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गुरुवार, 24 जून 2021

लक्ष्मण को आवश्यक है राम जैसा भाई...

  रामायण /रामचरितमानस में श्रीराम द्वारा स्वयंवर की शर्त पूरी करने के लिए धनुषभंग करने के वृतांत से कौन परीचित न रहा होगा.  धनुष तोड़ दिये जाने से क्रोधित ऋषि परशुराम के क्रोधित होने और राम के छोटे भ्राता लक्ष्मण का व्यंग्यपूर्वक उनका सामना करने/ढ़िठाई रखने का प्रसंग भी लोकप्रिय रहा है.  बहुत समय तक दोनों के मध्य हुए वाद विवाद का पटाक्षेप होने के बाद ऋषि स्वयं नतमस्तक हुए . अपने से छोटा जानकर भी उन्होंने अपनी भूल स्वीकार की.

क्या कारण रहा होगा कि अपने कुल की बड़ों को सम्मान देने की नीति का पालन करते हुए भी ऋषि के आगे वे तने ही रहे. स्पष्ट है कि मिथ्या अभिमान में बड़ों द्वारा  अपमान/असम्मान किये जाने का प्रतिकार करने में कोई अपराध न समझा गया. यह अवश्य है कि ऋषि के क्रोध  और लघु भ्राता के मध्य एक प्राचीर अथवा सेतु कह लें, राम धैर्यपूर्वक खड़े थे.

कई बार बुजुर्ग इसी प्रकार अपने मिथ्या अभिमान में अपने से छोटों के प्रति अकारण ही रोष प्रकट कर जाते हैं. और यदि उनसे छोटे अपनी सही बात पर अड़े रहकर प्रतिकार करने पर विवश हों तब उन्हें बड़ों/बुजुर्गों के असम्मान करने का दुष्प्रचार करते पाये जाते हैं. 

देश/समाज/परिवार की वर्तमान परिस्थितियों में विभिन्न वैचारिक मतभेदों के मध्य में  राम जैसे एक बड़े भाई का होना आवश्यक लगता है जो विनम्रता पूर्वक अपने बाहुबल का बखान कर लघु भ्राता लक्ष्मण के प्रतिकार को सहज मानकर आश्रय दे सके. वहीं दूसरे पक्ष को भी जता सके कि सिर्फ बड़े होने के कारण ही वे किसी के पूज्य नहीं हो सकते. उनके अपने कर्म ही उन्हें सम्मानित बना सकते हैं.


शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

ये तेरा घर ये मेरा घर...



देखो. इतने समय बाद चल रही हो. कुछ कहें तो चुप रहना.

उसने घूर कर पति की ओर देखा-  यह बात उन्हें क्यों नहीं कहते. तुम जानते तो हो. एक दो बार में तो मैं किसी को कुछ कहती ही नहीं.

कोई बात नहीं तीन-चार बार भी सुन लेना.

यह नहीं होगा. पाँचवीं बार तो मैं बोल ही पड़ूँगी. कहो तो चलूँ या रहने दूँ.

उनको कैसे कह सकता हूँ...

सच है, सुनने के लिए तो हमें ब्याह लाये थे.पर एक बात बताओ मैं क्यों सुनूँ.  क्या तुम मुझसे परिवार की सहमति के बिना प्रेम विवाह कर ले आये थे.

कैसी बात करती हो. पहले मम्मी, पापा और दीदी ने ही पसंद किया था तुम्हें.

अच्छा यह बताओ क्या मैं किसी गरीब परिवार से आई हूँ. दहेज के नाम पर कुछ नहीं लाई.

क्या तुक है इस बात की. मैंने खुद आगे बढ़कर कहा था कि तिलक में कुछ कैश नहीं लेना/देना है .

वह तो सही है. तभी तो हम साथ हैं. 

प्यारी सी मुस्कुराहट फैल गई अनुभा के चेहरे पर. पर फिर से सतर्क होते हुए अगला सवाल दाग दिया-

क्या मैं घर को साफ सुथरा नहीं  रखती. खाना अच्छा नहीं बनाती. वैसे तुम्हें बता  दूँ कि तीस वर्षों की गृहस्थी में 26 वर्ष तक घर का हर काम मैंने बिना मेड  की सहायता से किया है. बच्चों को बिना ट्यूटर पढ़ाया है .

क्या कह रही हो . मैंने कब कहा ऐसा. तुमने मैंने मिल कर ही किया है सब. वह प्यार से बाहों में भरने को हुआ पर अनुभा छिटक कर दूर हो गई.

क्या मेहमानों की आवभगत या लेनदेन में मैं मायका/ ससुराल में भेद करती हूँ!

ऐसा कब किसने कहा. मेरे भतीजे तो अकसर कहते थे कि तुम उनकी मम्मी से भी ज्यादा उनका खयाल रखती हो. 

हाँ. कई बार अस्पताल में भीें खाना/चाय आदि पैक कर ले गई हूँ. शादी ब्याह में भी अपना पराया समझे बिना सब काम किया है. यह ठीक है कि उन लोगों ने  भी हमारी जरूरत में हमारा साथ दिया. पर एक बात बताओ क्या मैं अनपढ़ गँवार हूँ.  क्या मैं नहीं जानती कब किससे कैसे बात करनी है. क्या मुझे बात करने की तमीज नहीं है!

ऐसा नहीं है पर तुम्हें गुस्सा आ जाता है.

अच्छा! क्या मुझे तुमसे और उनसे भी ज्यादा गुस्सा आता है और वह भी बिना कारण?

नाक खुजाते हुए इधर उधर ताकने के बाद हेलमेट उठाते हुए वह  बोला - अच्छा मेरी अम्मा. अब चल लो . तुम्हें मुझे जो सुनाना हो, सुना लेना पर वहाँ चुप रहना.

और मैं इतनी देर से क्या कर रही थी. .. दबे होठों में मुस्कुरा दी अनुभा.

क्या कहा.. 

कुछ नहीं.चलो जल्दी.आज मेरा किसी को कुछ और सुनाने का मूड नहीं. इससे पहले की मेरा मूड बदल जाये, चल आते हैं .


रविवार, 2 फ़रवरी 2014

बच्चों को खूब पढ़ाया लिखाया , मगर अपनी सोच का क्या किया ……

घर क्या होता है 
तुम क्या जानो 
तुम जानते हो जमीन के छोटे बड़े टुकड़े 
कमरा इतने फीट बाई इतने फीट 
कैसे बताऊँ - इसे घर नहीं कहते !
घर एक एहसास है 
जहाँ किसी एक का ज़ख्म 
दूसरे की तकलीफ बन जाता है 
घर वह नहीं
जहाँ रोटी की कीमत आंकी जाती है
घर -
ज़रूरी नहीं कि आलीशान हो !
छोटा हो
पर प्यार से भरा हो
जहाँ बचपन, सपने, खिलौने
सब एक साथ रजाई में दुबककर सोते हों
सुबह होते शोर हो
'आज कौन चाय बनाएगा'?
और फिर एक ख़ामोशी पसर जाए
थोड़ी देर बाद माँ की आवाज आए
'मैं ही बना लेती हूँ'
और फिर धम धम कोई रसोई तक जाये बड़बड़ाते हुए
'इमोशनली ब्लैक मेल करती हो !'
और पूरा घर खिलखिलाने लगे ....
घर ऐसा होता है !
(रश्मि जी की वॉल से चुराया हुआ)
-
 Rashmi Prabha

