहेगा. पूछती हूँ तुम्हारी समस्या के बारे में.

इनके पिताजी के देहांत के बाद इसकी तबियत ठीक नहीं रहती. पेट में अजीब सा दर्द बताती है. खाना पचता नहीं . दिन पर दिन कमजोर हुई जा रही. दवा लेते दो तीन महीने हुए. कुछ असर नहीं हो रहा. कहीं पैर तो नहीं पड़ गया इनका कहीं.

अब तक मिसेज वर्मा और माला भी कुर्सियों पर बैठ चुकी थीं.

  हम्म्म्... पिता जी के जाने के बाद.... एक जोर की साँस ली कन्नू ने और रूआँसी सी हुई माला की ओर देखा.

क्यों रोती हो इतना. किसके लिए रो रहे. क्या समझते हो . तुम अमर हो. ये जीवन है. इसका क्या भरोसा. सोचो कल ही तुम्हें कुछ हो गया तो.... तुम्हारा इस समय का रोना क्या काम आयेगा.

कान के पर्दे पर जैसे किसी तीक्ष्ण वस्तु का वार हुआ. भय से सिहर उठी माला. पाँच वर्ष की नन्ही सी काया , अकेले पड़ता शेखर... इतनी सी देर में क्या- क्या नहीं सोच लिया उसने.

मैं चलती हूँ. शेखर परेशान होंगे. काया को गोद में उठाये माला दौड़ती सी घर आ पहुँची. शेखर घर आ चुका था. स्कूटर भीतर रखने के लिए मेनगेट पूरा खोलता हुआ रूक गया.

कहाँ गई थीं. अब क्या हो गया. उसके मुरझाये
हतप्रभ चेहरे को देखते कहा उसने.

कुछ नहीं. काँपते हाथों से दरवाजे का ताला खोला माला ने. काया को गोद में लिए हल्की सिसकियों से शुरू हुई उसकी रूलाई जल्दी ही चीख कर रोने में बदल चुकी थी.  शेखर और काया को अंक में समेटे कुछ देर फूट फूट कर रोती रही माला. होठों में ही अस्पष्ट शब्दों में बुदबुदाती.  काया के उलझे बालों की लटें, तुड़ी मुड़ी सी यूनिफार्म को अँगुलियों से सही करते हुए . वह इतनी निर्दयी कब और कैसे हुई. पिता का जाना उसे  इतना व्यथित कर रहा कि उसने पाँच वर्ष की नन्हीं काया के बारे में भी नहीं सोचा. अपने आपको इतना कमजोर कैसे कर सकती थी वह. उसके और काया के अच्छे भविष्य के लिए खटते शेखर के प्रति इतनी लापरवाह कैसे हो सकती थी वह. अपनी जिम्मेदारियों से कैसे भाग सकती थी. क्या उसका अपना दुख इस दूधमुंही काया के दुख से भी बढ़कर था...
उसके बालों में अँगुलियाँ फेरते शेखर ने उसे जी भर रो लेने दिया.

तुम बहुत साहसी हो और हम दोनों का संबल भी. शेखर समझा रहा था और माला कल के नये सूर्य के साथ अपने भीतर ऊर्जा भरते हुए जिंदगी की ओर बढ़ रही थी. दर्द वहीं था अभी, अफसोस भी परंतु उसके साथ अपने उत्तरदायित्व को अच्छी तरह निभाने,का हौसला भी...।

कितनी दवाईयाँ, कितनी किताबें और कितने मनोवैज्ञानिक नहीं समझा सकते थे जिसे , एक अल्पशिक्षित अज्ञानी ने अनजाने में समझा दिया था उसे। देवी देवता के आने जाने  का पता नहीं और न कभी वह इस पर विश्वास भी कर पायेगी मगर जीवन मजबूती से चलते रहने का नाम है, दुर्लभ है . यह जरूर समझ चुकी थी माला. कमर कस कर आने वाली चुनौतियों से लड़ने को तैयार.

सोमवार, 30 अप्रैल 2018

चटनी जितनी लीद.....

कुछ समय पूर्व वृंदावन से पधारे कथा वाचक से राम कथा को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ . गृह कार्यों से फारिग होकर लगातार सुन पाना संभव भी नहीं इसलिए बीच के कुछ समय का लाभ लेकर ही उत्साहित अथवा कृतज्ञ समझ लिया जाए।पूर्ण समय न दे पाने का सिर्फ यही कारण है ,ऐसा भी नहीं कहा जा सकता।

रामचरितमानस का पाठन कई बार किया है और इनसे सम्बंधित कथा कहानियों का वाचन श्रवण एवं मंचन लाभ भी लिया है  सो मन में यह भावना भी रहती है कि  आखिर इस बार नया क्या सुनने को मिलेगा। सब तो पता है। कथा की श्रोता होते हुए भी यह विचार मन में चल रहा था मंच से स्वामी जी ने शिव शंकर पार्वती का वह प्रसंग सुना दिया जिसमें शिवजी काकभुसुंडि से राम कथा का श्रवण कर रहे मगर पार्वती सोच रही कि मुझे तो सब पता है यह क्या सुनाने वाले हैं। सीता का वेश धर  राम की परिक्षा लेने वाले इस वृतांत  में अंततः सती  को भान होता है कि सब ज्ञात होकर भी बहुत कुछ अज्ञात है।
जीवन के इस सत्य का प्रत्येक व्यक्ति को कई बार भान होता है कि ज्ञात में बहुत कुछ अज्ञात है पर अहम यह मानने नहीं देता ...एक ही जीवन में जाने कितना कुछ जानने को बाकी रह जाता है ...
  खैर,  उनके कथा वाचन में उनके ज्ञान पर टिप्पणी  न करते हुए बताते चलूँ कि स्वामी जी और उनके साथी रामकथा तथा अन्य भजन बहुत सुर में सुनाते हैं इसलिए आनंद रस भरपूर प्राप्त हुआ... उनके भजन  में फ़िल्मी टोन  नहीं बल्कि भरपूर शास्त्रीयता है जो हमारे जैसे श्रोता को बांधे रखती है। कथावाचक रामकथा के बीच-बीच में आज के समयानुसार कई रोचक दृष्टांत , कथाएं भी सुनाते हैं जिससे वाचन की रोचकता बनी  रहे।
ऐसी ही एक छोटी सी रोचक कथा साझा करने योग्य  है...

एक अभिमानी राजा मद में भरा हाथी पर नगर भ्रमण को निकला। तभी रास्ते से गुजर रहे एक साधू ने दानी जानकार  राजा से दान प्राप्त करने के लिए अपना वस्त्र आगे फैला दिया।    अभिमान में भरे उस चिड़चिड़े राजा ने इधर -उधर देखा  . तभी उसकी नजर हाथी द्वारा तुरंत की गई लीद पर गई।  उसने  अपने सैनिक को आदेश दिया कि वह लीद  उठा कर साधु की झोली में डाल  दे। राजा जब भ्रमण कर महल पहुंचा  और भोजन करने बैठा तो जैसे ही ग्रास उठता सुस्वादु व्यंजनों की भरी थाली में उसे लीद  ही लीद दिख पड़ी। कई ग्रास छोड़े ,कई  थालियां बदलीं मगर प्रत्येक ग्रास में वही लीद  नजर आये। भूख से बेचैन राजा की तकलीफ देख कर राज ज्योतिषी को बुलाया गया। उसने राजा द्वारा लीद का दान करने की घटना का प्रभाव बताया।
अब इसका क्या उपाय किया जाए। सोचते हुए ज्योतिषी ने सुझाया कि  राजा स्वयं ऐसे कार्य करे जिससे उसकी सर्वत्र निंदा हो ताकि राजा की जितनी अधिक निंदा होगी उसके पाप निंदा करने वाले के हिस्से में स्थानांतरित हो जाएंगे क्योंकि जो व्यक्ति किसी की निंदा करता है वह उसके पाप को स्वयं ढ़ोता  है। अपनी करनी से स्वयं अपनी निंदा कौन सुनना चाहता है मगर कोई उपाय न देख राजा ने मुनादी करवाई कि सभी नागरिक राजा की खूब  बुराई करें. प्रजा को अच्छा अवसर प्राप्त हुआ। जिसको देखो जी खोलकर राजा की निंदा करता नजर आता। धीरे -धीरे राजा की थाली से लीद कम होती जाती थी मगर फिर भी भोजन में चटनी जितनी लीद थाली में बनी ही रहती। राजा ने फिर बुलाया ज्योतिषी को...ज्योतिषी ने  बताया कि राजन आपके राज्य में सिर्फ एक व्यक्ति है जो किसी  की निंदा नहीं करता और आपकी थाली में बची हुई लीद  का कारण भी वही है। राजा ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी कि  वह व्यक्ति उसकी बुराई करें मगर निंदा करना उसका स्वाभाव ही नहीं था। थक हार कर राजा ने सामान्य नागरिक का वेश बनाया और उस व्यक्ति के पास पहुँच कर अपनी खूब बुराई करता रहा मगर उस व्यक्ति के मुंह से एक भी शब्द निंदा का नहीं कहलवा पाया। राजा के लगातार प्रयास को देख वह व्यक्ति हँस पड़ा  क्योंकि वह राजा को पहचान गया था  . उसने कहा कि राजन आप कितनी भी प्रयत्न करें मगर मेरी जुबान से आपकी निंदा नहीं निकलेगी  . चटनी भर ही सही लीद तो आपको खानी  ही पड़ेगी। अब राजा की समझ में आ गया था कि वचन और कर्म में सावधानी  प्रारम्भ से ही अपेक्षित है.  जब हम किसी की निंदा कर रहे होते हैं तब उसके पाप का भाग अपने ऊपर लाद  रहे होते हैं और जब निंदा झूठी हो तब तो उसके भार का कहना ही क्या  ....

कहते हैं न भाव सिर्फ कहानी सुनने तक ही जगते हैं फिर से वही वास्तविकता...मगर सुनने में आनंद मिला तो लिख कर बाँटना अच्छा लगा. हम न सही, किसी एक का भी जीवन बदल जाये तो लाभ ही होगा और नुकसान तो कुछ भी नहीं.
     

सोमवार, 3 नवंबर 2014

भीष्म पंचक (पंचभीकू ) लोककथा ....

