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शनिवार, 19 जनवरी 2019

उल्टा स्वस्तिक भी शुभ की कामना से...अजब गजब मान्यताएं


         
नहर के गणेशजी, जयपुर

हिंदू धार्मिक परंपरा में स्वस्तिक चिंह बहुत महत्व रखता है. गणेश पुराण के अनुसार स्वस्तिक गणेश का ही एक रूप माना जाता है इसलिए किसी भी भी प्रकार की पूजा (दैनिक या विशेष) में शुभ की कामना और प्रार्थना के साथ स्वस्तिक चिंह अंकित किया जाता रहा है. वहीं स्वस्तिक कि सीधा अंकन भी आवश्यक माना जाता है.  उल्टा या आड़ा टेढ़ा स्वस्तिक दुर्भाग्य या विपदा आमंत्रण  का प्रतीक माना जाता रहा है.
 
            आम मान्यता से उलट उल्टा स्वस्तिक

मगर जब जयपुर के  ' नहर के गणेश' में दीवार पर बड़ी संख्या में उल्टे स्वस्तिक अंकित देखे तो बहुत अजीब लगा. जिज्ञासा हुई कि आखिर  इतने लोग गलती कैसे कर सकते हैं. क्या किसी ने टोका नहीं होगा!!
पड़ताल में सामने आई यह जानकारी कि यहाँ लोग जानबूझ कर उल्टा स्वस्तिक बनाते हैं. किसी कार्य के पूर्ण होने की मान्यता लेकर उल्टा स्वस्तिक बनाते हैं और जब वह कार्य पूर्ण हो जाये तब वही व्यक्ति वापस आकर सीधा स्वस्तिक बनाता है. विशेष रूप से अविवाहित युवक/युवती विवाह की मन्नत कर उल्टा स्वस्तिक बनाते हैं और विवाह के पश्चात जोड़े सहित सीधा स्वस्तिक अंकित कर आभार प्रकट करते हैं.

बताया जाता है कि तांत्रिक क्रियाओं से प्राप्त भस्म से बनाई गई यह गणेश प्रतिमा लगभग 177 वर्ष पूर्व दक्षिणाभिमुख स्थापित की गई थी. इस गणेश प्रतिमा की सूंड का दाहिनी तरफ होना भी  इसकी एक विशेषता है.

जब गूगल पर उल्टे स्वस्तिक के बारे में खोज खबर ली तो मध्यप्रदेश के महेश्वर में लगभग 900 वर्ष पूर्व स्थापित गोबर के गणेश जी के यहाँ भी मन्नत माँगते समय उल्टा स्वस्तिक बनाने की प्रथा की जानकारी प्राप्त हुई....

लगभग सभी गणेश मंदिरों अथवा हनुमान मंदिरों में सिंदूर के रंग में  पुती विशेष दीवार होती है ताकि स्थान- स्थान पर सिंदूर लगाकर मंदिर का स्वरूप न बिगाड़ा जाये मगर अनुशासन तो हम भारतीयों के संस्कार में ही नहीं है. मंदिर प्रशासन के सतर्क करते आदेशों/प्रार्थनाओं पर भक्तों की विशेष श्रद्धा हमेशा ही  भारी पड़ती है.

शनिवार, 22 सितंबर 2018

देख तेरे संसार की हालत .....


कल एक शोक सभा से लौटते हरियाणा के एक कथित बाबा (जो फिलहाल जेल में हैं) की शिष्या टकरा गईं. अपनी सखी को बाय/विदा/खुदा हाफिज़/राम राम/राधे राधे की बजाये सत् और जाने क्या बुदबुदाई. 
इसी ने मुझे चौंकाया. मैंने पूछा अभी तुमने अभी क्या कहा . 
वह फिर बुदबुदाई . मुझे फिर भी समझ नहीं आया तो विस्तार से बताने लगी. 
हम फलाने गुरू की शिष्या हैं तो यही कहते हैं.  हमारे गुरू की बातें सुनो आप. हम किसी भी भगवान को नहीं मानते, पूजा पाठ नहीं करते. अभी वहाँ पंडित जी जब श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी का नाम स्मरण करा रहे थे तब मैं अपनी माला जप रही थी. वो अपने परीचित हैं वरना ऐसे स्थान पर हमको इजाजत ही नहीं है बैठने की.
 वो कह रहे थे व्रत करने को मगर शास्त्रों में गीता, बाईबिल, कुरान किसी में किसी में भी व्रत करने की, पूजा पाठ के लिए मना किया है. ये सब तो पंडितों का किया धरा है.

मैंने पूछा-  अच्छा!!! चलो हिंदुओं का तो मान लिया तुम्हारे अनुसार पंडितों ने बेड़ा गर्क किया है. मगर बौद्ध, ईसाई, मुस्लिम समुदाय तक भी थी पंडितों की पहुँच??

हमारे लिए हिंदू, मुस्लिम, ईसाई कुछ नहीं. सब एक प्रभु की संतान हैं. (बस पंडित ही उस प्रभु की संतान नहीं है, मैंने सोचा ).
ब्रह्मा/विष्णु/महेश सबका जन्म हुआ है. ईश्वर थो अजन्मा होता है.

हें... उनका जन्म हुआ था. यह तो मैंने पहली बार सुना किसी से. फिर भी चलो यह बताओ कि फिर तुम्हारी पूजा विधि क्या है, कैसे स्मरण करती हो ईश्वर को.

हम बस माला फेरते हैं गुरु का नाम लेते हैं. बीच में कबीर का भी नाम लिया .

मगर कबीर ने तो जन्म लिया था न...!

नहीं. वे सशरीर प्रकट हुए थे. आप अपना वाट्स नंबर दो. मैं सब भेजूँगी आपको .

देखो...मुझे यह सब जानने में रूचि नहीं है. हम लोग ऐसे किसी बाबा को नहींं मानते.

मैं भी नहींं मानती थी . मैंने सबको सुना . मुरारी बापू, आशाराम, राम रहीम मगर जब इनको सुना तो  बस इनकी बातें सच्ची लगी. ये  गुरू ही सच्चे हैं. सत् हैं. कोई बात नहीं. सब उस परमात्मा की संतान हैं.

 (कितने रहस्य की परतें खुलनी बाकी हैंअभी , मैं मन में सोच रही थी 😂. हमसे तो जो हमारा ज्ञान है वही सँभल नहीं रहा . अतिरिक्त ज्ञान का क्या करेंगे. हमें माफ करो देवी)

जब प्रश्नकर्ता के किसी प्रश्न  का जवाब तुम्हें नहीं पता तो उसे (कंफ्यूज) भ्रमित कर दो और फिर भी नहीं उलझे तो नंबर माँग लो, जबरदस्त प्रशिक्षण ( ट्रेनिंग ) हैं.

प्रकट में मैंने कहा  - तुम्हारा आध्यात्मिक ज्ञान देखकर लग रहा शायद तुम प्रवचन करने भी जाती हो.

नहीं, हम क्यों जायेंगे प्रवचन करने. हम गृहस्थ हैं. मैं मैरिड हूँ पर हमको लिपस्टिक , नेलपेंट लगाना अलाउड नहीं है.

मैंने उसके चेहरे की ओर देखा.  अच्छा! बिंदी लगाना भी नहीं होगा!

नहीं! उसकी मनाही नहीं है. अपनी मर्जी पर है.

अच्छा! क्यों मना है लिपस्टिक /नेलपेंट आदि.

