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गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

नाचेगा इंडिया तब ही तो बढ़ेगा इंडिया!

 


पुराने समय  (मतलब बहुत ज्यादा नहीं 😛)  समय से शादी /विवाह में  संगीत के नाम से कार्यक्रम होता रहा है  जिसमें स्टेज पर परिवार/मित्र आदि अपनी नृत्य कला का प्रदर्शन करते दिख जाते. सब साथ मिल बैठ कर नृत्य गान का आनंद हँसी मजाक और स्वादिष्ट भोजन के साथ करते रहे.  धीरे -धीरे दूल्हा /दुल्हन भी स्टेज पर आने लगे.
फिर शुरू हुआ दूल्हे के स्वागत में स्वयं दुल्हन का नृत्य के साथ पधारना. फिर दुल्हन की माँ का जमाई के स्वागत में, दूल्हे की माँ का बेटे की घुड़चढ़ी पर , दुल्हन के स्वागत में सास ननद का, मायरा भात में भाई के स्वागत में दूल्हा दुल्हन की माताजी का... अभी हाल में देखा विवाह की पहली मेहमान बुआ का भी नृत्य से स्वागत...
इन सब अवसरों पर हमने हमारी बुजुर्ग स्त्रियों को लोकगीत गाते हुए सुना देखा है। लोकगीत की धुन पर नृत्य करते भी.

फिल्मी सितारों के साथ ही यह ट्रेंड धार्मिक कथा प्रवचकों तक भी पहुंच गया. कथा प्रवचन सुनने जाओ तो अभी कथा प्रारंभ ही न हुई उससे पहले भजन पर नृत्य. एक कथा में तो यह भी सुना कि जो यहाँ नहीं नाचोगे तो दुनिया में नाचना पड़ेगा .

झट से दिमाग में गुलाम अली जी घूम गये. हम भी वहीं मौजूद थे हम से भी सब पूछा किये।

हम हँस दिये हम चुप रहे कि तर्ज पर हम अपना सा मुँह लेकर रह गये क्योंकि बस हमारे साथ एक या दो जने ही थे जो चुपचाप बैठे रहे.

अब यह सब पढ़ कर यह न सोचने/ कहने लग जाना कि हमें नृत्य पसंद नहीं। 

नहीं. भई!  बहुत पसंद है. महिला संगीत कार्यक्रमों में शायद हम ही वह होंगे जो बड़े ध्यान से कार्यक्रम को देखते हैं क्योंकि बाकि सारे अपने नृत्य में लीन होते हैं. कभी कभार हुड़दंग में हम भी शामिल हो लेते हैं बिना नृत्य आये भी.

बिना संदेह नृत्य एक आनंददायक कला है पर  आजकल जिस तरह से हर  समय  हर रस्म में नृत्य ही नृत्य हो रहा लगता है जैसे सब मिल कर कह रहे नाचेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया!

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

जीवन की सम्पूर्णता ....



सैद्धांतिक या पारिभाषिक रूप में देखे तो
विवाह (Marriage) दो व्यक्तियों (प्राय: एक नर और एक मादा) का सामाजिक, धार्मिक या/तथा कानूनी रूप से एक साथ रहने का सम्बन्ध है। विवाह = वि + वाह, अत: इसका शाब्दिक अर्थ है - विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) वहन करना

(साभार ..विकिपीडिया )

विवाह एक सूत्र/डोर /धागा है जिससे दो अपरिचित बंधते हैं और जीवन भर साथ चलने और उत्तरदायित्व वहन करने का प्रण करते हैं ...हालाँकि दो व्यक्तियों के आपस में बंधने का करना प्रेम ही होना चाहिए था मगर हमारे सामाजिक ढांचे ने एक तरह से इसे दो व्यक्तियों की एक दूसरे पर निर्भरता में तब्दील कर दिया है ... इसमें कोई शक नहीं कि जीवन के कठिन रास्तों पर एक हमसफ़र का होना बहुत सुकून देता है ...हर व्यक्ति कभी न कभी ऐसा साथी चाहता ही है जिससे वह अपना सुख दुःख साझा कर सके और आनंद और सुकून के कुछ पल बिता सके ...मगर यदि यह निर्भरता प्रेम के कारण हो तभी आनंददायक हो सकती है , वरना सिर्फ समझौता हो कर रह जाती है ...जबकि सच्चा प्रेम वह है जो किसी भी प्रकार की निर्भरता , आशा या अपेक्षा से बंधा नहीं होता ... व्यवहार में विवाह को प्रेम के आनंद पर आधारित होना चाहिए मगर जब समझौते का रूप ले लेता है तो प्रेम छू मंतर हो जाता है ...

