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शनिवार, 19 जनवरी 2019

उल्टा स्वस्तिक भी शुभ की कामना से...अजब गजब मान्यताएं


         
नहर के गणेशजी, जयपुर

हिंदू धार्मिक परंपरा में स्वस्तिक चिंह बहुत महत्व रखता है. गणेश पुराण के अनुसार स्वस्तिक गणेश का ही एक रूप माना जाता है इसलिए किसी भी भी प्रकार की पूजा (दैनिक या विशेष) में शुभ की कामना और प्रार्थना के साथ स्वस्तिक चिंह अंकित किया जाता रहा है. वहीं स्वस्तिक कि सीधा अंकन भी आवश्यक माना जाता है.  उल्टा या आड़ा टेढ़ा स्वस्तिक दुर्भाग्य या विपदा आमंत्रण  का प्रतीक माना जाता रहा है.
 
            आम मान्यता से उलट उल्टा स्वस्तिक

मगर जब जयपुर के  ' नहर के गणेश' में दीवार पर बड़ी संख्या में उल्टे स्वस्तिक अंकित देखे तो बहुत अजीब लगा. जिज्ञासा हुई कि आखिर  इतने लोग गलती कैसे कर सकते हैं. क्या किसी ने टोका नहीं होगा!!
पड़ताल में सामने आई यह जानकारी कि यहाँ लोग जानबूझ कर उल्टा स्वस्तिक बनाते हैं. किसी कार्य के पूर्ण होने की मान्यता लेकर उल्टा स्वस्तिक बनाते हैं और जब वह कार्य पूर्ण हो जाये तब वही व्यक्ति वापस आकर सीधा स्वस्तिक बनाता है. विशेष रूप से अविवाहित युवक/युवती विवाह की मन्नत कर उल्टा स्वस्तिक बनाते हैं और विवाह के पश्चात जोड़े सहित सीधा स्वस्तिक अंकित कर आभार प्रकट करते हैं.

बताया जाता है कि तांत्रिक क्रियाओं से प्राप्त भस्म से बनाई गई यह गणेश प्रतिमा लगभग 177 वर्ष पूर्व दक्षिणाभिमुख स्थापित की गई थी. इस गणेश प्रतिमा की सूंड का दाहिनी तरफ होना भी  इसकी एक विशेषता है.

जब गूगल पर उल्टे स्वस्तिक के बारे में खोज खबर ली तो मध्यप्रदेश के महेश्वर में लगभग 900 वर्ष पूर्व स्थापित गोबर के गणेश जी के यहाँ भी मन्नत माँगते समय उल्टा स्वस्तिक बनाने की प्रथा की जानकारी प्राप्त हुई....

लगभग सभी गणेश मंदिरों अथवा हनुमान मंदिरों में सिंदूर के रंग में  पुती विशेष दीवार होती है ताकि स्थान- स्थान पर सिंदूर लगाकर मंदिर का स्वरूप न बिगाड़ा जाये मगर अनुशासन तो हम भारतीयों के संस्कार में ही नहीं है. मंदिर प्रशासन के सतर्क करते आदेशों/प्रार्थनाओं पर भक्तों की विशेष श्रद्धा हमेशा ही  भारी पड़ती है.

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

म्हारा सोलह दिन को चालो र ईसर ले चाल्यो गणगौर ...


त्योहारों का इंतज़ार हम जहाँ पूरी बेसब्री से वर्ष भर करते हैं , वही इनके जाने के बाद एक अजीब सा खालीपन या सूनापन लगने लगता है ...और जब त्यौहार मनाने की अवधि अठारह - उन्नीस दिन तक रही हो तो इसके बाद का खाली वक़्त और अधिक अखरता है ...

पिछले दिनों गणगौर पर्व की अठारह दिनों की पूजा के बाद हमें भी कुछ ऐसा ही लगा ...सावन की तीज से शुरू होने वाले त्यौहार चैत्र की गणगौर के बाद थोडा अधिक विराम लेते हैं ...रोज 4-5 घंटे सहेलियों(हर उम्र की ) के साथ बिताना और घर के कई कामों को त्योहारी व्यस्तता के कारण टालते हुए त्यौहार के बीत जाने का इंतज़ार , मगर फिर उसके बाद का सूनापन एक उदासी-सी भरता है कुछ समय के लिए ..