छोड़िये. बहुत डिटेल में बताना पड़ेगा. आप अपना वाट्सएप नंबर दीजिए सब बता दूँगी.

वैसे सुना है उन बाबा के बारे में अभी जेल में हैं.

 वे सब आरोपों से बरी होंगे.

एक अच्छी खासी पढ़ी लिखी, अपना व्यवसाय करने वाली कन्या की यह भक्ति अचंभित से ज्यादा भयभीत कर रही थी मुझे.
सबसे ज्यादा परेशान करनी वाली बात थी किसी भी प्रश्न
पर जवाब देते समय और उसकी बातों से असहमति जताने पर उसकी बॉडी लैंग्वेज, उसका उत्तेजित होना .

जाने ये तथाकथित बाबा लोग क्या विद्या जानते हैं!!!

सोमवार, 30 अप्रैल 2018

चटनी जितनी लीद.....

कुछ समय पूर्व वृंदावन से पधारे कथा वाचक से राम कथा को सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ . गृह कार्यों से फारिग होकर लगातार सुन पाना संभव भी नहीं इसलिए बीच के कुछ समय का लाभ लेकर ही उत्साहित अथवा कृतज्ञ समझ लिया जाए।पूर्ण समय न दे पाने का सिर्फ यही कारण है ,ऐसा भी नहीं कहा जा सकता।

रामचरितमानस का पाठन कई बार किया है और इनसे सम्बंधित कथा कहानियों का वाचन श्रवण एवं मंचन लाभ भी लिया है  सो मन में यह भावना भी रहती है कि  आखिर इस बार नया क्या सुनने को मिलेगा। सब तो पता है। कथा की श्रोता होते हुए भी यह विचार मन में चल रहा था मंच से स्वामी जी ने शिव शंकर पार्वती का वह प्रसंग सुना दिया जिसमें शिवजी काकभुसुंडि से राम कथा का श्रवण कर रहे मगर पार्वती सोच रही कि मुझे तो सब पता है यह क्या सुनाने वाले हैं। सीता का वेश धर  राम की परिक्षा लेने वाले इस वृतांत  में अंततः सती  को भान होता है कि सब ज्ञात होकर भी बहुत कुछ अज्ञात है।
जीवन के इस सत्य का प्रत्येक व्यक्ति को कई बार भान होता है कि ज्ञात में बहुत कुछ अज्ञात है पर अहम यह मानने नहीं देता ...एक ही जीवन में जाने कितना कुछ जानने को बाकी रह जाता है ...
  खैर,  उनके कथा वाचन में उनके ज्ञान पर टिप्पणी  न करते हुए बताते चलूँ कि स्वामी जी और उनके साथी रामकथा तथा अन्य भजन बहुत सुर में सुनाते हैं इसलिए आनंद रस भरपूर प्राप्त हुआ... उनके भजन  में फ़िल्मी टोन  नहीं बल्कि भरपूर शास्त्रीयता है जो हमारे जैसे श्रोता को बांधे रखती है। कथावाचक रामकथा के बीच-बीच में आज के समयानुसार कई रोचक दृष्टांत , कथाएं भी सुनाते हैं जिससे वाचन की रोचकता बनी  रहे।
ऐसी ही एक छोटी सी रोचक कथा साझा करने योग्य  है...

एक अभिमानी राजा मद में भरा हाथी पर नगर भ्रमण को निकला। तभी रास्ते से गुजर रहे एक साधू ने दानी जानकार  राजा से दान प्राप्त करने के लिए अपना वस्त्र आगे फैला दिया।    अभिमान में भरे उस चिड़चिड़े राजा ने इधर -उधर देखा  . तभी उसकी नजर हाथी द्वारा तुरंत की गई लीद पर गई।  उसने  अपने सैनिक को आदेश दिया कि वह लीद  उठा कर साधु की झोली में डाल  दे। राजा जब भ्रमण कर महल पहुंचा  और भोजन करने बैठा तो जैसे ही ग्रास उठता सुस्वादु व्यंजनों की भरी थाली में उसे लीद  ही लीद दिख पड़ी। कई ग्रास छोड़े ,कई  थालियां बदलीं मगर प्रत्येक ग्रास में वही लीद  नजर आये। भूख से बेचैन राजा की तकलीफ देख कर राज ज्योतिषी को बुलाया गया। उसने राजा द्वारा लीद का दान करने की घटना का प्रभाव बताया।
अब इसका क्या उपाय किया जाए। सोचते हुए ज्योतिषी ने सुझाया कि  राजा स्वयं ऐसे कार्य करे जिससे उसकी सर्वत्र निंदा हो ताकि राजा की जितनी अधिक निंदा होगी उसके पाप निंदा करने वाले के हिस्से में स्थानांतरित हो जाएंगे क्योंकि जो व्यक्ति किसी की निंदा करता है वह उसके पाप को स्वयं ढ़ोता  है। अपनी करनी से स्वयं अपनी निंदा कौन सुनना चाहता है मगर कोई उपाय न देख राजा ने मुनादी करवाई कि सभी नागरिक राजा की खूब  बुराई करें. प्रजा को अच्छा अवसर प्राप्त हुआ। जिसको देखो जी खोलकर राजा की निंदा करता नजर आता। धीरे -धीरे राजा की थाली से लीद कम होती जाती थी मगर फिर भी भोजन में चटनी जितनी लीद थाली में बनी ही रहती। राजा ने फिर बुलाया ज्योतिषी को...ज्योतिषी ने  बताया कि राजन आपके राज्य में सिर्फ एक व्यक्ति है जो किसी  की निंदा नहीं करता और आपकी थाली में बची हुई लीद  का कारण भी वही है। राजा ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी कि  वह व्यक्ति उसकी बुराई करें मगर निंदा करना उसका स्वाभाव ही नहीं था। थक हार कर राजा ने सामान्य नागरिक का वेश बनाया और उस व्यक्ति के पास पहुँच कर अपनी खूब बुराई करता रहा मगर उस व्यक्ति के मुंह से एक भी शब्द निंदा का नहीं कहलवा पाया। राजा के लगातार प्रयास को देख वह व्यक्ति हँस पड़ा  क्योंकि वह राजा को पहचान गया था  . उसने कहा कि राजन आप कितनी भी प्रयत्न करें मगर मेरी जुबान से आपकी निंदा नहीं निकलेगी  . चटनी भर ही सही लीद तो आपको खानी  ही पड़ेगी। अब राजा की समझ में आ गया था कि वचन और कर्म में सावधानी  प्रारम्भ से ही अपेक्षित है.  जब हम किसी की निंदा कर रहे होते हैं तब उसके पाप का भाग अपने ऊपर लाद  रहे होते हैं और जब निंदा झूठी हो तब तो उसके भार का कहना ही क्या  ....

कहते हैं न भाव सिर्फ कहानी सुनने तक ही जगते हैं फिर से वही वास्तविकता...मगर सुनने में आनंद मिला तो लिख कर बाँटना अच्छा लगा. हम न सही, किसी एक का भी जीवन बदल जाये तो लाभ ही होगा और नुकसान तो कुछ भी नहीं.
     

