बतकही लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बतकही लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 17 अप्रैल 2019

इक बंगला बना न्यारा.....






कल सुबह किसी कार्य से घर से बाहर जाना हुआ. शाम तक वापस लौटी तो बाहर बरामदा बड़े तिनकों, नीम की ताजा पत्तियों और फूलों, धागे के छोटे, लंबे टुकड़े आदि से भरा पड़ा था. कल ऐसी कोई आँधी भी नहीं थी कि कचरा उड़ कर इस प्रकार इकट्ठा हो जाये. चीं चीं की आवाज सुनकर उपर देखा तब सब माजरा समझ आया. उपर गणेश जी के आले में तिनके मुँह में दबाये चिड़िया रानी नीड़ के निर्माण में लगीं थीं. पर्याप्त स्थान न होने के कारण बड़ी मेहनत से लाये उसकी निर्माण सामग्री इधर उधर गिर रही थी. मुझे यह भी लगा कि आले में स्थित गणपति को नुकसान न हो. बिटिया को आवाज लगाई . उसने प्लास्टिक और टेप की सहायता से आला पैक कर दिया. परंतु चिड़िया का चोंच में तिनके लिए आना जाना चलता रहा. माता पुत्री का मन विचलित होता रहा . एक अपराध बोध - सा था कि हम नन्हींं चिड़िया को उसके नीड़ को निर्माण करने में बाधा पहुँचा रहे. सोचा कि अमेजन से बर्ड हाउस मँगवा कर लगा दूँ ताकि इनको भटकना नहीं पड़े हालांकि हम जानते हैं कि वे अपनी इच्छानुसार ही स्थान तय करती हैं . ऑनलाइन ऑर्डर करने पर भी एक सप्ताह तो कम से कम लगना ही था. तब तक यह चिड़िया क्या करेगी!
आखिरकार उपाय सूझा. गत्ते का एक पुराना कार्टून मिल गया जिसको सँभालकर रखा था किसी आर्ट वर्क के लिए. उसमें कुछ बड़े दो गोल छिद्र कर दिये. बालकनी की ग्रिल में बाँधने के लिए रस्सी नहीं मिली तो पूजाघर में रखी मोली को काम में लिया. उपलब्ध होता तो रंगीन कागज लपेट इसे सुंदर/ आकर्षक बना लेती . 
जैसे तैसे बाँध तो दिया , अब चिड़िया को तुरंत उसमें कैसे बुलाया जाये!  नीचे बिखरे हुए तिनके तुरंत फुरंत घोंसले में ऐसे लटकाये कि चिड़िया को बाहर से दिखता रहे. हालांकि चिड़िया के लिए बर्ड फीडर लगा रखा है और दिन भर उनका आवागमन लगा रहता है. फिर भी इस चिड़िया को इस घोंसले तक पहुँचाने के लिए उसके आसपास चावल, बाजरा और ज्वार  के थोड़े से दाने बिखेर दिये . एक बरतन में अलग से पानी भी उसके पास रख दिया.  सिर्फ दस मिनट में ही चिड़िया को तिनके सहित वहीं मंडराते देखा तब खुशी का ठिकाना नहीं था. कल से उन्हें उड़ उड़ कर तिनके लाते , जमाते देख बड़ा सुकून मिल रहा. ईश्वर करे इस घर में उसके नन्हे मुन्ने सुरक्षित रहें, खेले कूदें और फिर उड़ना सीख फुर्र हो जायें....प्रार्थनाओं में आप भी शामिल हो सकते हैं...

इस बड़ी सी दुनिया में बसी अपनी छोटी सी दुनिया और उसमें भी उस चिड़िया को अपने नीड़ का निर्माण करते देख अत्यंत प्रसन्नता हो रही जैसे किसी का उजड़ता घर बसा दिया हो. पक्षियों  की दुनिया कितनी अलग है मगर कितनी अपनी भी. हम स्वयं घर बसाते हैं मगर हमारी उसी गृहस्थी में किसी और को अपना घर बसाते देख प्रसन्न होना कम ही होता है.  वैसे तो पक्षी भी अपने घोंसलों में किसी और को फटकने नहीं देते मगर घोंसले बनाने का उनका उद्देश्य बच्चोँ को जन्म देना और उन्हें उड़ना सिखाना ही होता है. पंख सक्रिय होते ही उड़ जाते हैं बच्चे और फिर चिड़िया भी अपने उस घोंसले में वापस नहीं आती शायद. देखा नहीं कभी मैंने. पाश्चात्य संस्कृति जितनी ही आधुनिक है पक्षियों की जीवनशैली भी....
क्या पश्चिम में भी पक्षियोंं का जीवन इसी प्रकार चलता है. क्या विषम पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण वहाँ उनके घर स्थाई होते हैं  या वहाँ भी निश्चिंत और उन्मुक्त उड़ान ही भरते हैं कल की चिंता छोड़ कर ....

बुधवार, 3 जून 2015

और कुछ न कर सके पर शोर तो मचाया ही .......

एक दोपहर रसोई में घुसते हुए  बाहर खुलने वाले जाली के दरवाजे से बेटी को बाहर के मेन गेट से किसी चीज का तेजी से गमलों की तरफ़ बढने की एक झलक सी दिखी. उत्सुकता लिये दरवाजा खोल कर बाहर जाने का उपक्रम किया मगर पुनः साँप साँप  चिल्लाते लौट पडी. एकबारगी मुझे यकीन नहीं हुआ कि उसे कोई भ्रम हुआ होगा. एक बार खुली गैलरी में कागज के डब्बे के पीछे गिरगिट के तेजी से  छिप जाने से गोहिरा का भ्रम हो गया था जो बडी मशक्कत के बाद दूर हुआ था.
खैर. कहाँ है कहती हुई गमलों की तरफ़ कदम बढाया तो तीन चार आकार में कुछ बडी सी चिडिया उन्हीं गमलों को घेर कर अपनी चोंच से प्रहार करती दिख पडी.
पहले तो ख्याल आया कि यह नन्ही चिड़िया साँप का क्या कर लेगी  मगर फिर उनकी चुस्ती फुर्ती ने समझा दिया। एक तो वे समूह में थी और शोर मचा रही थीं।  चिड़ियों से और कुछ न हुआ मगर शोर मचाया ही।  यह शोर  सावधान  कर ही देता हैं।  प्रकृति इंसान को सारे सबक भी स्वयं ही सिखाती है।  हर कमजोर से कमजोर व्यक्ति में कुछ न कुछ सामर्थ्य होता ही है और इसी दम पर वह अपना अस्तित्व बचाये रख सकता है।