होली के दूसरे दिन (धुलंडी )से प्रारंभ हुई मुख्य गणगौर पूजा चैत्र तृतीया ६अप्रैल की गयी तथा इसके दूसरे दिन गणगौर के विसर्जन से " तीज त्योहार बावड़ी ले डूबी गणगौर ' से संपन्न हुई ...

विवाह के पहले वर्ष में नवविवाहित बेटियां गणगौर पूजन के लिए अपने मायके जाती हैं और वहां गणगौर की स्थापना कर पूरे सोलह दिन तक पूजन करती हैं , और साथ देने के लिए सखी सहेलियां और आस पड़ोस की महिलाएं भी उसके साथ पूजन करती हैं ...विवाह के पहले वर्ष में यदि नववधू मायके नहीं जा सके तो ससुराल में ही १६ दिन तक उसे गणगौर का पूजन करना होता है ..पहली बार १६ दिन तक पूजन के बाद हर वर्ष इस लम्बी अवधि तक गणगौर पूजन की कोई बाध्यता नहीं होती ...ये १६ दिन बहुत ख़ास हो जाते हैं क्योंकि लम्बे समय तक चलनी वाली पूजन अवधि के कारण महिलाओं के लिए हर वर्ष पूरे सोलह दिन की पूजा संभव नहीं हो पाती है ...

शीतलाष्टमी के बाद पर्व की रौनक और बढ़ जाती है ...इस दिन जंवारे , हिंडोले आदि की स्थापना के साथ गणगौर को वस्त्र आभूषणों से सजाया जाता है ...तत्पश्चात प्रत्येक दिन गणगौर का बिन्दोरा पूजन करने वाली लड़कियों या महिलाओं के घर रखा जाता है ...गणगौर के पारंपरिक गीतों के साथ गणगौर तथा पूजन कर्ताओं का चाय नाश्ते आदि के साथ आतिथ्य सत्कार किया जाता है ...

हमारी लोक संस्कृति में गीत/संगीत रचे बसे हैं ...महानगरीय संस्कृति में भी ये गीत सामाजिकता निभाने और परिचय बढ़ाने में अनूठी मदद करते हैं , क्योंकि इन गीतों में उपस्थित कन्याओं और महिलाओं के नाम के साथ पिता , पति, ससुर , भाई , बेटा/ बेटी आदि के नाम भी लिए जाते हैं ...इन गीतों के माध्यम से वर्षों तक एक दूसरे के नाम से अपिरिचित लोंग पूरे परिवार के नामों से परिचित हो जाते हैं ..

गणगौर पूजन को जाते अपने पति से मनुहार करती हैं की उन्हें पूजन के लिए जाने दे , उनकी सहेलियां बाट देख रही हैं
भंवर म्हणे पूजन दयों गिन्गौर , म्हारी सहेलियां जोवे बाट ...

पूजन के लिए दूब और जल का कलश भर लाने से ...महिलाएं दूब लेने जाती हैं तो माली/मालन का द्वार खटखटाते हुए उसे दूब देने को कहती हैं ,
बाड़ी वाला बाड़ी खोल , म्हे आया छ दोब न ..
माली/मालन पहले उनसे उनके पिता/ससुर का नाम पूछता है ...
कुण जी री बेटी छो ,कुणजी री बहू छो ...

जल का पात्र भरते हुए वे कहती हैं ......
उंचों चंवरो चौखुटों , जल जमना को नीर भराओ जी , जठा पिता /पति का नाम संपरिया , वांकी रानियाँ /बेटियां ना गौर पूजाओजी...

दूब लेकर लौटती हुई वे गुनगुनाती हैं ...
गौर ए गणगौर माता खोल ए किंवाड़ी, बारे ऊबी थाने पूजन हाळी ...
हे गणगौर माता , किंवार खोल दे , हम पूजन करने वाली बाहर खड़ी हैं ..

गणगौर का पूजन करते हुई वे गाती हैं ...
गोर गोर गणपति , ईसर पूजे पार्वती ...