कुछ दिनों पहले  रश्मिप्रभा जी ने फेसबुक पर घर को घर बनाने वाली स्नेह पगी मीठी सी कविता पोस्ट की। उनके स्नेह और वात्सल्य से अभिभूत हम धड़ल्ले से चोरी /डाका डालने में अपराध नहीं समझते सो बाकायदा अपने फेसबुक वॉल पर भी चिपका दिया । गुदगुदाया मन फिर भी आशंकित हुआ कि घर के भीतर इमोशनली ब्लैकमेल माताएं अथवा पुत्रियां ही अधिक होती है। इसी सोच के आलोक में कुछ परिवार आँखों के सामने आये , जिनसे कुछ समय पहले या अक्सर मिलना -जुलना होता रहता है। 

पतिदेव का अपना ही शहर है ,  एक ही विद्यालय/मोहल्ले /ऑफिस  में साथ रहे /पढ़े लोगों का विस्तृत दायरा है मगर व्यस्त शहरी दिनचर्या में रिश्तदारों , परिचितों , मित्रो आदि से मिलना जुलना किसी ख़ास पारिवारिक कार्यक्रम अथवा कोई कार्य होने पर ही हो पाता है।  एक ही शहर में होने के बावजूद कई वर्ष गुजर जाते हैं हालाँकि फोन/मोबाइल /इंटरनेट  की सुविधा के कारण बातचीत होती रहती है। कुछ सप्ताह पहले वीकेंड पर परिचितों से मेल-  मिलाप का कार्यक्रम बना। 

मित्र केंद्रीय सेवा में हैं तो उनकी पत्नी बैंक में अधिकारी है। एक ही पुत्र है जो अपनी उच्च शिक्षा /करियर के लिए दूसरे शहर में रहता है , बस छुट्टियों में ही  आना  हो पाता है।  अच्छी लोकेशन में पार्क के सामने  मकान है उनका , बालकनी में खड़े उनकी पत्नी से कहा मैंने कि अच्छी जगह है , सामने पार्क है।  
पार्क है तो क्या , कभी सामने देखने का समय ही नहीं मिलता।  सुबह उठते ही रसोई नजर आती है , चाय -नाश्ता -खाना बनाया और भागे बैंक।  वीकेंड में देर से उठना , साप्ताहिक कार्य निपटाने में ही समय गुजर जाता है।  
नारी -शक्ति जाग उठती ही भीतर कभी  , तो  हम भी उसी भाव में ज्ञान देते हुए बोल पड़े ,  क्यों , इतने वर्षों में भाई साहब को नाश्ता बनाना नहीं सिखाया क्या। पत्नी सिर्फ मुस्कुराकर रह गयी। 
भाई साहब  तीखी नजरों से घूरते पतिदेव से मुखातिब हुए , ये क्या सिखा रही है मेरी बीबी को, हमारा झगड़ा करवाएंगी क्या। और दोनों मित्र खुल कर  हंस लिए। 
मैंने कहा उनकी पत्नी से , जागो नारी शक्ति और हम भी हँस  ही लिए !
 भाई साहब बड़े गर्व से बता रहे थे अभी ये नई गाडी खरीदी तो पुरानी पत्नी को दे दी। मैं समझती हूँ कि उनकी पत्नी की तन्खवाह उनसे कही अधिक ही रही होगी। 
पूरे समय मैं देखती रही , पानी लाने से लेकर जरुरी कागज़ , चश्मा , चाय पकड़ाते उनकी पत्नी ही चकरघिन्नी बनी रही। वर्षों से जानती हूँ इस परिवार को।  दोनों के बीच अच्छा सामंजस्य रहा है , कही कोई मनमुटाव या तानाकशी नजर नहीं आई।  यूँ तो भारतीय परिवारों में आम रहा है यह सब , मगर आजकल थोडा अखरता है।
   
एक और रिश्तेदार के घर जाना हुआ। संयुक्त परिवार था , सास -ससुर , बेटा बहू , पोता।  दो बेटे ही हैं उनके , इस परिवार में भी चाय पानी नाश्ता लिए श्रीमती जी ही चकरघन्नी बनी रही। अक्सर रश्क करते हुए कहती हैं , आपका अच्छा है , चाय -नाश्ता बेटियां सम्भाल लेती हैं. हैरानी अधिक इसलिए होती है कि  ये वह  महिला है जिन्होंने अपने घर में पिता और भाइयों को हमेशा माँ का हाथ बंटाते देखा है। 

एक और परिवार है , दो बेटे हैं उनके भी।  वे स्वयं  एकलौती पुत्री रही है , मगर मानसिकता वही , बेटियां सब कर लेती हैं , हमें तो स्वयं ही  करना पड़ता है।
 
एक और रिश्तेदार हैं।  दो पुत्रियों और एक पुत्र की माँ  अपने परिवार की एकलौती पुत्री रही हैं और उनकी संपत्ति की   इकलौती वारिस भी मगर जब अपना पुश्तैनी कार्य सम्भालने की बारी आई तो बड़ी बेटी के कार्य सँभालने की सम्भावना को सिरे  से  नकार दिया , यह कहते हुए कि व्यावहारिकता  का तकाजा यही है कि बेटा ही सम्भाले। 

एक और परिचित दो पुत्रियों और एक पुत्र की माता हैं।  उनका भरा -पूरा परिवार रहा छह बहनों और एक भाई का।  घर के काम में पति के हाथ न बंटाने  की शिकायत करती ये माताजी भी यही मानती है कि बेटियों को ही घर का काम सीखना है , बेटों का क्या है !!
 
ये सारे उदाहरण अच्छे- खासे पढ़े- लिखे परिवारों के हैं। माताएं भी पढ़ी- लिखी है , कोई सरकारी सेवा में हैं तो किसी का अपना व्यवसाय है। ये स्त्रियां पुत्र एवं पुत्रियों को रोजगार के लिए समान शिक्षा की वकालत तो करती हैं मगर घर के भीतर उनका अपना  दृष्टिकोण भिन्न है। 
  
कभी -कभी मुझे  लगने  लगता है कि पढ़ने- लिखने से आखिर होता क्या है !! अपने बच्चों को वकील , डॉक्टर , इंजीनियर , वैज्ञानिक , सीए आदि बना ले तो क्या , अपनी सोच का क्या करे। 
 
स्वयं पर भी संशय होने लगता है कि कही मैं भी पुत्रियों की माता होने के कारण ही तो निष्पक्षता की मंशा/भावना  नहीं रखती हूँ ! मानसिक स्थिति का उचित प्रकटन तो उन परिवारों में ही सम्भव है जो पुत्र और  पुत्री दोनों के माता -पिता है और उनके व्यवहार में अपनी संतान के लिए कोई भेद न हो , ना घर में , ना बाहर। 

क्या सच में पुत्र और पुत्री के जीवन को दिशा /शिक्षा देने के सम्बन्ध  में एक ही दृष्टिकोण सम्भव नहीं है !!! 

सोमवार, 24 जून 2013

महज आर्थिक स्वतन्त्रता ही स्वतंत्र व्यक्तित्व की परिचायक नहीं है !