  यह चिडिया भी नई सी ही हैं हमारे इलाके में. इधर एक वर्ष में ही नजर आने लगी है. गौरैया के रंग जैसी मगर आकार में कुछ बड़ी  अकसर  गमलों के पौधों और बडे पेड़ों  पर उधम मचाते कीट पतंगो को अपनी चोंच में दबाये या पानी भर कर रखे पात्र में स्नान ध्यान करती सी दिख जाती हैं. ये कभी भी एक अकेली नहीं आती बल्कि तीन चार के समूह में होती हैं।  कई बार इनकी घुन्नी सी लाल आंखों और चोंच में अटके कीट पतंगों को देख कर बच्चे इसे शिकारी चिडिया कहने लगे हैं.
जब गमलों की ओर थोडा झुक कर देखा तो निरीह अवस्था में सिकुडा सा साँप  नजर आ गया. थोडी देर उन गमलो को पार कर अपनी चोंच से भेद देने की असफल कोशिश करती रहीं मगर साँप उसी तरह कोने में सिकुडा पडा रहा. जब थक हार कर वे उड़ गईं तब जाकर उसने अपना आकार फैलाना शुरू किया जैसे भरपूर अंगडाई ले रहा हो और तभी हमें होश आया कि साँप कुतुहल का विषय नहीं विषैला भी  हो सकता है.
घबराहट के मारे कुछ सूझा नहीं. पेड़ पौधों की आड़ में जाने कहाँ छिप जाये. इस लिये उस पर नजर रखते हुए पडोसी परिवार  को आवाज लगाई कि उनकी ओर वाली दीवार पर पाइप से पानी डालें और इधर हम बाल्टी भर पानी ले बैठे. दोनों तरफ़ से पानी की बौछार से परेशान गुस्से और खीझ में बिलबिलाता हुआ दरवाजे को पार कर उससे सटी छोटी सी बगिया में घुस कर अनार के  पेड़ पर चढ कर निश्चिंत बैठ गया जैसे वहाँ बैठ कर हमारी बेचैनी के मजे ले रहा हो.
पेडो के झुरमुट में साँप का बैठे रहना चिंता का विषय होना ही था.
इस बीच वन विभाग में कार्यरत भाई को फोन कर पूछा कि अब क्या किया जाये . भाई ने एक NGO का नंबर देकर उनसे सम्पर्क करने को कहा. फोन मिला कर उनसे कहा कि साँप पकडने के लिये जल्दी आयें।  तब उधर से एक व्यक्ति आश्चर्य मिश्रित हकलाहट में पूछ रहा था कि पहले आप यह बताओ कि आपको यह नंबर किसने दिया.  हमने कहा कि  दिया तो हमारे भाई ने ही है जो इसमें क्या हो गया।
इस पर वह भाई की पूछताछ करने लगा कि वह कौन हैं , क्या करते हैं।
जब हम पूछे कि आप यह पूछताछ क्यों कर रहे तब  उधर से जवाब आया कि यह Women Empowerment NGO का नंबर  है.
उस समय दिमाग में चिंता साँप की थी मगर जब बाद में इस संयोग पर सोचा तो हँसी के दौरे पड़ गये. अगला व्यक्ति क्यों बौखलाया यह भी  समझ आ गया।
भाई को दुबारा फोन किया और उसे सारा माजरा बताया।  भाई ने बताया कि दोनों नंबर साथ ही लिखे थे तो शायद गलती से दूसरा नंबर दे दिया।  इस गलती में कितनी बड़ी गफलत हो जानी थी।  कहीं  उस NGO  ने साँप पकड़ने को व्यंग्य में ले लिया होता तो क्या होता।  बाद में यही सोच कर खूब मुस्कुराये हम।
दुबारा सही नंबर लेकर फिर फोन मिलाया।   वहां फोन करने पर मौजूद व्यक्ति ने साँप  का रंग , लम्बाई आदि पूछ कर सूचना दी कि हालांकि यह साँप विषैला नहीं है मगर आप उससे दूर रहे और निगरानी रखें। साथ ही यह जानकारी भी कि यह स्वयंसेवी संस्था स्वयं साँप  पकड़ने का कार्य नहीं करती बल्कि साँप पकड़ने वालों से संपर्क कर उन्हें भेजती है।  इसके लिए उन्हें धन भी देना पड़ेगा।  जब साँप सर पर हो तो धन की कौन सोचता है।  हमने कहा आप भेजो तो , हम पैसे दे देंगे।  थोड़ी देर बाद उनका दुबारा फोन आया कि हमारा आदमी तीस से चालीस मिनट में आयेगा तब तक आप साँप  पर निगरानी रखें।  पेड़ पर चढ़े साँप की इतनी देर निगरानी कोई आसान कार्य है!  जाने कब उतरकर किधर चल दे मगर साहस बंधा हुआ था कि हमलोग पांच छह जने थे जो बारी बारी उसका ध्यान रख सकते थे।
तब तक यहाँ से गुजर रहे दो व्यक्ति माजरा जानने आ गये।  उन्होंने कहा कि हम अपने तरीके से पकड़ लेंगे इसे।  फिर जैसे तैसे उसे पकड़ा गया  और उन लोगों को पैसे देकर विदा किया गया।
सब कार्यक्रम संपन्न हो चुकने के बाद NGO  से दुबारा फोन आया कि हमारा आदमी बीस मिनट में आप तक पहुँच जाएगा।  हमने भी कह दिया कि अब उनको आने की जरुरत नहीं , काम हो चुका  है।

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

यह नम्बर अस्तित्व में क्यों नहीं है ....



रोज सुबह की तरह ही मोबाइल का अलार्म बजा और श्रीमान जी ने झट से दबा दिया बटन कि  अभी बस बजता ही जाएगा .अलसाया मन अलार्म की एक क्लिक पर कहाँ उठता है , कुछ मिनट के अंतर पर कई बार मधुर ध्वनि सुन लेने के बाद ही सुप्रभात संभव है . मगर आज अलार्म बंद करते ही अचानक  चौंकते हुए उठे , जिसको अलार्म समझ कर बंद किया , वह मोबाइल की रिंग टोन थी . किसका फोन आ रहा था , इतनी सुबह . घडी में समय देखा तो सुबह के तीन बजकर अठावन मिनिट हुए थे . 

