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मंगलवार, 22 जुलाई 2014

द्विरागमन ....(3)

अपने जीवन की परेशानियों से निबटता एक सैनिक जा बैठा हरे भरे पार्क की एक बेंच पर , उसी बेंच से कुछ दूर मखमली दूब पर तिनके कुतरती एक स्त्री ,. तल्खी भरे परिचय से बढती मुलाकातें अजनबियत को परे धकेलती आत्मीयता में बदलती है . दोनों के बीच के  संवादों  के टुकड़े उन दोनों की कहानी को आगे बढ़ाते हैं , उनके जीवन की कहानी को . कहते हैं सुख में साथ चल रहे अपने फिर पराये हो जाते हैं मगर दुःख और संवेदना दो इंसानों के बीच बेहतर पहचान बनाती है ....जीवन की आपधापी के भागते क्षणों के बीच कुछ ठहर सी गयी है खुद को तलासते , सैनिक के दर्द अभी सिर्फ उसके अपने हैं ! पिछले  दो अंकों  द्विरागमन (1), द्विरागमन (2)के बाद अब आगे ....


        

उससे बतियाते मैं जानने लगा था कि वह अपने पति और बच्चों के साथ अकेले रहती थी।  उसके सास ससुर इतने नाराज थे कि एक ही शहर में रहने के बावजूद उससे कभी मिलने नहीं आते ...बच्चों के जन्म से लेकर उनके स्वास्थ्य खराब होने पर भी। बताया नहीं था उसने बस , उसकी बातों से जाना।
एक दिन पूछ  लिया था मैंने -
तुम्हारा प्रेम विवाह हुआ है क्या  !
हां, प्रेम विवाह के बाद हुआ है।
प्रेम विवाह के बाद प्रेम!
बुद्धू , प्रेम मुझे विवाह के बाद हुआ !!
अच्छा , उससे पहले किसी से प्रेम नहीं हुआ ! सच बताओ , तुम्हे विवाह से पहले कभी प्रेम नहीं हुआ।
वह कुछ देर खामोश रही।
प्रेम क्या होता है आखिर ! दो व्यक्ति एक साथ रहने और साथ जीने में ख़ुशी महसूस करते है , इसके अतिरिक्त प्रेम क्या होता है !
 मैं उस प्रेम की बात कर रहा हूँ जब कुछ अच्छा नही लगता ...  घबराहट होती है !भूख- प्यास मिट जाती है ... पढने में मन नही लगता ... रात में नींद नहीं आती  दिन में सपने देखने लगते हैं लोग !
वह प्यार होता है।  मुझे तो लगता था कि ये लक्षण ब्लड प्रेशर के होते हैं या अनिमिक होने के !
इस उम्र में तुम यह कह सकती हो , मगर मैं उस उम्र की बात कर रहा हूँ जब यह सब होता है ! क्या तुम्हे कभी कोई अच्छा नहीं लगा। तुम भी अच्छी खासी खूबसूरत हो ...तुम्हे भी तो किसी ने पसंद जरुर किया होगा .
अच्छा  क्यों नहीं लगा।  हम अपने जीवन में बहुत लोगो से मिलते हैं जो हमें अच्छे लगते हैं.  हम उनसे और  वो हमसे आकर्षित होते हैं.  सब हमारे जीवन में शामिल नहीं होते .  इससे प्रेम का क्या सम्बन्ध !
अभी तुमने कहा न दो व्यक्ति एक साथ रहने जीने में ख़ुशी महसूस करें , वही प्रेम है !

अचकचा गई वह।  शब्दों के जाल में उलझा दिया था मैंने।  उलझन भरी नजरों से थोडा नाराजगी से कहा उसने , मुझे नहीं पता ये सब ! मुझे इस तरह का कोई प्रेम नहीं हुआ बस।  मैं उसे ही प्रेम मानती हूँ जो जिम्मेदारी बन जाता है।
वह कुछ जल्दी में थी उस दिन। जल्दी जाना था उसे।  उसके पति शहर से बाहर जा रहे थे कुछ दिन के लिए . उनके सामान की पैकिंग करनी थी और भी घर के कुछ काम भी।  मुझे हैरानी हुई कि उसका पति उसकी कजिन के विवाह में अकेला ही जा रहा था।
कमाल है ! कजिन तुम्हारी है और पति तुम्हारा जा रहा है शादी में।  तुम क्यों नहीं जा रही।
मैं नहीं जा सकती। कम से कम एक सप्ताह लगेगा . बच्चों की पढाई का नुकसान होगा। वह कुछ उदास सी थी।
ऐसा भी क्या कि बच्चों को कुछ दिन की छुट्टी नहीं दिला सकती।
एक्जाम होने वाले है उनके कुछ दिनों में ही।
हाँ , मगर इसमें क्या हुआ ! तुम अपने सास ससुर के पास छोड़ सकती हो बच्चों को।
नहीं छोड़ सकती , वे नहीं आते हमारे घर !
मैंने उसकी ओर गौर से देखा तो वह एकदम से गड़बड़ा गयी .
मेरा मतलब है कि बच्चे कभी रहे नहीं है अकेले  इसलिए नहीं छोड़ सकती उनको कहीं।
वह कुछ नहीं बोली।  मगर मैं चाहता था कुछ कहे वह ! क्यों नहीं जाना चाहती है वह , क्यों नहीं जा सकती है !!
बस नहीं जा सकती , काफी है तुम्हारे लिए।
मुझे पता चल गया क्यों नहीं जाना चाहती हो तुम।  उसके जाने के बाद एक सप्ताह पार्क में मुझसे मिलने ज्यादा देर आ सकोगी … उसे खीझा कर बुलवाने का हुनर मैं सीख गया था !
खिझी बहुत अधिक वह मगर बोली कुछ और ही।
मैं तुम्हारा सर फोड़ दूँगी।
हा हा हा , मेरे सर तक तुम्हारा हाथ पहुचेगा भी  !! मैं सीधा तन कर खडा हो गया।  वह मेरे कंधे से भी छोटी थी।
मुझे बात ही नहीं करनी है तुमसे और उस दिन वह  नाराज होकर पैर पटकते चली गयी।

वह सचमुच नाराज हो गयी थी।  उस पूरे एक सप्ताह वह पार्क में आई ही नहीं . मैं पहली बार थोडा बेचैन हुआ। किससे पूछूं उसके बारे में।  आस पास खेलते बच्चों से , या आइसक्रीम वाले से।  मैं नहीं जानता था कहाँ रहती है वह . कभी मैंने पूछा नहीं . कभी उसने बताया भी नहीं। पहली बार मैंने सोचा ! कई बार उठ कर उन बच्चों के बीच गया मगर कदम फिर फिर कर लौट आते।  क्या पूछूं बच्चों से  , क्या कहेंगे बच्चे ! कौन थी वह जिसके बारे में मैं जानना चाह रहा था।  पता नहीं  कौन क्या सोचेगा . मैं चुप ही बैठा रहा मगर मुझे बेचैनी होती रही। इस बार मुझे खुद पर भी गुस्सा आ रहा था . मैंने उसे उदास देखा था कुछ परेशान भी और मैंने उसे चिढाना जारी रखा था . मुझे नहीं करना चाहिए था ऐसा .