गिफ्ट शॉप पर एक शाम पड़ोस की टीवी रिपेयरिंग की दूकान में  नजारा देखने को मिला . बड़ी सी कार खुद चला कर लाई महिला स्वय निर्णय नहीं ली पा रही थी कि टीवी ठीक होने के लिए यहीं छोड़ा जाय या नहीं . अपने पति से फोन पर बात की उन्होंने , फिर निर्णय किया कि टीवी वापस घर जायेगा फिर उनके पति ही उसे ठीक करवाएंगे , खैर , यह मामला  इतना संजीदा नहीं था इसके क्योंकि इसके कई और कारण हो सकते थे .

निम्नतम  आय वर्ग जैसे मजदूर , घरो में या खेती में काम करने वाली स्त्रियाँ , धोबी (प्रेस करने वाले ) इत्यादि  अक्सर कामकाजी या आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर ही माने जा सकते हैं  , मगर अक्सर उनकी तनखाह पर स्वयं उनका हक़ नहीं . घर लौटकर शराबी पति की मारपीट या खर्चा उनके हाथों में सौंप देना आम है .(हालाँकि अपवाद हर वर्ग में हैं !)   

मगर एक पारिवारिक चर्चा   में जब सामने बैठे एक परिचित कह बैठे - हमारा परिवार पुरुष प्रधान है ,घर/बाहर   से सम्बंधित कोई भी निर्णय मेरी स्वीकृति होने पर ही लिए जा  सकते हैं तो मेरा चौंकना स्वाभाविक था  .  भारतीय मध्यमवर्गीय समाज में परिवारों में घर परिवार से सम्बंधित महत्वपूर्ण आखिरी निर्णय पुरुष ही लेता है , यह सर्वविदित है मगर अक्सर परिवारों में महिला सदस्यों की राय लिया जाना भी सहज है इसलिए उनका  दम्भपूर्ण बखान मुझे अच्छा नहीं लगा . आखिर घर/ परिवार की प्रमुख धुरी स्त्री को नजरअंदाज कर  निर्णय कैसे लिए जा सकते हैं !! 
उनकी यह दम्भोक्ति उतनी अखरती नहीं यदि वह  कहते कि सारे निर्णय हम मिलजुल कर लेते हैं .  उक्त सज्जन की पत्नी सरकारी नौकरी में है ,पति के बराबर (बल्कि हो सकता है ज्यादा ही )   तनखाह लाती है , यानि घर चलाने में आर्थिक सहयोग उनका बराबरी का है , मगर घर में हक़ बराबरी का नहीं ??  

माने कि महज आर्थिक स्वतन्त्रता ही आपके स्वतंत्र  व्यक्तित्व की परिचायक नहीं है .  नौकरी और आमदनी आपको अपनी सुविधानुसार खर्च करने या घर से बाहर रहने में तो मदद कर सकती है , (हालाँकि इसमें भी शक किया जा सकता  है कि  खर्च भी वे अपनी इच्छानुसार कर सकती हों ) मगर आपके व्यक्तित्व को गढ़ नहीं सकती . 

 जो व्यक्ति /स्त्री इस प्रकार अपने अस्तित्व को महसूस करता है और दूसरों को उसके अस्तित्व को स्वीकारे जाने को बाध्य करे , व्यक्तित्व वही पूर्ण है . सिर्फ ऊँची डिग्रियां या कामकाजी होना आपके अस्तित्व और व्यक्तित्व की उपस्थिति  दर्ज नहीं कराता . व्यक्तित्व को पुष्ट करती है आपकी कार्यशैली , बिना डरे  /हिचके अपने विचार व्यक्त करने और महत्वपूर्ण निर्णय लेने में आपकी भागीदारी , वर्ना एक इंसान और रबर स्टाम्प में फर्क क्या रह जाता है !! 

स्त्रियों की अस्मिता , गौरव और आत्मसम्मान के लिए किये अभी कितना कार्य किया जाना शेष है , कभी -कभी बहुत निराशा होती है , लगता है कि एक गोल घेरे में ही घूमते चले जा रहे है हम सब , जहाँ से चले , वहीँ पहुँच जाते हैं !!


 आपकी राय का स्वागत है !

शुक्रवार, 18 मई 2012

परिवार वही बेहतर हैं जहाँ आपस में प्रेम , विश्वास और अपनापन है , संयुक्त परिवार हो या एकल !