पवित्र कार्तिक मास के आखिरी पांच दिन " भीष्मपंचक" (पंचभीकू )कहलाते हैं।  धार्मिक मान्यता में ये पांच दिन वे हैं जब बाणों की सरसैया पर लेते भीष्म पितामह ने पांडवों को उपदेश दिए थे।
 मगर लोक मान्यता में विभिन्न पर्व /व्रत  आदि के  नाम के बदलाव के साथ ही इससे जुडी  कथाएँ भी भिन्न हो जाती है।   सामाजिक , धार्मिक महत्व जो भी रहा हो इन लोक कथाओं का , मगर मनोवैज्ञानिक रूप से भी ये विलक्षण होती हैं।   कल्पनाशीलता की सजावट के साथ मनुष्य के मनोभावों , आदतों और व्यवहार पर तीक्ष्ण दृष्टि और समाधान रखती हैं ये लोककथाएं। किस प्रकार इन कथाओं के माध्यम से सामाजिक , मानसिक समस्याओं के विभिन्न पहलू  को प्रतीकात्मक रूप  उजागर कर समाधान ढूंढने का प्रयत्न
किया जाता रहा , विचारणीय है।

 पांच दिनों के इस व्रत अनुष्ठान के साथ लोकमानस में प्रचलित कथा इस प्रकार है -




एक साहूकार की बहू पंचभीकू का व्रत स्नान नियम से करती थी। तारों की छाँव में ही स्नान पूजन की कामना से गंगा स्नान को जाती स्त्री प्रार्थना करती  " गंगा -जमना -अड़सठ तीर्थ थारी पैड़ी पग  धरूं , मेरे सत (सतीत्व ) राखे" . और स्नान के बाद नहा धोकर , पीपल , केला , तुलसी , आवला और ठाकुर जी की पूजा करती। एक दिन स्नान के बाद अपनी माला और  मोचड़ी (जूतियां ) वहीँ भूल आई. राजा का बेटा गंगा किनारे जल पीने आते पशु पक्षियों का शिकार करने के लिए आया तो मोचड़ी देख मन में विचार किया कि जिसकी मोचड़ी इतनी सुन्दर है , वह स्त्री भी अवश्य सुंदर होगी। उसने साहूकार की बहू से मिलने का  प्रण किया और उसके घर बुलावा भेजा।  साहूकार और उसकी पत्नी भयभीत हुए कि अब क्या होगा।  राजा का आदेश टाला भी नहीं जा सकता और घर की बहू बेटी की सुरक्षा और इज़्ज़त का भी सवाल है।  बहू ने सुना तो ससुर जी को कहला दिया  कि वे चिंता न करें।  उधर राजा के बेटे को कहलवा दिया कि पांच दिन सुबह अँधेरे  ही वह गंगा स्नान को आएगी , वह उससे वहीँ मिल ले।  राजा के बेटे को चैन कहाँ।  वह रात में ही पहुँच गया नदी किनारे , रात भर उसके इन्तजार में जागता बैठा रहा , मगर सुबह  अँधेरे ही उसकी आँख लग गयी।  साहूकार की बहू गंगास्नान को आई , प्रार्थना करती " गंगा जमना अड़सठ तीर्थ थारी पैड़ी पग धरूँ , मेरा सत रखे। अपने नित्य कर्म किये।  अपने साथ वह तोते को लेकर आई जिसे साक्षी धरते हुए कह गयी ,  सुआ थारी साख धरुं , कह देना उस पापी हत्यारे को मेरी एक रात पूरी हुई !
जैसे ही साहूकार की बहू वहां से निकली ,  राजा के बेटे की आँख खुली तो सबेरा हो चूका था।  उसने देखा वहां कोई नहीं था , बस एक तोता था जो राजा के बेटे को देखकर हँसा कि  वह तो गई।  राजा के बेटे ने पूछा , कैसी थी !
सुआ बोला , "आभा की सी बिजळी , मोतिया सी झळ   " (उसकी आभा मोतियों की तरह थी जिसकी चमक बिजली जैसी हो )
अब तो राजा का बेटा बहुत पछताया।  दूसरे दिन प्रण कर बैठा वहीँ नदी किनारे कि आज तो देखकर ही रहूँगा।  मगर वही साहूकार की बहू के आने का समय हुआ और उसकी आँख लग गयी।  साहूकार की बहू ने अपने नित्य कर्म धर्म किये और तोते को साक्षी धर कह गयी , " सुआ ,  तेरी साख धरूं , कह देना उस पापी हत्यारे से मेरी दो रात पूरी हुई।  तीसरे दिन राजा के बेटे ने शूलों (काँटों ) की चौकी पर बैठा कि देखूं ,आज कैसे नींद आएगी।  मगर फिर वही साहूकार की बहू के आंने का समय हुआ और उसकी आँख लग गई।  सुबह जाते फिर साख भरा गयी कि  आज  तीन रात पूरी हुई।  चौथे दिन राजा अंगुली काटकर उस पर नमक छिड़क कर बैठा,  पांचवे दिन आँख में मिर्च डालकर सारी रात जागा मगर फिर उसे फिर भी आँख लग गई।  पांचवे दिन जाते जाते कह गयी - सुआ कह देना उस कामी लोभी को , मेरी पांच रात पूरी हुई। मेरी माला मोचड़ी मेरे घर पहुंचा दे। उसने एक स्त्री का सत बिगाड़ने की कोशिश की , सो उसे भगतना पड़ेगा।
राजा का बेटा निराश होकर महल चला गया।  घर पहुंचा तो देखा कि उसके सर पर गूमड़ हो गया है।  चार पांच दिन में गूमड़ बढ़ते हुए सींग बन गए।  अब तो वह छिप कर रहने लगा कि सब लोग उसे चिढ़ाएंगे कि उसके सर पर सींग निकल आये। राजा ने वैद्य बुलवाया मगर उन्होंने इलाज में असमर्थता व्यक्त करते हुए ज्योतिषी से पत्रा दिखाने को कहा. ज्योतिषियों ने उसका हाल देख बताया कि पराई स्त्री पर बुरा मन करने से उसकी यह दशा हुई है। वह पांच दिनों तक साहूकार की बहू के नहाये हुए जल से स्नान करे , तब ही उसकी बीमारी दूर होगी।  राजा  स्वयं साहूकार के घर गया और अपने पुत्र की करनी की माफ़ी मांगते हुए उनकी सहायता मांगी।  साहूकार की बहू ने  महल में जाने से इंकार कर दिया , राजा के बहुत विनती करने पर साहूकार ने कहा कि सुबह जब बहू स्नान करेगी तो छत के नाले से बहते पानी के नीचे राजा के बेटे को खड़ा किया जाए।  थक हार कर राजा को बात माननी पड़ी।  राजा के बेटे ने इस प्रकार स्नान किया तो उसके सींग झड़ गए।

(यह कथा थोड़ी बहुत फेरबदल के साथ भिन्न परिस्थितियों के अनुरूप कही जाती है )
इसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण मुझे तो यही लगा कि मन के विकार तन को भी बीमार करते हैं।  यदि मन की शुद्धता का उपाय किया जा सके तो तन भी स्वस्थ होगा !! बाकी मनोविश्लेषकों से प्रार्थना है यदि वे इस कथा की व्याख्या कर सके.

 !
नोट - चित्र गूगल से साभार ! आपत्ति होने पर हटा लिया जाएगा

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

द्विरागमन ....(3)

अपने जीवन की परेशानियों से निबटता एक सैनिक जा बैठा हरे भरे पार्क की एक बेंच पर , उसी बेंच से कुछ दूर मखमली दूब पर तिनके कुतरती एक स्त्री ,. तल्खी भरे परिचय से बढती मुलाकातें अजनबियत को परे धकेलती आत्मीयता में बदलती है . दोनों के बीच के  संवादों  के टुकड़े उन दोनों की कहानी को आगे बढ़ाते हैं , उनके जीवन की कहानी को . कहते हैं सुख में साथ चल रहे अपने फिर पराये हो जाते हैं मगर दुःख और संवेदना दो इंसानों के बीच बेहतर पहचान बनाती है ....जीवन की आपधापी के भागते क्षणों के बीच कुछ ठहर सी गयी है खुद को तलासते , सैनिक के दर्द अभी सिर्फ उसके अपने हैं ! पिछले  दो अंकों  द्विरागमन (1), द्विरागमन (2)के बाद अब आगे ....


        

उससे बतियाते मैं जानने लगा था कि वह अपने पति और बच्चों के साथ अकेले रहती थी।  उसके सास ससुर इतने नाराज थे कि एक ही शहर में रहने के बावजूद उससे कभी मिलने नहीं आते ...बच्चों के जन्म से लेकर उनके स्वास्थ्य खराब होने पर भी। बताया नहीं था उसने बस , उसकी बातों से जाना।
एक दिन पूछ  लिया था मैंने -
तुम्हारा प्रेम विवाह हुआ है क्या  !
हां, प्रेम विवाह के बाद हुआ है।
प्रेम विवाह के बाद प्रेम!
बुद्धू , प्रेम मुझे विवाह के बाद हुआ !!
अच्छा , उससे पहले किसी से प्रेम नहीं हुआ ! सच बताओ , तुम्हे विवाह से पहले कभी प्रेम नहीं हुआ।
वह कुछ देर खामोश रही।
प्रेम क्या होता है आखिर ! दो व्यक्ति एक साथ रहने और साथ जीने में ख़ुशी महसूस करते है , इसके अतिरिक्त प्रेम क्या होता है !
 मैं उस प्रेम की बात कर रहा हूँ जब कुछ अच्छा नही लगता ...  घबराहट होती है !भूख- प्यास मिट जाती है ... पढने में मन नही लगता ... रात में नींद नहीं आती  दिन में सपने देखने लगते हैं लोग !
वह प्यार होता है।  मुझे तो लगता था कि ये लक्षण ब्लड प्रेशर के होते हैं या अनिमिक होने के !
इस उम्र में तुम यह कह सकती हो , मगर मैं उस उम्र की बात कर रहा हूँ जब यह सब होता है ! क्या तुम्हे कभी कोई अच्छा नहीं लगा। तुम भी अच्छी खासी खूबसूरत हो ...तुम्हे भी तो किसी ने पसंद जरुर किया होगा .
अच्छा  क्यों नहीं लगा।  हम अपने जीवन में बहुत लोगो से मिलते हैं जो हमें अच्छे लगते हैं.  हम उनसे और  वो हमसे आकर्षित होते हैं.  सब हमारे जीवन में शामिल नहीं होते .  इससे प्रेम का क्या सम्बन्ध !
अभी तुमने कहा न दो व्यक्ति एक साथ रहने जीने में ख़ुशी महसूस करें , वही प्रेम है !

अचकचा गई वह।  शब्दों के जाल में उलझा दिया था मैंने।  उलझन भरी नजरों से थोडा नाराजगी से कहा उसने , मुझे नहीं पता ये सब ! मुझे इस तरह का कोई प्रेम नहीं हुआ बस।  मैं उसे ही प्रेम मानती हूँ जो जिम्मेदारी बन जाता है।
वह कुछ जल्दी में थी उस दिन। जल्दी जाना था उसे।  उसके पति शहर से बाहर जा रहे थे कुछ दिन के लिए . उनके सामान की पैकिंग करनी थी और भी घर के कुछ काम भी।  मुझे हैरानी हुई कि उसका पति उसकी कजिन के विवाह में अकेला ही जा रहा था।
कमाल है ! कजिन तुम्हारी है और पति तुम्हारा जा रहा है शादी में।  तुम क्यों नहीं जा रही।
मैं नहीं जा सकती। कम से कम एक सप्ताह लगेगा . बच्चों की पढाई का नुकसान होगा। वह कुछ उदास सी थी।
ऐसा भी क्या कि बच्चों को कुछ दिन की छुट्टी नहीं दिला सकती।
एक्जाम होने वाले है उनके कुछ दिनों में ही।
हाँ , मगर इसमें क्या हुआ ! तुम अपने सास ससुर के पास छोड़ सकती हो बच्चों को।
नहीं छोड़ सकती , वे नहीं आते हमारे घर !
मैंने उसकी ओर गौर से देखा तो वह एकदम से गड़बड़ा गयी .
मेरा मतलब है कि बच्चे कभी रहे नहीं है अकेले  इसलिए नहीं छोड़ सकती उनको कहीं।
वह कुछ नहीं बोली।  मगर मैं चाहता था कुछ कहे वह ! क्यों नहीं जाना चाहती है वह , क्यों नहीं जा सकती है !!
बस नहीं जा सकती , काफी है तुम्हारे लिए।
मुझे पता चल गया क्यों नहीं जाना चाहती हो तुम।  उसके जाने के बाद एक सप्ताह पार्क में मुझसे मिलने ज्यादा देर आ सकोगी … उसे खीझा कर बुलवाने का हुनर मैं सीख गया था !
खिझी बहुत अधिक वह मगर बोली कुछ और ही।
मैं तुम्हारा सर फोड़ दूँगी।
हा हा हा , मेरे सर तक तुम्हारा हाथ पहुचेगा भी  !! मैं सीधा तन कर खडा हो गया।  वह मेरे कंधे से भी छोटी थी।
मुझे बात ही नहीं करनी है तुमसे और उस दिन वह  नाराज होकर पैर पटकते चली गयी।

वह सचमुच नाराज हो गयी थी।  उस पूरे एक सप्ताह वह पार्क में आई ही नहीं . मैं पहली बार थोडा बेचैन हुआ। किससे पूछूं उसके बारे में।  आस पास खेलते बच्चों से , या आइसक्रीम वाले से।  मैं नहीं जानता था कहाँ रहती है वह . कभी मैंने पूछा नहीं . कभी उसने बताया भी नहीं। पहली बार मैंने सोचा ! कई बार उठ कर उन बच्चों के बीच गया मगर कदम फिर फिर कर लौट आते।  क्या पूछूं बच्चों से  , क्या कहेंगे बच्चे ! कौन थी वह जिसके बारे में मैं जानना चाह रहा था।  पता नहीं  कौन क्या सोचेगा . मैं चुप ही बैठा रहा मगर मुझे बेचैनी होती रही। इस बार मुझे खुद पर भी गुस्सा आ रहा था . मैंने उसे उदास देखा था कुछ परेशान भी और मैंने उसे चिढाना जारी रखा था . मुझे नहीं करना चाहिए था ऐसा .