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

राजस्थान में अक्षय तृतीया ....धर्म और परंपरा

आज अक्षय तृतीया है. पुराणों और शास्त्रों के मतानुसार इस दिन का धार्मिक महत्व यह है कि इस दिन से सतयुग का अत आरम्भ एवं द्वापर का अंत अर्थात त्रेता युग का प्रारम्भ हुआ था . भगवान विष्णु के 24 अवतारों में भगवान परशुराम, नर-नारायण एवं हयग्रीव आदि तीन अवतार अक्षय तृतीया के दिन ही इस धरती पर अवतरित हुए . हिन्दुओं के महातीर्थ स्थल माने जाने वाले  बद्रीनारायण धाम के पट भी अक्षय तृतीया को खुलते हैं।
इसके अतिरिक्त वृंदावन के बांके बिहारी के चरण दर्शन भी केवल अक्षय तृतीया को होते हैं।

अक्षय तृतीया (अखातीज) को अनंत-अक्षय-अक्षुण्ण फलदायक कहा जाता है। जो कभी क्षय नहीं होती उसे अक्षय कहते हैं। इस दिन किया जाने वाला कार्य अनन्त फल देता अक्षय तृतीया (अखातीज) को अनंत-अक्षय-अक्षुण्ण फलदायक कहा जाता है। जो कभी क्षय नहीं होती उसे अक्षय कहते हैं।
इस दिन बिना पंचांग देखे कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है, क्योंकि शास्त्रों के अनुसार इस दिन स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना गया है। समस्त शुभ कार्यों के अलावा प्रमुख रूप से शादी, स्वर्ण खरीदने, नया सामान, गृह प्रवेश, पदभार ग्रहण, वाहन क्रय, भूमि पूजन तथा नया व्यापार प्रारंभ कर सकते हैं। इस दिन किया जाने वाला दान भी अक्षय माना जाता है . लोग जल से भरे मटके , पंखे , खरबूजा , ककड़ी , आम  आदि फलों का का दान करते हैं. इसी दिन नए अनाज के बीजों का भी रोपण किया किया जाता है .
धर्म के कारण माने अथवा परम्परा में , इस प्रकार किये गए दान का लाभ जनता को मिलता ही .  भीषण ताप में विभिन्न स्थानों पर दान किये गए जल के पात्र और फल आदि राहगीरों/कृषकों /जरुरतमंदों  की भूख प्यास का इतंजाम हो ही जाता  था .
कहते हैं कि इस दिन जिनका परिणय-संस्कार होता है उनका सौभाग्य अखंड रहता है। इसलिए राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में इस दिन बहुत छोटे बच्चों का बड़ी संख्या में विवाह कर दिया जाता था . इतनी अधिक संख्या में ये विवाह संपन्न होते थे कि आखा तीज को बाल विवाह के दिन के रूप में ही जाना जाता था
.धर्म और परंपरा का दैनिक जीवन में इस तरह घुलना मिलना रहा है कि कई बार यह तय करना मुश्किल होता है कि धर्म से परंपरा चली या परम्परा ही धर्म की प्रेरक रही .  यह समय गेहूं , जौ, चना और सरसों की फसल काटने का होता है . भारत कृषिप्रधान देश रहा और यहाँ की बड़ी आबादी की जीविका का साधन भी कृषि ही रहा . कृषकों के कार्यकलाप और सुख दुःख  फसलों के बोने और काटने के समय पर निर्भर होते रहे . इस समय उनके पास अर्थ की व्यवस्था होती और फुर्सत भी इसलिए ग्रामीणों में आखा तीज शुभ मुहूर्त के साथ ही सुविधा का समय भी होता रहा .
इस दिन का आकर्षण हुआ करता था ट्रैक्टर ट्रौली में रंग बिरंगे चमकदार वस्त्र और बन्धेजी अथवा सादे साफे पहने ग्रामीण, चटख लाल पीली चुनरी और पीले में सजी औरतें गीत गाती  दिन भर मेले की तरह गुजरते देखना . हम भाई बहन कभी छत पर तो कभी बाउन्ड्री वाल पर टिके मासूमियत से ये नजारे देखते . हैरान होते रहते कि इतने छोटे बच्चों का विवाह हो रहा है! कई तो बिल्कुल दूधमुँहे से भी माँ की गोद से चिपके होते. हमारा कुतुहल समाप्त ही न होता था कि आखिर इनका विवाह अभी ही क्यों कर रहे!!
अच्छा है कि अब कानून के भय से ही सही , इस प्रकार के विवाह बड़ी संख्या में नहीं होते . मगर चोरी छिपे अभी भी ग्रामीण इलाकों में छोटे बच्चों के विवाह इस प्रकार संपन्न होने की इक्का दुक्का ख़बरें आती रहती हैं
गुड़राब और गेहूँ का खीच/ खिचडा


 ‪#‎अक्षय‬तृतीया जिसे ‪#‎राजस्थान‬ में ‪#‎आखा‬ तीज भी कहते हैं  को विशेष  प्रसादी के भोजन में  बाजरे या  गेहूं का खिचड़ा गुड़राब(आटे को गुड के पानी में पकने तक उबालकर ) और आखी (साबुत ) मंगोड़ी की सब्जी , आखी ही गंवार फली धूणी दी हुई. गंवार फली को उबालकर उसके रेशे निकालकर बर्तन में जलता कोयला रख उसपर घी डाल कर (जिस भी मसाले की खुशबू उसमें डालनी हो वह भी साथ ही डाल देते हैं , मैं अजवाइन डालती हूँ ) ढक्कन से ढक देते हैं . कोयले के धुंए की भीनी भींनी खुशबू उसमें रच बस जाती है . ( जिन्होंने मास्टर शेफ देखा , वे भी सब्जियों को इस प्रकार सुगन्धित करना जान गए होंगे ).
परंपरा में अन्य खाद्य पदार्थों के अलावा  पांच बाटियां बनाकर रसोई में ऊपर आले में रख देने का भी रिवाज रहा जो वर्षपर्यन्त वहीँ रखी होती थी .  इसके पीछे भी रसोई/घर में अन्न के अक्षय भंडारण की कामना रही होती होगी .इन सभी परम्पराओं के पीछे नए अनाज का स्वागत  और नई फसल की तैयारी और शुभेच्छा भी रही है .
(एक और रोचक बात भी पता चली कि इस दिन छिपकली का दिखना शुभ होता है. इसका कोई आधार ज्ञात नहीं  ).
बीकानेर में यह दिन पतंग उत्सव का भी  होता है . जहाँ अन्य शहरों में संक्रांति के दिन छतें पतंगों के शोर से गुलजार होती हैं , इस दिन बीकानेर का भी वही आलम होता है .

धन धान्य , सुख शांति की अक्षय कामनाओं के साथ आप सबको भी अक्षय तृतीया की बहुत शुभकामनाएँ !

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

दशहरे की तैयारी रावण मंडी में ....

बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक विजयदशमी पर्व की तैयारी पूरे देश में जोर शोर से चल रही है . रामलीलाओं के मंचन के साथ ही रावण के पुतलों को बनाने और जलाने की तैयारियां अपनी चरम पर है . पहले जहाँ चंदे इकठ्ठा कर कोलोनियों के बड़े और बच्चे बुजुर्गों के निर्देशन में सुखी लकड़ियाँ और रंगीन कागजों से लपेट कर दहन स्थल पर ही रावण का निर्माण करते थे , आजकल कारीगरों ने उनकी इस मेहनत को कम कर दिया है . जेब में पैसे लेकर जाओ और अपनी पसंद का रावण छांट लाओ .