समाजशास्त्र की किताबों में पढ़ा था कि  मनुष्य एक सामाजिक पशु है .   पशु  समूह में रहना पसंद करते हैं , मनुष्य के लिए भी विभिन्न कारणों से अकेले रहना संभव नहीं . वह परिवार , कबीला ,गाँव आदि बनाकर एक समूह में रहना ही पसंद करता है . समूह में रहने के लिए ना सिर्फ भोगौलिक और प्राकृतिक परिस्थितियां जिम्मेदार है बल्कि मनुष्य की मानसिक अवस्था भी प्रकारांतर से परिवार, कबीला आदि  की रचना के लिए प्रोत्साहित करती रही है . 
 एक परिवार का मतलब समझा जाता है , पति- पत्नी और उनके बच्चों का एक साथ मिल कर रहना , मगर वास्तव में यह रक्तसम्बधियों का समूह है , जहाँ कई भाई , चाचा आदि साथ रहते हैं . विश्व के बड़े भूभाग में परिवार को दो प्रकार से निरुपित किया जाता है . पहला एकल परिवार जहाँ एक ही मुख्य सदस्य और उसकी पत्नी और बच्चे साथ रहें और दूसरा संयुक्त परिवार जहाँ एक पिता के कई बेटे अपने परिवारों के साथ रहते हों , जिनमे व्यस्क होने के बाद भी बंटवारा ना हुआ हो , घर की हर चीज , दायित्व और अधिकार साँझा हैं . 
प्रारंभ से हमारे देश में संयुक्त परिवार का प्रचलन ही रहा है . जैसा की ऊपर बताया संयुक्त परिवार ऐसे कई छोटे परिवारों का समूह है जिसमे घर के प्रत्येक सदस्य की जिम्मेदारी , सुविधाएँ और सुख दुःख भी साझा ही होते हैं . संयुक्त परिवार का एक मुखिया होता है , जो परिवार के सभी सदस्यों के लिए नीतियाँ और निर्देश देता है. इन परिवारों में पुत्र विवाह के बाद अपने लिए अलग रहने की व्यवस्था नहीं करता . परिवार में जन्मे बच्चों के पालन पोषण के लिए एक स्वस्थ वातावरण निर्मित होता है जिसमे वह  समाज में घुल मिल जाने के संस्कार , नीतियाँ , दायित्व आदि सीखता है . एकल परिवार में जहाँ कुछ ही लोगों का लाड़ दुलार मिलता है , वही संयुक्त परिवारों में बच्चा विभिन्न प्रवृतियों वाले एक बड़े समूह  के बीच रहता है , जहाँ उसे लाड़ दुलार के साथ समाज में विभिन्न परिस्थितियों में सामंजस्य स्थापित करने के गुण सीखता है जो उसके भावी जीवन के लिए एक सुदृढ़ नींव का निर्माण करते हैं . इन परिवारों में किसी भी बुजुर्ग, अविवाहित या बेरोजगार को विशेष समस्या का सामना नहीं करना पड़ता क्योंकि बाकी सदस्य उनकी जिम्मेदारी उठा लेते हैं . मनुष्य को अवसाद , उदासी , अकेलेपन से बचाने में इन परिवारों की सशक्त भूमिका होती है .
संयुक्त परिवार एक लुभावनी धारणा है. लेकिन प्रत्येक व्यक्ति की दिन प्रति दिन हो रही  आर्थिक और मानसिक उन्नति ने संयुक्त परिवार की अवधारणा को बहुत नुकसान पहुँचाया है . आज एक परिवार कई परिवारों के साथ एक संयुक्त ढांचे में रहकर स्वयं को बंधन में  महसूस करते हैं . पहले तो संयुक्त परिवार बचे ही नहीं है और जो हैं वे क्लेश के घर बने हुए हैं . जिन परिवारों में संयुक्तता  बची हुई है ,उनमे एकल परिवारों को उपहास की दृष्टि से देखा जाता है . ये बात और है कि अक्सर इन दिखावटी संयुक्त परिवारों के मुकाबले एकल परिवारों में बच्चे बेहतर संस्कार पाते हुए सामाजिक होने का गुण सीख रहे हैं .
वास्तव में परिवार कुछ लोगों के साथ रहने से नहीं बनता है . कुछ लोगो के प्यार से साथ रहने , एक दूसरे के सुख दुःख को समझने , साझा करने और संवेदनशीलता और विनम्रता बनाये रखने से ही परिवार की मर्यादा है . पहले संयुक्त परिवारों में सबकी जरुरत के लिए भौतिक सुविधाएँ साझा होती थी मगर आजकल  संयुक्त परिवारों में हर कमरे में एक अलग घर बसा हुआ ही ज्यादा नजर आ जाता है . जो समर्थ है , वह अपने कमरे में सारी भौतिक सुविधाओं का जमावड़ा कर लेता है , असमर्थों द्वारा इनका उपयोग लगभग वर्जित या फिर ताने सुनने का उपक्रम हो जाता है . ऐसे परिवारों में बुजुर्गों की हालत और भी खस्ता हो जाती है .अपनी युवावस्था में अपने सिंचित धन का उपयोग वे परिवार को सुदृढ़ करने में लगाते हैं और आखिर में होता यह है कि बेटों द्वारा अपने कमरे बाँट लिए जाने के कारण मकान के गलियारे में स्थान पाते हैं . अपनी मेहनत की पूंजी से बनाये गये मकान में उन्हें अपने लिए एक कोना तलासना होता है , क्योंकि अपनी युवास्था में उन्होंने स्वयं के लिए नहीं , परिवार की सुख -सुविधा पर ध्यान केन्द्रित रखा .
अपने एक परिचित परिवार का उदाहरण देना चाहूंगी . भरा -पूरा परिवार है , सात- आठ भाई -बहनों का . बहनों का विवाह हो चुका है , वे अपनी गृहस्थी में मगन हैं और सभी भाइयों का अपना घर अपना परिवार , मगर जब किसी भी परिवार में कोई मंगल कार्य हो या पर्व उत्सव हो , ना हो तब भी महीने में कम से कम एक बार  सभी परिवार किसी एक भाई के घर  इकट्ठा होते हैं , मिलकर खाना -पकाना और उसके बाद मौज मस्ती , ताश- कैरम खेलना ,साथ घूमने जाना . व्यक्तिगत होने के बावजूद इनकी खुशियाँ और सुख दुःख साझा होते हैं . जिस सदस्य को  आर्थिक मदद की आवश्यकता है , दूसरे सक्षम सदस्य मिलकर उनकी सहायता करते हैं . 
अब एक संयुक्त परिवार की बात लें . एक ही घर में कई अलग घर बसे हुए . जो सबल है , अर्थ में , जबान में वह जीत में .  मकान में दरारें पडी हैं , घर में बुजुर्ग बीमार है , कोई साझा मेहमान आया है ...ये इस परिवार की समस्या है क्योंकि साझेदारी का काम है . कोई एक पहल क्यों करे , जिम्मेदारी क्यूँ उठाये . महँगी कटलरी , अचार  , मिठाई आदि प्रत्येक कमरे में उनके ससुराल पक्ष के लिए सुरक्षित होती हैं .  कौन आया , कौन गया , घर का बुजुर्ग सदस्य देखेगा क्योंकि यह घर तो उसका ही बसाया है . जब तक बच्चे छोटे हैं , उनकी देखभाल के लिए परिवार की जरुरत है , बुजुर्ग के पास धन है , तब तक उनकी जरुरत है , वरना घर के एक कोने में रहते हुए  बाकी सदस्यों के चेहरे देखने , बात करने को तरस जाते हैं . कई दिनों तक आपस में संवादहीनता बनी रहती है .  
संयुक्त परिवार ही पारिवारिक सद्भाव की गारंटी नहीं है . इसके भी भी अपने गुण- दोष है . 
ऐसे संयुक्त परिवारों का क्या लाभ जिसमे संयुक्त रहने के नाम पर बुजुर्गों का जीवन भर दोहन करने के बाद  एक कोने में पटक दिया जाए और उनकी संपत्ति अपर अपना हिस्सा काबिज करने के लिए उनके मरने का इंतज़ार किया जाए .  जबकि एकल परिवारों में बच्चे या बड़े ज्यादा समय अकेले रहते हैं , उनके घर आने वाले मेहमान अथवा दूसरे पारिवारिक सदस्यों की जिम्मेदारी उनकी अकेले की होती है , जिसे वे बेहतर तरीके से निभाते हैं , साझा करना सीखते हैं वरना तो साझा परिवारों में बच्चे मिठाई , फल तक अपने कमरे में छिप कर खाना सीख लेते हैं . संयुक्त परिवार के पक्ष में एक बड़ी दलील दी जाती है कि इसमें बच्चे ज्यादा सुरक्षित होते हैं . संयुक्त परिवारों में प्रत्येक सदस्यों का अपना परिचय क्षेत्र , मित्र आदि होते हैं, ऐसे में अवान्छितों  का घर में प्रवेश रोक पाना इतना सरल नहीं होता . परिवार के दूसरे सदस्यों के बीच मनमुटाव का कारण बन जाता है . एकल परिवार में  संघर्षपूर्ण जीवन परिवार के सदस्यों के  बीच आपसी समझ को बढाता है , जो रिश्तों को मजबूत करता है .  
हम भारतीय अपने परम्पराओं और संस्कृति पर बहुत गर्व करते हैं, मगर उन्हें परिष्कृत कर बदलते समय के अनुकूल बनाने में उतनी रूचि नहीं रखते . परिवार प्रेम , विश्वास और सहयोग की बुनियाद पर इकट्ठे रहने चाहिए , ना कि सिर्फ लोक लुभावनी संस्कृति के दिखावटी  पोस्टर के रूप में . 
इसलिए परिवार वही बेहतर हैं जहाँ आपस में प्रेम , विश्वास और एक दूसरे के सुख- दुःख में शामिल होने का अपनापन है , वह चाहे संयुक्त परिवार हो या एकल !
मनोजजी कि इस प्रविष्टि ने सोचने पर विवश किया कि क्या वाकई संयुक्त परिवार ही पारिवारिक प्रेम की कसौटी हैं , एकल परिवार में बच्चे या बड़े सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं . 

मनोज जी की इस प्रविष्टि  और फेसबुक पर पर हुई चर्चा ने सोचने पर मजबूर किया कि क्या वाकई सिर्फ संयुक्त परिवार ही अच्छे पारिवारिक रिश्तों की गारंटी है , एकल परिवार सिर्फ स्वार्थी ही होते हैं!! फेसबुक पर भी विचार मंथन हुआ जिसके नतीजे में यह पोस्ट आई .   