मानव जाति के विकास , सृष्टि की निरंतरता और व्यक्ति के जीवन में सरलता के लिए विवाह एक आवश्यक प्रक्रिया है लेकिन विवाह में व्यक्ति संकुचित हो जाता है और परिवार उसकी प्राथमिकता हो जाती है . मेरे विचार में यही होना भी चाहिए ...प्रेम दो व्यक्तियों के बीच बढ़कर , परिवार , समाज , देश और फिर सृष्टि तक विस्तार पाए ..

विवाह में प्रेम नर और नारी के बीच का व्यवहार है जब कि जीवन जीने की आदर्श स्थिति मानव से मानव के प्रेम में है ...जीवन की सम्पूर्णता प्रेम में है ....मानव से मानव का , प्रकृति, पशु , पक्षियों , समाज , देश , पृथ्वी सबसे प्रेम ..मानवता का अस्तित्व बनाये रखने लिए भी यही आवश्यक है ....अपने प्रकृति प्रदत्त, वैधानिक या ईश्वर द्वारा निर्धारित रिश्तों से प्रेम तो सभी करते हैं , कर लेते हैं मगर लोक कल्याण के लिए प्रेम , करुणा और स्नेह के स्थाई भाव की आवश्यकता है ...जो लुप्तप्राय सा हो चला है ... नफरतें , रंजिशें , आतंकवादी घटनाये , बढ़ते अपराध स्नेह और करुणा के सूखते स्रोतों के कारण ही अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं !

विवाह में प्रेम और समस्त मानव जाति के प्रेम में बहुत अंतर है.… विवाह में बंधा प्रेम दो व्यक्तियों और परिवारों के बीच संचारित है , जबकि मानव से मानव अथवा मानव  का प्रकृति और उसके सभी अवयवों से प्रेम अपने दिव्य रूप में प्रसारित है. 


सृष्टि में मानव श्रृंखला की सतत गति बने रहने के लिए जहाँ परिवारों और समाजों की स्थापना आवश्यक है ,वही विभिन्न समाजों और प्रकृति की जीवन्तता कायम रखने के लिए मानव का मानव और प्रकृति से प्रेम आवश्यक  है. किसी भी प्रकार से परिवारों के सदस्यों के पारस्परिक प्रेम  और मानव से मानव/प्रकृति के प्रेम को छोटा अथवा  बड़ा कर देखा अथवा  परिभाषित नहीं किया जा सकता  …. 
मानव जीवन के अस्तित्व के लिए प्रेम का होना आवश्यक है , वह परिवार , समाज , मानव अथवा प्रकृति  (इस धरा पर स्थित उपस्थित भूभाग , नदिया , झरने , पर्वत ,पठार , जीव जंतु इत्यादि  )  से भी हो , सभी से हो !!  

डॉ महावीरप्रसाद द्विवेदी ने 'प्रेम' की व्याख्या कुछ इस तरह की है कि -

 'प्रेम से जीवन को अलौकिक सौंदर्य प्राप्त होता है। प्रेम से जीवन पवित्र और सार्थक हो जाता है। प्रेम जीवन की संपूर्णता है।'
प्रेम चतुर मनुष्यों के लिए नहीं है। वह तो शिशु-से सरल हृदय की वस्तु है।' सच्चा प्रेम प्रतिदान नहीं चाहता, बल्कि उसकी खुशियों के लिए बलिदान करता है। प्रिय की निष्ठुरता भी उसे कम नहीं कर सकती।
प्रेम एक दिव्य अनुभव , एहसास है जो स्नेह , करुणा और दुलार से पूरित होता है ...वह चाहे मानव से मानव का , मानव से प्रकृति का , माता- पिता से अपनी संतान का ,या प्रेमी -प्रेमिका और पति- पत्नी के बीच हो ...