क्यों नहीं आई वह ! सब ठीक तो है या हो सकता है वह भी अपने पति और बच्चों के साथ चली गयी हो विवाह में।  या कही मुझसे सचमुच नाराज तो नहीं हो गयी है।  ईश्वर जानता था मैंने सिर्फ उसे खिझाने के लिए ही कहा था।  जब कभी वह अनमनी नजर आती या अधिक चुप रहती नजर आती मैं जानबूझकर कुछ ऐसा कहता कि उसे गुस्सा आ जाये और चिल्लाते हुए लड़ पड़ती और लड़ते हुए उदासियाँ उस ज्वालामुखी चेहरे के डर के मारे दुबकी रहती . लड़ते हुए ही जाने कब मुस्कुराने भी लगती।   मुझे उसे मुस्कुराते देखना बहुत अच्छा लगता था।  मैं टटोलता हूँ खुद को , उसे ही क्यों , मुझे सबको मुस्कुराते देखना अच्छा लगता है।

उस पूरे सप्ताह मुझे बहुत अकेलापन लगा।  गलत है यह . मैं खुद को धिक्कारता था।  मैं सब बन्धनों से छूट चूका हूँ , मुझे किसी को याद नहीं करना ., याद नहीं आना है।  मगर क्या सचमुच छूटा जा सकता था !!
 मैं याद करता था उस मनहूस दोपहर को जिसने मेरी जिंदगी का रुख बदल दिया था।  हलकी सर्दी के दिन उस पार्क की बेंच पर धूप का टुकड़ा मुझे आकर सहलाता रहा . मैं याद करता रहा जो मैं भूल जाना चाहता था , मगर भूला नहीं था।
सैनिकों के जीवन में छुट्टियाँ उनकी पूरी एक उम्र होती है।  कब जाने कौन सी छुट्टी उनके जीवन की आखिरी हो जाए , उस छुट्टी के बाद कभी लौट नहीं पाए जीवन। हर जवान जी लेना चाहता है उन पलों को यादगार लम्हों की तरह। अचानक घर जाकर निशा को चौंका देना चाहा था मैंने . मगर उससे पहले ढेर सारी खरीददारी करनी थी मुझे . लाल किनारे वाली सफ़ेद साडी  बंगला साहित्य को सनक तक पसंद करने वाली निशा . बहुत भाता था उसे उसी बंगला स्टाईल में साडी पहनना , उसके लम्बे बालों और बड़ी आँखों के बीच चेहरे की बड़ी बिंदी उसे ठेठ बंगाली लुक देती थी . कई बार यकीन करना मुश्किल हो जाता कि वह बंगाल से नहीं थी , बंगाली नहीं थी .  "आमी तुमाको भालो वासी " दुकानदार ने चौंक कर देखा था मेरी ओर . सेल्सगर्ल द्वारा खोल कर दिखाई जाने वाली साडी में जाने कब निशा आ खड़ी हुई थी . सेल्सगर्ल ने भी पूछा,  कुछ कहा आपने सर!,
हाँ हाँ वो .... इस साडी को पैक कर दो . मैं घबरा गया था . क्या सोचा होगा उन लोगों ने . कैसी चुभती अर्थपूर्ण निगाहें थी दुकानदार की मगर सेल्सगर्ल बहुत प्यारी संजीदा सी लड़की थी.
 वह समझ गयी थी ,"सर , मैम पर बहुत जचेगी यह साडी , अच्छी पसंद है आपकी !"
घर परिवार से दूर रहने वाले जाने कितने पथिक घर की उड़ान भरने से पहले यहाँ भटकते आ जाते होंगे . माँ , बहन, पत्नी,  प्रेयसी के लिए कुछ उपहार में खरीदते उनकी आँखों को पढना सीख जाती है ये बालाएं . कई बार उनसे सलाह भी ले लेते हैं जैसे अपनी पसंद से दे दीजिये बहन को क्या अच्छा लगेगा ... क्या ले जाना चाहिए माँ के लिए , प्रेयसी को कौन सा रंग सुहाएगा . अनजान दुनिया के कुछ पल के साथी जाने पहचाने अपनों के लिए किस अपनेपन से जुट जाते हैं . ना , सिर्फ व्यापार या मजबूरी नहीं . उनके चेहरे की नम आत्मीयता बेगानों में भी संवेदनाओं के बचे होने की पूरी गारंटी देती हैं . और जब अपनी नन्ही परी  तृषा के लिए परियों वाली ड्रेस और गुडिया सिंड्रेला लेते तो जैसे वात्सल्य का समन्दर उछाले भरता उनकी ममता को सहलाते रहा .
मेरी नन्ही परी , आ रहा हूँ मैं !  फोन पर अपनी तुतलाती जुबान में जाने क्या सुनाती रहती थी .  उसकी माँ से ही जान पाता था कि कभी वह लोरी सुना रही होती है तो कभी मम्मा की शिकायत . उस दिन उसकी प्यारी शरारतें बताते सुनते हम दोनों के गले भर आये थे . कागज़ पेन लेकर बैठी उसकी तृषा अपने पिता को ख़त लिख रही थी . उसकी माँ का सिखाया गीत गाते. पापा , जल्दी आ जाना . अच्छी सी गुडिया लाना .

क्रमशः ....
चित्र गूगल से साभार !

सोमवार, 6 जनवरी 2014

रोशनी है कि धुआँ .... (4 )

(तेजस्वी की कहानी को कम में समेटना चाहती थी , मगर नए किरदार जुड़ते जा रहे हैं , कैसे लिखोगी कम में , हमें अनसुना कर !
यह कहानी उपन्यासिका में ही परिवर्तित होती  प्रतीत हो रही है) . 

वायब्रेंट मीडिया हाउस में कार्यरत तेजस्वी के उत्साह पर सामान्यतः ऑफिस में होने वाली राजनीति ने उदासी के छींटे डाले।  घर से बाहर की विचित्र दुनिया से रुबरु  होते हुए तेजस्वी का सफ़र जारी है.

अब आगे --- 

माँ ने पहले से ही उसके सलवार कमीज हैंगर पर लटका रखे थे।  जल्दी तैयार हो जाओ ,हमें काफी देर हो चुकी है।  खाने के समय कार्यक्रम में पहुंचना अच्छा नहीं लगता। 

हाथ मुंह धोकर   क्रीम और पीले रंग के अनारकली सूट पहने आईने के सामने बाल संवारती तेजस्वी पर  मुग्ध दृष्टि डालते  माँ  ने थूथकारा डाला , नजर न लगे !