फेसबुकिया विचार विमर्श ---
बकौल रश्मि प्रभा जी ...परिवार एक सोच है , रिश्तों का संस्कारों का - जहाँ इसका अस्तित्व है , वह एकल हो या संयुक्त - सही मायने में परिवार वही है . ढोने जैसी भावना का निर्वाह नहीं होता , वह ख़त्म ही हो जाता है ! दिखावे का संयुक्त परिवार ही अधिक देखा है ... जहाँ कई चूल्हे जलते हैं और घिनौनी लडाइयां होती हैं -चूल्हा एक भी हो तो अपने खाने पीने का सामान बेडरूम में भेजने के बाद डाल और सब्जी में ढेर पानी की मिलावपर दिखावा ही अधिक है .... हाँ मर जाने पर यूँ चीत्कार करते हैं कि .... खैर मुझे कोई भ्रम अब नहीं होता ! क्योंकि शांति की लकीरें उस चीत्कार में मुझे दिखी हैं . हमेशा आटे दाल का भाव बढा ही है ... आज के हिसाब से जो महंगाई पहले कम थी , तो वेतन कम था ... पर उस वक़्त दिलों में जगह थी . परिवार में एक उत्साह था , मिल बांटकर खाने का सुख था ...... अब तो बस अपना आराम ! पहले एक आलसी था , अब पलड़ा बराबर है इस आज का भयानक रूप कल होगा .... स्व जब चलने से लाचार होगा तो कोई देखनेवाला नहीं होगा पहले ये दिवस नहीं थे .... तब हर दिन माँ का था , प्यार का था , बुजुर्गों का था , पिता का था , बच्चों का था ------- अब एक दिन का कार्ड , इतिश्री

शिखा वार्ष्णेय ने कहा --आजकल संयुक्त परिवारों में भी सबका अपना कमरा, अपनी अलमारी , अपना फ्रिज, अपना टीवी , अपने नाश्ते ,मेवे, मिठाई के डिब्बे आदि आदि होते हैं..संयुक्त परिवार में नाम के अलावा कुछ भी संयुक्त रहा कहाँ है .मनोज जी जितना ज्यादा कमाते हैं उतना ही लालच बढ़ता जा रहा है.."मैं" के अलावा किसी की जगह ही नहीं बची है इंसानी रिश्तों में .

सोनल जी ने बताया --मैं एक बहुत बड़े संयुक्त परिवार से हूँ पहले त्याग ,सामंजस्य और ममता थी पर आज ,चालाकी दिखावा और चालबाजी ज्यादा है.
बढती महंगाई , लोगो की महत्वाकांक्षा और स्वार्थ ने इसका रूप विकृत कर दिया है.

मनोज जी बोले --परिवार कुछ लोगों के साथ रहने से नहीं बन जाता। इसमें रिश्तों की एक मज़बूत डोर होती है, सहयोग के अटूट बंधन होते हैं, एक-दूसरे की सुरक्षा के वादे और इरादे होते हैं। हमारा यह फ़र्ज़ है कि इस रिश्ते की गरिमा को बनाए रखें।
कभी-कभी दोनों खूब कमाते हुए होते हैं पर एक छत के नीचे रहकर भी वह परिवार परिवार नहीं लगता रह पाता। मुझे लगता है कि त्याग और उदारता की भावना का लोप होता जा रहा है। मानवता के गुणों का ह्रास। हमने (जिस दादी - नानी के ज़माने की बात आपने की है) कि उस ज़माने में एक बेरोज़गार भी संयुक्त परिवार का ऐसेट हुआ करता था।

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

जिंदगी सबकुछ सिखा देती है .....

लगभग एक महिना हुआ इस ब्लॉग पर कुछ भी लिखे हुए . वैसे तो कौन लेखन महारथी है या ब्लॉग अथवा फेसबुक पर दोस्तों की बहुत लम्बी लिस्ट है जो इतना लम्बा समय तक ना लिखने से कुछ फर्क पड़ता . लिखते हैं तो अपनी आत्मसंतुष्टि के लिए ही या लेखन की दुनिया में जाने जाने के लिए या अपनी पहचान बनाये रखने के लिए जो कारण आपको सुविधाजनक और आपके अहम को पुष्ट करे , वही मान लिया जाना चाहिए , हालाँकि सामाजिक और कर्मचारी संगठन से जुड़े पतिदेव को कई बार कौंच देती हूँ कि आपके कार्यों से आपको जानने वाले आपके शहर या राज्य में ही हैं ,हमें तो पूरे विश्व में हमारे लेखन से जाना जाता है . किसी भी व्यक्ति को उसके नाम से जाना जाये , कितनी संतुष्टि देता है ना ...पतिदेव भी मुस्कुरा देते हैं , मैडम, आपकी इस लोकप्रियता का बिल हमी को भरना पड़ता है . आखिर इंटरनेट का बिल तो वही चुकाते हैं :)...

खैर बात हो रही थी लम्बी अनुपस्थिति की . चाचा जी के देहावसान के बाद उनके द्वादसे पर हैदराबाद जाना हुआ . पिछले कई वर्षों से परिजन अपने शहर आने का आमंत्रण दे रहे थे , मगर जाना संभव ही नहीं हुआ . एक दो विवाह समारोह भी हुए थे , मगर उसी समय बच्चों की परीक्षाओं के कारण पतिदेव को अकेले ही इन कार्यक्रमों में शामिल होना पड़ा .
मगर सुख में साथ ना दिया जा सके , मगर दुःख में परिवार जनों की उपस्थिति बहुत हिम्मत देती है . ऐसे में बड़े परिवारों का सकारात्मक पक्ष भी नजर आता है . चाचाजी की उम्र अधिक नहीं थी , साठ से कुछ वर्ष ही ऊपर हुई थी , मगर अस्वस्थता के कारण पिछले दो-तीन वर्षों से निष्क्रिय जीवन ही बिता रहे थे. भाइयों ने कम उम्र में ही अपनी जिम्मेदारियां सँभालते हुए घर की अन्य जरूरतों को पूरा करते हुए भी उनके इलाज़ में कोई कोताही नहीं बरती . मगर होनी को जो मंजूर हो , वही होता है . निष्क्रिय ही सही , घर के प्रमुख सदस्य की उपस्थिति भी बहुत मायने रखती है . पिछले कुछ समय से तेजी से गिरते उनके स्वास्थ्य के कारण नियति को स्वीकार लिया गया था इसलिए माहौल इतना गमगीन नहीं था या फिर ये कहें कि विपरीत परिस्थितियां बच्चों को कम उम्र में ही मजबूत बना देती हैं . श्रीवैष्णव परम्परा के अनुसार ही सारी रस्मे निभायी गयी . अन्य संस्कारों के साथ ही प्रतिदिन दिवंगत को रुचने वाली मिठाई या पकवान बनाना , द्वादसे के दिन कम से कम पांच मिठाई और अन्य पकवानों के साथ "न्यात" जिमाना (मृत्यु भोज ), ज्येष्ठ पुत्र को पगड़ी पहनाने के अतिरिक्त परिवार के प्रत्येक विवाहित सदस्य के ससुराल पक्ष से परिजनों को वस्त्रादि भेंट करना आदि ... इन रस्मों के औचित्य पर सोचते हुए मैंने जो निष्कर्ष निकाला वह यह था कि गहन दुःख के क्षणों में सदमे से उबरने के लिए परिजनों का ध्यान दूसरी ओर आकर्षित करने के लिए या फिर इस अवसर पर दिए जाने वाले धन आदि से परिवार को आर्थिक संबल प्रदान करने के लिए इस प्रकार की रस्मों की शुरुआत की गयी होगी जो कालांतर में जबरन थोपे जाने वाले रिवाज या सामाजिक परम्पराएँ बन गयी . जो भी कारण हो , आजकल इन परम्पराओं के औचित्य पर गहन विमर्श किया जाता है , कही -कही तो इन रस्मों से मुक्ति भी पा ली गयी है , आर्थिक रूप से अक्षम लोगों पर परिजन को खोने के बाद इन सभी रस्मों के लिए धन की व्यवस्था उन्हें और दुःख ही पहुंचाती है .