पूजन करती हुई बहू बेटियों को टोकती महिलाएं जंवारा गीत गाती हैं ...
म्हारा हरया ए जंवारा की जंवारा म्हारा पीला पड़ गया
गोरियों सीचों जतन से , की लाम्बा तीखा सरस बढे

छोटे से कान्हुड़े को झूला झुलाती गाती हैं ...
चंपा की डाळ हिंडोलो जी घाल्यो घाल्यो छ रेशम डोर जी
म्हे हिंडो घाल्यो ...

हर सुहागिन अपने लिए अनमोल चुंदरी की फरमाईश करती हुए गाती हैं ...उसके लिए हरे पल्ले और कसूमल (गहरा लाल रंग )की चुंदरी ले कर आये ..
बाई सा र बीरा , थे तो जयपुर जा जो जी , आता तो ल्याजो तारा की चुन्दडी ...जांका हरया- हरया पल्ला जी , कसूमल रंग की तारा की चुंदरी...

अनगिनत सुमधुर लोक गीत हैं जो इस अवसर पर गाये जाते हैं....
इन लोकगीतों में स्त्रियों को भी पूरी तवज्जो मिलती है , कुछेक ही ऐसे अवसर होते हैं जिनमें वे अपने नाम से जाती हैं ...अपने नाम से अनचीन्ही सी फलाने की बहू , फलाने की माँ इन गीतों को गाते हुए अपने नाम भी लेती है ...
जैसे एक कांगासिया(कंघी ) गीत इस प्रकार है ...
म्हारी बाई (गीत गाने वाली महिलाओं के नाम ) का लाम्बा केस , कंगासियो बाई क सिरां चढ्यों जी राज
"कर ले बाई आरत्यों " मे भी इसी प्रकार महिलाओं के नाम जुड़ते हैं ...

लोकगीतों में महिलाओं के मन की भड़ास निकालने के पूरे अवसर मौजूद होते हैं ...परदे में रहने वाली जो बहुएं , सास -ससुर , देवर ननद आदि से तकरार नहीं कर सकती थी , इन गीतों के माध्यम से अपनी पूरी भड़ास निकल लेती थी ...सास , ननद आदि के पास सिर्फ मुस्कुरा कर रह जाने के अलावा कोई चारा नहीं रहता क्योंकि उसी समय वे स्वयम भी यही गीत गा रही होती हैं ...
गणगौर पूजन के समय कनेर के पत्ते से पूजन करती हुई वे गाती हैं ...
" गेले गेले सांप जाए , सुसराजी थांको बाप जाए "
" गेले गेले हिरनी जाए , सुसराजी थांकी परनी जाए "
" चूल्हा पाचे फिर उन्दरी , सासु जाने बहन सुंदरी "
"चूल्हा पाछ पांच पछेठा , सासू जाने म्हारा बेटा "
इनमे से कुछ शब्दों के अर्थ तो मुझ भी नहीं मालूम ... उपस्थित महिलाओं से संस्कृति से जुड़े कई रोचक आख्यान सुनने को मिल जाते हैं !

विभिन्न त्योहारों अथवा मांगलिक अवसरों पर विशेष प्रकार के पकवान और वेशभूषा राजस्थानी संस्कृति की अनूठी विशेषता है ...इसी प्रकार गणगौर के अवसर पर भी विशेष पकवान " गुणे" और घेवर बनाये जाते हैं .. ...आटे या मैदे के गुड अथवा चीनी की चाशनी पगे आठ या सोलह "गुणों" तथा घेवर ईसर गणगौर को भोग में अर्पित किये जाते हैं....

गुणे
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गणगौर विसर्जन के पल बड़े भावुक होते हैं ...महिलाएं भावुक होकर गीत गाते हुए उन्हें जंवारों सहित विसर्जन के लिए ले जाती हैं ...

म्हारा सोलह दिन को चालो रे इसर ले चाल्यो गणगौर ...
मैं तो बागां में फुन्दी खाती रे ईसर ले चल्यो गणगौर ...
मेरे सोलह दिनों की चहलपहल गणगौर को ईसर जी अपने साथ लिए जा रहे हैं ...

मैं तो बागां में फुन्दी खाती रे ईसर ले चल्यो गणगौर ...
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घरों में सादे तरीके से की गयी पूजा का समापन भी सादगी से होता है , मगर कई स्थानों पर बड़ी गणगौर स्थापित की जाती हैं , उन्हें बाकायदा ढोल नगाड़ों के साथ ले जाकर झील/ तालाब पर विसर्जित किया जाता है , मेला भी लगता है ...