क्यों नहीं आई वह ! सब ठीक तो है या हो सकता है वह भी अपने पति और बच्चों के साथ चली गयी हो विवाह में।  या कही मुझसे सचमुच नाराज तो नहीं हो गयी है।  ईश्वर जानता था मैंने सिर्फ उसे खिझाने के लिए ही कहा था।  जब कभी वह अनमनी नजर आती या अधिक चुप रहती नजर आती मैं जानबूझकर कुछ ऐसा कहता कि उसे गुस्सा आ जाये और चिल्लाते हुए लड़ पड़ती और लड़ते हुए उदासियाँ उस ज्वालामुखी चेहरे के डर के मारे दुबकी रहती . लड़ते हुए ही जाने कब मुस्कुराने भी लगती।   मुझे उसे मुस्कुराते देखना बहुत अच्छा लगता था।  मैं टटोलता हूँ खुद को , उसे ही क्यों , मुझे सबको मुस्कुराते देखना अच्छा लगता है।

उस पूरे सप्ताह मुझे बहुत अकेलापन लगा।  गलत है यह . मैं खुद को धिक्कारता था।  मैं सब बन्धनों से छूट चूका हूँ , मुझे किसी को याद नहीं करना ., याद नहीं आना है।  मगर क्या सचमुच छूटा जा सकता था !!
 मैं याद करता था उस मनहूस दोपहर को जिसने मेरी जिंदगी का रुख बदल दिया था।  हलकी सर्दी के दिन उस पार्क की बेंच पर धूप का टुकड़ा मुझे आकर सहलाता रहा . मैं याद करता रहा जो मैं भूल जाना चाहता था , मगर भूला नहीं था।
सैनिकों के जीवन में छुट्टियाँ उनकी पूरी एक उम्र होती है।  कब जाने कौन सी छुट्टी उनके जीवन की आखिरी हो जाए , उस छुट्टी के बाद कभी लौट नहीं पाए जीवन। हर जवान जी लेना चाहता है उन पलों को यादगार लम्हों की तरह। अचानक घर जाकर निशा को चौंका देना चाहा था मैंने . मगर उससे पहले ढेर सारी खरीददारी करनी थी मुझे . लाल किनारे वाली सफ़ेद साडी  बंगला साहित्य को सनक तक पसंद करने वाली निशा . बहुत भाता था उसे उसी बंगला स्टाईल में साडी पहनना , उसके लम्बे बालों और बड़ी आँखों के बीच चेहरे की बड़ी बिंदी उसे ठेठ बंगाली लुक देती थी . कई बार यकीन करना मुश्किल हो जाता कि वह बंगाल से नहीं थी , बंगाली नहीं थी .  "आमी तुमाको भालो वासी " दुकानदार ने चौंक कर देखा था मेरी ओर . सेल्सगर्ल द्वारा खोल कर दिखाई जाने वाली साडी में जाने कब निशा आ खड़ी हुई थी . सेल्सगर्ल ने भी पूछा,  कुछ कहा आपने सर!,
हाँ हाँ वो .... इस साडी को पैक कर दो . मैं घबरा गया था . क्या सोचा होगा उन लोगों ने . कैसी चुभती अर्थपूर्ण निगाहें थी दुकानदार की मगर सेल्सगर्ल बहुत प्यारी संजीदा सी लड़की थी.
 वह समझ गयी थी ,"सर , मैम पर बहुत जचेगी यह साडी , अच्छी पसंद है आपकी !"
घर परिवार से दूर रहने वाले जाने कितने पथिक घर की उड़ान भरने से पहले यहाँ भटकते आ जाते होंगे . माँ , बहन, पत्नी,  प्रेयसी के लिए कुछ उपहार में खरीदते उनकी आँखों को पढना सीख जाती है ये बालाएं . कई बार उनसे सलाह भी ले लेते हैं जैसे अपनी पसंद से दे दीजिये बहन को क्या अच्छा लगेगा ... क्या ले जाना चाहिए माँ के लिए , प्रेयसी को कौन सा रंग सुहाएगा . अनजान दुनिया के कुछ पल के साथी जाने पहचाने अपनों के लिए किस अपनेपन से जुट जाते हैं . ना , सिर्फ व्यापार या मजबूरी नहीं . उनके चेहरे की नम आत्मीयता बेगानों में भी संवेदनाओं के बचे होने की पूरी गारंटी देती हैं . और जब अपनी नन्ही परी  तृषा के लिए परियों वाली ड्रेस और गुडिया सिंड्रेला लेते तो जैसे वात्सल्य का समन्दर उछाले भरता उनकी ममता को सहलाते रहा .
मेरी नन्ही परी , आ रहा हूँ मैं !  फोन पर अपनी तुतलाती जुबान में जाने क्या सुनाती रहती थी .  उसकी माँ से ही जान पाता था कि कभी वह लोरी सुना रही होती है तो कभी मम्मा की शिकायत . उस दिन उसकी प्यारी शरारतें बताते सुनते हम दोनों के गले भर आये थे . कागज़ पेन लेकर बैठी उसकी तृषा अपने पिता को ख़त लिख रही थी . उसकी माँ का सिखाया गीत गाते. पापा , जल्दी आ जाना . अच्छी सी गुडिया लाना .

क्रमशः ....
चित्र गूगल से साभार !

शुक्रवार, 27 जून 2014

द्विरागमन .... (1)




"We All are Dogs !"
कह दिया मैंने और उसकी प्रतिक्रिया को परखता रहा।  पिछले जितने समय से उसे जानता था उसे लगा था कि वह  बुरी तरह चिढ़ेगी , चीखेगी और कहेगी कि  इसमें क्या शक है ! 
मगर नहीं! एक सेकण्ड के लिए उसके चेहरे का रंग बदला और फिर से वही  स्निग्ध मुस्कराहट लौट आई थी।
बात चल रही थी उसके पति की .  अपनी धुन में डूबी हुई सी वह बता रही थी उसके पति के बारे में . वह मितभाषी है , ईमानदार है , दिल बहुत बड़ा है उनका …  
मैं उसे चिढ़ाना चाहता था या फिर उसका भ्रम दूर करना चाहता था  पता  नहीं क्यों . मैं देर तक  सोचता रहा था  उसके जाने के बाद कि  आखिर क्यों। … 
मैं जवाब नहीं जानता था या  जो जानता था उसे झुठलाना चाहता था। । पता नहीं , क्या , क्यों।
अचानक हंसी आ गयी मुझे। 

उस दिन पूछ लिया था था मैंने. आखिर तुम अपनी  जिंदगी से चाहती क्या हो।
पता नहीं!
तुम जिंदगी से खुश हो!
पता नहीं!
तुम नाराज हो!
पता नहीं!

मुझे झुंझलाहट होने लगी थी। तुम्हे कुछ पता भी  होता है !
अभी मैं इस समय यहाँ तुम्हारे साथ हूँ , तुम रखते हो न सब पता… 
और उसकी  खिलखिलाहट में मेरी झुंझलाहट जाने कहाँ ग़ुम  हो गयी।
मैं चिढ़ता हूँ खुद पर  उस पर-  गुस्सा हो तो खिन्न दिखना  चाहिये मगर  नहीं, उसे तो मुस्कुराना या  कहकहे ही लगाना है हमेशा। 
और आज मैं था जो हर बात पर कहता था.… पता नहीं !
इतनी देर से बात कर रहा हूँ उसके बारे में। 
वह कौन! कौन थी वह !कहाँ से आई थी ! कौन थी वह मेरी !
इस अनजान  शहर में चला आया था सबकुछ छोड़कर , या कहूँ छूट गया था …

अपने बारे में क्या लिखूं , उसकी ही बात करता हूँ.  इस  नए शहर की वसंत ऋतु की  एक दोपहर रही होगी . उस बाग़ की एक बेंच पर बैठा यूँ ही कर रहा था जिंदगी का हिसाब- किताब .  पता नहीं चला था कब सामने आ बैठी थी वह बेंच से थोड़ी दूर . पार्क की दूब पर बैठी तिनके तोड़ कर दांत में कुरेदती जैसे कुछ फंसा था  उसके दांत में ! 
नहीं , कुछ अटका हुआ जेहन में जैसे कुतरती जाती थी।

मेरी नजर कैसे पड़ी उस पर . शायद वहां खेलते दो बच्चों की बॉल उसके सर पर जा लगी थी . बच्चे डरे सहमे उसके पास जा खड़े हुए थे . उसने हलकी सी मुस्कराहट के साथ बॉल उठाई और दम  लगा कर दूर फेंक दी। बच्चे हुलस  कर बॉल के पीछे भागे और वह फिर उदास सी दूब कुतरती रही दांतों में जैसे कि  जिंदगी की मुश्किलात को कुतर देना चाहती हो।

क्या सूझा मुझे मैं अपनी जिंदगी के हिसाब किताब बंद कर उसकी ओर  देखने लगा।  एक अनचीन्ही सी मुस्कराहट लिए बैठी रहती है रोज उसी स्थान पर कभी मेरे आने से पहले , कभी आने की बाद से। कभी किसी को  देख मुस्कुरा देती मगर कुछ कहती नहीं  . कभी हाथ में पकडे काले क्लच के बटन को खोलती बंद करती , कभी घडी में समय देखती , कभी अँगुलियों पर कुछ गिनती। … एक सप्ताह  हो गया था मुझे उसे इसी प्रकार देखते। अपनी आँखों के सामने पड़ने वाले दृश्य से बिना  जाने कब हमसे  रिश्ता  बना लेते हैं .  जाने कब हमें उनकी आदत हो जाती है।  रोज देखते हुए उसे मुझे भी  उत्सुकता होने लगी थी . कौन है यह स्त्री ! किसी से बातचीत नहीं बस कभी अपने में खोयी तो कभी दूसरों को निहारती चुपचाप एक निश्चित समय तक ,. उसके बाद उठकर धीमे क़दमों से चल देती।

अपनी शांति को दरकिनार रख मेरा मन करने लगा  था  कुछ बातचीत करने को ,. किसी से भी  पास से गुजरते चने या आईसस्क्रीम वाले को रोक उससे जोर से बातें करता ,  मगर वह निस्पृह सी दूसरी और निगाह  किये जाने क्या तलाशती लगी मुझे।  बात करना चाहता था मैं उस ख़ामोशी से जो उस हरी दूब के मखमली लॉन  से  इस बेंच के दरमियान पसरी रहती थी. संकोच भी था कहीं वह मुझे  असभ्य न समझ बैठे।