दोनों  कार्यक्रम में पहुंची तब तक महिला संगीत समाप्त ही होने को ही था।  लाया डाक बाबू लाया रे संदेसवा , मेरे पिया जी को भाये न बिदेसवा पर एक लड़की मंच पर थिरक रही थी। 
तेजस्वी और उसकी माँ  ने सीमा के पास जाकर सीमा को  बधाई  दी।
भड़कीले लाल रंग के सलवार कमीज में लकदक मिसेज वालिया चहकती हुई तपाक  से बोली ," हमने तो समय से अच्छा लड़का देखकर सगाई कर दी , अब आप भी तेजस्वी के लिए लड़का  देखना शुरू  कर दो।  बराबर- सी ही तो  हैं दोनों।
माँ ने कुछ कहा नहीं , सिर्फ मुस्कुरा कर रह गयी।  

 संयोगवश सीमा का जन्मदिन भी था उसी दिन।  मंच के पास ही केक काटने की तैयारी  भी थी। सीमा और उसका भावी पति सौरभ मंच के सबसे आगे एक सुन्दर झूलनुमा बेंच पर साथ बैठे थे। उस  मंच के सामने लगी बेंच पर पीछे की तरफ बैठ कर दोनों संगीत का आनंद ले रही थी। मिसेज वालिया चहकती हुई बता रही थी ,  सीमा के ससुर बहुत खुश  हैं इस रिश्ते से , केक पर सजावट उन्होंने अपने हाथों से की है।  कहने लगे कि मेरी बहू लाखों में एक है तो इसका तोहफा तो मैं ही सजाऊंगा। अभी थोड़ी देर पहले ही नृत्य के लिए बहू का हाथ पकड़कर स्टेज पर ले गए। पूरे परिवार ने साथ नृत्य किया। ख़ुशी में उनकी आँखें छलछला रही थी।

संगीत के बाद केक काटा गया ,  वर- वधू  को अंगूठी पहनाई गयी, मेवा -बताशे से गोद भरी गयी। पूरे कार्यक्रम में सीमा के स्वसुर का उत्साह देखते बनता था।  बहू का हाथ पकड़कर केक कटवाने से लेकर अंगूठी पहनाने  तक वे साये की तरह सीमा के आसपास ही मंडराते नजर आ रहे थे।  महिलाओं की खुसुर- पुसुर चालू थी , बहुत खुशकिस्मत है सीमा।

रोशनी  , संगीत , उल्लासमय वातावरण , अच्छा भोजन , घर लौटते तेजस्वी का मानसिक तनाव काफी कम हो चूका था, मगर माँ कुछ अनमनी -सी दिख रही थी।
 क्या  हुआ माँ  , तुम्हे कैसे लगे सीमा के ससुराल वाले।  
कुछ नहीं।  अच्छे हैं।  शोरशराबे से थकान हो जाती है मुझे !
निकलते समय कॉफी पी लेनी थी।  कोई नहीं , घर चल कर पी लेते हैं। 

घर आकर माँ काफी देर तक सीमा के श्वसुर  के अत्यंत उत्साही व्यहार पर सोचती रही , मगर किसी से कहा कुछ नहीं। 
गहराती रात में खिड़की के परदे सरकाकर बाहर चाँद निहारते तेजस्वी भी सोचती रही देर तक।  हर दिन एक अँधेरे में डूबता है और सवेरा फिर सूर्य की रोशनी में जगमगाता। यूँ तो अँधेरा किसे भाता है मगर  चांदनी रात में अँधेरा भी कितना सम्मोहक होता है , रोशनी भी आँखों को चौंधियाए नहीं तभी भाती है वरना  तो वेल्डिंग मशीने भी कितनी किरणे बिखेरती है , आँखों पर चश्मा न हो तो आँखे खराब। 
क्या -क्या सोचने लगी वह।
लैंप की बत्ती बुझा सूर्य के संतुलित प्रकाश की  सम्भावना लिए नींद पलकों पर भारी हो आई। 

आलिया के केबिन में अनाथाश्रम , बालश्रम ,  बालश्रमिकों के शोषण आदि  विषयों पर चर्चा करते हुए तेजस्वी की नजरे बार -बार टेबल पर रखी   लाल फ़ोल्डर वाली फाईल पर टिक जाती।  उसका हेडिंग  जाना -पहचाना सा लग रहा था।  चर्चा समाप्त होकर कमरे से बाहर निकलते आखिर उसने फाईल उठाकर पलट ही ली।  वह शक्ति सदन की विस्तारित  रिपोर्ट थी जिस पर प्रस्तुतकर्ता का नाम पढ़ा उसने - सिमरन बर्वे। तेजस्वी हतप्रभ उदास सी  कमरे से बाहर निकल आयी।  उसका प्रोजेक्ट किसी और  नाम से पूर्ण हो चूका था।
सिमरन ने भी काफी काम किया था इस पर , एक गहरी सांस लेकर तेजस्वी ने स्वयं को समझाया मगर मित्रता का यह नया रूप देखकर तेजस्वी चकित थी।  सिमरन के साथ ही उसे सुचित्रा के व्यवहार पर  भी अचम्भा हो आया था। स्वयं मन को टटोला उसने , दृढ महिला के रूप में उनकी छवि में क्या बचा रह गया था उसकी समझ से परे।  उसे समझ आने लगा था कि  घर से बाहर की दुनिया बहुत विचित्र है।  माँ -पिता  की समझाइशें इतनी व्यर्थ नहीं थी।   

वह सिमरन के साथ अपनी मित्रता के पलों को स्मरण करती रही। एक दिन उसके लिखे  आलेख  पर बहस करते  अंग्रेजी में धाराप्रवाह अपने विचार प्रस्तुत कर रहे मनीष को  सिमरन ने  उसे टोका था  , क्यों अंग्रेजी झाड़ रहे हो , उससे क्या फायदा होगा , तुम्हे पता नहीं कि तेजस्वी हिंदी मीडियम से है। 
साथियों के होठों की दबी मुस्कान के साथ  सिमरन  का विजयी भाव उसे सब समझा तो रहा था , मगर आँखों पर बंधी मित्रता की पट्टी ने उसे बतौर  मजाक अथवा  टांग खिंचाई जैसे ही लिया था। जब -तब बहनजी कह देना भी वह इग्नोर ही करती आई थी। 
पीछे छोड़ आये कुछ और पन्ने भी उलटे उसने। उसने सोचा फिर से, एक लेख पर मनीष की उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया पर भी सिमरन का व्यवहार अखरना चाहिए था उसे।  एक साथ ही संस्कृत , हिंदी ,अंग्रेजी और उर्दू भाषा पर अपनी तीव्र पकड़  के साथ प्रखर प्रतिभाशाली मनीष अपने साथियों ही नहीं ,वायब्रेंट मीडिया हाउस से जुड़े  पाठकों , दर्शकों में भी अत्यंत लोकप्रिय था। अपने कार्यक्षेत्र में प्रगति करते विद्वानों की प्रशंसा बहुत मायने रखती है , तेजस्वी फूली नहीं समा रही थी मगर सिमरन ने विशेष कुछ भी कहा नहीं था बल्कि स्वयं की अन्य उपलब्धियों के बारे में बात करते विषय ही बदल दिया था।  

यह सब कुछ अखरा क्यों नहीं उसे , तो क्या मित्रता के रिश्तों में  अब तक वह सिर्फ मूर्ख ही बनती  आई थी, सोचते स्मृतियों के तार  उलझते जाते थे. खैर तेजस्वी को अटकना नहीं था , आगे ही बढ़ना था।  नाम तेजस्वी यूँ ही तो नहीं रख गया था।  