इतनी सुबह फ़ोन और वह फी किसी के लैंड लाईन नंबर से . चिंता स्वाभाविक थी , आखिर इस समय कोई फ़ोन क्यों करेगा , किस मदद की जरूरत थी , या कोई जरुरी सूचना थी , क्या सोचता होगा वह इंसान की मैंने मदद के समय फोन काट दिया , जाने क्या क्या विचार मन में डोलते रहे . थोड़ी देर इन्तजार होता रहा की देखें , कहीं अगला दुबारा ही फ़ोन मिला ले . मगर लगभग दस पंद्रह मिनिट तक फ़ोन नहीं आने पर एक विचार मन में बना की क्यं ना इसी नम्बर पर फोन कर पूछ लिया जाए , अब तो मोबाइल क्या लैंड लाईन फ़ोन पर भी इनकमिंग नंबर  दर्ज होने से मिस कॉल की सारी डिटेल मिल जाने की सुविधा रहती है . कही किसी ने गलती से ना मिला दिया हो , थोडा झिझकते हुए पुनः उसी नम्बर पर फोन किया तो उधर से आवाज़ आयी ." यह नम्बर अस्तित्व में नहीं है ".   
अब तो होश फाख्ता होने ही थे . एक तो अनजान नंबर लैंड लाईन का , वो भी इतनी सुबह और वह नम्बर अस्तित्व में ही नहीं है . कुछ वर्षों पूर्व ऐसी घटना की बहुत चर्चा रही थी कि कुछ ख़ास नंबर से फ़ोन पर किसी महिला के रोने , सिसकने की आवाज़ आती थी , मगर उसी नम्बर पर फ़ोन करने पर सुनाई देता , यह नम्बर अस्तित्व में नहीं है . भय और रोमांच मिश्रित   एक सिहरन सी हुई . रहस्यमय कथाएं या फ़िल्में इसी प्रकार तो देखी - सुनी जाती हैं . भटकती आत्मा से दूरभाष पर साक्षात्कार का एक अविस्मरणीय पल घटे बिना  रह गया .
अनजाने ही सही , क्या जरुरत थी बिना सुने ही कॉल ऑफ करने की ,बार -बार यही अफ़सोस सताता रहा .

ओह , हम भी किसी ऐसी रहस्यमय घटना के साक्षी होते रह गए क्या ..हालाँकि यह जानकारी तो थी की कुछ वी आई पी नम्बर भी सिर्फ सुने जा सकते हैं , उन पर कॉल बैक नहीं किया जा सकता है , फिर भी रहस्य तो था ही कि आखिर  यह फ़ोन हमारे पास क्यों आया . 

कैसे पता करें , किसका फोन नम्बर है , पड़ताल करते श्रीमान जी  बी एस एन एल की  वेबसाइट पर पहुंचे . यह भी अच्छा हुआ की लैंड लाईन नंबर था वर्ना मोबाइल नम्बर की तो डाइरेक्टरी भी उपलब्ध नहीं होती . सच करने पर पता चला की उक्त नम्बर उनके दफ्तर के सामने स्थित किसी सरकारी भवन का है। अब चिंता का पहाड़ बढ़ता ही जा रहा था , जरुर किसी ने मदद के लिए फोन घुमाया होगा , मगर यदि ऐसा है तो नम्बर अस्तित्व में नहीं है , क्यों सुन पड़ रहा है . छुट्टी का दिन था , वर्ना ऑफिस जाकर ही माजरा जान आते . अब सोमवार का इन्तजार करने के सिवा चारा नहीं था . मगर दिन भर दिमाग में  यही उधेड़बुन चलती रही  , इतनी सुबह किसका फोन था , नम्बर क्यों नहीं लग रहा आदि -आदि .कई बार बच्चों से भी इस पर चर्चा हुई . अचानक शाम को चार बजे मोबाइल की आवाज़ पर बेटी ने उछलते हुए कहा ," पापा , यह तो फिर से वही नंबर  है . सुबह से इतनी पड़ताल हो चुकी थी कि फोन नम्बर रट ही गया था . हम सबकी उत्सुकता भरी निगाहों से जानना चाह रहे थी की आखिर यह रहस्यम कॉल किसकी है , किसकी हो सकती है। श्रीमान जी ने कॉल सुनते ही स्पीकर ऑन कर दिया . " यदि आपको जुखाम के साथ तेज बुखार ,सर में दर्द है तो स्वाईं फ्लू की जांच अवश्य करवा ले "  कम्प्युटराईज्ड ध्वनि में  स्वास्थ्य विभाग की जनहित चेतावनी जारी हो रही थी .  इस नंबर के अस्तित्व में नहीं होने की वज़ह समझ आ गयी . 

धत तेरे की ...सारे रहस्य की ऐसी -तैसी हो गई . 

अब हमारी सरकार की मुस्तैदी का जवाब क्या है , भोर के चार बजे फोन से नागरिकों को स्वाईंन  फ्लू के खिलाफ चेता  रही है , सही भी है , बीमारियाँ भोर अथवा शाम का समय देख कर थोड़े आती है . राहत भी हुई कि जनता को जागरूक करने के  सरकारी काम भी इतनी चुस्ती -फुर्ती से होते हैं . 
 पुरानी रहस्यमय घटनाओं के सन्दर्भ और स्रोत भी समझ आ गए कि  उक्त रहस्यमय घटनाओं  के पीछे किसी स्त्री की दारुण व्यथा नहीं , बल्कि उनके लिए ऐसे किसी नम्बर का प्रयोग कर शरारत ही रही होगी .

रहस्यमय संसार अचानक ही सामान्य सा लगने लग गया , ये भी कोई बात है भला !! 

बुधवार, 23 मई 2012

बारिश से तरबतर एक सप्ताहांत ....