परिवार के सबसे बड़े सदस्य होने की जिम्मेदारी निभाते हुए माँ एक महिना तक चाची के साथ ही रहने वाली थी , हमारे लौटने के दो दिन बाद ही माँ को अचानक सीने में दर्द के कारण हॉस्पिटल में एडमिट होना पड़ा , कुछ टेस्ट और एन्जीओग्राफी की रिपोर्ट में मायनर हर्ट अटैक के साथ ही हर्ट में ब्लौकेज होने की पुष्टि हुई और अब वे एन्जीओप्लास्टी के बाद स्वास्थ्य लाभ कर रही हैं .

तेजी से हुए इन घटनाक्रमों ने इस विश्वास को और बढाया कि हम लाख उठापटक कर लें , प्लानिंग बना ले मगर अपनी अँगुलियों पर नचाता हमें ईश्वर या नियति ही है . वरना कहाँ तो परिवार के एक विवाह समारोह में शामिल होने के लिए माँ के साथ अपने पूर्वजों के ग्राम जाने की योजना बन रही थी और कहाँ अचानक हैदराबाद जाना हुआ , परिवार का एक सदस्य कम हुआ ,साथ ही माँ को भी अस्पताल में भर्ती होना पड़ा .

जन्म के साथ मृत्यु का दौर अटल और अवश्यम्भावी है , हम सभी जानते हैं . दो बुआ और फूफा का देहावसान हो चुका हैं , उनके बच्चों से मिलते हुए कितना कुछ मन में गुजरता है और मन ही मन माँ की छत्रछाया के लिए ईश्वर को धन्यवाद देती हूँ , क्योंकि अधेड़ावस्था की ओर बढ़ते हम लोंग अभी भी उनके सामने बच्चे ही बने होते हैं . कम उम्र में ही अपने परिवार की जिम्मेदारी सँभालते इन भाई बहनों से मिलते उनकी मजबूत इच्छाशक्ति और जिजीविषा को सलाम करने को मन करता है .

उम्र बढ़ने के साथ परिवार के पुराने सदस्यों का साथ छूटने के अतिरिक्त नए सदस्यों का जन्म अथवा जुड़ना भी होता है मगर फिर भी लगता है जैसे परिवार सिकुड़ता जा रहा है. जिन परिजनों की गोद में खेले , जिनके साथ बड़े हुए वे पीछे छूट जाते हैं और नए जुड़ने वाले सदस्यों से दूरियों के कारण ज्यादा परिचय नहीं हो पाता .

सभी रस्मों के बाद एक दिन शहर के उस हिस्से में भी चक्कर लगा आये जहाँ बचपन और युवावस्था का कुछ समय गुजारा था . अत्यधिक ट्रैफिक के कारण हुए दबाव से चारमिनार को क्षतिग्रस्त होने से बचाने के लिए बस स्टैंड के हट जाने के अतिरिक्त कोई बड़ा फेरबदल नहीं लगा मुझे . अक्सर शाम को घूमते हुए चारमिनार के पास चक्कर काट आना , खोमचों पर भेलपुरी का स्वाद लेना बहुत याद आया . मक्का मस्जिद , मदीना बाजार , रेडीमेड कपड़ों या ड्रेस मेटेरिअल का होलसेल बाजार पटेल मार्केट , गुलजार हौज़ से ईरानी गली का के बीच पैदल घूमते हुए बहुत कुछ याद आया .

दुःख के क्षण हर व्यक्ति पर अलग -अलग प्रभाव डालते हैं . हमें भीतर से और मजबूत करते जाते हैं , व्यावहारिक बनाते हैं या फिर कभी -कभी संवेदनाहीन भी बनाते हैं, कहा नहीं जा सकता . ईश्वर और प्रकृति हमें हर कदम पर सचेत और सावधान करती है , क्रिया , प्रतिक्रिया और विशिष्ट प्रतिक्रिया के अनुसार लोगों पर इसका असर भिन्न होता है .
पड़ोसन आंटीजी भी शारीरिक व्याधि से जूझती हुई पिछले एक महीने से बेड रेस्ट पर हैं . रोज उनके साथ कुछ समय गुजारना , माँ के साथ रहना , बचे समय में अपना घर संभालना , इन दिनों ब्लॉगिग की बजाय मुझे यही ज्यादा सार्थक लग रहा है . अब इस पर आप मुझे घरेलू जिम्मेदारियों से त्रस्त महिला समझे और बहनजी जैसे संबोधन देना चाहे तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि मैं जानती हूँ कि आभासी दुनिया से जुड़ने के साथ ही वास्तविक दुनिया के रिश्तों को संभालना , उन्हें समय देकर मैं अपने जीवन को सार्थकता ही दे रही हूँ .

इन दिनों परिवार से जुडी और भी वारदातों (!!) के बीच सभी के व्यवहार पर नजर डालते एक निष्कर्ष भी निकाला , परिवार के सबसे बड़े या अपनी जिम्मेदारी समझने वाले सदस्य के हिस्से में सम्मान और जिम्मेदारियां आती हैं , जबकि छोटे अथवा गैरजिम्मेदार के हिस्से में लाड़- दुलार और पैसा ... ईमानदारी से कहूं इन जिम्मेदारों को देखकर कभी -कभी ख़याल भी आता है कि कोरे सम्मान का क्या अचार डलता है ?
क्या कभी आपके मन में भी किसी जिम्मेदार सदस्य को देखते हुए यह खयाल आता है !!

माँ और पड़ोसन आंटी जी के लिए आपकी दुआओं और शुभकामनाओं की दरकार रहेगी , क्योंकि दुआओं से ही दवाओं में असर होता है !

रविवार, 14 अगस्त 2011

आपके लिए परिवार, समाज अथवा देश से प्रेम के क्या मायने हैं ...

लिखने , बोलने या समझाने का सबका अपना अलग ढंग/ तरीका होता है. गुणीजनों को अपनी शब्द सम्पदा पर मोहित हो कठिन शब्दों में ग्रंथों के हवाले से सदुपदेश देना रुचता है , वही महात्मा सरल शब्दों में विभिन्न महापुरुषों के उदाहरण देकर समझाने का यत्न करते हैं जबकि आम इंसान अपनी शब्दों की घनचक्करी के बिना ही अपने आसपास घटने वाली घटनाओं और उसमे स्वयं और विभिन्न व्यक्तियों द्वारा निष्पादित कार्यों अथवा व्यवहार द्वारा सिर्फ यह जतलाता है कि यह समस्या है/थी , इसे सुलझाने के प्रयास इस प्रकार किये जा सकते थे /हैं .