 बाल श्रमिकों की वर्त्तमान स्थितियों पर अपनी खोज पर कई हैरतअंगेज चौंकाने वाले तथ्य  उसके सामने थे।   बाल कल्याण के लिए निर्मित की जाने  वाली सरकारी संस्थाओं के आंकड़े मानवता को शर्मसार करते नजर आते थे। बाल  कल्याण के लिए निर्मित विभिन्न आश्रय स्थलों से भागने अथवा गायब होने वाले बच्चों की संख्या उसे विस्मित कर रही थी।  दर दर भीख मांग कर गुजर करने वाले बच्चे इन सुविधाजनक आश्रय स्थलों पर टिकना क्यों नहीं चाहते , क्यों बार- बार भागने के प्रयास करते हैं , सम्मान पूर्वक मिलने वाला भोजन और आश्रय इन्हे क्यों नहीं सुहाता , घर पहुँचते , खाना खा कर विश्राम करते भी उसके दिमाग में प्रश्न अटके ही थे।  

चींचीं के मधुर कलरव से नींद खुली उसकी , नारंगी आभा के साथ सूर्यदेव प्रकट हुआ ही चाहते थे , माँ बालकनी में पक्षियों के लिए अनाज और पानी रख कर आयी थी। बहुत बचपन से माँ को  पक्षियों को दाना खिलाते देखा है उसने। दाना चुगने आती नन्ही चिड़िया , कबूतर , तोते उसे सदा लुभाते रहे थे। एक बार  पिंजरे में पक्षी पालने के लिए वह कितना मचली थी , मगर माँ ने सख्ती से मना कर दिया था। तेजस्वी को समझाया था माँ  ने कि पंछी तो उड़ते- फिरते ही लुभाते हैं , तुमने देखा नहीं उन्हें , वे यहाँ रखें पानी और दाने से ज्यादा इधर -उधर बिखरे हुए दाने  या बहते पानी की ओर ही अधिक भागते हैं। घायल पक्षी के संरक्षण के लिए बेहतर स्थान उपलब्ध करवाना उचित है , मगर आकाश में उन्मुक्त उड़ते पक्षी को पिंजरे की कैद में रखना आमनवीय है। ये पक्षी मनुष्य से अधिक स्वतंत्रता प्रेमी होते हैं !

पक्षियों की चहचहाहट के बीच उसे आश्रम के बच्चों का ख्याल हो आया  और अपना  कार्य भी।  उसे बाल विकास मंत्रालय से जुड़े आश्रयस्थलों और  बाल भवन के अतिरिक्त कुछ स्वयंसेवी संस्थानों से भी जानकारी प्राप्त करनी थी। ऑफिस में मनीष व अन्य साथियों के साथ  ग्रुप डिस्कशन के बाद उन्होंने अपनी खोज की रुपरेखा तय की और उत्साही  कदम चल पड़े एक नयी मंजिल  की राह पर  । 


क्रमशः  
रुकावटें  जीवन का सहज हिस्सा है, कई बार इंसान टूट जाता है , बिखर जाता है तो कई बार दृढ बनता है .... 

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

रोशनी है कि धुआँ ….. (3)

अब तक …
 अपने सपने की तलाश ने तेजस्वी को " वायब्रेंट मिडिया हाउस "पहुंचा दिया है।   

पत्रकारिता को अपना जूनून माने वाली तेजस्वी  को आखिर अपनी पसंद का कार्य मिल  ही गया।  घर -बाहर , आसपास उसके उत्साह पर चुनातियों के छींटे दस्तक  देने लगे हैं , ना जाने कौन -सा रंग होगा इनका .... 

अब आगे ……


कैसा रहा आज का दिन।  माँ उसका रास्ता ही देख रही थी। 
बहुत अच्छा , थकान हो रही है लेकिन अब।  
फ्रेश होकर थोड़ी देर  आराम कर लो ,  खाना बन रहा है. साथ ही  खायेंगे .  

होती  रहेंगी परीक्षाएं  … हाथ -मुंह धोकर  फ्रेश होने से काउच पर चैन से पसरते शब्द उसके कानों में गूंजते रहे। माँ  छोटी बहन मनस्वी के साथ टेबिल पर खाना लगाकर सबको बुला  रही थी। चार लोगो के छोटे से  परिवार में रात  खाना एक साथ ही करने का एक अलिखित नियम सा था। भाई   मयूर और उसके पिता भी पहुँच चुके थे डाइनिंग टेबिल तक।  

माँ , लोग बेटियों को क्यों पढ़ाते हैं , बस एक अच्छा रिश्ता मिल जाए , सिर्फ इसलिए ही। तेजस्वी के  दिन भर के अनुभव के बारे में कोई उससे पूछे, उससे पहले ही वह अपने सवाल के  साथ तैयार थी। 

मकसद यही हो , जरुरी नहीं।  मगर अच्छा रिश्ता हो जाए , यह तो सभी माता- पिता चाहते होंगे।

उसने सीमा के बारे में बताया , सीमा बीटेक  के आखिरी वर्ष में थी।  

मुझे पता है , लड़के ने भी अभी बीटेक किया है , कैम्पस सलेक्शन हो चुका  है। लड़के के माता -पिता दोनों ही सरकारी सेवा में हैं , उसकी बड़ी बहन विदेश में सैटल है।  उन्हें सीमा के आगे पढ़ने में भी कोई समस्या नहीं है।  इस रिश्ते में कोई समस्या मुझे नजर नहीं आती।  

मगर माँ , सीमा की परीक्षाएं हैं , शादी के कुछ दिन बाद ही। 

मुहूर्त नहीं था आगे का , लड़के की बहन भी अभी ही आ सकती थी विदेश से। उनके नजरिये से भी देखो। 

खाने के समय हम क्यों उलझ रहे हैं दूसरों की जिंदगियों से। तुम बताओ , सब ठीक रहा आज। पिता ने हस्तक्षेप करते हुए बात को बहस में बदलने से रोका  . खाना खाते हुए वे दिन  भर  के कार्यकलापों पर बातचीत करते रहे। 

दिन पर दिन गुजरते  रहे।  आलिया  के साथ उसके साथियों की मीटिंग होती , लक्ष्य निर्धारित होते   .  स्त्रियों की शिक्षा व  सुरक्षा से सम्बधित योजनाओं और कानून की जानकारी एकत्रित करने के लिए स्त्रियों से जुड़े कई समाजसेवी संगठनों से मिलना , विभिन्न आंकड़े एकत्रित करना , साक्षात्कार लेना  ,रिपोर्ट तैयार करना ,  उनको आलेख अथवा समाचार में बदलना , कार्य के ढेर में ढेर होते तेजस्वी अपने कार्य में प्रवीण होती जा रही थी। 

अपने कार्य के प्रति समर्पित तेजस्वी  अपने अन्य साथियों के मुकाबले विनम्र और हंसमुख होने के कारण सभी से घुली मिली रहती। आलिया का उस पर यकीन  बढ़ता  जाता था।  एक दिन आलिया ने उसे केबिन में बुलाकर शक्ति  सदन की रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा। शक्ति  सदन के फाउंडर ,सदस्यों ,  प्रताड़ित स्त्रियों की कानूनी सहायता करने , उन्हें आवास उपलब्ध कराने , आर्थिक मदद हेतु कार्य की व्यवस्था , कार्य निष्पादन मूल्यांकन  करने तथा उनसे सम्बंधित विभिन्न आंकड़े जुटाने थे.  इस कार्य के विस्तार और समय के तकादे के मद्देनजर आलियां ने तेजस्वी को एक और साथी को इस प्रोजेक्ट से जोड़ लेने के निर्देश भी दिए। 