निस्वार्थ प्रेम की पराकाष्ठा के रूप में हमारे शास्त्रों और धार्मिक प्रसंगों में राधा कृष्ण के प्रेम के अनेक दृष्टान्त है ...हालाँकि यह प्रेम भी दो व्यक्तियों नर /नारी के बीच का ही उदाहरण है मगर समूची सृष्टि इस के आनंद से अभिभूत है ...
उन्हीं के अनुसार एक बार राधा से श्रीकृष्ण से पूछा- हे कृष्ण तुम प्रेम तो मुझसे करते हों परंतु तुमने विवाह मुझसे नहीं किया, ऐसा क्यों? मैं अच्छे से जानती हूं तुम साक्षात भगवान ही हो और तुम कुछ भी कर सकते हों, भाग्य का लिखा बदलने में तुम सक्षम हों, फिर भी तुमने रुक्मिणी से शादी की, मुझसे नहीं।
राधा की यह बात सुनकर श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया- हे राधे, विवाह दो लोगों के बीच होता है। विवाह के लिए दो अलग-अलग व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। तुम मुझे यह बताओं राधा और कृष्ण में दूसरा कौन है। हम तो एक ही हैं। फिर हमें विवाह की क्या आवश्यकता है। नि:स्वार्थ प्रेम, विवाह के बंधन से अधिक महान और पवित्र होता है। इसीलिए राधाकृष्ण नि:स्वार्थ प्रेम की प्रतिमूर्ति हैं और सदैव पूजनीय हैं।
प्रकृति से मानव के प्रेम के सन्दर्भ में राजस्थान के खेजडली ग्राम के निवासियों के प्रयास और योगदान को बिसराया ही नहीं जा सकता. उत्तराखंड की वर्तमान त्रासदी के मद्देनजर यह दृष्टांत अत्यंत ही उपयोगी /अनुसरणीय प्रतीत होता है। 


राजस्थान में एक कहावत प्रचलित है ..."सर सांठे रुंख रहे तो भी सस्तो जान " यानी यदि सर कटकर भी वृक्षों की रक्षा की जाए तो भी फायदे का ही काम है .जोधपुर के किले के निर्माण में काम आने वाले चूने को बनाने के लिए लकडि़यों की आवश्यकता महसूस होने पर लिए खेजड़ली गांव में खेजड़ी वृक्षों की कटाई का निर्णय किया गया। इस पर खेजड़ली गांव के लोगों ने निश्चय किया कि वे वृक्षों की रक्षा के लिए के लिए अपना बलिदान देने से भी पीछे नहीं हटेंगे . आसपास के गांवों में संदेशे भेजे गए ..लोग सैकड़ों की संख्या में खेजड़ली गांव में इकट्ठे हो गए तथा पेड़ों को काटने से रोकने के लिए उनसे चिपक गए। पेड़ों को काटा जाने लगा, तो लोगों के शरीर के टुकड़े-टुकड़े होकर गिरने लगे। एक व्यक्ति के कटने पर तुरन्त दूसरा व्यक्ति उसी पेड़ से चिपक जाता। धरती लाशों से पट गई . कुल मिलाकर 363 स्त्री-पुरूषों ने अपनी जानें दीं। जब इस घटना की सूचना जोधपुर के महाराजा को मिली, तो उन्होंने पेड़ों को काटने से रोकने का आदेश दिया !


प्रकृति प्रेम का इससे बड़ा और क्या उदाहरण हो सकता था ..  उनके  लिए जीवन की सम्पूर्णता वृक्षों /प्रकृति से प्रेम में ही रही!!

इस तरह समाज में अनेकानेक उदाहरणों ने साबित किया है कि जीवन की सम्पूर्णता सिर्फ विवाह में ही नहीं  अपितु  आध्यात्मिक उन्नति , और मानव से मानव के मध्य  स्नेह, प्रेम और करुणा के विस्तार में भी है ! 