केंद्रीय विभागों की तर्ज पर ही राजस्थान में कर्मचारियों के लिए पांच दिन का सप्ताह किये जाने की घोषणा पिछली सरकार के समय की गयी थी, जिसके अंतर्गत पेट्रोल की खपत में कमी के एक उपाय के रूप में सरकारी विभागों में कामकाज की अवधि सोमवार से शुक्रवार तक की गयी . इसके तहत कार्यालयों में प्रतिदिन के कामकाज के समय में भी परिवर्तन किया गया . पहले के 10 से 5 कार्य करने के समय को 9.30 से 6 बजे तक कर दिया .
सरकारी दफ्तरों में कामकाज किस तरह होता है , हम सभी जानते हैं . ऐसे में पांच दिन के सप्ताह से कामकाज प्रभावित होने की सम्भावना ही ज्यादा थी . सर्दियों में दिन छोटा होने से अँधेरा जल्दी ही घिर आने के कारण भी कर्मचारियों के जल्दी दफ्तर छोड़ जाने की पूरी सम्भावना थी , मगर सरकार ने कर्मचारियों को इस समय के नियम का पालन करने को लेकर सख्ती दिखाई और धीरे -धीरे इसके सकारात्मक प्रभाव नजर आने लगे . कम से कम कर्मचारियों के परिवारजनों ने तो इससे राहत ही महसूस की . दफ्तर का समय सुबह 10 से घटाकर साढ़े नौ करने का ख़ास फर्क नहीं पड़ा , मगर इससे परिवार के लिए एक दिन अतिरिक्त मिलने लगा और यहाँ भी सप्ताहांत मनाने का रिवाज़ निकल पड़ा . सरकारी कर्मचारियों की पेट्रोल की खपत में कमी का तो पता नहीं , पारिवारिक सदभाव बढ़ने में जरुर सफलता मिली होगी ..

इस सप्ताहांत पर जब बहुत समय बाद घर से निकलना हुआ तो गाड़ियों की रेलमपेल के बीच दोनों छूट्टियों के दिन भी गुलजार हो रही सड़कें बता रही थी कि इस शहर को भी पांच दिन का सप्ताह रास आने लगा है .
रविवार को सूनी रहने वाली सड़कें अब गुलज़ार रहने लगी हैं . पिछले वर्षों में प्रोपर्टी मार्केट में बूम आने के बाद चौपहिया वाहनों की बढ़ी संख्या ने भी परिवार के साथ छुट्टियों मनाने वालों की संख्या में वृद्धि की है.
इस शनिवार को ट्रैफिक में फंसे हुए समीर जी की उपन्यासिका के कई अंश आँखों के सामने साकार हुए . लोंग भागे जा रहे हैं बाहर , क्या घर में बैठ कर परिवार जनों के साथ अच्छा वक़्त बिताते हुए छुट्टियाँ नहीं मनाई जा सकती या फिर पर्यटन के लिए शहर अथवा देश से बाहर जाना ही क्या आवश्यक है ...

गर्मी की छुट्टियाँ तो बच्चों की परीक्षाओं,शादियों की भेंट चढ़ी , रही सही कसर अस्वस्थता ने पूरी कर दी , नतीजन पूरी छुट्टियाँ घर में भरपूर आराम करते ही बीती . सोचा इस सप्ताहांत पर अपने ही शहर को नवीन दृष्टि से देख लिया जाए .

शनिवार का दिन झाड़खंड महादेव के दर्शन के लिए निकले . द्रविड़ स्थापत्य शैली पर आधारित यह शिव मंदिर इसे राजस्थान के अन्य प्रसिद्ध मंदिरों से अलग बनाता है . जन्मभूमि ही द्रविड़ों का प्रदेश है तो इस प्रकार की इमारतें , मंदिर, चित्रकारियां मुझे बहुत लुभाती है , इन स्थलों पर जाने पर बहुत दिन बाद बेटी का अपने मायके आने जैसा ही अहसास होता है . हम महिलाएं उम्र के किसी भी पड़ाव पर हों , ससुराल की परम्पराओं ,रीति -रिवाजों को निभाते उनमे ही रच बस गयी हो , मगर मायके की एक छोटी सी झलक भी स्मृतिलोक के कितने ही परदे भेद कर बचपन तक ले आती हैं . माँ को भी कई बार गुजरते देखती हूँ इन्ही अनुभूतियों से जब हुलस कर वे अपने मायके के बारे में बताती हैं ...ये रिश्ता बेटियों का बेटियों से पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता चलता रहता है .

झारखण्ड महादेव , जयपुर
आर्मी एरिया के पास होने के कारण यहाँ का प्राकृतिक वातावरण लुभाता है .मंदिर प्रशासन भी पर्यावरण के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध नजर आया . मंदिर के अहाते की छत डालते समय में पीपल या बरगद के बड़े पेड़ों को कटा नहीं गया बल्कि छत का वह हिस्सा खुला ही छोड़ दिया गया है .
मदिर के भीतर पक्षियों के चुग्गे और पानी के लिए बड़ी जगह सुरक्षित है , कबूतरों के ढेर के बीच सफ़ेद कबूतर भी नजर आये . यहाँ बड़ी संख्या में मोर भी हैं , हालाँकि मंदिर के बाहर हरे चारे के ढेरों के पास गायों और सांडों का हुजूम थोडा डराता भी है . मैं देख नहीं पाए , शायद कही आस पास ही मंदिर की अपनी डेयरी भी हो . देश में हर तरफ मंदिरों में भारी संख्या में धन मिलने की ख़बरों के बीच यह सब देखना सुखद लगा .
दूर से देखने पर मंदिर की बाहरी बाउंड्री के रंग इसे कहीं से भी मंदिर होने का आभास नहीं देते . सफ़ेद रंग की दीवार और खिडकियों और दरवाजों पर हरा रंग , बच्चों ने आश्चर्य से पूछा ," यहाँ मंदिर है ?"
भक्ति भी भला किस रंग का अवलंबन चाहती है ! हम इंसानों ने इसे अलग -अलग रंगों में बाँट दिया है .
शाम गहराने लगी तो बिरला मंदिर और मोती डूंगरी गणेशजी के दर्शन कर घर लौट आये ...

बिरला मंदिर , जयपुर बिरला मंदिर से ट्रैफिक का नजारा

दूसरे दिन आमेर किले के लिए निकले घर से , जलमहल तक आते -आते मौसम ने तेजी से करवट ली और बारिश के साथ लबालब सड़कों ने रास्ता रोक लिया . जलमहल की पाल से उमड़ते घुमड़ते बादल और बरसात ने इस पर्यटन स्थल की रौनक को चार चाँद लगा दिए थे .

बरसात में जलमहल का नजारा

बारिश में भीगते भुट्टे खाते लोंग जश्न मनाते नजर आये . पानी के निकास की सही व्यवस्था ना होने के कारण बहुत ज्यादा बारिश नहीं होने के बावजूद सड़कों पर नहर बन जाने जैसे हालात को देखते हुए वहीं से वापस लौट आना पड़ा . रास्ते में जयपुर नगर निगम का बोर्ड और उनके शहर को विश्वस्तरीय बनाने की प्रक्रिया का दर्शन कर
लौटे ..
जयपुर विकास प्राधिकरण का आश्वासन


जरा सी बारिश में जो हुए शहर के हालात ...
इस तरह बनेगा हमारा शहर विश्वस्तरीय !
मगर इन्हें नहीं है किसी से कोई शिकायत ....