जयपुर के गोपालपूरा बाई पास पर गुजर की थड़ी से लेकर किसान धर्म काँटा तक रावण की मंडी सज गयी है . राजस्थान के जालौर जिले के अतिरिक्त अन्य जिलों से भी कारीगर यहाँ रात दिन रावणों के निर्माण में परिवार सहित जुटे हुए हैं . बांस की खपच्चियों पर लेई की मदद से रंगीन कागज लपेट कर विभिन्न चित्ताकर्षक रावण के साथ ही मेघनाद और कुम्भकरण आदि की छवियाँ तैयार की जाती हैं .



रावण की यह मंडी राह चलते राहगीरों को इतना आकर्षित करती है कि इस मार्ग से गुजारने वाले एक बार रुक कर इसे देखते जरुर हैं , साथ ही अपनी कोलोनियों के सार्वजानिक स्थलों पर रावण दहन की तैयारियों के लिए इनका मोलभाव भी करते हैं . कहा जाता है कि यह एशिया की सबसे बड़ी रावण मंडी है . यहाँ दो से तीन फीट के रावण के साथ ही तेईस फीट तक के रेडीमेड रावण उपलब्ध हैं जिनकी कीमत 150 -200 के साथ 7000 तक है .

सिर तानकर खड़े इन रावणों को देखकर लोंग चुटकी लेने से नहीं चूकते कि दो दिन की और बात है फिर तो तुम्हे खाक में मिलना है , तन ले जितना तनना है अभी ...यही तो मानव जीवन पर भी लागू होता है , लालच , लोभ ,अहंकार में आकंठ डूबे लोंग हर वर्ष रावण की ऐसी दुर्गति देखकर भी अपने जीवन पर दृष्टि नहीं डाल पाते .

हिन्दुओं के धार्मिक ग्रन्थ रामायण/ रामचरितमानस का एक प्रमुख पात्र रावण है . कहा भी जाता है कि रावण ना होता तो रामायण भी नहीं होती . राम का जन्म ही रावण के संहार के उद्देश्य से हुआ था . यहाँ रावण कोई एक व्यक्ति नहीं , बल्कि दुर्गुणों का प्रतीक माना जाता है , परन्तु ऐसे लोगों की कमी भी नहीं जो रावण को असाधारण बुद्धि का ज्ञाता मानते हैं . वाल्मीकि रामायण का हवाला देते हुए रावण को वीर , पराक्रमी , गायनी , ज्योतिष एवं वास्तुकला , नीति व राजनीतिशास्त्र का प्रकांड विद्वान् माना जाता है . वह इंद्रजाल और सम्मोहन विद्या का ज्ञाता भी था . रावण ने राजनैतिक और कुटनीतिक चतुराई दिखाते हुए अपने साम्राज्य की सीमाओं में विस्तार किया . रावण ने शिव तांडव स्तोत्र की रचना करने के अलावा अन्य कई तंत्र ग्रंथों की रचना की. चारों वेदों का ज्ञाता होने के अतिरिक्त रावण संगीत में भी दखल रखता था . वह विना बजाने में कुशल था , साथ ही उसने वायलिन जैसे एक वाद्य यन्त्र का निर्माण भी किया था जिसे रावण हत्था कहा जाता है. रावण पुलस्त्य मुनि के पुत्र विश्र्वश्रवा का पुत्र था , उसकी माता कैकसी दैत्य पुत्री थी , इसलिए ही उसमे विद्वान् ब्राहमण के गुण होने के साथ ही असुर प्रवृति भी थी .

बड़े से बड़े जहाज को डुबोने के लिए एक छिद्र ही काफी है , रावण के पतन के लिए यह उक्ति बिलकुल उपयुक्त साबित होती है . सभी गुणों से संपन्न होने के बावजूद परायी स्त्री के हरण अर्थात उसकी चरित्रहीनता के कारण ही उसका पतन हुआ .
रावण जहाँ दुष्ट था और पापी था वहीं उसमें शिष्टाचार और ऊँचे आदर्श वाली मर्यादायें भी थीं। राम के वियोग में दुःखी सीता से रावण ने कहा है, "हे सीते! यदि तुम मेरे प्रति काम भाव नहीं रखती तो मैं तुझे स्पर्श नहीं कर सकता।" शास्त्रों के अनुसार वन्ध्या, रजस्वला, अकामा आदि स्त्री को स्पर्श करने का निषेध है अतः अपने प्रति अकामा सीता को स्पर्श न करके रावण मर्यादा का ही आचरण करता है।
वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस दोनों ही ग्रंथों में रावण को बहुत महत्त्व दिया गया है। राक्षसी माता और ऋषि पिता की सन्तान होने के कारण सदैव दो परस्पर विरोधी तत्त्व रावण के अन्तःकरण को मथते रहते हैं। (http://bharatdiscovery.org से साभार ).

अहंकार को भयंकर दुर्गुण मानते हुए यह भी प्रचलित है कि अहंकार तो रावण का भी नहीं टिका . कहा भी जाता है कि एक अज्ञानी यदि चरित्रवान है तो उसके अज्ञान को क्षमा किया जा सकता है , क्योंकि वह अच्छे और बुरे का फर्क समझता है , मगर यदि एक विद्वान् इस अंतर को नहीं समझता तो वह स्वयं अपना और अपने कुल का भी नाश करता है . अपने शौर्य और विद्वता के अहंकार और मद में डूबा रावण प्रकृति के संतुलन को समझ नहीं सका और उसके सोने की लंका का सर्वनाश हुआ .


बुधवार, 28 सितंबर 2011

श्री घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग शिवालय , शिवाड (राजस्थान)


श्री घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग
शिवालय , शिवाड (राजस्थान)

पिछले दिनों जयपुर लगभग 98 किलोमीटर दूर द्वादशवे ज्योतिर्लिंग श्री घुश्मेश्वर जाना हुआ . भव्य साज सज्जा से युक्त यह मंदिर भक्ति भाव युक्त दर्शनार्थियों के अलावा पर्यटन स्थल के रूप में भी विकसित हो रहा है .
दरअसल महाराष्ट्र के मनमाड के वेरुल स्थित ग्राम में विराजित ज्योतिर्लिंग को भी द्वादशवे ज्योतिर्लिंग ही माना जाता रहा है , मगर शिवाड स्थित मंदिर के शिलालेखों और प्राप्त ऐतिहासिक और धार्मिक दस्तावेजों से इस स्थान की द्वादाश्वे ज्योतिर्लिंग के रूप में मान्यता स्थापित होती है .

द्वादशवे ज्योतिर्लिंग श्री घुश्मेश्वर राजस्थान के शिवालय (शिवाड ) ग्राम में विराजमान है . यह ज्योतिर्लिंग स्वयम्भू है अर्थात यह किसी के द्वारा निर्मित नहीं किया गया , अपितु स्वयं उत्पन्न है . पुरातनकाल में इस स्थान का नाम शिवालय था जो अपभ्रंश होता हुआ , शिवाल से शिवाड नाम से जाना जाने लगाशिवाड स्थित ज्योतिर्लिंग मंदिर के दक्षिण में भी तीन श्रृंगों वाला धवल पाषणों का प्राचीन पर्वत है, जिसे देवगिरी के नाम से जाना जाता है . यह महाशिवरात्रि पर एक पल के लिए सुवर्णमय हो जाता है जिसकी पुष्टि बंजारे की कथा में होती है कि जिसने देवगिरी से मिले स्वर्ण प्रसास से ज्योतिर्लिंग की प्राचीरें एवं ऋण मुक्तेश्वर मंदिर का निर्माण प्राचीन काल में करवाया . १८३७ में ग्राम शिवाड स्थित सरोवर की खुदाई करवाने पर दो हजार शिवलिंग मिले जो इसके शिवलिंगों के आलय होने की पुष्टि करता है . मंदिर के परंपरागत पराशर ब्राह्मण पुजारियों का गोत्र भी शिवालय है .