जयपुर की गणगौर की शाही लवाजमे के साथ निकली सवारी देशी -विदेशी पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण होती है ...

सोमवार, 19 नवंबर 2012

अमीर- गरीब , बड़े -छोटे, ऊँच - नीच का भेद मिटाता है छठ पर्व !

    
 छठ राजस्थानियों का पर्व  नहीं है , मगर वर्षों बिहार में रहने के कारण माँ और भाभी भी इस पर्व को पूरी श्रद्धा और विधि विधान से करती हैं , जयपुर के गलता  तीर्थ सहित अन्य कुछ और स्थानों पर इस पर्व के दिन धूमधाम होती है . तीन दिन तक कठोर नियम कायदे के बीच यह व्रत बहुत मुश्किल होता है , हम  सिर्फ जल में खड़े होकर कुछ देर सूप पकड़ना ,  दूध और जल से अर्ध्य देने जितना ही कर पाते है . पिछले कुछ वर्षों में बढती भीड़ के कारण यह भी सोचा गया कि क्यों न यह पर्व घर पर ही मन लिया जाए , मगर  माँ को मनाना इतना आसान नहीं होता , कोई साथ जाए ना जाए , वे तीर्थ स्थान पर ही पूजा करती है . डूबते सूरज को अर्ध्य वाले दिन दोपहर में ही गंतव्य पर पहुँच कर ठहरने का इंतजाम , दरी , रजाई , कम्बल आदि , पूरे  परिवार के शाम के खाने का प्रबंध ,भारी  भरकम पूजन सामग्री के साथ जाना परेद्श भ्रमण जैसा ही हो जाता है . रात भर माईक पर चलने वाली  भजन -कीर्तन की सांस्कृतिक संध्या के अतिरिक्त  पटाखों की आवाज़ , छठ  व्रतियों के परिवार की महिलाओं  द्वारा झुण्ड गाये जाने वाले भजन , चाय नाश्ते के साथ अन्य  साजो सामान की छोटी दुकाने , मेले या हाट का आभास देती हैं .


 छठ पर्व के नियम के अनुसार पूजन/अर्ध्य के   के लिए जुटाई गयी सभी सामग्रियों में शुचिता का पूरा ध्यान रखा जाता है . गेंहू धोकर सुखाने से लेकर खरने के लिए खीर , पूड़ी बनाने , ठेकुआ बनाते समय बहुत सावधानी रखी जाती है . छठ पर्व का मुख्य प्रसाद ठेकुआ व्रतियों द्वारा देर रात बनाया जाता है , कहा जाता है इस समय बिल्ली या किसी भी पशु पक्षी की आवाज़ भी सुनायी नहीं देनी चाहिए . मगर अर्ध्य के समय घाट  पर उपस्थित भारी भीड़ में संतुलन बिगड़ता प्रतीत होता है . गलता  तीर्थ छठ व्रतियों के हिसाब से बहुत छोटा पड़ता है , व्यवस्था बनाये रखने में प्रशासन और विभिन्न स्वयं सेवक संगठनों  को भी बहुत समस्या होती है  . इस भीडभाड से बचने के लिए बहुत से लोग घरों में तसले अथवा टब के  पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्ध्य देने का इतंजाम भी करने लगे हैं .

पंडितों के व्यवधान के बिना भक्त और आदित्य   के सीधे संपर्क का यह  अनूठा पर्व इस मायने में अनोखा है कि इस के नियम पालन के लिए सिर्फ श्रद्धा ही काफी है .  प्रदेश  में बिहारियों की बड़ी संख्या श्रमिक वर्ग की है ,  जिनके लिए रोज की रोटी का इंतजाम ही मुश्किल होता है। अपने परिवार से दूर पर्व के लिए ज्यादा तैयारी नहीं कर पाने के कारण  कई बार इन परिवार के पुरुषों को सिर्फ नारियल या केले का डंठल लेकर ठण्ड में कांपते जल के बीच खड़े सूर्य के उगने या अस्त होने का इन्तजार करते भी देखा जा सकता है  .सूर्योदय के अर्ध्य के बाद अपनी झोली फैलाकर कम से कम दो से सात व्रतियों से प्रसाद माँगना , सुहागन स्त्रियों द्वारा अन्य स्त्रियों की मांग में सिन्दूर भरना भी इस पर्व की एक विशेषता है .   ऊँच - नीच, बड़े- छोटे , अमीर -गरीब का भेद इस समय मिट जाता है .इस पर्व पर भगवान् आदित्य के दर्शन और प्रसाद वितरण का लाभ लेते हिन्दूओं के साथ मुस्लिम और ईसाईयों  को भी आसानी से देखा जा सकता है .