स्वामी विवेकानंद , मदर टेरेसा , अटल बिहारी बाजपेयी , अब्दुल कलाम आज़ाद, बाबा रामदेव , आदि महत्वपूर्ण हस्तियों ने अपने जीवन को मानव कल्याण के लिए समर्पित किया और उनके जीवन की सम्पूर्णता पर किसे शक है !!!


 

बुधवार, 5 जनवरी 2011

हमारे संस्कार बन गए हैं उनकी मौज मस्ती ....!

कड़ाके की ठंड पड़ रही है इन दिनों ...शादियों का मौसम भी कुछ समय लिए थमा हुआ है ....हिन्दू समाज में मल मास में शादियाँ या अन्य शुभ कार्य नहीं किये जाते हैं ...मौसम के मिजाज़ को देखते हुए यह ठीक भी है ....

मेरी बात इस समय से कुछ पहले की है यानि जब शादियों का मौसम अपनी पीक पर था ....इस सीजन में कुछ शादियों में सम्मिलित होने का अवसर प्राप्त हुआ जो सामान्य से लेकर थीम पर आधारित भी थी ...ये संयोग ही रहा कि कुछ दिनों के अंतराल पर एक राजपूत परिवार के विवाह समारोह में शामिल हुए , तो दूसरी ओर एक राजपूताना थीम पर आधारित ....जहाँ एक विवाह में लोंग मदिरा और सामिष भोजन के आगे ढेर हुए पड़े थे , वही दूसरी सौम्य सभ्य, जहाँ मधुर गीतों की स्वरलहरियों के साथ वर- वधु ,घराती और बाराती सभी आनंदित हो रहे थे ....यही फर्क होता है थीम और आम विवाह समारोह में ....मगर औपचारिक होते जा रहे समारोहों में कुछ नजदीकी रिश्तेदारों के अलावा अन्य लोगों की भागीदारी सिर्फ भोजन करने और लिफाफा पकड़ने तक ही सीमित रह गयी है ....कई विवाह समारोहों में तो आगंतुकों ने दूल्हा- दुल्हन को देखा भी नहीं होता है ...बस खाना खाया , लिफाफा पकडाया और चल दिए ...कई बार हम भी ऐसा ही कर देते हैं ...

एक विवाह कजिन के ससुराल में था ...कजिन दौड़ी चली आई ....मेरे ब्लॉग की नियमित पाठक भी है ...कहने लगी कि ध्यान रखना पड़ता है ....लिखने वालों का क्या भरोसा ...कुछ भी लिख दे और हम साथ हँस पड़े ...सत्य ही लिखने वालों से डरना पड़ता है ...बस फर्क यही रह गया है कि भय सिर्फ आम लोगों के साथ जुड़ गया है ....जिन्हें डरना चाहिए वे ही नहीं डरते हैं ...आप लाख कलम घसीट लें ....

विवाह समारोहों के इस मौसम में एक विवाह के टूटने की खबर भी छाई रही ...अरुण नायर और लिज़ हर्ली के विवाह-विच्छेद की खबर बहुत चर्चा में रही ... वे विवाह बंधन में पहले ही बंध चुके थे मगर हिन्दू तरीके से विवाह का लुत्फ़ उठाने के लिए ही उन्होंने इस धरती को उत्सव का एक और अवसर दिया ....हम उत्सव प्रेमी भारतीय जो सप्ताह के सात दिन व्रत कर उन्हें भी उत्सव की तरह ही मना लेते हैं , विदेशियों के लिए खासी ईर्ष्या का सबब बन जाते हैं ....मार्च २००७ में धूम धाम से हुए इस भव्य विवाह समारोह को अभी लोंग भूला नहीं पाए होंगे कि उनका विवाह टूटने की खबर भी आ गयी ....विदेशियों के लिए यह कुछ अचंभित करने जैसा मुद्दा नहीं है ....उनके यहाँ विवाह जन्मों का बंधन नहीं , एक औपचारिक रस्म भर है ....