देश प्रेम पर बड़ी -बड़ी बातें पढ़ी सुनी, मगर मेरे लिए देश प्रेम का सीधा सा मतलब है इस देश से , देश में रहने वाले इंसानों से ,देश की प्रकृति से , भोगौलिक स्थिति से , यहाँ बसने वाले पशु पक्षी , बोलियाँ , भाषा , रहन सहन ,सबसे प्रेम करना है .
प्रत्येक व्यक्ति , समाज , देश के व्यवहार के दोनों पहलुओं में कुछ सकारात्मक अथवा नकारात्मक हो सकते हैं . साधु स्वभाव के बीच विघटनकारी अथवा दुष्ट प्रवृति भी साथ पलती ही है . ऐसी परिस्थितियों में हमारा या अन्य व्यक्तियों का वह व्यवहार जो दुष्प्रवृतियों को परे हटाकर सदमार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है , वही आदर्श हो जाता है . ध्यान रहे कि यहाँ समझाने के लिए भारी- भरकम उदाहरण नहीं देकर सिर्फ यह जतलाना होता है कि मैंने यह किया , इससे निजात पाई , तुम भी यह कर सकते हो या कम से कम प्रयास तो कर सकते हो ...

एक स्थान पर अभियंताओं का बड़ा दल भरसक प्रयास कर के भी नक़्शे के अनुसार बनाये गये मशीन के बराबर बनाये गये स्थान पर एक बड़ी मशीन को लगा नहीं पा रहे थे कि एक ग्रामीण के सरल उपाय ने उनकी मुश्किल एकदम से आसान कर दी . उसने सुझाव दिया कि पूरे स्थान को बर्फ के टुकड़ों से भरकर उसपर मशीन को रख दिया जाए , जैसे- जैसे बर्फ पिघलती जायेगी , मशीन भी उसके साथ अपने निर्धारित स्थान पर रख जाएगी .
कहने का तात्पर्य सिर्फ यह है कि बड़ी- बड़ी बातें करने या लिखने से ही हर समस्या का निदान संभव हो , आवश्यक नहीं ,सामान्य सहज बुद्धि भी कई बार बड़ी समस्याओं को चुटकियों में सुलझाने में सक्षम होती है .

कोई भी व्यक्ति , समाज या देश अपने आप में परिपूर्ण नहीं है . इन संस्थाओं में आसुरी प्रवृति को अनदेखा करते रहना , उसे छोड़ जाना या गरियाते रहना , कोई निदान नहीं है . अपने परिवार , समाज और देश में साथ रह कर अपने अच्छे कार्यों द्वारा समझाना, सुधार का प्रयास और फिर अंतिम उपाय के रूप में दंड देना ही एक मात्र समाधान है .

मैं सबसे पहले एक इंसान और हिन्दुस्तानी हूँ और जब हमारे समाज और देश के समस्त नियम , कायदे, कानून और संविधान धर्म और जातियों के आधार पर ही निर्धारित हैं तो मुझे अपने धर्म और समाज पर कोई शर्मिंदगी भी नहीं है . एक सच्चे हिन्दुस्तानी के रूप में मैं दूसरे व्यक्ति , समाज अथवा धर्मों में कमी देखने या दिखाने की बजाय स्वयं अपने में , परिवार में , समाज में और देश में सुधार की कोशिश करने का प्रयत्न /प्रार्थना करूंगी .

मैं हर दिन ईश्वर से यही प्रार्थना करती हूँ कि जिस समय या जो वस्तु , इंसान या कोई भी प्रलोभन मुझे अपने परिवार ,समाज और देश से गद्दारी या बेईमानी करने को उकसाए , वही पल उस वस्तु , इंसान और स्वयं मेरे लिए भी आखिरी हो जाए ....
परिवार , समाज या देश से प्रेम का जो मतलब मैं समझती हूँ , वह तो यही है , आपके लिए इनके क्या मायने हैं .....

स्वतन्त्रता दिवस की अनगिनत शुभकामनायें!

शनिवार, 19 जून 2010

भागती जिन्दगी से चुराए गर्मी की छुट्टियों के कुछ पल ..

गर्मी की छुट्टियाँ बस समाप्त ही होने को है ...इन छुट्टियों का सबसे ज्यादा इंतजार होता है बेटियों को और उनके नन्हे मुन्नों मुन्नीयों को ...गर्मी की छुट्टी का मतलब नानी के घर जाबा दे ...दूध मलाई खाबा दे ...मोटो हों आब दे (नानी के घर जाने दो , दूध मलाई खाने दो ,मोटे होकर आने दो )...भागमभाग और बढ़ते प्रतियोगी माहौल में परीक्षाओं की तैयारी या अन्य हौबी कक्षाएं आजकल के बच्चों से गर्मी की लम्बी छुट्टियों की बेफिक्री और ननिहाल सुख़ को लीलती जा रही हैं ...और तिस पर मायका यदि एक ही शहर में हो और आपका एकल परिवार मानो करेला ऊपर नीम चढ़ा ...लम्बी लम्बी छुट्टियों की बात तो भूल ही जानी चाहिए ...भूल गए हैं हम भी जब से पिता के देहावसान के बाद माँ अपने संयुक्त परिवार सहित इसी शहर में निवास करने लगी हैं ...लू चलती भरी दुपहरी में खुद की देखभाल के प्रति हद दर्जे के लापरवाह पति को कुछ दिन को भी अकेला छोड़ कर जाना बड़ा मुश्किल होता है ...मगर जब इस बार पतिदेव कुछ दिनों के लिए व्यस्त थे तो मौका देखकर तीन चार दिन मायके जाने का जुगाड़ भिड़ा ही लिया ...
घर गृहस्थी की चिंता माँ के आँचल तले भी अब वैसी बेफिक्री तो नहीं रहने देती ...मगर कुछ पल के लिए ही सही आनंददायक पल लौटा लाती है ...और बच्चे तो महाखुश ...नानी , मामा -मामी और उनके बच्चों के साथ मस्त ...विवाहिता बेटियों के लिए शादी के बाद मायके में टिकना एक तनी हुई रस्सी पर संभल कर चलने जैसा ही होता है ...माँ के लिए यह मानना आसान नहीं होता कि हमउम्र होने के कारण बेटियां और बहुएं वैचारिक धरातल पर एक जैसी ही होंगी ...वही भाभियों के मन में एक पूर्वाग्रह कि बेटी तो मां का ही पक्ष लेगी ...दोनों के बीच संतुलन बनाने का शउर जिसने सीख लिया वही इन छुट्टियों को मजे से बिता सकता है .......

बेटियों के लिए उनकी पसंद की ड्रेस के लिए रंग चुनती मां बहुओं के सलवार कमीज ,गाउन आदि पहनने पर मन ही मन भुनभुनाती है तो मैं मुस्कुराये बिना नहीं रहती ...कह देती हूँ ...

" क्या हुआ , हम भी तो ये सब पहनते हैं अपने घर में "...

"तुम्हारी बात और है ...तुम सास के साथ थोड़े ना रहती हो ...उनके सामने तो सर ढकती हो , घूँघट भी ..."

" हाँ मां , वो इसलिए कि ससुराल में पर्दा प्रथा की जानकारी होने के बाद भी आप लोगों ने अपनी मर्जी से रिश्ता किया था ...और मैं सोचती हूँ कि कोई भी घर अपनी परम्पराएँ एकदम से नहीं छोड़ सकता , अब तो वहां भी इतना नहीं रहा ...सिर्फ अपनी पसंद के कपडे पहन सके इसलिए सास के साथ नहीं रहना चाहिए क्या ..."मुझे हंसी आती है ...