कई विद्वान् , धर्माचार्य , पुरातत्वविद, शोधार्थी आदि इस स्थान की यात्रा कर इसे वास्तविक घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग होने की पुष्टि कर चुके हैं .

शिव पुराण कोटि रूद्र संहिता के अनुसार भक्तिमयी घुश्मा के पुत्र को उसकी बहन ने सौतिया डाह के कारण टुकड़े -टुकड़े करके उसी सरोवर में फेंक दिया था ,जिसमे घुश्मा प्रतिदिन एक सौ एक पार्थिव शिवलिंगों की पूजा कर विसर्जित करती थी . घुश्मा की अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर आशुतोष शिव ने उसके मृत पुत्र को जीवित कर दिया तथा घुश्मेश्वर नाम से इस स्थान पर अवतरित हुए .

ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बाद किशना एवं जानकी के पाषाण स्तंभों की परिक्रमा आवश्यक मानी जाती है . कहा जाता है कि शिवाल ग्राम के किशन खाती की गाय जंगल में ज्योतिर्लिंग पर खड़ी होती तो उसके दूध की धरा स्वतः बह ज़ाती थी. किशना ने गाय का पीछा कर यह प्रत्यक्ष देखा तो अज्ञानतावश शिवलिंग पर कुठार प्रहार किया , जिससे खून का फव्वारा फूट पड़ा . किशना भय के मारे कुछ दूर भागा तो पाषाण का हो गया . गाय किशना की पत्नी जानको को घटनास्थल पर लेकर आई . जानकी ने प्रभु से प्रार्थना की तो भगवान् ने किशना को पुनः शरीर देकर जानकी को आशीर्वाद दिया कि उसकी पूजा करने के बाद किशना जानकी की परिक्रमा अवश्य होगी .

११२१ में मंडावर के राजा शिववीर चौहान ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया तथा अखंड ज्योति एवं शिवरात्रि जागरण एवं मेला आरंभ किया जो आज तक निर्बाध रूप से जारी है .


इस स्थान की विशेषता है कि अधिकांश समय यहाँ ज्योतिर्लिंग जलहरी में जलमग्न रहता है. जलहरी का जल चमत्कारी माना जाता है. कहा जाता है कि पारे के सेवन से उत्पन्न डाह एवं सफ़ेद दाग इस जल के सेवन से प्रायः नष्ट हो जाते हैं . भारत वर्ष के कोने- कोने से यात्री अपनी वेदना , आशाओं को संजोये हुए इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने आते हैं .


किसी विशेष परिस्थिति में इसके जल स्तर के गिरने को किसी संकट के आगमन की पूर्व सूचना माना जाता है .
शिवाडस्थ ज्योतिर्लिंग के दक्षिण में स्थित देवगिरी पर्वत में ऊँचाई पर एक शक्तिपीठ स्थापित है , जो इस स्थान के प्राचीन होने का पुख्ता प्रमाण है . प्राचीन ग्रन्थ श्री घुश्मेश्वर महात्म्य के अनुसार प्राचीनकाल में ज्योतिर्लिंग क्षेत्र शिवालय में एक योजन विस्तार में चारों दिशाओं में चार द्वार थे जिनका नाम पूर्व में सर्प द्वार , पश्चिम में नाट्यशाला द्वार तथा उत्तर में वृषभ द्वार व दक्षिण में ईश्वरद्वार था तथा पश्चिमोत्तर में सुरसरि सरोवर था .
वर्तमान में ग्राम शिवाड स्थित ज्योतिर्लिंग क्षेत्र के चारों ओर पुरोक्त चारों द्वारों के प्रतिक चार गाँव हैं जो सारसोप (सर्व सर्प्द्वर ), नत्वादा (नाट्यशाला द्वार ), बहड़ (वृषम द्वार ), ईसरदा (ईश्वर द्वार ) के नाम से जाने जाते हैं . पश्चिमोत्तर में सिरस गाँव सुरसरि सरोवर के स्थान पर बसा हुआ है .

वाशिष्ठी नदी के किनारे बिल्व पत्रों एवं मंदार के वन ...

घुश्मेश्वर महात्म्य ग्रन्थ के अनुसार ज्योतिर्लिंग के शिवालय क्षेत्र में वाशिष्ठी नदी बहती थी , जिसके किनारे मंदारवन(आकड़ों का वन ) तथा बिल्वपत्रों के वन थे जिनसे घुश्मेश्वर की नित्य पूजा की जाती थी .
ग्राम शिवाड स्थित ज्योतिर्लिंग क्षेत्र के पास बनास नदी बहती है जो पूर्वकाल की वाशिष्ठी नदी ही है तथा इसके किनारे बिल्वपत्रों का वन आज भी विरल रूप में स्थित है . मंदार वन के स्थान पर मंडावर ग्राम है जहाँ आकडे (मंदार ) बहुतायत में उत्पन्न होते हैं .

मुहूर्त मार्तंड ज्योतिष ग्रन्थ के अनुसार ग्रन्थ में प्रसिद्ध ज्योतिष ग्रन्थ के रचनाकार पंडित नारायण ने ग्रन्थ के संक्रांति प्रकरण के अंत में निम्न प्रकार अपने वंश , जनक , जन्मस्थान का उल्लेख किया है ---

" जिन्होंने विष्णु के चरणों में अपनी आत्मा को अर्पित किया है , ऐसे विष्णु चरणों से पवित्र कौशिक वंश में द्विजश्रेष्ठ श्री हरि, जिनसे शम , दम , तप , अध्ययन , जितेन्द्रियता , उदारता आदि गुणों से अलंकृत ब्राहमणों से पूजित अनंत नाम द्विज श्रेष्ट उत्पन्न हुए , उनके पुत्र नारायण ने मुहूर्तों के भण्डार इस मुहूर्तमार्तंड ग्रन्थ की रचना की जो पुराण प्रसिद्ध देवगिरी पर्वत के पास उत्तर में स्थित शिवालय सरोवर के उत्तर की ओर स्थित टापर ग्राम में रहता है .
ग्राम तापर , शिवाड स्थित ज्योतिर्लिंग के उत्तर में यथास्थान स्थित है तथा अनेक महान विभूतियों की जन्मभूमि और कर्मभूमि रहा है .

विक्रम संवत १०८१ (वर्ष 1023) में महमूद गजनवी के सिपहसालार मसूद द्वारा इस स्थान का विध्वंस किया गया . इस मंदिर के प्रांगन में मिले प्रस्तर खंड , मूर्तियाँ आदि अवशेष सातवीं शताब्दी के आसपास निर्मित मंदिरों की शैली के हैं , हरा -नीलापन लिए इन बलुआ पत्थरों पर भी युगल देव मूर्तियाँ उत्कीर्ण है .