मौका मिल गया था उस दिन बातचीत का जब फिर से एक बॉल आ टकराई थी उसके क्लच से होते हुए मेरी बेच तक !
मैंने मुस्कुराकर उसे नमस्कार कहा-  रोज देखता हूँ आपको यहाँ !
हूँ -  उसके शब्दों के रूखेपन में टोकने पर टरका  दी जाने वाली की नाराजगी ने मुझे आगे कुछ कहने से रोक लिया !
 भीतर कही जिद जोर मारने लगी . शायद मेरे भीतर का पुरुष  जानवर क्यों न कहूँ .  एक स्त्री की उपेक्षा को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। कहीं भीतर मेरे सम्मान को चोट तो नहीं लगी यह देखकर कि  मुस्कराहट का जवाब भी मुस्कुराहट से नहीं दिया  गया। अब मेरी जिद मेरी ख़ामोशी को पीछे धकेलते वाचालता में तब्दील होती जाती थी।  उससे बेखबर होने का दिखावा करता मैं कभी बॉल खेलने वाले बच्चों से  कभी कुल्फी या चना  वालों से जोर से बातें करता . बिना बात कहकहे लगाता मगर इतने दिनों बाद भी उन आँखों में पहचान या होठों पर मुस्कराहट नहीं उभरी। 
मैं समझ नहीं पाता  था , क्यों चाहता था मैं ऐसा। ऐसा कुछ ख़ास तो नहीं था उस स्त्री में . उसके सामान्य कद जैसा ही सामान्य पहनावे में लिपटा  .... किसी भी स्त्री को देखकर ही प्रभावित हो जाने वाला या उनके आगे पीछे चक्कर काटने जैसा चरित्र मेरा नहीं था. अपने  सैनिक जीवन के  औपचारिक  माहौल में जमने  वाली  अनौपरिक बैठकों में खूबसूरत ग्लैमरस तेजतर्रार  पार्टी की शान बनी तितलियाँ कम  नहीं देखी थी मैंने , देखने से लेकर मित्रता , साथ घूमना और वह सब भी जो सामान्य जीवन में अनैतिक माना जा सकता था … शायद एक सामान्य सी स्त्री द्वारा उपेक्षित किये जाने   ने ही मुझे कही भीतर नाराज किया था। जिस व्यक्ति को आप रोज देखते हो दिखते हो !  बात न करे पहचान आगे न बढ़ाये मगर सामने पड़ने पर मुस्कुराया तो जा सकता है !

उसे मुस्कुराता देखने की मेरी नाकाम कोशिशें मुझे चिढ़ाती जाती थी।  अपने व्यवहार की तबदीली पर हैरान मैं स्वयं पर झुंझलाता  था  और एक दिन जब यह झुंझलाहट हद से बढ़ी तो मैं पास से गुजरते कुल्फी वाले को जबरन रोककर उसे सुनाने की गरज से जोर से  बोल पड़ा , जब लोगो को किसी से बात नहीं करनी होती , किसी से घुलना मिलना पसंद नहीं होता तो घर से बाहर ही क्यों निकलते हैं।  सार्वजानिक स्थानों पर आने  की क्या आवश्यकता है , अपना कमरा बंद कर पड़े रहे न घर में !
इस बार पलटकर देखा उसने।  जाने कैसी सख्त निगाहें थी - सार्वजानिक स्थान किसी की बपौती नहीं , और  लोग  हर किसी से बातें करने के  लिए यहाँ आते भी नहीं।
मेरा तीर निशाने पर लगा था .  गुस्से से तिलमिलाती ही सही कुछ कहा तो उसने ! 

उस शाम से लेकर अब तक जाने कितनी शामें थी हम रोज ही आते मुस्कुराते  बातें करते .  वह बताती अपने बारे में , अपने पति , अपने बच्चों के बारे में , और मैं सुनता , कभी कुछ पूछ भी लेता … 
जाने कब  बीच की अनौपचारिकता की दीवार ढही मुझे या शायद उसे भी पता नहीं चला नहीं होगा  जब भी मैं उस दिन की तल्खी की बात सोचता हूँ।

आज वह गुस्से में तिलमिलाई नहीं  मगर उसके शब्दों में पर्याप्त तीखापन था - हंसी आ रही  है मुझे कि एक पुरुष मुझे यानि एक स्त्री को यह बता रहा है!
उसकी आँखों में अभी भी वही पहले से सख्ती जैसे कह रही हो मुझे कि हम स्त्रियां बेहतर जानती हैं कि तुम कुत्ते ही होते हो मगर अगले ही पल  फुर्ती से लौटी उसी स्निग्ध मुस्कराहट ने अपने शब्दों पर पर्याप्त  बल  देकर कहा - नहीं , वे ऐसे नहीं है ! सब ऐसे नहीं होते !
मत  मानो अभी  . एक दिन तुम मानोगी तब मुझे याद करोगी।
तुम्हे याद तो मैं यूँ ही कर लूंगी . कुत्तों के बहाने क्यों !
उसकी तिरछी नजरों के साथ  खिलखिलाहट  का अंदाज बात वहीं समाप्त कर देने जैसा था ! मगर बात समाप्त नहीं हुई  थी वहां।
मुझे लगता था कहीं भीतर से आती उसकी आवाज - तुम सब कुत्ते ही होते हो , सब एक जैसे।  गोश्त चूस लेने के बाद हड्डियां चुभलते रहने वाले कुत्ते , तुम्हारी भौंक बस हड्डी मुंह में रहने तक ही बंद रह सकती है।  
मैं काँप रहा था इस अनकही को सुनते . उसने तो कुछ कहा नहीं था।  कहीं मेरे मन की ही बात तो मेरे कानों में नहीं उड़ेली जा रही थी उसके अनकहे शब्दों में।  अपने आप को हमसे बेहतर और कौन जान सकता था! 
अपनी बेरहमी और बेशर्मी से घबराया मैं उसी बाग़ के दूसरे कोने पर लगे फूलों और बच्चों को देख मुस्कुरा दिया. अपने भीतर के पशु को छिपाते सांत्वना देता मनुष्य को !

मुझमे अभी बाकी है जिंदगी . रहेगी भी ! यकीन दिलाता स्वयं को।  वह थी ही ऐसी . बुरी तरह कुरेदती  अपने शब्दों से भीतर को बाहर खड़ा कर देती  जैसे कि आईने में अपना अक्स नजर आ रहा हो।

क्रमशः

(चित्र गूगल से साभार )

शुक्रवार, 9 मई 2014

रोशनी है कि धुआँ..... (8 )



मध्यम वर्ग में पली बढ़ी तेजस्वी अपने तेज के दम पर ही आगे बढती आयी है , कार्यालय की मुसीबतों से लड़ कर विजयी होते इस बार उसने लडाई लड़ी अपनी सखी के लिए , साथ ही उस स्त्री के लिएभी  , जिसने बेटी के रूप में लड़कियों को ताना या निपटा दी जाने वाली जिम्मेदारी ही समझा था . 

अब आगे ...

                                   