" तो मैं कहाँ मना करती हूँ ...सब तो पहनती हैं ये ..और कहाँ सर ढकती हैं ...घूंघट तो कभी भी नहीं निकाला ..."माँ शांत हो जाती हैं ...

पूरी उम्र लगर कर संवारी गृहस्थी की डोर छूटने पर खालीपन महसूस करती सास और घर को अपने तरीके से चलाने के लिए अतिउत्साहित बहू के बीच परिवार के बाकी सदस्यों को संतुलन बना कर चलना होता है ......कौन इनके बीच में पड़े (मुस्कुराहट ).... सास बहूओं की नोक- झोंक कब एक दूसरे के लिए फिक्र में बदल जाती है , पता ही नहीं चलता ...दो दिन के लिए सासू माँ अगर शहर से बाहर हो तो घर और बच्चों को संभालती आंसू बहाती जल्दी वापस घर लौटने का आग्रह करती बहू और बहू की जरा सी तकलीफ और पोते -पोतियों की चिंता में घुलती हाय तौबा मचाती दौड़ती भागती इस सास को देखना मुझे बहुत मनोरंजक लगता है ...

शाम को छत पर लाईन से बिस्तर में अटे देर रात तक माँ से बतियाते , भाई भतीजे भतीजियों के साथ अन्ताक्षरी खेलते , बचपन के दिन याद करते और हंसी ठहाके सुनकर शहरी पडोसी (एयर कंडीशन के बीच सिर्फ धीमी फुसफुसाती आवाज़ों के साथ अपनी शहरी औपचारिकता बनाये रखने वाले ) रश्क तो करते होंगे ...

माँ के घर पर नहीं होने पर बचपन में चोटी पकड़ कर रसोई में अपना मनपसंद हलुवा बनवाने वाला भाई बिहार से फोन पर छेड़ते हुए कह रहा है " जर्दा आम की पेटी भेजी है ...अपने बिन्द के लिए भी ले जाना ...कभी देखे नहीं होंगे पेड से टूटे ताज़ा आम ..." और शिकायत भी " बड़ी हा- हा, ही - ही हो रही है ...करो, खूब मजे करो "

कौन सा रंग नहीं होता इन रिश्तों में ...रूठना , मनाना , गरियाना , पुचकारना ....मुझे कई बार कमेंट्स के तौर पर कही गयी गिरिजेश जी की बात याद आती है ..." परिवार टूटेंगे ..." " विवाह संस्था समाप्त की जानी चाहिए ..."
क्या सचमुच ...
परिवार
के सुख के पीछे छोटे छोटे दुखों को नजरअंदाज करते हम क्या सिर्फ आत्ममुग्धता के ही शिकार है ...
भावनाओं
के धोगों से कच्चे पक्के धागों से बांधे खट्टे मीठे रिश्ते आत्ममुग्ध होने के सिवा कुछ नहीं है ....!!




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गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

ग्रीटिंग कार्ड का टुकडा .........

कल जब यूँ ही पढने के लिए बुक सेल्फ से एक किताब निकाली तो उसके बीच से एक पुराने ग्रीटिंग कार्ड का एक हिस्सा निकाल आया ...याद आया ..ये ग्रीटिंग कार्ड का फटा तुडा मुड़ा सा टुकड़ा तीन चार साल पहले बेटी को उसके कोचिंग सेंटर के बाहर पड़ा मिला था ....अपनी कोमल भावना के वशीभूत होकर वह इसे घर उठा लाई ...इस तुड़े मुड़े कागज को देख कर मैं उसपर नाराज ही होती ....वर्षों से यत्न से संभाले मेरे कार्ड्स पर अपनी चित्रकला का सजीव प्रयोग कर उनकी दुर्गति करने वाली मेरी बेटी को इसमें ऐसे क्या ख़ास दिखा कि वह सड़क के बीच से इसे उठा लाई ....इसकी लिखावट को पढ़ा गौर से ...इसकी भाषा बता रही थी कि यह किसी सास ने अपने बहू को उसकी सफलता की बधाई देने के लिए लिखा था ...


इसका मजमून इस प्रकार है ...

Dear ??? {beta}

God bless you ,
I really fall in love with you , because you are so caring and sincere that I always dream t for my daughter in law . God give you lots which you imagine in in your dreams. I will never tolerate you to be sad always cheerful with your simplicity and love ...

your Maa & Papa


मैं उस सास की भावना पढ़ कर गदगद हो गयी ....हमारे समाज में जहाँ अमूमन सास बहू का रिश्ता अत्यंत ही तनावपूर्ण होता है ...वहां एक सास की अपनी बहू के प्रति इतनी ममता .... मुझे उस बहू पर बहुत गुस्सा आया जिसने अपनी सास के इतने प्यार से लिखे गए शुभकामना सन्देश को कचरे के ढेर के हवाले कर दिया .... और खुद पर थोडा सा गर्व भी हुआ ...कि मेरे बच्चों में इन रिश्तों के प्रति कितनी संवेदनशीलता है कि वह इस कागज के टुकड़े को अनदेखा नहीं कर पायी और इन बच्चों ने अपनी माँ से यह सब एकल परिवार में रहते हुए सीखा है ....थोड़ी हैरानी भी कि जो भावना एक 14 साल की बच्ची को इतना भावविभोर कर गयी ...वह एक परिपक्व युवती को अपने मोहपाश में क्यों नहीं बाँध पायी ...सास कितनी उमंग से अपने बेटे के लिए बहू चुनती है , या फिर बेटे की पसंद को ही बहू के रूप में अपनाती है ....फिर धीरे धीरे इन रिश्तों में ऐसा क्या हो जाता है जो उनके बीच स्नेह और अपनापन चुकता जाता है ...क्या सिर्फ इसीलिए कि एक ही व्यक्ति से दो जनों की भावनाए इतनी ज्यादा जुडी होती हैं जो उनके बीच में दरार का कारण बन जाती है ...अपने रिश्ते का अधिकार जताते हुए दोनों ही पक्ष में एक दूसरे के प्रति कटु भावना तीव्र हो जाती है ...दोनों पक्ष की जरा सी समझदारी और केंद्र में अवस्थित व्यक्ति की तटस्थता दोनों के मध्य टकराव को दूर करते हुए इस रिश्ते की गरिमा और उनके प्रेम को बनाये रखने में मदद कर सकता है ....

बहुत पहले किसी पत्रिका में कहानी पढ़ी थी ...सास बहू के रोज के झगड़ों से तंग आकर एक बेटा कुछ दिनों के लिए घर छोड़ कर चला गया ....ट्रेन की पटरी के पास किसी लाश का अनुमान कर दोनों सास बहुएं एक दूसरी की गोद में सर रखकर छाती पीटती विलाप करती रही ....और एक दूसरे का संबल बनती बड़े प्रेम के साथ विपत्ति के दिन साथ बिताने लगी ...जब कुछ दिनों बात बेटा वापस लौट कर आया तो चुपके से उन दोनों का प्रेम देखकर उलटे पाँव लौट गया ...इस भावना के साथ कि यदि वह वापस आ गया तो इनका नेह बंधन फिर से विकृत हो जाएगा ....

अजब गजब है यह रिश्तो की माया नगरी ....!!




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