माँ इस बार छठ पर बिहार में हैं . कल शाम  किसी भी शहर के छठ पर्व के विहंगम दृश्यों और तस्वीरों  के लिए समाचार चैनल पर  ट्यून किया तो सामने ह्रदय विदारक दृश्य नजर आये . राज्य की राजधानी जहाँ छठ पर्व का मुख्य  आयोजन होता है , वहां ऐसी बदइन्तजामी देखकर बहुत ही निराशा और दुःख हुआ . भूखे प्यासे व्रतियों और उनके परिजनों के साथ हुए हादसे ने दिल दहला दिया . बांस के कच्चे अस्थायी पुल के कारण  होने वाली इस घटना  के लिए यकीनन  प्रशासन के इंतजामों की खामियां गिनाई जा सकती है , मगर यह भी कहना होगा कि इस प्रकार की अन्य दर्दनाक  घटनाओं में आम नागरिकों का   दोष भी कम नहीं है . हममे  से कितने लोग प्रशासन द्वारा किये गए इंतजामों में उनका ईमानदारी  से सहयोग कर पाते हैं .सबसे पहले , सबसे आगे होने की दौड़ ऐसी बहुत सी घटनाओं का कारण बनती है . लोग कैसे भूल जाते हैं कि भीड़भाड़  वाले स्थानों पर आम जन का संतुलित और सहयोगी होना ही  सुरक्षित होता है  अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी !

जयपुर के गलता तीर्थ पर भी किये गए अनगिनत इंतजामों के बावजूद हालत बहुत खस्ता होती है . भीड़ में कई शराबी भी घुस आते हैं जो व्रतियों के परिवारजन या मित्र  ही होते हैं . इस व्रत के पालन में शुचिता का अत्यंत ध्यान रखे जाने के बाद यह व्यवहार अजीब ही लगता है .इनके द्वारा  कई बार वमन करते हुए चीखने चिल्लाने के अतिरिक्त  मार पीट के दृश्य भी उपस्थित होते हैं , जहाँ पुलिस को बीच बचाव करना पड़ता है . एक शराबी के वमन न का शिकार हमारी नयी कम्बल भी हो चुकी जिसे वही  छोड़ कर आना पड़ा .
सुरक्षा इंतजामों में पुलिस , प्रशासन और स्वयंसेवकों के साथ ही आम जनता की जागरूकता, अनुशासन , सजगता और सहयोग भी  आवश्यक है,  तभी हमारी गंगा जमुनी संस्कृति के आडम्बर रहित पर्व भी प्रसन्नता के साथ मनाये जा सकेंगे .

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

दशहरे की तैयारी रावण मंडी में ....

बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक विजयदशमी पर्व की तैयारी पूरे देश में जोर शोर से चल रही है . रामलीलाओं के मंचन के साथ ही रावण के पुतलों को बनाने और जलाने की तैयारियां अपनी चरम पर है . पहले जहाँ चंदे इकठ्ठा कर कोलोनियों के बड़े और बच्चे बुजुर्गों के निर्देशन में सुखी लकड़ियाँ और रंगीन कागजों से लपेट कर दहन स्थल पर ही रावण का निर्माण करते थे , आजकल कारीगरों ने उनकी इस मेहनत को कम कर दिया है . जेब में पैसे लेकर जाओ और अपनी पसंद का रावण छांट लाओ .

जयपुर के गोपालपूरा बाई पास पर गुजर की थड़ी से लेकर किसान धर्म काँटा तक रावण की मंडी सज गयी है . राजस्थान के जालौर जिले के अतिरिक्त अन्य जिलों से भी कारीगर यहाँ रात दिन रावणों के निर्माण में परिवार सहित जुटे हुए हैं . बांस की खपच्चियों पर लेई की मदद से रंगीन कागज लपेट कर विभिन्न चित्ताकर्षक रावण के साथ ही मेघनाद और कुम्भकरण आदि की छवियाँ तैयार की जाती हैं .