सिमरन प्रशिक्षण अवधि में उसकी  साथी थी।   उनकी अच्छी मित्रता भी  हो चली  थी. तेजस्वी ने इस कार्य के लिए सिमरन के नाम की सिफारिश की। एक ही साथ कार्य करते दोनों आपस के अनुभव बांटती। जब -तब सिमरन उसके पास आ कर बैठ जाती और विभिन्न विभागों के हर व्यक्ति से जुडी ख़बरें सुनाती रहती।  पता नहीं वह इतनी सूचनाएं कहाँ से जुटाती थी। काम के बीच सर जुड़ाए खुसर- पुसर करते ,  देख दूसरे साथी बहुत चिढ़ते कि आखिर  ये यहाँ क्या करने आई हैं  मगर सिमरन पर कुछ असर न होता। 
कार्य के बीच चर्चा , विमर्श के दौरान जब भी वे लोग अन्य साथियों के साथ होते ,  सिमरन तेजस्वी की प्रशंसा ही करती  नजर आती।    तुम कितनी सुन्दर हो , तुम लिखती कितना अच्छा हो , .कितनी मेहनती  हो।  तेजस्वी विनम्रता से अपनी प्रशंसा सुनते हुए थोडा सकुचाती .  वह कई बार दबी जुबान में उसे मना  भी करती। 

अब सिमरन और तेजस्वी को अपने इस कार्य की रिपोर्ट वायब्रेंट  मिडिया हाउस  की विभागीय प्रभारी सुचित्रा को देनी थी।  स्त्रियों से जुड़े  सभी विषयों को  सुचित्रा ही देखती थी।  आलिया  से बिलकुल विपरीत  सुचित्रा अत्यंत सख्त मिजाज थी। अपने विषय में निष्णात सुमित्रा को  स्त्री इनसायक्लोपीडीया भी कहा जाता था।  तेजस्वी नोट करती कि उनके चेहरे पर एक मुस्कराहट भी अतिरिक्त नहीं होती थी , बल्कि शायद उसने उन्हें कभी मुस्कुराते हुए भी नहीं देखा था।  स्त्रियों से जुडी शिकायतों में वे हमेशा स्त्री के पक्ष में ही रहती।  इस मामले में उन्हें जरा भी लापरवाही पसंद नहीं थी। यदि किसी भी रिपोर्ट में स्त्री पर  आरोप सही  साबित होने की स्थिति में होता  , तब वे उस पर गहन  छानबीन करती ,कई फेरबदल करवाती  , यहाँ तक कि कई बार रिपोर्ट ख़ारिज ही कर देती।


कानून की अवधारणा की तर्ज पर ही उनका अजेंडा था कि कई दोषी स्त्रियां बच निकलें तो कोई बात नहीं , मगर एक भी निर्दोष स्त्री  उपेक्षा अथवा  गलतबयानी की शिकार न हो। उनके स्त्रियों  से जुड़े मामलों पर  अतिवादी रुख तथा  तीव्र प्रतिक्रिया से  आतंकित पुरुष साथी घबराये से रहते। उनके सौंपे गए कार्य  जल्दी से निपटाकर भागने की कोशिश में रहते। पीठ पीछे लोग उन्हें हिटलर अथवा कुंठित स्त्री का खिताब देते नजर आते , यहाँ तक कि  सिमरन भी अन्य साथियों के साथ मिलकर अक्सर सुचित्रा का उपहास करती   हालाँकि उनके सामने कुछ कहने की हिम्मत किसी में भी नहीं होती थी।  कभी -कभी इस छींटाकशी से   तेजस्वी व्यथित भी होती। वह मानती  थी  कि  उनके इस रूखे व्यवहार के पीछे कुछ तो गम्भीर वजह अवश्य रही होगी।

एक दिन अपने केबिन में उन्हें अकेला पाकर उनके सामने की कुर्सी पर डट गयी।  
सुचित्रा का रुखा सा प्रश्न  था - कुछ काम था मुझसे !
नहीं , बस यूँ ही। आपको अकेले देखा तो बात करने की इच्छा हुई।

 मन में सोच रही थी तेजस्वी कि सख्त मिजाज लोगों के आँखों पर चश्मा ना हो तो उनका सामना बड़ा मुश्किल  हो जाता है।

क्यों , आज तुम्हे कोई काम नहीं है! 
थोडा ही बाकी है। क्या आप कभी हंसती मुस्कुराती नहीं है !
उनके रूखेपन को नजरअंदाज करते हुए तेजस्वी ने कहा।

मैं ऑफिस काम करने के लिए आती हूँ ,  यह कोई मनोरंजन का स्थान नहीं है , जहाँ हंसी -मजाक  कर दिल बहलाया जाए। 
नहीं … मतलब काम तो किया जाना चाहिए … मगर  … बस ऐसे ही … आपको कभी हँसते नहीं देखा … बस इसलिए ही  … अटकते ,झिझकते , डरते तेजस्वी ने कह ही दिया।

अपने काम से काम रखने की सलाह देने की मंशा रखते हुए  सुचित्रा ने एक बार गम्भीर मुद्रा में उसकी ओर  देखा। मगर तेजस्वी के भोले सहमे चेहरे और कागज-पेन  को हाथ में पकड़कर भागने की मुद्रा में देख  रोकते रुकते भी सुचित्रा के मुख पर हलकी-सी मुस्कान आ ही गयी। 

अरे बाबा , मैं हंसती भी हूँ और मुस्कुराती  भी हूँ , मगर उचित कारणो से ही।  बेवजह हंसी -दिल्लगी में मेरी कोई रूचि नहीं है।  तुम्हारी रिपोर्ट कहाँ तक पहुंची , तुम्हे पता है न मुझे काम समय पर चाहिए।

जी , रिपोर्ट लगभग पूरी हो चुकी है , कुछ थोडा- सा कार्य ही अभी बाकी है।

सुचित्रा के रूखे रौबीले व्यवहार से थोडा आहत होते हुए  तेजस्वी को सुखद अनुभूति भी हुई। उसने सुचित्रा को मुस्कुराते हुए देखा  और आँखों में छिपी कही स्नेह की छाया भी अवतरित हुई।

विरोधाभास मूलतः इंसानी प्रवृति ही नहीं , प्रकृति में ही निहित है. बर्फ से ढकी चादर से ढका है गुनगुने पानी का अस्तित्व , नारियल के सख्त आवरण में है सफ़ेद झख मुलायम गिरी , कछुए के कड़े खोल में छिपा है एक नरम वजूद ।  सुचित्रा  और तेजस्वी भी इसी विरोधाभाषी व्यक्तित्व अथवा अनुभूति की प्रतीक दिख पड़ी।

अगले दिन तेजस्वी ऑफिस में पहुंची तो फिजां में तनाव साफ़ नजर आ रहा था। सुचित्रा आज समय से पहले ऑफिस में मौजूद थी।  फक्क पड़े कुछ चेहरों को देखते डेस्क तक पहुची तेजस्वी तो सिमरन   दोनों हाथ बांधे विचारमग्न मुद्रा में खड़ी नजर आई.