मिसेज वालिया ने बेटी के दिन पर दिन पीले पड़ते चेहरे और खाना खाने की इच्छा नहीं होने को बिगड़ते रिश्ते के कारण तनाव और पढाई के साथ कॉलेज की भागदौड़ ही समझा था , मगर एक दिन जब कॉलेज से लौट कर बेहद थकान के साथ सीमा ने खाया पीया सब उलट दिया तो उन्हें चिंता होने लगी थी उसके स्वास्थ्य की भी . लेडी डॉक्टर ने बधाई के साथ जो सूचना दी , उसने एकबारगी उन्हें खुश भी किया था , शायद आने वाले बच्चे की ख़ुशी में परिवार के मतभेद सुलझ सके , मगर सीमा और अधिक चिंतित हो गयी थी . मिसेज वालिया यह खुशखबरी लेकर सीमा के ससुराल पहुंची तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं था , सौरभ घर पर ही मौजूद था , वह दुबई से अपनी नौकरी छोड़ कर आ चूका था . उसके माता पिता ने बहुत अधिक प्रसन्नता न जाहिर करते हुए भी वे सीमा को अपने घर छोड़ जाने की ख्वाहिश प्रकट की , मगर सौरभ ने इस पर कुछ नहीं कहा और वहां से उठकर चला गया . उसी शाम  सीमा के फोन पर सौरभ का फोन आया तो जो थोड़ी बहुत उम्मीद बची थी , वह भी टूट गयी . नशे में फोन पर ही भारी गालीगगलौज करते हुए उसके चरित्र पर अंगुली उठाते सौरभ का यह रूप इससे पहले सीमा ने नहीं देखा था . सौरभ का यह रुख देखते सीमा तय नहीं कर पा रही थी कि वह आगे क्या करेगी , उसकी पढाई , करिअर , जीवन सब अधरझूल में था . अँधेरे आंसुओं में डूबते एक रात पेट में उठे भीषण दर्द ने उसे अस्पताल पहुंचा दिया , आने वाली जिंदगी ने खुद अपना रास्ता तलाश कर लिया था , उसने मुक्त कर दिया सीमा को. यह खबर जब सीमा के के ससुराल पहुंची तो तीनो प्राणी चीख पुकार उठे कि उनके खानदान के वारिस को जानबूझकर इस दुनिया में आने नहीं दिया गया . सीमा और उसके माता पिता हैरान थे कि कल तक जिस बच्चे को स्वीकार ही नहीं किया जा रहा था , वह इतना अजीज हो गया आज कि उसके न होने का कारण भी सीमा के मत्थे ही मंड दिया गया . मगर सीमा के लिए मुश्किलें यही समाप्त नहीं होने वाली थी , हॉस्पिटल से घर पहुँचते उसके सामने कानूनी नोटिस था जिसके अनुसार वह घर के कीमती जेवर और रुपयों के साथ लापता थी . उस नोटिस का जवाब देने के लिए वकील से मिलने जुलने का दौर चल रहा था इन दिनों !गहरी सांस लेकर सीमा ने अपनी कहानी समाप्त की .  उत्पीडन और शोषण के अनेकानेक केस से रूबरू होने के बाद भी तेजस्वी को इस मामले में कुछ कहना सूझा नहीं . खिड़की से बाहर देखा उसने , बाहर घिरता अँधेरा उसके दिल में घर करने लगा था जैसे मगर  अपनी सखी से सब कहकर सीमा का मन हल्का हो गया था .  अब वह बहुत संयमित लग रही थी .
चलती हूँ अब , बहुत रात हो गई सी दिखती है .
सॉरी , यार . तुम दिन भर से थकी मांदी लौटी थी , अपना दुखड़ा रोने में मैंने यह ध्यान ही नहीं रखा .
कोई बात नहीं  , मुझे अच्छा लगा कि मैं तुम्हारे लिए इतनी विश्वसनीय हूँ कि तुम बेहिचक सब कह सकी . चिंता मत करो , सब ठीक ही होगा . अपनी परीक्षा की तैयारी अच्छी तरह करो , कुछ मदद चाहती हो तो भी कहना .
अवश्य ही , खाना खा लो बेटा. मिसेज वालिया उसे बड़े स्नेह से कह रही थी . उनके शब्दों की आर्द्रता ने छुआ तेजस्वी के मन का कोई कोना , बीत कुछ वर्षों की कडवाहट जो उसने कभी जाहिर नहीं की थी , घुल कर बह गयी जैसे उसमे .
नहीं आंटी , माँ इन्तजार करती होंगी . आप सीमा का ख्याल रखिये . मैं अभी चलती हूँ ....स्नेह से भरी तेजस्वी  ने जवाब दिया और दरवाजा खोल कर बाहर निकल आई . माँ-पिता और भाई बहन खाने पर लिए उसका ही इन्तजार कर रहे थे . माँ ने कुछ पुछा नहीं , सिर्फ खाना परोसती रही . तेजस्वी को माँ की यह बात भी बहुत पसंद आती है कि वे चुप रखकर सुनने का इन्तजार करती है . खाने के बाद बालकनी में बैठी माँ बेटी देर रात सीमा की परेशानियों पर विचार करती रही , क्या हल निकलेगा इसका !!
अगला दिन बहुत व्यस्त था तेजस्वी की लिए , सीमा के माता पिता के साथ वह भी वकील बत्रा से मिलने चली गयी थी. उन्होंने सीमा को कोर्ट में प्रताड़ना का केस दर्ज करवाने की सलाह दी मगर वह इसके लिए तैयार नहीं थी . उसके मन में हलकी सी उम्मीद थी कि वह सौरभ से मिलकर बात करेगी तो शायद बात संभल जाए . आखिर तेजस्वी के प्रयासों के फलस्वरूप मध्यस्थ की सहायता से सीमा के कॉलेज में सौरभ का आना तय हुआ क्योंकि वह उसके घर आने के लिए बिलकुल तैयार नहीं था . सौरभ सीमा से मिलने कॉलेज पहुंचा तब भी नशे में ही धुत था . सीमा ने  अपना पक्ष समझाने की बहुत कोशिश की , मगर सौरभ टस से मस ने हुआ.  सीमा का हाथ पकड़कर ग्राउंड में ले आया और चीखने चिल्लाने  लगा ,  कॉलेज के अन्य साथियों ने भरसक प्रयास कर उसे चुप कराया और उसकी गाडी में ले जाकर बैठाया . सुलह की यह आखिरी कोशिश नाकाम हो गयी थी , मगर पास ही मौजूद तेजस्वी के कैमरे में उसकी हरकतें कैद हो चुकी थी . तेजस्वी ने जब यह मिसेज वालिया और उनके परिवार को दिखाया तो वे समझ गए कि अब सुलह की कोई गुन्जाइश नहीं रही हालाँकि वे यह भी जानते थी कि कोर्ट में सीमा के चरित्र हनन की कोशिशों को सामना करना इतना आसान नहीं था . तेजस्वी ने अपने कैमरे की गवाही के साथ ही सौरभ की नशे की आदतों , बुरे व्यवहार  एक मजबूत पक्ष अवश्य खड़ा कर लिया था . तेजस्वी ने सीमा को कुछ बताये बिना ही उसके सास ससुर से अपने सुबूतों के साथ संपर्क किया तब वे समझ चुके थे कि अब सीमा को कोर्ट में बुलाना उनके लिए मुसीबत हो सकता है . वे हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगने लगे और सीमा को वापस ससुराल बुला लेने की बात भी कर उठे .  तेजस्वी जानती थी कि उसके लिए इस तनावपूर्ण  तकलीफदेह व्यवहार को भूला पाना संभव नहीं होगा मगर वह सीमा से मिलकर ही आखिरी फैसला करना चाहती थी . सीमा ने सौरभ के साथ आगे जीवन बिताने में असमर्थता प्रकट की . आखिर तय यह हुआ कि आपसी सहमति के आधार पर तलाक लिया जाएगा , और सीमा के विवाह में होने वाला खर्च , दहेज़ में दिया गया सामान सहित  उसका स्त्रीधन उसे वापस दिया जाएगा . भरण पोषण के लिए सौरभ से रकम लेने में सीमा की कोई रूचि नहीं थी .
तेजस्वी को सीमा के लिए दुःख अवश्य था कि मात्र 24 वर्ष की उम्र में उसने क्या नहीं देखा , मगर फिर भी उसके मुश्किल समय में मददगार होने का आत्मसंतोष भी था.
मिसेज वालिया को समय ने सबक दिया है कि बेटी का विवाह हो जाना ही कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है , उनके सामने सपनों , महत्वाकांक्षाओं का विस्तृत संसार है , उनका साथ देना है , उत्साह बढ़ाना है .जब तब तेजस्वी की सहायता से  गदगद हुई जाती बलईंयाँ लेती हैं , बेटी हो तो तेजस्वी जैसी !
सीमा के जीवन में भी धीरे- धीरे खुशियाँ लौट आएँगी . कडवे दुखद समय को भूलने में कुछ समय तो लगेगा ही . समय ने उसे सिखाया है बहुत कुछ ....
तेजस्वी ने जो बाहर की दुनिया में सीखा , सीमा को घर की चाहरदिवारियों ने ही सिखाया . चुनौतियाँ , कठिनाई , कहीं भी कम नहीं !
अब मिसेज वालिया नहीं करती किसी पर कटाक्ष , यही कहती नजर आती है - बेटी है तो क्या , पढाओ लिखाओ , अपने पैरों पर खड़ा करो , जीने दो उन्हें अपनी जिंदगी , शादी /विवाह भी समय पर हो ही जायेंगे !!
तेजस्वी की एक और यात्रा पूर्ण हुई , हालाँकि चुनौतियों का सफ़र सतत है . उसे अभी अपने जीवन के अनगिनत सोपान इसी दृढ़ता और साहस के साथ तय करने हैं !!
धुंए के पार रोशनी है , विश्वास और  दृढ़ता कायम रहे तो धुंध को चीर कर रोशनी की लकीर पहुँचती ही है !!

(पूरी कहानी को दो भागों में एक साथ यहाँ भी पढ़ा जा सकता है )


चित्र गूगल से साभार!


शनिवार, 19 अप्रैल 2014

रोशनी है कि धुआँ..... (7)





तेजस्वी के जेहन में कौंधी माँ की शंका जो उन्होंने सीमा की सगाई के समय व्यक्त की थी ," तुम्हे सीमा के ससुर का स्वभाव कैसा लगा ".
सीमा कहते हुए कुछ देर के लिए रुकी थी और तेजस्वी सोच रही थी ये माताएं सचमुच अंतर्ज्ञानी होती है . बचपन में उनसे छिप कर की जाने वाली शरारतें भी वे झट से ताड़ लेती थी .किचन में से आवाज लगा लेती , तुम लोग सोफे पर क्यों उछल रहे हो , दूध का वेशिन में उड़ेल दिया न . बच्चे हर बार हैरान हो जाते .  माँ , आप एक साथ क्या- क्या कर लेती हो . आपको सब कैसे पता चल जाता है . ममता से भरी माँ मुस्कुराती . बच्चों के जन्म के समय ईश्वर माँ की पीठ पर भी आँख उगा देते हैं और चार अदृश्य हाथ भी देते हैं . कुछ भी शरारत करते उन्हें याद रहता कि  माँ की पीठ पर लगी आँखें उन्हें देख रही है .

सीमा की आवाज जैसे किसी अंधे कुंए से आ रही थी . उसे ससुराल में अजीब सा भय लगने लगा था हालाँकि वह अपने आप को समझाती कि कहींं उसका भ्रम तो नहीं रहा . कहींं उनके स्नेह को उसने गलत अर्थ तो नहीं दिया.  यदि ऐसा हुआ तो कितना बड़ा पाप अपने सर पर ले रही है वह . हर समय कशमकश अथवा अपराधबोध  में घिरी रहती .  एक दिन बेडरूम से अटैच्ड बाथरूम से बाहर निकल बेध्यानी में साड़ी पहनते जब उसकी नजर दरवाजे पर गयी तो उढ़के दरवाजे के पास एक साया सा नजर आया . वह धीमे चलते कमरे से निकल कर किचन तक आई तो फ्रिज में ठन्डे पानी की बोतल निकलते उसके ससुर सास से चाय बनाने की फरमाईश करते नजर आये . वह घबराई पसीने से भरी उलटे पैरों  कमरे तक पहुंची और अनुमान लगाती रही कि उसके कमरे के सामने से होकर रसोई तक जाने में कितना समय लगता लगेगा!

 एक बार फिर उसने डरते हुए भी  स्वयं को धिक्कारा . नहीं . इस तरह की शंका व्यर्थ है . मगर मन में बैठे भय ने कमरे में रहते उसे दरवाजे की सांकल बंद रखने को मजबूर कर दिया . यदि दरवाजा खुला रहता तो हर समय सावधान रहने की उसकी कोशिश न उसे सोने देती , न ही किसी काम में मन लगा पाती . अपने मन की शंका को अपने साये तक से भी छिपा कर रखना और अपनी संभावित गलत दृष्टि के अपराधबोध  और चिंता में डूबे उसका स्वास्थ्य गिरता जाता था . आँखों के नीचे काले घेरे होने लगे . सीमा अपनी स्थिति का बयान किसी से नही कर सकती थी . घर में काम करते हर समय घबराए ,चौकस रहते उससे काम में गलतियाँ होती जाती . कभी कप गिलास टूट जाते. रसोई से डायनिंग टेबल तक लाते खाने के डोंगे गिर जाते . डोर बेल बजने पर हर प्रकार से निश्चिन्त होने पर ही खोलने की उसकी आदत , घर में अकेले न  रहने का इसरार , सास अब उससे नाराज रहने लगी थी .
छुट्टियों में कुछ दिनों के लिए सौरभ के घर आने से उसे कुछ राहत मिली क्योंकि वह ज्यादा समय घर में ही बिताता था. इस बार उसके व्यवहार में कुछ परिवर्तन भी था . देर से सही , कुछ खुशियाँ उसके हिस्से में आई तो . मगर जब छुट्टियों के बाद वह वापस काम पर जाने लगा तो सीमा ने उसके अच्छे मूड को ध्यान में रख कर अपनी पढाई मायके में रहकर पूरी करने की इच्छा प्रकट कर दी .
सौरभ इस पर सहमत नहीं था . उसके जाने के बाद मम्मी पापा के अकेले रह जाने की चिंता के साथ ही उनके बुरे मान जाने का भय भी था . फिर भी कुछ दिनों के अंतराल पर मायके आने -जाने और रहने की स्वीकृति देते हुए उसने अपने माता पिता को भी सूचित किया . सास यह सुनकर थोड़ी नाराज हुई . क्या तकलीफ है यहाँ इसे . अपना कमरा , अपना घर . कोई पाबंदी नहीं . लोग सवाल भी करेंगे , मगर सौरभ ने नई ब्याहता पत्नी के बिगड़ते स्वास्थ्य और अनुरोध की लाज रखते हुए माँ को मना ही लिया . सौरभ के जाने के बाद कुछ दिनों के लिए सीमा मायके रह आई . दाम्पत्य प्रेम की आभा, दुश्चिंताओं से मुक्ति और आराम . उसके चेहरे पर पुरानी रंगत लौट आने लगी थी .
एक सप्ताह बात पुनः लौटी ससुराल तो सास ,ससुर दोनों ही चहक उठे .
सुनती हो .  इसकी नजर उतार देना . और खूबसूरत हो आई हमारी बहू तो .
उसके ससुर अपनी पत्नी को सम्बोधित कर रहे थे. सास स्नेह से मुस्कुराई  मगर सीमा के चेहरे पर भय और सकुचाहट एक साथ उजागर हो आई .
दुश्चिंता और शक एक बार मन में घर कर जाए तो .व्यक्ति की सोच घड़ी की सूई की उलटी दिशा में चल देती है . हर कथन अथवा कार्य अपने विपरीत अर्थ में भाषित हो मानसिक कष्ट देता प्रतीत होता है . कहींं दोष उसकी सोच का ही हो . सीमा स्वयं को यह समझा साहस बटोर लाती .
एक बरसात के दिन सीमा कॉलेज से लौटी . रेनकोट और हेलमेट ने उसे पूरा गीला होने से तो बचा लिया था मगर फुहार ने मन का मौसम सीला कर दिया था . अपनी मस्ती में गुनगुनाते अपने कमरे की ओर बढ़ते उसके कदम ठिठक से गए .
आज फिर उसके श्वसुर घर पर ही थे . झिझकते हुए उसने पूछ ही लिया , आप अभी घर पर कैसे ! ऑफिस के काम से शहर से बाहर जाना है , पैकिंग के लिए जल्दी आना पड़ा . तुम थोड़ी देर आराम कर लो . फिर मदद कर देना .
मदद के नाम से सीमा की सिट्टी पिट्टी गुम थी . वह कमरे में गयी और तेजी से दरवाजा बंद कर लिया  . गीले कपड़े तक बदलने की इच्छा नहीं हुई उसकी . घबराई सी बैठी थी वह कि कब वे उसे पुकार ले ।  क्या कहकर वह कमरे से बाहर आने से मना करेगी , यही सोचती डरती सिमटी बैठी रही . कुछ देर में अपने दरवाजे पर खटखट की आवाज़ से तीव्र हुई उसकी धडकनों के कारण पैरों तक ने जैसे उसका साथ छोड़ दिया . उसने दबे पाँव दरवाजे और खिड़की की सांकल अच्छी तरह चेक की और आँखें बंद कर लेटने का नाटक करने लगी . एक दो बार की खटखट के बाद दरवाजे पर आहट बंद हो गयी और सोने का नाटक करते जाने उसकी आँख कब लग गयी, उसे पता ही नहीं चला  .
नींद खुलने पर उसने देखा खिड़की से बाहर शाम का धुंधलका छाने लगा था .
ओह , कितनी देर सोती ही रह गयी. साथ ही उसे अपना भय भी फिर से याद आने लगा .