रावण की यह मंडी राह चलते राहगीरों को इतना आकर्षित करती है कि इस मार्ग से गुजारने वाले एक बार रुक कर इसे देखते जरुर हैं , साथ ही अपनी कोलोनियों के सार्वजानिक स्थलों पर रावण दहन की तैयारियों के लिए इनका मोलभाव भी करते हैं . कहा जाता है कि यह एशिया की सबसे बड़ी रावण मंडी है . यहाँ दो से तीन फीट के रावण के साथ ही तेईस फीट तक के रेडीमेड रावण उपलब्ध हैं जिनकी कीमत 150 -200 के साथ 7000 तक है .

सिर तानकर खड़े इन रावणों को देखकर लोंग चुटकी लेने से नहीं चूकते कि दो दिन की और बात है फिर तो तुम्हे खाक में मिलना है , तन ले जितना तनना है अभी ...यही तो मानव जीवन पर भी लागू होता है , लालच , लोभ ,अहंकार में आकंठ डूबे लोंग हर वर्ष रावण की ऐसी दुर्गति देखकर भी अपने जीवन पर दृष्टि नहीं डाल पाते .

हिन्दुओं के धार्मिक ग्रन्थ रामायण/ रामचरितमानस का एक प्रमुख पात्र रावण है . कहा भी जाता है कि रावण ना होता तो रामायण भी नहीं होती . राम का जन्म ही रावण के संहार के उद्देश्य से हुआ था . यहाँ रावण कोई एक व्यक्ति नहीं , बल्कि दुर्गुणों का प्रतीक माना जाता है , परन्तु ऐसे लोगों की कमी भी नहीं जो रावण को असाधारण बुद्धि का ज्ञाता मानते हैं . वाल्मीकि रामायण का हवाला देते हुए रावण को वीर , पराक्रमी , गायनी , ज्योतिष एवं वास्तुकला , नीति व राजनीतिशास्त्र का प्रकांड विद्वान् माना जाता है . वह इंद्रजाल और सम्मोहन विद्या का ज्ञाता भी था . रावण ने राजनैतिक और कुटनीतिक चतुराई दिखाते हुए अपने साम्राज्य की सीमाओं में विस्तार किया . रावण ने शिव तांडव स्तोत्र की रचना करने के अलावा अन्य कई तंत्र ग्रंथों की रचना की. चारों वेदों का ज्ञाता होने के अतिरिक्त रावण संगीत में भी दखल रखता था . वह विना बजाने में कुशल था , साथ ही उसने वायलिन जैसे एक वाद्य यन्त्र का निर्माण भी किया था जिसे रावण हत्था कहा जाता है. रावण पुलस्त्य मुनि के पुत्र विश्र्वश्रवा का पुत्र था , उसकी माता कैकसी दैत्य पुत्री थी , इसलिए ही उसमे विद्वान् ब्राहमण के गुण होने के साथ ही असुर प्रवृति भी थी .

बड़े से बड़े जहाज को डुबोने के लिए एक छिद्र ही काफी है , रावण के पतन के लिए यह उक्ति बिलकुल उपयुक्त साबित होती है . सभी गुणों से संपन्न होने के बावजूद परायी स्त्री के हरण अर्थात उसकी चरित्रहीनता के कारण ही उसका पतन हुआ .
रावण जहाँ दुष्ट था और पापी था वहीं उसमें शिष्टाचार और ऊँचे आदर्श वाली मर्यादायें भी थीं। राम के वियोग में दुःखी सीता से रावण ने कहा है, "हे सीते! यदि तुम मेरे प्रति काम भाव नहीं रखती तो मैं तुझे स्पर्श नहीं कर सकता।" शास्त्रों के अनुसार वन्ध्या, रजस्वला, अकामा आदि स्त्री को स्पर्श करने का निषेध है अतः अपने प्रति अकामा सीता को स्पर्श न करके रावण मर्यादा का ही आचरण करता है।
वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस दोनों ही ग्रंथों में रावण को बहुत महत्त्व दिया गया है। राक्षसी माता और ऋषि पिता की सन्तान होने के कारण सदैव दो परस्पर विरोधी तत्त्व रावण के अन्तःकरण को मथते रहते हैं। (http://bharatdiscovery.org से साभार ).