मैं यह ऑफिस छोड़ रही हूँ।  
क्यों , क्या हुआ , ऐसे अचानक , तेजस्वी परेशान थी। 
कारण तो तू  सुचित्रा से ही पूछ लेना  , बस तुझे विदा कहने को ही रुकी थी। मुझे जल्दी ही कहीं जाना है।  तेजस्वी की किसी भी प्रतिक्रिया का  इन्तजार किये  बगैर ही सिमरन तीर की तरह दरवाजे से बाहर निकल गयी।

अगले ही पल तेजस्वी सुचित्रा के केबिन में थी। 
मैम , सिमरन ऑफिस छोड़ कर जा रही है , ऐसा क्या हुआ। उसके चेहरे पर उलझन , खिन्नता , परेशानी स्पष्ट पढ़ी जा सकती थी। 
सुचित्रा ने अपनी उसी सख्त रौबदार मुद्रा में उसे बैठने का इशारा करते हुए एक कागज उसके सामने  बढ़ा दिया। 
हलकी सी सिहरन के साथ कागज़ सँभालते तेजस्वी की आँखें तरल हो आई थी।  वह कागज सिमरन के "सुकेत  एक्टिविस्ट" होने की पुष्टि कर रहा था।

क्या तुम्हे पता नहीं है , इस ग्रुप से सम्बन्ध रखने वाले किसी व्यक्ति को हम अपने विभाग में नियुक्ति नहीं दे सकते हैं। यह एक्टिविस्ट ग्रुप हमारे प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मिडिया कम्पनी का ही एक हिस्सा है।

मुझे इस सम्बन्ध  में कोई जानकारी नहीं है, जैसा कि आप जानती है यह  मेरा पहला कार्य ही है।

जिसे किसी प्रोजेक्ट में आप साथ लेते हैं , मित्र बनाते हैं , उसकी जानकारी तो आपको होनी चाहिए। सञ्चालन दृष्टि से दृश्य -श्रव्य माध्यम किसी भी तरह कॉर्पोरेट संस्था से भिन्न नहीं है,  यहाँ भी उतनी ही सतर्कता आवश्यक है।  तुम्हे इसका ध्यान रखना चाहिए था।

सुचित्रा के कमरे से निकलते तेजस्वी अनमयस्क सी थी।  उसने फ़ोन मिलाया सिमरन को ," तूने अपने एक्टिविस्ट होने की बात मुझसे क्यूँ छिपाई। 
मैंने कुछ नहीं छिपाया , मुझे स्वयं ही नहीं पता कि कब उन्होंने मुझे सदस्य बना लिया . मैं मना  कर पाती , इससे पहले ही मेरा नाम सार्वजानिक कर  दिया गया। चल , मैं तुझसे बाद में बात करती हूँ।  
सिमरन ने  बड़ी बेरुखी से अपनी बात समाप्त करते हुए फोन काट दिया।

तेजस्वी अचानक हुए इस घटनाक्रम से बुरी तरह परेशान थी।  शक्ति सदन की उसकी रिपोर्ट भी अधूरी पड़ी थी , उससे सम्बधित  सामग्री भी सिमरन के पास ही थी। उसका किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था। बेखयाली में दो- तीन दिन गुजर गए , मगर उसका कार्य पूरा नहीं था।  अनुशासन की पाबंद सुचित्रा समय में लापरवाही और छूट बर्दाश्त नहीं कर सकती थी, उसने तेजस्वी को इस प्रोजेक्ट  से अलग कर दिया।
अपने पहले बड़े प्रोजेक्ट को अधूरा छोड़ने की कसक तेजस्वी के चेहरे और  कार्यशैली पर स्पष्ट नजर आती थी।  मगर आलिया का व्यवहार अब भी उसके साथ स्नेहपूर्ण ही था। आलिया के निर्देशानुसार अब उसे भारतीय संस्कृति, परंपरा  ,व्रत- त्योहार जैसे विषय पर कार्य प्रारम्भ करना था मगर तेजस्वी का उत्साह क्षीण हो चुका  था।
 कई बार  स्वयं को समझाती तेजस्वी अपने कार्य में मन लगाने का भरपूर प्रयास करती। समय अपनी रफ़्तार से बीतता ही है , मनःस्थिति किस प्रकार  की भी हो। 

 कुछ समय बीते  एक दिन सुचित्रा के केबिन के आगे से गुजरते चिरपरिचित आवाज ने उसके क़दमों को रोक लिया।  केबिन में  झाँक कर देखा तो उसकी हैरानी और ख़ुशी का  ठिकाना न था।  सुचित्रा के सामने कुर्सी पर बैठी सिमरन बहुत बेतकल्लुफी से आपस में विमर्श कर रही थी। उसने दोनों को टोका नहीं और अपनी सीट पर लौट आई।
 उस दिन के  बाद सिमरन से उसकी बात भी नहीं हो पाई थी।    उसे  पूरा यकीन था कि सिमरन तेजस्वी से मिलकर ही  जायेगी , बल्कि तेजस्वी को गहन उत्सुकता थी कि नाराजगी में संस्थान छोड़ने वाली सिमरन को सुचित्रा से आखिर क्या काम रहा होगा। सिमरन का इन्तजार करते अपने काम से फारिग होकर नजरें उठाई  तो अचानक ही सामने से अनजान बन कर गुजरती सिमरन पर उसकी नजर पड़  गई। उसने पीछे से पुकारा भी मगर जाने उसकी आवाज सिमरन के कान तक नहीं पहुंची अथवा उसने जानबूझकर नहीं सुना।

 तेजस्वी देर तक  अजीबोगरीब व्यवहार पर  सोचती रही मगर उसे कोई  सिरा नजर नहीं आया।  उसने सर झटक कर कई बार स्वयं को समझाया शायद  जल्दी में रही होगी , कोई आवश्यक कार्य रहा होगा , सोचते उसका सिर  भारी हो गया।

इसी उधेड़बुन के बीच घर पहुंची  तो माँ सजी- धजी सीमा की  मेहंदी और  महिला संगीत में जाने के लिए तैयार उसका इन्तजार कर रही थी।

रविवार, 16 दिसंबर 2012

रूठना कोई खेल नहीं !


तुम  ही  हो माता ,पिता तुम  ही हो !
तुम ही हो बन्धु ,सखा तुम ही हो !

प्रार्थना के बीच अधमुंदी आँखों से सुनीता ने अपनी पीछे  की लाईन में देखा . कुसुम अब तक नहीं आयी थी . कद के आधार पर बनाई जाने  वाली पंक्तियों में सबसे पीछे लम्बी -सी कुसुम अलग ही दिखती थी . लम्बी कुसुम और छोटी सुनीता दोनों की दांत कटी  दोस्ती पूरे विद्यालय में  लम्बू- छोटू के नाम से जानी जाती थी . विद्यालय में प्रवेश करने के बाद से दोनों हर समय साथ दिखती . टीचर जी द्वारा दिए गए कक्षा कार्य से  लेकर स्पोर्ट्स और खाने तक उनका साथ हमेशा कायम होता .

क्या हो रहा है सुनीता, सीधे खड़ी रहो ...
भटनागर मैम  की कडकती आवाज़ के बीच सुनीता ने जल्दी से दोनों आँखें मीच प्रार्थना में सुर मिलाया . 
कहाँ रह गयी कुसुम !
आज का अनमोल विचार कुसुम को  ही पढ़ना था . 
प्रार्थना के बाद जैसे ही आँखें खोली डायस के पास कुसुम को देख कर राहत  की सांस ली उसने .