हवामहल को भी देखा भीगते हुए

झमाझम बारिश के बीच संपत की नमकीन और आलू- प्याज कचौरी का स्वाद लेते हुए लौटे घर तो हमारे इलाके में एक बूँद पानी की नहीं ...कॉलोनी में गाडी को बारिश से भीगे देखते लोग आश्चर्यचकित हुए , कहाँ हो गयी इतनी बारिश ...बच्चे अलग भुनभुनाते रहे " यहाँ इतने पेड़ पौधे लगाने की जरुरत ही क्या है , जब बारिश ना हो तो "
रोज शहर के विभिन्न इलाकों में अच्छी बारिश के समाचार मिल रहे हैं और यहाँ बस बादल गरजते बरसते पानी की कुछ बूँदें बरसाकर चले जाते हैं ...
जगजीत सिंह जी की ग़ज़ल याद आ रही है ...
बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने , किस राह से बचना है , किस छत को भिगोना है ...
वाकई बादल दीवाने ही हो गए हैं ...


सोच रही हूँ कुछ दिनों के लिए ब्लॉगिंग को भी अपनी झमाझम टिप्पणियों से मुक्ति दे दी जाये ...ज्यादा नहीं ,बस कुछ ही दिन रह लीजिये हमारी टीका टिप्पणी के बिना भी !


गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें !


मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

छोटी पहचान लम्बा इंतज़ार....

उबासियाँ लेते हुए मेनगेट का लॉक खोला और उसने एक लम्बी सांस ली . सुबह की ताजा हवा की ठंडक कलेजे तक भर गयी . पेड पौधों को निहारते पीले गुलाब के फूल पर उसकी नजर टिक गयी , अधखिले फूल को प्यार से सहलाते मुस्कुरा पड़ी .
कमरे से बाहर निकलते बेटी की नजर माँ की इस बचकाना हरकत पर पड़ी तो हँस पड़ी , आप हमसे ज्यादा इन फूलों से प्यार करती हैं ,संभालिये अपने नन्हे -मुन्नों को , झूठ मूठ नाराज होने का नाटक करती हुई वापस अन्दर चली गयी .
पुष्प होते ही ऐसे हैं , किसी भी रंग रूप आकार में प्रकृति का सौन्दर्य बढ़ाते हैं , अपने छोटे से जीवन में खुशियाँ बाँट देते हैं , खुशियों से लेकर ग़म तक , मिलने से लेकर बिछड़ने तक के साथी होते हैं. किसे प्यार नहीं हो जाता होगा इन फूलों से !!
मुस्कुराते हुए गुनगुनाने लगी ,कौन है ऐसा जिसे फूलों से , गीतों से,पंछियों से प्यार ना हो ....नहीं ....होते हैं बहुत लोंग इस दुनिया में ऐसे भी , जिन्हें इनसे प्यार नहीं होता , हाँ ...सच ऐसे लोंग भी होते हैं !!
फूल के पास पीली पड़ गयी पत्तियां तोड़ते एक कांटा चुभा उसके हाथ में और खून की कुछ बूँदें टपक गयी . यदि ये कांटे नहीं होते तो फूल कितने सुन्दर होते , सोचा उसने , फिर तुरन्त ही ख्याल आया शायद कांटे ही इन फूलों की रक्षा करते हैं , वरना डाल पर इतनी देर तक शान से खड़ा मुस्कुराता ना होता , कांटा खुद दूसरों की आँखों की किरकिरी बन फूल की रक्षा करता है . एक ही पौधे पर पलते , एक जैसी ही हवा , धूप , चांदनी , मिट्टी और खाद मगर कितने अलग एक दूसरे से . एक पौधे पर पलने वाले फूल भी कौन से एक जैसे ही होते हैं .
फूल और काँटा , पुष्प की अभिलाषा , कितनी कवितायेँ याद हो आती हैं ...मन की गति कितनी चंचल है , क्षणांश में ही कितने मीलों की यात्रा , सुबह सुबह उसके ख्यालों की उड़ान कितनी ऊँची उड़ गयी ...खुद को धमकाते हुए कह उठी , अब काम पर लग जाओ ....
सड़क के उस पार नीम के पेड के नीचे पार्क की छोटी दीवार पर रखे पात्र पर चिड़ियाँ शोरगुल मचा रही थी , ओह , आज इसमें पानी नहीं भरा , वह मिट्टी के बड़ी सिकोरे से उस पात्र को उठा लाई और साफ़ कर ताजे पानी से भर दिया . पेड के नीचे फिर से चिड़ियों का वही शोरगुल था , मगर अब खिलखिलाता- सा ... कभी पात्र के किनारे बैठ चोंच से पानी भरती तो कभी पात्र के बीच में बैठ कर जोर से पंख फडफडाते किलोल करती .
उसकी दिनचर्या का ही एक हिस्सा है यह कार्य भी . इसी समय अक्सर एक वृद्ध महिला को लाठी का सहारा लेकर मॉर्निंग वॉक पर जाते हुए देखती हूँ उनके साथ एक लड़का भी होता है , जो शायद उनका नौकर है . कई दिनों से यह संयोग होता है , जब वह पानी भरकर रख रही होती है , उनका गुजरना होता है . कई बार दोनों की नजरें टकरा गयी , मगर अपरिचित चेहरों से मुस्कुराना , बात करना थोडा अजीब लगता है . बस वे ख़ामोशी से कभी उस सड़क से गुजर जाती, कभी अपने नौकर से बतियाती .
बहुत अच्छा काम कर रही हो , बेटा ....एक दिन पात्र में पानी भरते सुनकर चौंक कर मुड़ी तो वही वृद्ध महिला थी . अचानक से टोका था उन्होंने , हडबडाहट में वह सिर्फ मुस्कुराकर रह गयी ,कुछ कह नहीं पाई और वे धीरे धीरे चलते हुए उस रास्ते से गुजर गयी . वह बहुत देर तक सोचती रही , उसने कुछ जवाब क्यों नहीं दिया , चलो कोई नहीं , कल मिलेंगी तो जरुर बात करुँगी उनसे और कुछ नहीं तो गुड मोर्निंग ही कह दूँगी .....
एक महिना , दो महिना , करते समय अब तो एक वर्ष तक बीत गया उस बात को , वह रोज सुबह उनका इंतज़ार करती है मगर उस दिन के बाद वे कभी नजर नहीं आईं .पहले कई दिनों तक सोचती रही कि वे कहीं बाहर गयी हुई होंगी अपने परिवार के साथ , मगर उनके साथ कभी कोई परिवारजन नजर तो नहीं आया था , वे तो बस उस नौकर के साथ ही घूमने निकलती थी , दूसरे शहर में रहते होंगे बेटे -बेटी , उन्हें अपने साथ ले गये होंगे ....कभी- कभी उसका दिल धक् भी रह जाता है , कहीं वे बीमार तो नहीं हो गयी , कही उन्हें कुछ हो तो नहीं गया ....
अब वह कई बार झुंझलाती है , उस छोटी सी पहचान से उसे कितना लम्बा इंतज़ार दे दिया है . उन्हें उस दिन के बाद आना नहीं था तो उस दिन उसे टोका ही क्यों !!!!