अहंकार को भयंकर दुर्गुण मानते हुए यह भी प्रचलित है कि अहंकार तो रावण का भी नहीं टिका . कहा भी जाता है कि एक अज्ञानी यदि चरित्रवान है तो उसके अज्ञान को क्षमा किया जा सकता है , क्योंकि वह अच्छे और बुरे का फर्क समझता है , मगर यदि एक विद्वान् इस अंतर को नहीं समझता तो वह स्वयं अपना और अपने कुल का भी नाश करता है . अपने शौर्य और विद्वता के अहंकार और मद में डूबा रावण प्रकृति के संतुलन को समझ नहीं सका और उसके सोने की लंका का सर्वनाश हुआ .


शनिवार, 16 अप्रैल 2011

आवारा सडको पर कभी -कभी इत्तिफाक से ...

हमारा शहर जयपुर ना सिर्फ देश बल्कि विश्व में ऐतिहासिक , संस्कृति एवं धार्मिक पर्यटन के लिए जाना जाता है, मगर कहते हैं ना कि "घर का जोगी जोगना बाहर का सिद्ध" ... शहर के कई पर्यटन/धार्मिक स्थल अभी भी अनदेखे रहे हैं , हालाँकि कई बार उनके सामने से होकर निकलना हो जाता है , मगर "फिर कभी" कहते हुए वे इतने वर्षों में भी अनदेखे ही रह गए हैं ...ऐसा ही एक प्रसिद्द मंदिर है " जयपुर का गढ़ गणेश मंदिर "...गूगल पर पर्यटन स्थलों की खोज में इसे ढूँढने की कोशिश की ,मगर इस मंदिर पर कोई विशेष सामग्री मौजूद नहीं है...जबकि मोती डूंगरी गणेश मंदिर की तरह ही यह गणेश मंदिर भी जयपुरवासियों की आस्था का केंद्र है ...

ऊँची पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर में भी प्रत्येक बुधवार को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है ...पिछले दिनों जब बेटियों को ज्ञात हुआ कि उनका भाई (कज़िन लिखना बहुत अजीब लग रहा है ) प्रत्येक बुधवार को जिस मंदिर में दर्शन करने जाता है , वह ऊँची पहाड़ी पर है और वे कभी वहां गयी नहीं है तो ठिनकना शुरू हो गया उनका " हमें भी जाना है "...बुधवार का इंतज़ार भी नहीं करना चाहती थी ...चूँकि उस मंदिर में बुधवार के अलावा लोगों की ज्यादा आवाजाही नहीं होती , और रोज अख़बारों की हेड लाईन्स शहरों के असुरक्षित होने की गवाही देती हुए अभिभावकों को कितना डराती हैं ... इसलिए अनुमति देते हुए हम थोडा हिचकिचा रहे थे ..मगर जैसे- तैसे चारों बच्चों ने मिलकर हमसे सहमति ले ही ली ...हजार तर्क होते हैं , आप ही तो कहते हो , अपने आप आना- जाना सीखो , अभी तो भाई भी साथ है , और कोई हम घूमने दोस्तों के साथ नहीं जा रहे हैं , मंदिर ही तो जाना है ... इन नयी पीढ़ी के बच्चों से सीखे कोई तर्क से अपनी बात मनवाना ...

सुबह जल्दी उठकर कम्प्यूटर से मगजमारी मेरे लिए कोई नयी बात नहीं है , सुबह 5 बजे ही बेटी का मोबाइल बजा ...भाई अपने घर से रवाना हो चुके थे ...15 मिनट में तो दोनों हाज़िर ...उत्साहित बेटियां फुर्ती से तैयार हुई , मेरी चुटकियों को नजर अंदाज करते हुए ...खाली पेट इतनी ऊँचाई चढ़ना ठीक नहीं है , समझाते हुए बड़ी मुश्किल से केला खाने को राजी किया ...6 बजे उनका काफिला घर से रवाना हो गया ...चली तो गयी बड़ी ख़ुशी- ख़ुशी , मगर जब उस चढ़ाई पर पहुंची तो प्यास के मारे बुरा हाल ... चूँकि उन्हें खड़ी चढ़ाई का अंदाजा नहीं था और रास्ते में पानी का इतंजाम भी नहीं ... मगर वहां पहुँचने के बाद उनके आनद की सीमा नहीं थी ...सुबह सवेरे पक्षियों कोयल , मोर और चिड़ियों आदि की बोलियाँ सुनते हुए पहाड़ी से पूरे शहर का विहंगम नजारा , और मंदिर के दर्शन ...अब मैं तो साथ थी नहीं मगर तस्वीरों और उनके बताये विवरण से ही लिख रही हूँ ...कभी मेरा जाना हुआ तो बाकायदा इस मंदिर के इतिहास और तस्वीरों के साथ विवरण भी होगा ...दरअसल आज की पोस्ट लिखने का कारण बच्चों का घूमना नहीं , बल्कि लौटते समय हुआ एक रोचक वाकया है ...