नींद भी क्या अजब शै है. बड़े से बड़ा दुःख और भय नींद में महसूस नहीं होते . ऐसे समय में नींद आ जाना राहत देता है तन मन दोनों को . दुःख के हाथो कलेजे फटने से रह जाते है उनके जिन्हें नींद आ सकती हो . चिंता , आशंकाओ से घिरे भी नींद आ ही जाती है . मानव प्रजाति के लिए प्रकृति की यह महत्वपूर्ण देन है .

धीमे से द्वार खोल देखा उसने . किचन से खटर पटर आती आवाज ने उसे आश्वस्त किया कि सासू माँ लौट आई थी घर . कॉलेज से आकर भूखे ही सो गयी थी , भूख भी सताने लगी थी अब उसे .  वह रसोई की ओर बढ़ गयी . सास के चेहरे पर नाराजगी साफ़ झलक रही थी .
ऐसे भी क्या घोड़े बेच कर सोना आता है तुम्हे , घर में कोई आये कोई जाए , किसी से कोई मतलब नहीं . पापा ने कहा भी था मदद करने को मगर तुम अनसुनी कर जाकर सो गयी , ये क्या तरीका है . क्या कर रही थी तुम इतनी देर !
मुझे अकेले घर में डर लगता है .
अकेले कहाँ थी तुम . तुम्हारे ससुर थे न घर में  और अपने घर में किससे डर लगता है ! तुम्हे अपने मायके में डर नहीं लगता था कभी !
वह आगे कुछ न कह सकी .  बस पैर से जमीन कुरेदती सी चुपचाप खड़ी रही . उन्होंने सीमा से यह पूछना भी उचित नहीं समझा कि उसने खाना खाया या नहीं . पेट में कुलबुलाते चूहों की अनदेखी कर वह रसोई में सास का हाथ बंटाने लगी . मगर अच्छा यह रहा कि दो तीन दिन के लिए उसे भय से राहत मिल गयी थी .

सप्ताहांत का दिन उसके लिए मनहूस होने वाला था, उसने सोचा नहीं होगा . कॉलेज से लौटी ड्राइंगरूम में टीवी देखते सोफे पर ही  लेटी सीमा को नींद आ गयी थी . मेनगेट का दरवाजा कब खुला , कौन अन्दर दाखिल हुआ उसे कुछ खबर ही नहीं रही . गालों पर कुछ सरसराहट से चौंक कर उसकी नींद खुली तो स्तब्ध सीमा को कुछ सोचने में भी वक्त लगा . सोफे पर उसके करीब कोई बैठा था जिसकी गोद में उसका सर था. घबराकर तेजी से उठते हुए वह स्वयं से बहुत नाराज थी . इतनी निश्चिंतता से वह सो कैसे सकती थी . स्थिति समझ में आते ही अपना आपा खोकर उसकी चीख निकल पड़ी  .
आप यहाँ क्या कर रहे हैं . दरवाजा बंद था.  भीतर कैसे आये ?
चाबी थी मेरे पास . बेल की आवाज पर किसी ने दरवाजा नहीं खोला तो लॉक खोलकर अन्दर आ गया . मगर तुम इतना घबरा क्यों गयी . तुम्हे सोते देख उठाना उचित नहीं समझा . तुम आराम करो .
अपना बैग उठाकर वे अन्दर चले गए. मगर सीमा के लिए अब इस स्थिति में उस घर में अकेले रहना संभव नहीं था . हर समय भय के साये में रहना उसे मानसिक रूप से थका रहा था . उसी शाम सौरभ भी लौटा . मगर सीमा को समझ नहीं आ रहा था कि किस प्रकार वह अपना भय सौरभ के आगे प्रकट करे .
यदि सौरभ ने उस पर विश्वास नहीं किया .  यदि उसका भय भी बेबुनियाद रहा , भ्रम रहा हो तो वह स्वयं से कैसे नजरें मिलाएगी . मन को मजबूत कर उसने सौरभ  से अपने मायके में रहने  या उसके साथ ही जाने की बात की तो सौरभ का सौम्य दिखने वाला चेहरा गुस्से से तमतमा उठा .
क्या मतलब है तुम्हारा . क्यों जाना है तुम्हे मायके रहने या मेरे साथ . यही रहना होगा तुम्हे मेरे मम्मी पापा के साथ . क्या परेशानी है तुम्हे यहाँ !
 सौरभ के तेज चीखने की आवाज सुन उसके माता पिता भी वहीँ आ गए थे . एकांत में कही अपनी बात  पर तेज चीख कर हंगामा करते देख सीमा अपमान और ग्लानि से भर  उठी .
क्या बात है सौरभ ! इतना क्यों चीख रहे हो . क्या हुआ ?
कुछ नहीं माँ .  सीमा अपने मायके रहना चाहती है या मेरे साथ .
सौरभ की माँ को बुरा लगाना स्वाभाविक था . थोड़ी नाराजगी भरे शब्दों में वे बोली .   घर में कुल तीन प्राणी हैंं . काम का कोई दबाव नहीं है . कॉलेज जाने की छूट है .  पूछो इससे ये फिर भी ये ऐसा चाहती है .

हाँ ! बताओ क्या परेशानी है तुम्हे यहाँ . क्या कहती सीमा.
परेशानी कुछ नहीं है  , मैं आपके साथ रहना चाहती हूँ.

सौरभ की माँ दुःख और क्षोभ में भर उठी . इतने चाव से बहू लेकर आये थे मगर पता नहीं था कि उसे हमारी आवश्यकता नहीं . वह हमारे साथ नहीं रहना चाहेगी . कुछ महीनोंं की ही गृहस्थी हुई है अभी और इनके अलग रहने के ख्वाब जाग उठे हैं . उनकी आँखों से बहते आँँसू ने सीमा को अपराधबोध से भर दिया . विवाह से पहले सौरभ के माता- पिता के व्यवहार से प्रभावित सीमा ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उसे इन परिस्थितियों का सामना करना होगा . अपने छोटे से घर में अपने पति और उसके माता -पिता के साथ रह उनकी खुशियों और दुखों को जीना और साझा करना ही ध्येय समझा था उसने . मगर अब हर समय इस भय के साये में सौरभ के बिना उसका उस घर में रहना असंभव था . सौरभ के मना करने के बावजूद उसके जाने के बाद अपना बैग उठाकर वह मायके चली आई थी . सौरभ को यह पता चला तो वह सीमा को फ़ोन कर उसने अपनी नाराजगी प्रकट की  और कभी घर वापस न लौटने का फरमान सुना दिया था .
उधर सौरभ को  बहुराष्ट्रीय कम्पनी में कार्य करने के प्रयास में अंततः दुबई में नौकरी मिल गयी थी . दुबई जाने की तैयारियों के लिए हालंकि वह कुछ दिन के लिए अपने शहर आया मगर सीमा से मिलने या उसको बुलाने की कोई कोशिश नहीं की . सीमा को इस खबर का पता उसके किसी मित्र से तब पता चला जब वह दुबई जा चुका था .
सौरभ के बिना उसे ससुराल जाना मंजूर नहीं था और उसके दुबई चले जाने के बाद वैसे भी उसके रास्ते बंद हो चुके थे . मिसेज वालिया ने सीमा को समझाने की बहुत कोशिश की कि उसे ससुराल में रहना चाहिए अपने सास ससुर के साथ.  मगर सीमा के लिए नहीं जाने का कारण बताना इतना आसान नहीं था .
बेटी की जिद के आगे मजबूर उन्होंने एक दो बार उसके सास ससुर से मिलकर बात करने की कोशिश की मगर वे इसे पति -पत्नी के बीच का मामला बताकर दूर हो गए . अब जो भी बातचीत हो सकती थी , वह सौरभ के दुबई से लौटने पर ही संभव थी . सौरभ के लौटने का इन्तजार करते सीमा ने अपनी पढाई पर पूरा ध्यान केन्द्रित किया . फाइनल सेमेस्टर की तैयारी में उसने रात दिन एक कर दिए .

क्रमशः .... अपने भय से मुक्ति पाने के लिए  लिए सीमा के उठाये कदम उसके लिए कितने घातक होंगे , वह स्वयं नहीं जानती थी , कौन उसके साथ होंगा , कौन नहीं !

चित्र गूगल से साभार ....

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

प्रजा मस्त , राजा पस्त ....


राजा  के राज्य में हर ओर अमन चैन था।  अच्छी बरसात ने झीलों  ,कुओं और तालाबों को लबालब  कर दिया . फसलों की हरियाली लुभावनी थी. गायों और भैंसों को ताजा हरा चारा प्राप्त था . शुद्ध दूध, दही ,घी प्रचुर मात्रा  में उपलब्ध था।  प्रजा  को  ताजा फल ,हरी सब्जियां ,  अनाज भी उपयुक्त कीमत पर मिल रहे थे लिहाज़ा अच्छी खासी सेहत के साथ कोई भूखा नंगा नहीं था।  खेत , व्यवसाय , उद्योग और राजकीय कार्य में व्यस्त प्रजा को मनोरंजन के तमाम विकल्प भी उपलब्ध थे।  हर और ख़ुशी का साम्राज्य था। सुबह शाम खुशनुमा हुए जा रहे थे . प्रजा अपने कार्य करती ,मनोरंजन करती , खाती पीती  सोती और जागती।  

मंदिर ,मस्जिद , गुरूद्वारे ,गिरिजाघर  में समय पर झालर, घंटे ,  मंजीरों और नियमानुसार समय से होने वाली आरती , प्रार्थनाओं  ने ईश्वर को विसराने  ना दिया , मगर धीरे- धीरे राजा के महल में फरियादों की संख्या नगण्य हो गई। 

महल के बाहर टंगे घंटे ने जाने कब से टंकार नहीं सुनाई . राजा की जय हो , न्याय की विजय हो ,भी कानों में सुन नहीं पड़ते और  ना ही प्रजा में राजा की दयालुता के चर्चे। सत्ता के केंद्र का आकर्षण बने राजा के कानों  को याचना और प्रशंसा की कमी खलने लगी।  वह कैसा राजा जिसे दयालुता दिखने का मौका ना मिले .  न्याय -अन्याय की तराजू पर अपने फैसलों पर  प्रजा की  जयकार सुनने अवसर ना मिले। 