----------------------------------------------------------

नेट पर घूमते हुए अचानक नजर पड़ी ...http://forums.abhisays.com/showthread.php?t=३५६३
हमें पता ही नहीं होता हम कहाँ कहाँ हैं :):)

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

हम बड़े क्यों हो जाते हैं !!!


सस्ता रिचार्ज आजकल के बच्चों को बहुत ललचाता है ...चूँकि SMS के द्वारा बात करना फोन कॉल से सस्ता पड़ता है , इसलिए ज्यादा समय आजकल के बच्चों की अंगुलियाँ अपन मोबाइल पर ही थिरकती रहती है . वो चाहे परिवार के बीच हो या दोस्तों के बीच . ..कभी टोक दो उन्हें कि इतना समय टाइप करने में बर्बाद होता है . इतने में फोन ही कर लो तो जवाब मिलेगा  कि ये सस्ता है ...एक हमारे जैसे आलसीराम . फ़ोन तो बेचारा इधर -उधर पड़ा रहता है किसी कोने में . कभी मैसेज टोन सुनाई देने पर ढूंढना पड़ जाता है . इसलिए मायके और ससुराल की सारी खबर बच्चों के माध्यम से ही पता चलती रहती है .  हम तो ज़रूरी होने पर ही फोन करते हैं या फिर मिलने पर सारी बात होती है .

इधर बहुत दिनों बाद भतीजा घर आया तो देखा कुछ नाराज  कुछ उदास सा लगा . थोडा कुरेदने पर पता चला कि महाशय इसलिए नाराज़ थे कि दोनों भाई -बहनों की लडाई में मैंने अपनी बेटी का पक्ष ले लिया था . मैंने समझाया कि उस समय वह सही थी सिर्फ इसलिए . मैं पक्षपात नहीं करती हूँ .जो गलत होता है , उसे ही डांटती हूँ . मगर बेटा सुनने को तैयार नहीं ...

नहीं बुआ , आप दीदी का पक्ष ले रहे थे  जबकि वो गलत थी .

 इतनी देर में बिटिया रानी उठाकर आ गयी कमरे से बाहर और दोनों में वाद विवाद शुरू हो गया . तब समझ आया कि पिछले कुछ दिनों से दोनों में अबोला चल रहा था . दोनों को ही ये शिकायत  तुमने ऐसा कहा तुमने वैसा कहा , और बात भी कुछ गंभीर नहीं थी , बस नोट्स के आदान प्रदान को लेकर कुछ ग़लतफ़हमी थी .

मैं बहुत देर तक समझाती रही  मगर उस पर कुछ असर नहीं . वह बस यही कहता रहा कि आप दीदी की मम्मी हैं ,इसलिए उसका पक्ष ले रही है . मैंने बहुत समझाने की कोशिश की ,मगर वह सुनने को तैयार नहीं ..
आखिर मैंने कह दिया ," अगर तुझे ऐसा लग रहा है कि दीदी ही गलत है तो छोड़ ना . जाने दे . कौन तेरे सगी बहन है . कौन सी दीदी , किसकी दीदी . चल जाने दे . तू सोच ही मत !

क्या जादू हुआ इन शब्दों का कि भतीजा एक दम से शांत हो गया ...

अरे वाह .ऐसे कैसे . दीदी तो दीदी ही रहेगी ..झगडा होने का ये मतलब थोड़े हैं कि दीदी ही नहीं है ...

अब मुझे हंसी आ गयी . तो फिर क्या परेशानी है !

दोनों भाई- बहन देर तक आपस में बहस करते रहे , तूने उस दिन ऐसे कहा वैसे कहा ,. ऐसा क्यों कहा , वैसा क्यों कहा , मैं घर के काम निपटाते सब सुन रही थी , जब नाश्ता बना कर लेकर आई तो देखा दोनों की आँखों से गंगा- जमना बह रही थी . मन का कलुष भी शायद इनके साथ बह कर निकल गया था ...
दोनों के सिर पर हाथ फेर कर मैंने कहा - इतना सबकुछ इतने दिनों तक मन में क्यों छिपाए रखा था .  पहले ही कह सुन लेते !

दोनों फिर से हंसी मजाक करते हुए नाश्ता करने लगे .

बच्चों के लडाई झगडे इतने से ही तो होते हैं , कुछ दिन कुछ महीने फिर सब कुछ वैसा ही मगर वही बच्चे जब बड़े हो जाते हैं तो सबकुछ बदल जाता है , कभी कभी लगता है हम बड़े ही क्यों हो जाते हैं . वैसे ही बच्चे क्यों नहीं बने रहते ...
सुनती हूँ माता -पिता की प्रोपर्टी और विरासत के लिए भाई- बहन एक दूसरे के खून के प्यासे  तो मन उदास हो जाता है .
ये लोग बड़े क्यों हो जाते हैं !!!!

शायद इसलिए ही कहा गया है मेरे भीतर का बच्चा बड़ों की देखकर दुनिया, बड़ा होने से डरता है!

कुछ शब्द कैसे जादू करते हैं . जब कोई लगातार नकारात्मक बातें कर रहा हो तब एक बार उसकी हाँ में हाँ मिला दीजिये .  देखिये उसका असर ,। बेशक इसके लिए ज़रूरी है दिल का सच्चा होना और भावनाओं की ईमानदारी ...

" तू जो अच्छा समझे ये तुझपे छोड़ा है " ...वाद विवाद के बाद अक्सर अपने पति और बच्चों को कह देती हूँ , मुझे भी कहा किसी ने. आप भी कभी किसी खास अपने को कह कर तो देखिये!