खैर बात यहाँ भव्य विवाह समारोहों की हो रही है ...चूँकि अधिकांश भारतीयों के लिए विवाह मात्र एक रस्म नहीं है , एक संस्कार है जो ना सिर्फ स्त्री पुरुष को आजीवन बंधन में बांधता , बल्कि दो परिवारों को भी आपस में जोड़ता है ...और अपने या अपने परिवारजन के जीवन के लिए अनमोल पल होता है इसलिए इस महत्वपूर्ण पल को यादगार बनाने के लिए भरसक प्रयत्न होता है ...विवाह की भव्यता और ताम झाम इसी विश्वास से प्रेरित हैं ...

हमारे विवाह पद्धति का आकर्षण इसलिए ही विदेशियों को खींच लाता है ...वे हमारी विवाह पद्दति के उद्देश्य से सर्वथा अनजान होते है , बस इसका ग्लैमर ही प्रभावित करता है ..विवाह भी उनके पर्यटन का एक अंग बन गया है ...दोष इन विदेशी सैलानियों का नहीं है ...हम अधिकांश भारतीय भी विवाह में होने वाली विभिन्न रस्मों सिर्फ को मौज मस्ती की तरह ही लेने लगे हैं ...ना तो विवाह करवाने वाले पंडित इन रस्मों की महत्ता बताने में रूचि रखते हैं और ना ही अन्य लोग जानने में ...और इसका परिणाम ही है तलाकशुदाओं की बढती संख्या ... चूँकिहिन्दू विवाह पद्धति में विवाह सिर्फ दो व्यक्तियों का बंधन नहीं अपितु दो परिवारों का सम्बन्ध है इसलिए विवाह के टूटने पर दोनों पक्षों के माता -पिता और अन्य सम्बन्धी भी प्रभावित होते हैं ...बच्चे तो खैर सर्वाधिक पीड़ित पक्ष में आते हैं ...
हिन्दू विवाह पद्धति में विवाह शर्तों पर आधारित नहीं होता है .... यह हमारा धार्मिक संस्कार और संकल्प है दो इंसानों के एक साथ मिलकर चलने के लिए ...सप्तपदी में लिए जाने वाले सात वचन जो कन्या/वधु अपने पति /वर से लेती है वे इस प्रकार है ....

१. बिना किसी कारण से तुम रात बाहर नहीं बीताओगे। बाहर भोजन भी नहीं करोगे।’

२. तुम्हारे सुखदुःख, भाईबंधु अब मेरे होंगे। मेरा पालनकर्ता बनकर तुम मेरी सब जरूरतें पूरी करना।

३. ‘मैं तुम्हारी शक्ति लेकर अपनी शक्ति ब़ढाऊंगी।’

४. ‘मैं तुम्हारी खातिर जिऊंगी। तुम मेरी चिंता करना।’

५. मैं रूठूं, झगडूं, तब भी तुम शांत रहना। बुरा मत मानना।’

६. मेरे मातापिता ने पालपोस कर कन्यादान किया है, उन्होंने कुछ दिया न दिया, तुम कभी ताना मत मारना।’

७. ‘हवन, यज्ञ और सभी धार्मिक कार्यों में मैं तुम्हारी भागीदार रहूंगी, परंतु तुम्हारे पाप कार्य में मैं भागीदार नहीं रहूंगी। मैं अपना धर्म भी नहीं बाटूंगी । तुम पराई स्त्री का संसर्ग कभी नहीं करोगे।’

वर द्वारा उपरोक्त सात वचनों को स्वीकार करने पर ही कन्या उसके वाम भाग में बैठती है तत्पश्चात दोनों ध्रुवतारा के दर्शन करते हैं जिसका कारण उनके संबंधों की ध्रुव तारे सी अटलता की कामना ही है ...

इन वचनों /कसमों /प्रतिज्ञाओं को समझे बिना ही सिर्फ अग्नि के सात फेरे लेना ही विवाह नहीं है ....ये सात वचन हमारी विवाह पद्धति की मुख्य रस्मे हैं जिन्हें हम कम से कम महत्व देते हुए अपना पूरा ध्यान अच्छे खाने , नाच गाने पर केन्द्रित करते हैं ....

विदेशियों से तो हम शिकायत कर भी ले , मगर अपने लोगों का क्या करें ... !!!!!