राजा के कानों में सरसराहट होने लगती। बार -बार लगता कोई पुकार रहा है  मगर दूर -दूर तक कोई नहीं।  कान थपथपाकर कर  दोनों सिरे खींच कर सुनने का प्रयास करता मगर कोई लाभ नहीं।  जैसे -जैसे समय बीतता गया कानों में खुजली  बढ़ने लगी।  बात करते , खाते पीते , सोते जागते राजा के हाथ कानों पर।   राजा  की इस परेशानी को रानियों ने ,दासियों ने  दरबारियों ने सबने देखा ,महसूस किया।  आखिर राजवैद्य जी  को बुलाया गया।  वैद्य ने हर प्रकार से निरीक्षण  कर जाना कि बीमारी तन की नहीं  मन की थी। राजवैद्य ने राज ज्योतिषी की सलाह ली और बीमारी के निराकरण हेतु प्रजा की सेवा करने  गरीबों को  वस्त्र , अनाज , आभूषण आदि दान करने तथा अनाथालय /चिकत्सालय  आदि  के निर्माण  का उपाय सुझाया गया। 

राजा ने दरबारियों से मशवरा किया और गरीबों , अनाथों , बीमारों को दरबार में उपस्थित होने को कहा  मगर यह क्या।  राज्य में कोई गरीब , अनाथ अथवा मरीज न था।  दरबार में फरियादी का स्थान खाली का खाली। राजा की खुजली दिन बी दिन बढ़ती ही जाए। 
राजा की व्यग्रता देखकर कुछ वरिष्ठ मंत्रियों दरबारियों ने मिल कर फैसला लिया . राज्य में कर बढ़ा दिए गए . खेतों में खड़ी फसलों को  गौशाला और अश्वशाला के निवासियों के सुपुर्द कर दिया गया .  सर्दी में जल रहे अलाव की अग्नि रहस्मय रूप से खलिहानों तक पहुँच गयी।  प्रजा में त्राहि-त्राहि मच गयी। कुछ ही दिनों में कंगाल/ गरीबों और मरीजों की संख्या बढ़ती गयी। प्रजा के दुखों का भार बढ़ते राजा के महल तक जा पहुंचा।  आये दिन महल के बाहर बने घंटे की टंकार सुनाई देती रहती। राजा  के कानों की खुजली और सरसराहट कम होने लगी। 
 फरियादी की बढ़ती संख्या देख शासन ने मुनादी करवाई . राजा प्रति सप्ताह गरीबों को अपने हाथों से अन्न , वस्त्र , दवा आदि  दान करेंगे। जिस तरह राजा दान करते , उसी तरह जनता पर कर की दर बढ़ा दी जाती। कर बढ़ते ..प्रजा व्यथित  होती . राजा दान करते .  प्रजा राजा की दयालुता की सरहाना करते हुए अति विनम्रता से दान ग्रहण करती।  

चतुर दरबारियों ने राजा के कानों की खुजली का स्थाई इलाज़ ढूंढ निकाला।  राजा अब सदा के लिए स्वस्थ था।  

रविवार, 16 दिसंबर 2012

रूठना कोई खेल नहीं !


तुम  ही  हो माता ,पिता तुम  ही हो !
तुम ही हो बन्धु ,सखा तुम ही हो !

प्रार्थना के बीच अधमुंदी आँखों से सुनीता ने अपनी पीछे  की लाईन में देखा . कुसुम अब तक नहीं आयी थी . कद के आधार पर बनाई जाने  वाली पंक्तियों में सबसे पीछे लम्बी -सी कुसुम अलग ही दिखती थी . लम्बी कुसुम और छोटी सुनीता दोनों की दांत कटी  दोस्ती पूरे विद्यालय में  लम्बू- छोटू के नाम से जानी जाती थी . विद्यालय में प्रवेश करने के बाद से दोनों हर समय साथ दिखती . टीचर जी द्वारा दिए गए कक्षा कार्य से  लेकर स्पोर्ट्स और खाने तक उनका साथ हमेशा कायम होता .

क्या हो रहा है सुनीता, सीधे खड़ी रहो ...
भटनागर मैम  की कडकती आवाज़ के बीच सुनीता ने जल्दी से दोनों आँखें मीच प्रार्थना में सुर मिलाया . 
कहाँ रह गयी कुसुम !
आज का अनमोल विचार कुसुम को  ही पढ़ना था . 
प्रार्थना के बाद जैसे ही आँखें खोली डायस के पास कुसुम को देख कर राहत  की सांस ली उसने .

प्रार्थना के बाद क्लास में लौटते दोनों की खुसुर पुसुर शुरू थी 
देर कैसे हो गयी .आज टिफिन में क्या लाई हो !

केर का अचार , मूली का पराठा ! 

ला दिखा .

कुसुम  ने लगभग छीनते हुए उसके हाथ से टिफिन ले लिया और खोलने लगी .

हद है . बहुत सारे हैं.  मम्मी ने तेरे लिए भी एक्स्ट्रा रखे हैं . अभी ही शुरू मत हो जा .

लंच तक कौन रुकेगा !

 कुसुम ने टिफिन खोल लिया था . क्लासरूम में अपनी सीट पर पहुँचते एक बड़ा ग्रास उदरस्थ कर चुकी थी . दूसरा ग्रास तोड़ि ही था कि   रजिस्टर लिए क्लासटीचर   क्लास में पहुँच गयी . हडबडाहट में टिफिन खुला ही डेस्क की खुली दराज में सरका तो दिया मगर अचार की खुशबू को मैम की नाक से बचाना संभव नहीं हुआ . 

अचार की खुशबू कहाँ से आ रही है .  तुम लोग घर से नाश्ता नहीं करके आते और यहाँ क्लास में घुसते ही  शुरू हो जाते हो. बंद करो यह सब ...

मैम के खुद के मुंह में पानी आ रहा है मगर कहे कैसे . 
बंद कर तो दिया .
कुसुम को कोहनी मारती हुए सुनीता ने टिफिन बंद कर रख दिया .

सुनीता और कुसुम . क्या खुसुर -पुसुर करती रहती हो दोनों . कुसुम तुम वहां से उठो और इधर बाईं बेंच पर बैठो ...

नहीं मैम , हमें यही बैठने दीजिये . हम अब बात नहीं करेंगे .

नहीं तुम उठो वहां से ! कितनी बार समझा दिया तुम्हे !

प्लीज़ मैम ...पक्का अब नहीं  करेंगें बातें, प्लीज़ -प्लीज़ !

ये मेरी आखिरी वार्निंग है ।अब अगर कानाफूसी करती नजर आयी तो क्लास से बाहर निकाल दूँगी ...
भटनागर मैम शब्दों को भरसक कोमल बनाते हुए बोली .

नहीं मैम . अब नहीं करेंगे . 

चल बैठ जा . कॉपी  निकाल फुर्ती  से .  
सुनीता ने कुसुम का हाथ पकड़कर सीट पर बैठा दिया . 

लंच टाइम में क्लास मॉनिटर सहित सभी लड़कियां बरस रही थी . क्या है तुम लोगों का . तुम्हारे कारण पूरी क्लास डिस्टर्ब होती है .

क्या किया मैंने . टिफिन खोल कर दो ग्रास खा लिए . थोडा बतिया लिया तो कौन सा अनुशासन भंग हो गया !

तुम्हारी ढिठाई के कारण  पूरी क्लास का तमाशा बन जाता है  मगर तुम्हे क्या फर्क पड़ता है !

नाराजगी प्रकट करते हुए वीणा क्लासरूम से बाहर निकल गई  .  

उस दिन जाने सर जोड़े जाने किस बात पर खीखी में लगी थी दोनों . मैम का क्लासरूम  में आना उन्हें नहीं दिखा , न ही पूरी क्लास का उनके सम्मान में खड़ा होना . 
थोड़ी देर तक चुपचाप उन दोनों का भरपूर अवलोकन करने के बाद मैम की आवाज़ से ध्यान भंग हुआ।  दोनों  हडबड़ाती गुड मोर्निंग कहती उठ खड़ी  हुई  जरुर मगर बंद होठों में खिलखिलाना रुका नहीं .

पढ़ाते  हुए कई बार ध्यान भंग होने पर शालिनी मैम ने उन्हें बेंच पर खड़ा होने की सजा सुना दी . दोनों साथ खड़े हुए भी अपनी खिलखिलाहट से बाज नहीं आयी . साथ ही हंसी के संक्रमण का असर पूरी क्लास पर होते देख  दोनों को क्लासरूम के बाहर खड़ा कर दिया गया था  .

सब लोग परेशान है हमारे कारण . चल, दोनों आज से अलग सीट पर बैठेंगे , बात भी नहीं करेंगे !
 खीझती हुए कुसुम  ने कहा .

सॉरी , मैं ऐसा नहीं करूंगी .

अरे !सचमुच बात करना बंद थोड़ी न कर देंगे .  बस क्लास में नहीं बोलेंगे  सबको यही लगेगा कि  हमारा झगडा हो गया .

नहीं , मुझसे नहीं होगा . मैं पूरे एक पीरियड तुझसे बात नहीं करूँ . ऐसा नहीं हो सकता .

रोज क्लास का माहौल खराब होता है . सबसे डांट  पड़ती है.   सिर्फ एक दिन के लिए यह नाटक कर देखते हैं .

दूसरे दिन सुबह पूरी क्लास हैरान थी . सुनीता और कुसुम अलग -अलग आई क्लास में और एक दूसरे  से दूर दूसरी कतार में बैठी . बस एक दूसरे को मुस्कुराते देखती रही मगर बात नहीं की .
पूरी क्लास दम साधे  लंच का इन्तजार कर रही थी . यह सातवाँ आश्चर्य संपन्न कैसे हुआ . कुछ बच्चे सुनीता के पास तो  कुछ कुसुम के पास घेरा बना कर खड़े हो गए .

क्या हुआ .आज दोनों बात नहीं कर रही . 
अपना टिफिन लेकर कुसुम के पास जाती सुनीता के पाँव वहीं  थम गए वीणा की आवाज सुनकर.

कुछ नहीं .  बस अब बात नहीं करेंगे . रोज डांट पड़ती है हमें . 

अच्छा है . क्लास में शांति बनी रहेगी.  देखते हैं कितनी देर तक ...वीणा  मटकते हुए वहां  से चली गयी .

 कुसुम सोचती रही सुनीता आएगी अपना टिफिन लेकर उधर सुनीता उसके आने का  इतंजार करती रही . आखिर  लंच समय समाप्त हुआ . दोनों के टिफिन बिना खुले बैग में रख गए .

आखिरी पीरियड के बाद उसी तरह गोलों में घिरी दोनों अपनी -अपनी बस में चढ़ गयी . पेट में दौड़ते चूहों ने जोर मारा बस में टिफिन खोलकर खाती सुनीता और कुसुम की आँखें नम  थी . यह पहला अवसर था जब कैर का अचार अनखाया रह गया था 

दूसरा दिन , तीसरा दिन और कई दिन इसी तरह गुजरते गए . 

सुनीता और कुसुम दोनों ही सोचती रही ।.उनका सचमुच झगडा थोड़ी ना हुआ है . मगर फिर से बात कौन पहले शुरू करे। दोनों एक दूसरे को देखती दूर से. मुस्कुराती मगर शब्द जुबान पर ही अटके रहते .  

सहपाठी सोचते ,पूछते , बाते करतें .

क्या हुआ है इन  दोनों के बीच .  किस बात पर झगडा हुआ .
 
दोनों चुप रहती।  

क्या कहती . झगडा तो हुआ ही नहीं था . रूठने का खेल हकीकत- सा हो गया था . 

फाइनल एक्जाम के लिए प्रिपरेशन लीव शुरू होने वाली थी . दोनों रोज़ सोचती आज  बात की  शुरुआत कर ही लेंगे  मगर स्कूल पहुँचते समझ नहीं आता . क्या बात करें . कैसे बात करें . एक गुमसुम सन्नाटा सा पसरा रहता उन दोनों के बीच . 