बुधवार, 3 अगस्त 2011

भगवान बचाए ऐसे भाई- बहनों से ...

नौकरीशुदा इंसान की सबसे बड़ी ख्वाहिश होती है कि वह अपने सेवाकाल में ही बच्चों की शिक्षा , विवाह के साथ ही एक नीड़ का निर्माण भी कर ले ताकि वृद्धावस्था आराम से कटे . पिता ने भी इस शहर में मकान लेते समय यही सोचा था हालाँकि होनी को कुछ और ही मंजूर था . अपनी व्यस्त दिनचर्या के कारण स्वयं तो गिनती के दिन ही गुजारे होंगे इस मकान में मगर अपनी पत्नी और बेटों के लिए रहने का इंतजाम कर गये . मकान के उपरी हिस्से की छत डली हुई थी , बल्ली फंटों के बीच उस हिस्से को अँधेरे में सिर्फ एक नजर ही देख पाए थे , खैर ...
उनकी मृत्यु के बाद माँ अपने कुनबे सहित यही बस गयीं . शुरू से शुगर मिल कोलोनी में रही माँ को आस- पास के लोगों से अच्छा व्यवहार रखने की आदत पडी हुई है . ऐसी कॉलोनियों में हर धर्म और जाति के लोंग आपस में मिलजुल कर रहते हैं और एक दूसरे के सुख दुःख में काम आते हैं . जब सबके पति ऑफिस में होते हैं तो ये महिलाएं साथ मिल कर पापड़ , बड़ी , अचार आदि बनाने से लेकर मूवी देखना , खरीददारी तक भी साथ ही करती हैं . पूरा मोहल्ला एक कुनबा ही बन जाता है . तारक मेहता का उल्टा चश्मा देखते हुए मुझे वो कोलोनी बरबस ही याद आ जाती है .
माँ की वही आदत यहाँ भी बनी रही . पड़ोसियों के दुःख दर्द में काम आना , किसी की पतोहू की जचगी में उनके साथ अस्पताल में रहना , तो किसी की बेटी की पसंद के कपड़े खरीदने साथ जाना , किसी नई बहू को अचार बनाना सिखाना , किसी अकेली वृद्धा को खुद खाना बना कर पहुँचाना आदि . उनके बेटे -बेटी- बहुएं सब नाराज होते हैं उनसे इस समाज सेवा को लेकर , क्योंकि कई बार इसमें उन्हें पैसे और सम्मान का नुकसान भी उठाना पड़ता है , मगर उनकी आदत है, जो है ...

एक बार छुट्टियों में बच्चों के साथ मैं भी दो-चार दिनों के लिए रहने गयी . एक ही शहर में होने का सबसे बड़ा नुकसान मुझे यही लगता है कि मायके में ज्यादा दिन रहना संभव नहीं हो पाता . माँ के आँचल में तो इस उम्र में भी बच्चों जैसा ही लगता है . सुबह की चाय के साथ अखबार पढ़ते हुए बाहर गेट पर किसी महिला द्वारा मम्मी कह कर पुकारे जाने पर बाहर जाकर देखा तो सामने बने आधे -अधूरे मकान में से कोई महिला माँ को आवाज लगा रही थी । पीछे पीछे माँ भी चली आई . माँ को देखते ही वह महिला दौड़ी चली आई ," अच्छा , दीदी आई हुई हैं " कह कर गले लगने लगी . मेरी बहुत बुरी (?) बुरी आदत है , मैं जल्दी से किसी अनजान को गले लगाना तो क्या हाथ भी नहीं मिलाती , इस पर चाहे कोई मुझे नकचढ़ी कहे या घमंडी !
मैंने पीछे हटते हुए माँ से थोड़े नाराजगी भरे लफ्जों में पूछा ." अब ये नई बहन कहाँ से आ गयी मेरी ". तब तक वह महिला मां के गले में लटक चुकी थी " अरे , सामने ही रहती है , कुछ ही दिन हुए है आये हुए ." तब तक उसके गेट पर कोई युवक आ पहुंचा . माँ से यह कहते हुए कि उसके देवर आये हैं , वह महिला खिसक ली .

अब मैं माँ पर बिगाड़ने लगी । तुम यूँ ही किसी पर विश्वास कर लेती हो , पता नहीं कौन है , क्या है , बेटी बना लिया ...

अरे , गरीब मजदूर है बेचारी , मम्मी -मम्मी करते हुए आ जाती है तो कैसे परे धकेलूं । देख कितनी मुश्किल में रह रही है , घर में लाईट भी नहीं है , इसका आदमी भी कहीं बाहर नौकरी करता है .ये भी पास ही फैक्ट्री में काम करती है .

माँ तुम भी ना ....जानती हूँ , कितनी भोली हैं , जरा सा कोई आँख से आंसूं टपका दे , अपनी परेशानियों का रोना रो दे , बस झट से पिघल जाती हैं , कितना ही समझा लो कि माँ , ये तुम्हारी मिल कोलोनी नहीं है , ये शहर है , यहाँ लोगों को पहचानना इतना आसान नहीं है , नहीं मानती है !

तीन चार दिन तक मैं रही वहां और देखती रही कि उसके घर जाने कैसे अजीब से लोंग आते हैं , जब भी माँ पूछती तो यही जवाब कि मेरा देवर है. मैं माँ पर झुंझला रही थी ," कितने देवर हैं इसके , हर बार कोई नई शकल नजर आती है " .
मेरी भोली माँ समझाती मुझे ," इसके ससुराल का बहुत बड़ा परिवार है , मौसी , मामा , चाचा आदि के लड़के आते रहते हैं यहाँ मिलने "
मैंने माँ को टोका , मुझे ठीक नहीं लग रहा , कभी कोई महिला तो नहीं आती इससे मिलने ..और देवर हैं ,अभी घर में लाईट नहीं है तो इस अँधेरे में अकेले क्या करते हैं घर में ...
अभी कुछ दिन पहले आई थी इसकी मौसी सास ,मेहमान को चाय- नाश्ता नहीं बना कर खिलायेगे क्या , गरीब है इसलिए तुम लोंग हर वक़्त इस पर अंगुली उठाते रहते हो ...
मेरी माँ तो पुरानी हिंदी फिल्मों वाली टिपिकल मां है !
खैर , मैं घर लौट आई वापस अपनी गृहस्थी में मगन , मगर मुझे बार -बार वह महिला ध्यान आती रही । लगभग एक सप्ताह बाद माँ का फोन आया ." तुझे पता है , वो सामने रहती है न मीना, वो बहुत बुरी औरत निकली , कोलोनी वालों ने उससे तुरंत मकान खाली करवा लिया है और आस पास दिखाई भी नहीं देने की चेतावनी दी है .