प्रार्थना के बाद क्लास में लौटते दोनों की खुसुर पुसुर शुरू थी 
देर कैसे हो गयी .आज टिफिन में क्या लाई हो !

केर का अचार , मूली का पराठा ! 

ला दिखा .

कुसुम  ने लगभग छीनते हुए उसके हाथ से टिफिन ले लिया और खोलने लगी .

हद है . बहुत सारे हैं.  मम्मी ने तेरे लिए भी एक्स्ट्रा रखे हैं . अभी ही शुरू मत हो जा .

लंच तक कौन रुकेगा !

 कुसुम ने टिफिन खोल लिया था . क्लासरूम में अपनी सीट पर पहुँचते एक बड़ा ग्रास उदरस्थ कर चुकी थी . दूसरा ग्रास तोड़ि ही था कि   रजिस्टर लिए क्लासटीचर   क्लास में पहुँच गयी . हडबडाहट में टिफिन खुला ही डेस्क की खुली दराज में सरका तो दिया मगर अचार की खुशबू को मैम की नाक से बचाना संभव नहीं हुआ . 

अचार की खुशबू कहाँ से आ रही है .  तुम लोग घर से नाश्ता नहीं करके आते और यहाँ क्लास में घुसते ही  शुरू हो जाते हो. बंद करो यह सब ...

मैम के खुद के मुंह में पानी आ रहा है मगर कहे कैसे . 
बंद कर तो दिया .
कुसुम को कोहनी मारती हुए सुनीता ने टिफिन बंद कर रख दिया .

सुनीता और कुसुम . क्या खुसुर -पुसुर करती रहती हो दोनों . कुसुम तुम वहां से उठो और इधर बाईं बेंच पर बैठो ...

नहीं मैम , हमें यही बैठने दीजिये . हम अब बात नहीं करेंगे .

नहीं तुम उठो वहां से ! कितनी बार समझा दिया तुम्हे !

प्लीज़ मैम ...पक्का अब नहीं  करेंगें बातें, प्लीज़ -प्लीज़ !

ये मेरी आखिरी वार्निंग है ।अब अगर कानाफूसी करती नजर आयी तो क्लास से बाहर निकाल दूँगी ...
भटनागर मैम शब्दों को भरसक कोमल बनाते हुए बोली .

नहीं मैम . अब नहीं करेंगे . 

चल बैठ जा . कॉपी  निकाल फुर्ती  से .  
सुनीता ने कुसुम का हाथ पकड़कर सीट पर बैठा दिया . 

लंच टाइम में क्लास मॉनिटर सहित सभी लड़कियां बरस रही थी . क्या है तुम लोगों का . तुम्हारे कारण पूरी क्लास डिस्टर्ब होती है .

क्या किया मैंने . टिफिन खोल कर दो ग्रास खा लिए . थोडा बतिया लिया तो कौन सा अनुशासन भंग हो गया !

तुम्हारी ढिठाई के कारण  पूरी क्लास का तमाशा बन जाता है  मगर तुम्हे क्या फर्क पड़ता है !

नाराजगी प्रकट करते हुए वीणा क्लासरूम से बाहर निकल गई  .  

उस दिन जाने सर जोड़े जाने किस बात पर खीखी में लगी थी दोनों . मैम का क्लासरूम  में आना उन्हें नहीं दिखा , न ही पूरी क्लास का उनके सम्मान में खड़ा होना . 
थोड़ी देर तक चुपचाप उन दोनों का भरपूर अवलोकन करने के बाद मैम की आवाज़ से ध्यान भंग हुआ।  दोनों  हडबड़ाती गुड मोर्निंग कहती उठ खड़ी  हुई  जरुर मगर बंद होठों में खिलखिलाना रुका नहीं .

पढ़ाते  हुए कई बार ध्यान भंग होने पर शालिनी मैम ने उन्हें बेंच पर खड़ा होने की सजा सुना दी . दोनों साथ खड़े हुए भी अपनी खिलखिलाहट से बाज नहीं आयी . साथ ही हंसी के संक्रमण का असर पूरी क्लास पर होते देख  दोनों को क्लासरूम के बाहर खड़ा कर दिया गया था  .

सब लोग परेशान है हमारे कारण . चल, दोनों आज से अलग सीट पर बैठेंगे , बात भी नहीं करेंगे !
 खीझती हुए कुसुम  ने कहा .

सॉरी , मैं ऐसा नहीं करूंगी .

अरे !सचमुच बात करना बंद थोड़ी न कर देंगे .  बस क्लास में नहीं बोलेंगे  सबको यही लगेगा कि  हमारा झगडा हो गया .

नहीं , मुझसे नहीं होगा . मैं पूरे एक पीरियड तुझसे बात नहीं करूँ . ऐसा नहीं हो सकता .

रोज क्लास का माहौल खराब होता है . सबसे डांट  पड़ती है.   सिर्फ एक दिन के लिए यह नाटक कर देखते हैं .

दूसरे दिन सुबह पूरी क्लास हैरान थी . सुनीता और कुसुम अलग -अलग आई क्लास में और एक दूसरे  से दूर दूसरी कतार में बैठी . बस एक दूसरे को मुस्कुराते देखती रही मगर बात नहीं की .
पूरी क्लास दम साधे  लंच का इन्तजार कर रही थी . यह सातवाँ आश्चर्य संपन्न कैसे हुआ . कुछ बच्चे सुनीता के पास तो  कुछ कुसुम के पास घेरा बना कर खड़े हो गए .

क्या हुआ .आज दोनों बात नहीं कर रही . 
अपना टिफिन लेकर कुसुम के पास जाती सुनीता के पाँव वहीं  थम गए वीणा की आवाज सुनकर.

कुछ नहीं .  बस अब बात नहीं करेंगे . रोज डांट पड़ती है हमें . 

अच्छा है . क्लास में शांति बनी रहेगी.  देखते हैं कितनी देर तक ...वीणा  मटकते हुए वहां  से चली गयी .

 कुसुम सोचती रही सुनीता आएगी अपना टिफिन लेकर उधर सुनीता उसके आने का  इतंजार करती रही . आखिर  लंच समय समाप्त हुआ . दोनों के टिफिन बिना खुले बैग में रख गए .

आखिरी पीरियड के बाद उसी तरह गोलों में घिरी दोनों अपनी -अपनी बस में चढ़ गयी . पेट में दौड़ते चूहों ने जोर मारा बस में टिफिन खोलकर खाती सुनीता और कुसुम की आँखें नम  थी . यह पहला अवसर था जब कैर का अचार अनखाया रह गया था 

दूसरा दिन , तीसरा दिन और कई दिन इसी तरह गुजरते गए . 

सुनीता और कुसुम दोनों ही सोचती रही ।.उनका सचमुच झगडा थोड़ी ना हुआ है . मगर फिर से बात कौन पहले शुरू करे। दोनों एक दूसरे को देखती दूर से. मुस्कुराती मगर शब्द जुबान पर ही अटके रहते .  

सहपाठी सोचते ,पूछते , बाते करतें .

क्या हुआ है इन  दोनों के बीच .  किस बात पर झगडा हुआ .
 
दोनों चुप रहती।  

क्या कहती . झगडा तो हुआ ही नहीं था . रूठने का खेल हकीकत- सा हो गया था . 