मंदिर का वास्तुशिल्प पाणिनी के अष्टांगिक योग पर आधारित है . इस शिल्पकला में समाधि प्रिय शिव का सानिध्य योग बल से ही संभव मान कर निर्माण किया जाता है . इस मंदिर में यम एवं नियम की पांच- पांच सोपान (सीढियाँ ), नंदी (आसन ), पवनपुत्र (प्राणायाम ), कछुआ (प्रत्याहार ), गणेश (धारणा ), माता पार्वती (ध्यान ), भगवान् शंकर (समाधिस्थ ) विराजमान है जो कि अष्टांगिक योग पर आधारित वास्तुकला की पुष्टि करते हैं . १९९८ में खुदाई पर मिली कश्यपावतार की समुद्र मंथन मूर्ति अष्टांगिक योग में प्रत्याहार का प्रतिनिधित्व करती है .

सवाई माधोपुर होकर जयपुर आने वाली रेलवे लाईन पर ईसरदा स्टेशन से उतरकर बस या तांगे द्वारा शिवाड पहुंचा जा सकता है .


बुधवार, 4 मई 2011

जन आस्था का केंद्र ..."बूटाटी"





स्वास्थ्य के क्षेत्र में विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है ...देश में बुजुर्गों की बढती संख्या और औसत आयु इसे प्रमाणित भी करती है ...आज चिकित्सकों के पास अधिकांश बिमारियों का इलाज़ है और नित नए अनुसन्धान और शोध प्रत्येक बीमारी को जड़ से समाप्त करने के लिए उपचार की विधि की तलाश में संलग्न है ..इतना सब कुछ होने पर भी बहुत कुछ ऐसा है जो चिकित्सा विज्ञान की सीमा से परे है ...प्रकृति के रहस्यों को पूरी तरह जानने में अभी भी विज्ञान असमर्थ है...जब भरपूर इलाज़ लेने के बाद भी कोई व्यक्ति पूर्णतया स्वस्थ नहीं हो पाता है तो वह वैकल्पिक चिकित्सा के अतिरिक्त कई टोटकों को भी अपनाने लगता है ...जहाँ विज्ञान की सीमा समाप्त होती है , वही से श्रद्धा और अंधविश्वास का प्रारम्भ होता है ...उदाहरण के रूप में नजर लगना जैसी किसी बीमारी को हममे से अधिकांश लोंग मजाक में हँस कर उड़ा देते हैं , मगर वही जब अपना कोई परिचित भरपूर इलाज़ के बाद भी ठीक ना हो रहा हो , या बिना किसी कारण सुस्त , उखड़ा या उदास हो तो हम झट नजर उतारने के हथियार इस्तेमाल करते हैं ..

पक्षाघात /लकवा के रोगियों को भी चिकित्सकों के इलाज के बाद श्रद्धा नागौर के बूटाटी ग्राम में खींच लाती है ...अभी पिछले दिनों एक रिश्तेदार अचानक ब्रेन हैमरेज का शिकार होकर लम्बे समय तक कोमा में रही ...कोमा की स्थिति से बाहर आने तक उनके पूरे आधे शरीर पर पक्षाघात का असर हो चुका था ...पिछले कई महीनों से वे ना सिर्फ चलने- फिरने में असमर्थ हैं , अपितु करवट बदलने तक के लिए भी उन्हें मदद की आवश्यकता होती है ... चिकित्सा के दौरान ही उन्हें किसी ने राजस्थान के नागौर जिले के बूटाटी ग्राम के बारे में बताया ..आखिरी उम्मीद के रूप में किसी प्रकार हिम्मत जुटा कर परिजन उन्हें लम्बी दूरी तय करते हुए आंध्र प्रदेश से राजस्थान लेकर आये ...तीन दिन की परिक्रमा के बाद उनकी दशा में इतना सुधार हुआ कि कई महीनों से से लघु शंका के लिए लगी नलियाँ हटा दी गयी ...चार पांच दिन में वे बिना सहारे 3-4 कदम भी चली (जैसा की उनके परिजनों ने बताया )..हालाँकि अभी पूरी तरह बिना सहारे चलना मुमकिन नहीं है , मगर महीनों से सिर्फ बिस्तर पर लेटे मरीज के लिए एक सप्ताह में इतना परिवर्तन भी कम सकारात्मक नहीं है ... बूटाटी धाम के बारे में सुना तो पहले भी कई बार था , और सुनी सुनायी बातों पर यकीन नहीं किया जा सकता मगर इसका प्रत्यक्ष प्रमाण पहली बार देखा ...बताते हैं की लकवा के नब्बे प्रतिशत मरीजों की स्थिति में यहाँ सुधार होते देखा गया है ...

राजस्थान के नागौर जिले में स्थित यह क़स्बा " बूटाटी" पक्षाघात के रोगियों के लिए तीर्थ धाम बन चुका है ... यह मंदिर सिद्ध पुरुष चतुरदास जी महाराज की समाधि है ...लकवा के मरीजों को सात दिन का प्रवास करते हुए रोज एक परिक्रमा लगाते हैं ... सुबह की आरती के बाद पहली परिक्रमा मंदिर के बाहर तथा शाम की आरती के बाद दूसरी परिक्रमा मंदिर के अन्दर लगानी होती है , ये दोनों परिक्रमा मिलकर पूरी एक परिक्रमा कहलाती है ...सात दिन तक मरीज को इसी प्रकार परिक्रमा लगानी होती है ...अक्सर मरीज स्वयं चलने फिरने में असमर्थ होते हैं ,उन्हें परिजन परिक्रमा लगवाते हैं ... निवास के लिए यहाँ सुविधा युक्त धर्मशालाएं हैं ... यात्रियों को जरुरत का सभी सामान बिस्तर , राशन , बर्तन, जलावन की लकड़ियाँ आदि निःशुल्क उपलब्ध करवाई जाती हैं ...इसके अतिरिक्त पास में ही बाजार भी हैं जहाँ यात्री अपनी सुविधा से अन्य वस्तुएं खरीद सकते हैं ... हर माह की शुक्ल पक्ष की द्वादशी को यहाँ मेला लगता है ,इसके अतिरिक्त वैशाख , भाद्रपद और माघ महीने में भी विशेष मेलों का आयोजन होता है !

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

गरीबनवाज श्री रघुनाथ ...रामचरितमानस से कुछ चौपाईँयां ...

रामचरित मानस की ये चौपाईँआं अर्थ सहित लिखने का कोई प्रवचन देने जैसा उद्देश्य नहीं है ....बदलते समय और समाज के विकास के साथ हमारे जीवन और सामाजिक गतिविधियों , आचार -विचार, नैतिक मूल्यों में भी परिवर्तन होता है ...परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है , और कुछ हद तक इसका पालन भी होना चाहिए ...मगर जब जीवन से जुड़े हर क्षेत्र (राजनीति , खेल , मनोरंजन )में बुरा और ज्यादा बुरा में से चुनने लगे हैं ...तो धर्म को भी इसी बदली दृष्टि के साथ स्वीकार करना चाहिए ...जिस कार्य से जीवन में सहजता हो , वही किया जाए ...आँख मूंदकर लकीर पीटने जैसा ना संभव है , ना स्वीकार्य होना ही चाहिए ...

कुछ और मोती
...



उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति
जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करई सप्रीति ...

दुष्टों की यह रीति है कि वे उदासीन , शत्रु अथवा मित्र किसी का भी हित सुनकर जलते हैं यह जानकर दोनों हाथ जोड़कर यह दास प्रेमपूर्वक उनसे विनय करता है ....