दोनों बेटियां अपनी स्कूटी पर और भतीजे अपनी बाईक पर खाली सड़कों पर ट्रैफिक नहीं होने का लाभ लेते हुए आड़ी- तिरछी गाड़ियाँ चलाते हुई लौट रहे थे ...छोटा भतीजा पीछे रह गयी अपनी बहनों को चिढाता मोबाइल से उनकी तस्वीरें खिंच रहा था ... बेटी भी स्पीड तेज करती हुई उनसे आगे निकल गयी ...उनके पीछे आ रही एक कार में एक सज्जन यह सब देख रहे थे ...भतीजों की बाईक को रोकते हुए उनसे तस्वीरें खींचने पर डांट लगाने लगे ...जब बच्चों ने उन्हें बताये कि वे अपनी बहनों के साथ है, और उन्हें स्कूटी मोड़ क़र उनके पास आते देखा , तब वे थोड़े शांत हुए ...बाद में बेटियां देर तक चिढाती रही ,"यदि हम ज्यादा दूर आ गए होते तो तुम्हारी वो पिटाई होती "...यह तो खैर मजाक की बात है ...

अब कुछ गंभीर हो जाए ... हम सब उन सज्जन के इस कार्य से बहुत प्रभावित हुए ...यदि इस तरह के जागरूक लोंग खाली सड़कों अथवा भीड़- भाड़ वाले स्थानों पर अपनी सजगता दिखाएँ तो यह दुनिया , समाज लड़कियों /महिलाओं के लिए कितना सुरक्षित हो जाए ...ऐसे समय में जब चेन लूटने से अथवा बदतमीजी का प्रतिरोध करने वाली लड़कियां/महिलाएं ट्रेन के डब्बों से उठाकर पटरियों पर फेंक दी जाती हैं , बोरी में पार्सल कर भिजवा दी जाती है ,समाज के ऐसे जागरूक नागरिकों का होना हौसला देता है , एक विश्वास जगाता है ...सभ्य नागरिक बदतमीजियों/प्रताड़ना को अनदेखा ना करते हुए इस प्रकार अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करे तो लड़कियों /महिलाओं के लिए एक सुरक्षित समाज की स्थापना से कौन रोक सकता है ...
मुझे गर्व है इस शहर के इस जिम्मेदार नागरिक पर ....थोड़ी थोड़ी जागरूकता हम सब भी दिखाएँ , ना सिर्फ लड़कियों या महिलाओं के सम्बन्ध में , बल्कि किसी के साथ भी ,जहाँ भी कुछ गलत /बुरा घटता दिखे ...क्योंकि प्रताड़ना और दुर्घटनाओ के शिकार तो पुरुष भी होते ही हैं !

क्या संयोग है कि इसी दिन आनंद द्विवेदी जी की यह रचना भी पढ़ी ...
"आओ कुछ और करें !"



एक मानवीय कमजोरी बहुत दिनों से चिढ़ा रही है ...हम लोंग अपना दुःख तो बहुत जल्दी दूसरों के साथ बांटते हैं , मगर खुशियाँ अकेले ही सेलिब्रेट करते हैं ...एक पोस्ट लिखी थी , बेटे की बीमारी के बारे में "बेटा बीमार है "... सभी ब्लॉगर्स की दुआ भी काम आई और आज वह एकदम स्वस्थ चित्त अपने पैरों पर खड़ा है ... बहुत दिनों से इस ख़ुशी को बांटना चाह रही थी ..आखिर आज लिख ही दिया ...