फाइनल एक्जाम के लिए प्रिपरेशन लीव शुरू होने वाली थी . दोनों रोज़ सोचती आज  बात की  शुरुआत कर ही लेंगे  मगर स्कूल पहुँचते समझ नहीं आता . क्या बात करें . कैसे बात करें . एक गुमसुम सन्नाटा सा पसरा रहता उन दोनों के बीच . 

एक दिन सुनीता ने तय किया कि  आज  वह बात कर के ही रहेगी . बात ही क्यों  सीधे अपना बैग अपनी पहले वाली सीट पर ही रखेगी . 

प्रार्थना में उसकी नजरे ढूंढती रही कुसुम को  मगर वह कहीं नजर नहीं आयी और ना ही क्लास में . 
किससे पूछे वह कि  कुसुम क्यों नहीं आयी . 

हमेशा  उन दोनों से ही सब पूछते थे दोनों के बारे में .
 एक दिन , दो दिन ,कई दिन बीत गए . आखिर  एक दिन सुनीता पहुँच ही गयी कुसुम के उन रिश्तेदार के घर जहाँ वह पेईंग गेस्ट बन कर  रह रही थी . 

कुसुम के चिकित्सक पिता की पोस्टिंग एक कस्बे  में थी जहाँ शिक्षा की समुचित व्यव्यस्था नहीं हो पाने के कारण कुसुम को इस शहर में अपने रिश्तेदार के घर रहना पड़ा था .  मालूम हुआ  कि उसके पिता की तबियत अचानक बहुत ख़राब हो गयी .उसे जाना पड़ा था . उसके पिता का स्थानांतरण बड़े शहर में हो गया है .  वह सिर्फ परीक्षा देने ही आएगी .और इसके बाद  अपने परिवार के साथ उस शहर में ही रहेगी .

सुनीता लौट आयी थके क़दमों से . खेल -खेल में रूठने ने उसकी एक मित्र को उससे हमेशा के लिए दूर कर दिया था . 
दिन , महीने , साल बीतते गए . सुनीता और कुसुम का आमना -सामना कभी नहीं हुआ मगर अब सुनीता को भूल कर भी किसी से रूठने में डर लगता है . 
कही वह इस रिश्ते को हमेशा के लिए खो ना दे !


अपना लिखा अर्चनाजी की आवाज़ में सुन लेना सुखद है !
साभार !
http://archanachaoji.blogspot.in/2012/12/blog-post_5597.html

गुरुवार, 25 मार्च 2010

विपत्ति कसौटी जे कसे सोई सांचे मीत .....



जीवन एक संग्राम ही तो है । जिसमे समय समय पर विभिन्न विपत्तियाँ आती हैं । इन विपत्तियों में ही परम मित्र की सत्यता प्रमाणित होती है ।
पंचतंत्र में कहा गया है ...." जो व्यक्ति न्यायलय, शमशान और विपत्ति के समय साथ देता है उसको सच्चा मित्र समझना चाहिए "
मित्र का चुनाव बाहरी चमक दमक , चटक मटक या वाक् पटुता देखकर नहीं कर लेना चाहिए। मित्र ना केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाला बल्कि हमारी भावनाओं को समझने वाला सच्चरित्र , परदुखकातर तथा विनम्र होना चाहिए।

मित्रता के लिए समान स्वाभाव अच्छा होता है परन्तु यह नितांत आवश्यक नहीं है। दो भिन्न प्रकृति के मनुष्यों में में भी मैत्री संभव है। नीति-निपुण अकबर तथा हास्य -व्यंग्य की साकार प्रतिमा बीरबल, दानवीर कर्ण और लोभी दुर्योधन की मित्रती भी विपरीत ध्रुवो की ही थी ...

सच्ची मित्रता बनाये रखने के लिए जागरूकता आवश्यक है। यह देखना आवश्यक है कि क्या हमारा मित्र हमारा हितैषी है ? हमें सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है ? दोषों से हमारी रक्षा करता है? निराशा में उत्साह देता है ? शुभ कार्यों में सहयोग और विपत्ति सहायता करता है या नहीं ?

दूसरी जागरूकता यह होनी चाहिए कि हम अपने मित्र के विश्वासपात्र बने । उसकी निंदा से बचे। उन पलों या घटनाओं को उससे दूर, छिपा कर रखे जो उसे अंतस तक दुःख पह्नुचाते हैं ना कि उसका विश्वासपात्र बनने के लिए उसे खूब प्रचारित करे ।
किसी ने ठीक कहा है ..." सच्चा प्रेम दुर्लभ है , सच्ची मित्रता उससे भी दुर्लभ "

श्रीरामचरितमानस के पठन का असर अभी गया नहीं है ...राम की महिमा ही ऐसी है .... मित्र धर्म पर पर कुछ बेहतरीन सूक्तियां देखें ....

जे ना मित्र दुःख होहिंबिलोकत पातक भारी
निज दुःख गिरी संक राज करी जानामित्रक दुःख राज मेरु समाना

जोग लोग मित्र के दुःख से दुखी नहीं होते, उन्हें देखने से ही बड़ा पाप लगता है । अपने पर्वत के समान दुःख को धूल के सामान तथा मित्र के धूल के समान दुःख को पर्वत के समान जाने ।

जिन्ह के असी मति सहज ना आई ते सठ कत हठी करत मिताई
कुपथ निवारी सुपंथ चलावा गुण प्रगटे अव्गुनन्ही दुरावा

जिन्हें स्वाभाव से ऐसी बुद्धि प्राप्त नहीं है , वे मूर्ख क्यों हाथ करे किसी से मित्रता करते हैं ? मित्र का धर्म है वह मित्र को बुरे मार्ग से रोक कर अच्छे मार्ग पर चलाये। उसके गुण को प्रकट करे और अवगुणों को छिपाए।

देत लेत मन संक धरई बल अनुमान सदा हित कराई
विपत्ति काल कर सतगुन नेहा श्रुति का संत मित्र गुण एहा

मित्र अपने बल अनुसार देने लेने में संकोच ना करते हुए सदा हित करे । विपत्ति के समय सौगुना स्नेह करे। वेद कहते हैं कि सच्चे मित्र के यही गुण होते हैं ।

आगे कह मृदु वचन बनाई पाछे अनहित मन कुटिलाई
जाकर चित अहि गति सम भाई अस कुमित्र परिहरेहीं भलाई

जो सामने तो बना बना कर भले वचन कहता है और पीठ पीछे बुराई करता है , तथा मन में कुटिलता रखता है। जिसका मन सर्प की चाल के सामान टेढ़ा है,उस कुमित्र को त्यागने में ही भलाई है ।

सेवक सठ , नृप कृपन , कुनारी, कपटी मित्र सुल सम चारी ....
मूर्ख सेवक, कंजूस राजा , कुलटा स्त्री और कपटी मित्र ये चारों शूल के सामान है ...इनसे बचना चाहिए।

मित्र के बारे में चाणक्य ने भी कुछ लिखा है ....
परोक्षे परोक्षेकर्यहंतारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम
वर्जये तासदृषम मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम
पीठ पीछे काम बिगाड़ने वाले तथा सामने प्रिय बोलने वाले ऐसे मित्र को मुंह पर दूध रखे विष के घड़े के सामान त्याग देना चाहिए ।




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