एक दिन सुनीता ने तय किया कि  आज  वह बात कर के ही रहेगी . बात ही क्यों  सीधे अपना बैग अपनी पहले वाली सीट पर ही रखेगी . 

प्रार्थना में उसकी नजरे ढूंढती रही कुसुम को  मगर वह कहीं नजर नहीं आयी और ना ही क्लास में . 
किससे पूछे वह कि  कुसुम क्यों नहीं आयी . 

हमेशा  उन दोनों से ही सब पूछते थे दोनों के बारे में .
 एक दिन , दो दिन ,कई दिन बीत गए . आखिर  एक दिन सुनीता पहुँच ही गयी कुसुम के उन रिश्तेदार के घर जहाँ वह पेईंग गेस्ट बन कर  रह रही थी . 

कुसुम के चिकित्सक पिता की पोस्टिंग एक कस्बे  में थी जहाँ शिक्षा की समुचित व्यव्यस्था नहीं हो पाने के कारण कुसुम को इस शहर में अपने रिश्तेदार के घर रहना पड़ा था .  मालूम हुआ  कि उसके पिता की तबियत अचानक बहुत ख़राब हो गयी .उसे जाना पड़ा था . उसके पिता का स्थानांतरण बड़े शहर में हो गया है .  वह सिर्फ परीक्षा देने ही आएगी .और इसके बाद  अपने परिवार के साथ उस शहर में ही रहेगी .

सुनीता लौट आयी थके क़दमों से . खेल -खेल में रूठने ने उसकी एक मित्र को उससे हमेशा के लिए दूर कर दिया था . 
दिन , महीने , साल बीतते गए . सुनीता और कुसुम का आमना -सामना कभी नहीं हुआ मगर अब सुनीता को भूल कर भी किसी से रूठने में डर लगता है . 
कही वह इस रिश्ते को हमेशा के लिए खो ना दे !


अपना लिखा अर्चनाजी की आवाज़ में सुन लेना सुखद है !
साभार !
http://archanachaoji.blogspot.in/2012/12/blog-post_5597.html

रविवार, 12 अगस्त 2012

ऐसा भी कोई मित्र होता है भला ?

इन्टरनेट पर एक अलग फेसबुक समाज की स्थापना हो चुकी है . आभासी दुनिया की सीमा को लांघ कर यहाँ भी वास्तविक जीवन के सारे गुण दोष , अफवाहें , आरोप , प्रेम , तकरार , नफरत अपनी पूरी भावप्रवणता के साथ मौजूद हैं . हों भी क्यों नहीं . आभासी दुनिया कह देने से यह सिर्फ आभास नहीं हो सकता , कंप्यूटर के कीबोर्ड से जुड़े हुए लोग तो वास्तविक ही हैं . उनकी उम्र , जाति , लिंग , धर्म और प्रोफाइल फर्जी होने के बावजूद भी  .कुछ दिनों पहले फेसबुक पर मैसेज बॉक्स में आये विशेष सन्देश को लेकर काफी हलचल मची रही . इस सन्देश में एक कन्या विशेष को फ्रेंड लिस्ट में ना जोड़ने की प्रार्थना के साथ लेकर फेसबुक धारियों को आगाह किया जा रहा था कि उक्त कन्या बहुत खतरनाक है .. अफवाहों में विशेष रूचि नहीं होने के कारण इस पर तवज्जो नहीं दी मगर यह खयाल आया कि क्यों इस तरह किसी ख़ास कन्या को फेसबुक पर सामाजिक होने से बाधित किया जा रहा है . यदि खतरनाक भी होगी तो फेसबुक पर क्या कर तमंचा ,गोला बारूद चला लेगी ? अगले ही पल खयाल आया कि शायद यह चेतावनी उसके हैकर होने की सम्भावना को लेकर हो ..
किसने उड़ाई होगी यह अफवाह . इससे उसे क्या लाभ होगा ! यह अलग मसला था मगर मेरे ज़ेहन में एक विचार आया ही कि यह कहीं  दो  मित्रों के बीच किसी प्रकार की ग़लतफ़हमी के कारण रिश्ता टूटने या बिगाड़ने का परिणाम रहा हो . मित्र यदि दुश्मन बन जाए तो उससे खतरनाक कौन हो सकता है . विचार मंथन के दौरान एक हास्यव्यंग्य से भरपूर लोककथा स्मरण में रही जिसमे मित्रों के बीच स्नेह्बंधन टूटने का कारण   व्यंग्य की दृष्टि   से अत्यंत रोचक था . 

किसानों के लिए बुआई  का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है . सुबह जल्दी उठना , खेतों पर जाना , हाड़ तोड़ मेहनत के बाद जमीन को बुआई के लायक बनाते परिवार और मित् के साथ किसान अपने छकड़ों पर घर से खेतों के मार्ग का रास्ता बतियाते तय करते हैं . ऐसे ही एक विशेष जाति का किसान अपनी  
धुन   में अपने ऊंट छकड़े पर दौड़ता जा रहा था कि उसके गाँव के ही एक दूसरे व्यक्ति ने आवाज़ देकर उसे भी साथ ले चलने को कहा . किसान ने उस व्यक्ति से उसकी जाति पूछी और हमजात होने पर उसे अपने साथ ले चलने को राजी हुआ . 

हां तो तुम भी ....हो , इसलिए ही मैंने तुम्हे अपने छकड़े पर बैठा लिया .  फलाना जाति के होते तो मैं कभी अपने छकड़े पर तुम्हे जगह नहीं देता . वे लोग तो बिलकुल मित्रता के योग्य नहीं होते हैं .

कहते तो तुम ठीक हो . मेरा भी अनुभव कुछ ऐसा ही रहा है . इन लोगों को तो कभी मित्र बनाना ही नहीं चाहिए . बुरे समय में कभी साथ नहीं निभाते .  बोलो ऐसे भी कोई मित्र होते हैं !

अच्छा तुम्हारे साथ भी यही हुआ , क्या किस्सा है ,बताना तो !

अरे होना क्या है . मेरा भी एक ....मित्र था . दांत कटी दोस्ती थी हमारे बीच . साथ उठना- बैठना , खाना -पीना , खेतों पर काम करना  , सब कार्य  साथ ही करते थे . सब  अच्छा चल  रहा था मगर एक दिन  मेरे सर  पर आफत  आ  गयी  . मैंने जब  अपने उस मित्र को मदद  करने  को कहा तो साफ़  मुकर  गाया  ...

ऐसी   क्या मुसीबत  आ  गयी   थी  !

पिछली फसल के समय हम ऐसे ही अपने  छकड़े पर अपने परिवार के साथ खेतों पर जा रहे थे . रास्ते में प्यास लगी तो देखा कि  पानी भरा देवरा तो घर ही भूल आये थे . राह में ही मीठे पानी का कुआं दिख गया तो सोचा यही से पानी भर ले चले  . मैंने मित्र से कहा तो तुरन्त मान गया वह भी . हालाँकि उसके पास भी थोड़ा पानी तो भरा हुआ था .  रास्ता कंकड़ पत्थरों के साथ बेर की झाड़ियों के काँटों से भी भरा था . हम दोनों मित्र अपनी पत्नियों  के साथ  कुएं की ओर बढे . मेरी पत्नी की चप्पल टूट गयी थी मैंने अपने मित्र से कहा कि अपनी पत्नी की चप्पल दे दे मेरी पत्नी को . बेचारी कैसे चल पाएगी . मित्र की पत्नी ने अपनी एक चप्पल उतार कर दे दी!
 बोलो !ये क्या बात हुई . दोनों चप्पल दे देती तो क्या बिगड़ता ?
बेचारी मेरी पत्नी सिर्फ एक चप्पल से कैसे चल पाती . गुस्से का घूँट पीकर मैं उस समय चुप ही रहा . कुँए की पाल  पर   पहुंचे   तो देखा कि बाल्टी में रस्सी छोटी पड़ रही थी . बाल्टी कुएं में डूबती नहीं थी . कैसे पानी भर पाते!
अब  सुनसान  बियाबान  में जेवड़ी  कहाँ  से आती  , मैं बोला  मित्र से-- तेरे  ऊंट की जेवड़ी   निकाल  कर ले आ  . मित्र  भागा हुआ  गया और ऊंट के नाक  से बंधी  नकेल  का  आधा  हिस्सा  काट  कर ले आया.
मैंने बोला  कि तू   पूरी रस्सी  क्यों नहीं लाया  तो कहने  लगा  कि आधी  रस्सी  से ऊंट को पेेेड़ड़ से बांध  कर आया हूँ  . कहीं  इधर-  उधर  चला गया तो ?
खैर,  आधी  जेवड़ी  से जैसे-  तैसे  पानी निकाला  , मगर मेरा मन  खराब  हो गया था ,
बोलो!  ऐसा भी कोई मित्र  होता है?

सही कहते हो भाई ऐसा भी कोई मित्र होता है ! मगर तुमने अपने  ऊंट  की नकेल क्यों नहीं निकाली ...

क्या कहते हो . और मेरा ऊंट कही इधर - उधर चला जाता तो ? मैं तो बर्बाद ही हो जाता !

सही कहते हो भाई , ये लोग मित्र बनाने के योग्य नहीं है. अब तुम सुनो मेरा किस्सा !!
पिछले बरस अच्छी कमाई हुई खेती में . बारिश सही समय पर  आई   . अच्छी फसल हुई , अच्छी कीमत पर बिक भी गई तो सोचा के अबके बेटी का ब्याह ही  निपटा  दिया जाए . सो अच्छा -सा खाते -पीते घर का लड़का देखा .  शादी पक्की कर दी .  लगन हुआ . सारी  तैयारी करते शादी की तारीख भी आ गयी . मगर गलती ये हुई कि ननिहाल गयी बेटी को शादी के दिन समय से बुलवाने की बात ही  भूल गया  .
उधर बारात रवाना होने की खबर आई तो जल्दी से भाई को भेजा कि बेटी को लिवा  लाये . अब इतनी दूर का मामला . आते तो समय लगता ही . उधर बरात  रवाना हो चुकी थी . मैं अपने मित्र के पास गया कि एक दिन के लिए अपनी बेटी को मेरे घर भेज  दे .  हल्दी  , तेल  , मेहंदी  , जयमाल  तक  की सारी  रस्मे    कर लेगी .  तब  तक   मेरी बेटी आ जाएगी  ननिहाल से . फिर उसका  विवाह  कर देंगे  और तेरी बेटी तुझे वापस  .
मेरा मित्र बोला  कि हम इतने दिनों से अच्छे  मित्र है .  जैसी  मेरी बेटी  वैसी  ही तेरी  बेटी  मगर ये तो आज  तक  नहीं हुआ कि तेल  , हल्दी  , मेहंदी  किसी का हो , और विवाह  किसी और का .  यह नहीं हो सकता ...मुझे  माफ़  कर दे .

ओहो  ! फिर क्या हुआ , क्या किया ?

क्या करता  . मिट्टी  की गुुड़िया रखकर  सारे नेगचार  किये  . किस्मत  अच्छी थी कि जयमाल  के समय बेटी वापस  आ गयी थी ननिहाल से . सो शादी तो सही ढंग  से निपट  गयी मगर मैंने इस मुसीबत की घड़ी  में दोस्त  को अच्छी तरह परख   लिया . मैंने उससे दोस्ती ही तोड़ ली.   ऐसा भी कोई मित्र होता है भला ?

सही कहते हो भाई . ऐसे लोगों को तो मित्र बनाना ही नहीं चाहिए ! ऐसा भी कोई मित्र होता है भला!

लोक कथा से प्रेरित  ...
कहानी  का मॉरल  तो आप सब लिख   ही देंगे  :)