बंदउं संत असज्जन चरना दुखप्रद उभय बीच कछु करना
बिछुरत एक प्राण हरि लेही मिलत एक दारुण दुःख देहि

अब मैं संत और असंद दोनों के ही चरणों की वंदना करता हूँ , दोनों ही दुःख देने वाले हैं परन्तु उनमे कुछ अंतर कहा गया है ..वह अंतर यह है कि एक (संत ) से बिछड़ते समय प्राण हर लेते हैं , वही दूसरे (असंत ) मिलते हैं तब दारुण दुःख देते हैं ...अर्थात संतों का बिछड़ना मृत्यु के समान दुखदाई है तो असंतों का मिलना भी इतना ही दुःख देने वाला है ....

उपजहिं एक संग जग माहिं जलज जोंक जीमि गुन बिलगाहिं
सुधा सुर सम साधू असाधु जनक एक जग जलधि अगाधू

संत और असंत दोनों ही जगत में एक साथ पैदा होते हैं पर कमल और जोंक की तरह उनके गुण भी अलग- अलग होते हैं। कमल दर्शन और स्पर्श से सुख देता है , किन्तु जोंक शरीर का स्पर्श पाते ही खून चूसने लगती है साधु अमृत के समान (मृत्युरूपी संसार से उबारने वाला ) और असाधु मदिरा (मोह , प्रमाद और जड़ता उत्पन्न करने वाला ) के समान है दोनों को उत्पन्न करने वाला जगात्रुपी अगाध समुद्र एक ही है ...(शास्त्रों में समुद्रमंथन से ही अमृत और मदिरा दोनों की उत्पत्ति बताई गयी है )

भल अनभल निज निज करतूति लहत सुजस अपलोक बिभूति
सुधा सुधाकर सुरसरि साधू गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू
गुन अवगुन जानत सब कोई जो जेहिं भाव नीक तेहि सोई

भले और बुरे अपनी -अपनी करनी के अनुसार सुन्दर यश और अपयश संपत्ति पाते हैं अमृत , चन्द्रमा , गंगाजी , साधु , विष और अग्नि कलियुग के पापों की नदी अर्थात कर्मनाशा और हिंसा करने वाला व्याघ्र , इनके गुण-अवगुण सब जानते हैं , किन्तु जिसे जो भाता है , उसे वही अच्छा लगता है

खल अघ अगुन साधु गुन गाहा उभय अपार उदधि अवगाहा
तेहिं ते कुछ गुन दोष बखाने संग्रह त्याग ना बिनु पहिचाने

दुष्टों के पापों और अवगुणों और साधुओं के गुणों की कथाएं, दोनों ही अपार और अथाह समुद्र हैं इसी से कुछ गुणों और दोषों का वर्णन किया गया है क्योंकि बिना पहचाने उनका ग्रहण अथवा त्याग नहीं हो सकता है

भलेउ पोच सब बिधि उपजाए गनि गुन दोष बेद बिलगाए
कहहिं बेद इतिहास पुराना बिधि प्रपंचु गुन अवगुण साना

भले - बुरे सभी ब्रह्मा के ही पैदा किये हुए हैं , पर गुण और दोषों का विचार कर वेदों ने उनको अलग - अलग कर दिया है वेद, इतिहास , और पुराण कहते हैं कि ब्रह्मा की यह सृष्टि गुण - अवगुणों से भरी सनी हुई है

अस बिबेक जब देई बिधाता तब तजि दोष गुनहिं मनु राता
का सुभाऊ करम बरिआई भलेउ प्रकृति बस चुकई भलाई

विधाता जब इस प्रकार का विवेक (हँस का सा ) देते हैं तब दोषों को छोड़कर मन गुणों में अनुरक्त होता है काल -स्वभाव और कर्म की प्रबलता से भले लोग (साधु ) भी माया के वश में होकर कभी -कभी भलाई से चूक जाते हैं ...

जो सुधरी हरिजन जिमि लेहिं लि दुःख दोष बिमल जासु देहिं
खलकरहिं भाल पाई सुसंगूमिटहिं मलिन सुभाउ अभंगू

भगवान् के भक्त जैसे उस चूक को सुधार लेते हैं और दुःख दोषों को मिटाकर निरमल यश देते हैं , वैसे ही दुष्ट भी कभी -कभी उत्तम संग पाकर भलाई करते हैं , परन्तु कभी भंग होने वाला उनका मलिन स्वभाव नहीं मिटता है ...

लखि सुबेष जग बंचक जेऊबेष प्रताप पूजिअहिं ते
उघरहिं अंत होई निबाहूकालनेमि जिमि रावण रहू

जो ठग हैं , उन्हें भी अच्छा वेश बनाये देखकर बेष के प्रताप से जग पूजता है , परन्तु एक --एक दिन उनके अवगुण चौड़े (दोष जाहिर होना ) ही जाते हैं , अंत तक उनका कपट नहीं निभता जैसे, कालनेमि , रावण और राहू का हाल हुआ

कियेहूँ कुबेष साधु सनमानूजिमी जग जामवंत हनुमानू
हानि कुसंग कुसंगति लाहूलोकहूँ बेद बिदित सब काहू

बुरा वेश बना लेने पर भी साधु का सम्मान ही होता है , जैसे जगत में जाम्बवान और हनुमानजी का हुआ बुरे संग से हानि और अच्छे संग से लाभ होता है , यह बात लोक और वेद में हैं और सब जानते हैं ...


कुछ विशेष ...
गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू॥
बुध बरनहिं हरि जस अस जानी। करहिं पुनीत सुफल निज बानी॥

भावार्थ:-वे प्रभु श्री रघुनाथजी गई हुई वस्तु को फिर प्राप्त कराने वाले, गरीब नवाज (दीनबन्धु), सरल स्वभाव, सर्वशक्तिमान और सबके स्वामी हैं। यही समझकर बुद्धिमान लोग उन श्री हरि का यश वर्णन करके अपनी वाणी को पवित्र और उत्तम फल (मोक्ष और दुर्लभ भगवत्प्रेम) देने वाली बनाते हैं

इस चौपाई में श्री रघुनाथ के लिए गरीबनवाज और सूफी हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह (अजमेर ) का गरीबनवाज के नाम से प्रसिद्द होना ...सुखद ही तो है .... !


प्रयत्न तो बहुत किया है कि सही शब्द ही लिखूं , फिर भी जो त्रुटियाँ रह गयी हैं , उनके लिए अल्पज्ञ मान कर क्षमा करें ...

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

रामचरितमानस से चुन लिए कुछ मोती...

नोट ...यह प्रविष्टि कोई प्रवचन या उपदेश नहीं है . रामचरितमानस को अर्थ सहित समझने का प्रयास मात्र है ...

रामायण और रामचरितमानस हिन्दू संस्कृति के प्रमुख ग्रन्थ हैं ...हर घर में इनका होना अनिवार्य है ...श्रीराम के जीवनवृत पर आधारित श्रद्धा से जुडी होने के कारण अतुलनीय पूज्यनीय तो है ही मगर ....सिर्फ धर्म की दृष्टि से ही नहीं , कविता या महाकाव्य के रूप में भी यह विलक्षण है ...अलंकारों का ऐसा सुन्दर उपयोग और किसी भी महाकाव्य या ग्रन्थ में नहीं है ....इसे पढ़ते हुए व्यकित चकित , चमत्कृत रह जाता है ...इतनी असाधारण प्रतिभा दैवीय ही हो सकती है ....