अब बोलो माँ , तुम कैसी महिला को मेरी बहन बना रही थी .भगवान् बचाए ऐसे भाई -बहनों से !

मन खराब हो गया था ।छत पर यूँ ही टहलते देखा किसामने तीन मंजिला बिल्डिंग के फ़्लैट की बालकनी में एक आधुनिका स्ट्रिप वाली ड्रेस पहने अपने लैपटॉप से उलझी पड़ी मुस्कुरा रही थी . कल ही उनकी पड़ोसन बता रही थी ,पता नहीं कौन है , अकेले रहती है , संडे को अक्सर कोई आता है , तेज संगीत के साथ नाचने- गाने की आवाजें आती हैं , देखते हैं एक दो दिन नहीं तो इसके मकान मालिक से शिकायत करनी पड़ेगी .

मुझे फिर वही मीना याद आ गयी , क्या पता चलता है , किस भेस में कौन मिल जाए !!

सोच रही हूँ जब वास्तविक दुनिया में इंसानों को पहचानना इतना आसान नहीं है तो अंतरजाल पर तो ??

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

चाह्ते कैसी- कैसी !

अलसुबह जो गीत सुन लो , बरबस ही लब पर चढ़ जाता है और दिन भर उसी गीत की धुन लगी रहती है ...अभी एक दिन सुबह पहले अली जी की पोस्ट " तुम्हारा चाहने वाला खुदा की दुनिया में ,मेरे सिवा भी कोई और हो , खुदा ना करे " पढ़ ली , बस फिर क्या था दिन भर यही गीत जबां पर अटका रहा ....जब भी गुनगुन होती इस गीत कि खुद को टोक देती " क्या खतरनाक चाहते हैं " , मगर फिर थोड़ी देर में वही ...गीत का मूड बदलने के लिए ठुमरी , ग़ज़ल , भजन , रॉक संगीत सब सुन लिया , मगर वही ढ़ाक के तीन पात ....जब भी गुनगुनाओ , बस यही गीत फूट पड़ता ....
तुम्हारा चाहने वाला खुदा की दुनिया में
मेरे सिवा भी कोई और हो खुदा ना करे
तुम्हारा चाहने वाला ...

ये बात कैसे गवारा करेगा दिल मेरा
तुम्हारा ज़िक्र किसी और की ज़ुबान पे हो
तुम्हारे हुस्न की तारीफ़ आईना भी करे
तो मैं तुम्हारी क़सम है के तोड़ दूँ उसको
तुम्हारे प्यार तुम्हारी अदा का दीवाना
मेरे सिवा भी कोई और हो खुदा ना करे
तुम्हारा चाहने वाला ...
हे भगवान , कितनी खतरनाक चाह्ते हैं ....ये क्या बात है कि तुम्हारी तारीफ कोई और दूसरा करे ही नहीं , ये प्यार कहाँ , जूनून है , जलन है , ईर्ष्या है ...

यह गीत तो अपनी चाल चल ही रहा था कि इंदु जी अपनी टिप्पणी कर गयी ," कोई कुछ भी कहे , तुम्हारा कृष्ण तो राधे रानी के बिना अधूरा है "....पता नहीं क्यों, कुछ बूँदें आंसुओं की लुढ़क गयी ....

जीवन का गणित इतना कैलकुलेटिव कहाँ होता है ...सिर्फ गणित में ही होता है , दो दूनी चार , आठ दूनी सोलह हमेशा , जिंदगी में नहीं ...उसका तो अपना ही गणित , अपनी ही परिभाषा , हर एक के लिए अलग ...किस बात पर हंसी आये , किस बात पर रोना ....
दिन भर से कितनी खबरे पढ़ी , देखी ... लूटमार , हत्या , धोखाधड़ी ,रोना- पीटना , आँखें गीली नहीं हुई ... कितने सुखद , दुखद पल याद किये मगर पलकें फिर भी नम नहीं हुई , और ये जरा -सी बात कृष्ण की हुई तो आंसू छलक गये ...
जी किया कि झगड़ पडूं इंदुजी से ... छलिया कृष्ण , खुद अधूरा कब रहा , वह तो अपने आप में सम्पूर्ण ही था ... उसने हर उस व्यक्ति को अधूरा किया , जिसने उससे प्रेम किया ...माँ यशोदा, राधा , रुक्मिणी , सत्यभामा ,गोपियाँ , मीरा .... सब तो उसके बिना अधूरे ही रहे !
ओ तेरी ! कृष्ण सबको चाहे तो भी चितेरा ही , सबका दुलारा ही !
कैलाश जी भी पूछ रहे थे ," कान्हा, राधा से क्यों रूठे "
मिल जाए कहीं कान खींच कर कह दूं ..."कान्हा , अब ना चलने की है रे तेरी चतुराई!"

समझाया मन को .... फर्क है कृष्ण में , आम इंसान में ...बहुत फर्क है !


ब्लॉग दुनिया में लौटे फिर से ...देखा तो गिरिजेश जी अपलाप कर रहे हैं ....
"मृत्यु के बारे में सोचना पलायन है। अतार्किक भय की तार्किक परिणति।"
"यह कहना सीमित दृष्टि का परिचायक है। तुमने यह मान लिया कि मृत्यु के बारे में सोचने वाला जीवन संघर्षों से घबराता है और यह भी कि वह भयभीत होता है।"

उधर आनद द्विवेदी जी कह रहे थे ...
"इस जगत में प्रेम से बड़ी कोई सृजनात्मक शक्ति नही है ! इसलिए प्रेम मृत्यु को स्वीकार कर ही नही सकता; वह घटती ही नही | अगर तुम प्रेम करते हो किसी को तो वह मरेगा नही; मर नही सकता | प्रेमी कभी नही मरता | प्रेमी मृत्यु को जानता ही नही | प्रेम अमृत है - ओशो"

मृत्यु, प्रेम भी सबके लिए एक जैसा कहाँ ... किसी को मृत्यु में भय है , किसी को प्रेम ...
कितने रूप है प्रेम के , चाहतों के ....
चाहतें कैसी -कैसी ....

ज्यादा पढना भी कई बार कन्फ्यूज कर देता है !