वाल्मीकि को संसार का आदि कवि माना जाता रहा है क्यूंकि उनके सम्मुख कोई ऐसी रचना नहीं थी जो उनका पथ प्रदर्शन कर सके ...इसलिए रामायण महाकाव्य उनकी मौलिक कृति है और इसलिए ही इस महाकाव्य को आदिकाव्य भी कहा जाता है ...
वाल्मीकि रामायण संस्कृत का महाकाव्य है जिसमे वाल्मीकि ने राम को असाधारण गुणों के होते हुए भी उन्हें एक मानव के रूप में ही चित्रित किया है ...जबकि रामचरितमानस में तुलसीदास ने राम को भगवान विष्णु के अवतार के रूप में ...

चुन लाई हूँ कुछ मोती ...आप भी आनंदित हो लें ...

तुलसीदास की राम के विवरण और वर्णन में अपनी असमर्थता को प्रकट करती विनम्रता देखते ही बनती है...परन्तु कुटिल खल कामियों को हंसी- हंसी में विनम्रता के आवरण में कब तंज़ कर जाते हैं , पता ही नहीं चलता ....

मति अति नीच ऊँची रूचि आछी चहिअमि जग सुर छाछी ।।
छमिहहिं सज्जन मोरी ढिठाई सुनिहहिं बालबचन मन भाई ।।

मेरी बुद्धि तो अत्यंत नीची है , और चाह बड़ी ऊँची है चाह तो अमृत पाने की है पर जगत में जुडती छाछ भी नहीं है सज्जन मेरी ढिठाई को क्षमा करेंगे और मेरे बाल वचनों को मन लगाकर सुनेंगे

जों बालक कह तोतरी बाता सुनहिं मुदित मन पित अरु माता
हंसीहंही पर कुटिल सुबिचारी जे पर दूषण भूषनधारी

जैसे बालक तोतला बोलता है , तो उसके माता- पिता उन्हें प्रसन्न मन से सुनते हैं किन्तु कुटिल और बुरे विचार वाले लोंग जो दूसरों के दोषों को ही भूषण रूप से धारण किये रहते हैं , हँसेंगे ही ...

निज कवित्त कही लाग नीका सरस होई अथवा अति फीका
जे पर भनिति सुनत हरषाहीं ते बर पुरुष बहुत जग नाहिं

रसीली हो या फीकी अपनी कविता किसे अच्छी नहीं लगती किन्तु जो दूसरे की रचना को सुनकर हर्षित होते हैं , ऐसे उत्तम पुरुष (व्यक्ति ) जगत में बहुत नहीं हैं ...

जग बहू नर सर सरि सम भाई जे निज बाढहिं बढ़हिं जल पाई॥
सज्जन सकृत सिन्धु सम कोई देखी पुर बिधु बाढ़ई जोई

जगत में तालाबों और नदियों के समान मनुष्य ही अधिक है जो जल पाकर अपनी ही बाढ़ से बढ़ते हैं अर्थात अपनी ही उन्नति से प्रसन्न होते हैं . समुद्र - सा तो कि एक बिरला ही सज्जन होता है जो चन्द्रमा को पूर्ण देख कर उमड़ पड़ता है ...


महाकाव्य लिखने में तुलसी की विनम्रता देखते ही बनती है ...जहाँ आप -हम कुछेक कवितायेँ लिख कर अपने आपको कवि मान प्रफ्फुलित हो बैठते हैं और त्रुटियों की ओर ध्यान दिलाते ही भृकुटी तान लेते हैं , वहीँ ऐसा अद्भुत महाकाव्य रचने के बाद भी तुलसीदास खुद को निरा अनपढ़ ही बताते हैं ...

कबित्त विवेक एक नहीं मोरे . सत्य कहूँ लिखी कागद कोरे ...

काव्य सम्बन्धी एक भी बात का ज्ञान मुझे नहीं है , यह मैं शपथ पूर्वक सत्य कहता हूँ ...
मगर श्री राम का नाम जुड़ा होने के कारण ही यह महाकाव्य सुन्दर बन पड़ा है ..

मनि मानिक मुकुता छबि जैसी . अहि गिरी गज सर सोह तैसी
नृप किरीट तरुनी तनु पाई . लहहीं सकल संग सोभा अधिकाई ...

मणि, मानिक और मोती जैसी सुन्दर छवि है मगर सांप , पर्वत और हाथी के मस्तक पर वैसी सोभा नहीं पाते हैं ...राजा के मुकुट और नवयुवती स्त्री के शरीर पर ही ये अधिक शोभा प्राप्त करते हैं ..

अति अपार जे सरित बर जून नृप सेतु कराहीं .
चढ़ी पिपिलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं..

जो अत्यंत श्रेष्ठ नदियाँ हैं , यदि राजा उनपर पुल बंधा देता है तो अत्यंत छोटी चीटियाँ भी उन पर चढ़कर बिना परिश्रम के पार चली जाती हैं ...

सरल कबित्त कीरति सोई आदरहिं सुजान ...

अर्थात चतुर पुरुष (व्यक्ति ) उसी कविता का आदर करते हैं , जो सरल हो , जिसमे निर्मल चरित्र का वर्णन हो ...

जलु पे सरिस बिकाई देखउं प्रीति की रीती भली
बिलग होई रसु जाई कपट खटाई परत पुनि ..

प्रीति की सुन्दर रीती देखिये कि जल भी दूध के साथ मिलाकर दूध के समान बिकता है , परन्तु कपटरूपी खटाई पड़ते ही पानी अलग हो जाता है (दूध फट जाता है ) स्वाद (प्रेम )जाता रहता है ...

दुष्टों की वंदना और उनकी विशेषताओं का वर्णन बहुत ही सुन्दर तरीके से किया है ...
संगति का हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है ...इसको भी बहुत अच्छी तरह समझाया है ..-

गगन चढ़इ राज पवन प्रसंगाकीचहिं मिलइ नीच जल संगा
साधु असाधु सदन सुक सारिणसुमिरहिं राम देहि गनि गारीं

पवन के संग से धूल आकाश पर चढ़ जाती है और वही नीच (नीचे की ओर बहने वाले ) जल के संग में कीचड़ में मिल जाती है ...साधु के घर में तोता मैना राम -राम सुमिरते हैं और असाधु के घर के तोता मैना गिन गिन कर गलियां बकते हैं ...

धूम कुसंगति कारिख होई लिखिअ पुरान मंजू मसि सोई
सोई जल अनल अनिल संघाता होई जलद जग जीवन दाता

कुसंग के कारण धुंआ कालिख कहलाता है , वही धुंआ सुन्दर स्याही होकर पुराण लिखने के काम आता है और वही धुंआ जल , अग्नि और पवन के संग मिलकर बादल होकर जगत में जीवन देने वाला बन जाता है ...

नजर और नजरिये के फर्क को भी क्या खूब समझाया है ...
सम प्रकाश तम पाख दूँहूँ नाम भेद बिधि किन्ह।
ससी सोषक पोषक समुझी जग जस अपजस दिन्ह॥

महीने के दोनों पखवाड़ों में उजियाला और अँधेरा समान रहता है , परन्तु विधाता ने इनके नाम में भेद कर दिया है . एक को चन्द्रमा को बढाने वाला और दूसरे को घटाने वाला समझकर जगत ने एक को यश और दूसरे को अपयश दिया ...



क्रमशः