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गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

मथुरा , वृन्दावन धाम की यात्रा ....

दूसरे दिन सुबह जल्दी उठकर सभी नहा धोकर तैयार हुए , मंदिर पहुंचे तब तक मंगला आरती तो हो चुकी थी ...मंगला झांकी के दर्शन कर के ही संतुष्ट होना पड़ा ...फिर चल पड़े हम मथुरा की ओर ...

मार्ग में अधिकांश मकान नीले और हरे रंग से पुते हुए थे ...
चरण मंदिर से शहर का विहंगम दृश्य
मथुरा में द्वारकाधीश जी के नजदीक पहुंचे ही थी कि एक गाईड पीछे पड़ गया ...गाडी के साथ चलते मंदिर और पार्किंग के बारे में बताने लगा ...जैसे तैसे उससे पीछा छुड़ा कर हम भागे मंदिर की ओर , वहां दर्शन में सिर्फ 5 मिनट बचे थे . ...मंदिर के विशाल प्रांगन में भीड़ -भाड़ होने के बावजूद दर्शन आराम से हो गए...प्रसाद लेकर बाहर निकाले तो ड्राईवर गाडी सहित फरार मिला ...वही गाईड फिर नजर आ गया ..." चलिए , आपकी गाडी उधर घाट के पास पार्क कर दी है " साथ -साथ चलते जयपुर में किस स्थान पर रहते हैं , क्या गोत्र है ...आदि आदि पूछने लगे ...हमने समझाया कि हम यहाँ पहली बार नहीं आये हैं , हमें सब पता है " मगर फिर भी वो साथ साथ ही चलता रहा ...विश्राम घाट पर सूर्योदय की छटा निराली थी ...पिछली बार के मुकाबले यहाँ सफाई भी थी ...
विश्राम घाट पर सूर्योदय

अब हमने रुख किया कृष्ण जन्मभूमि की ओर ....गाईड अभी भी साथ था ..आखिर कुछ रूपये देकर उन्हें हाथ जोड़ लिया ...इस तरह जबरन पीछे पड़ने के कारण गुस्सा तो बहुत आ रहा था मगर फिर ये भी लगा कि ये भी उनके रोजगार का ही एक हिस्सा है ....
कृष्ण जन्मस्थान पर भरी सेक्युरिटी का इंतजाम था ...चप्पे- चप्पे पर कमांडो अपनी गन संभाले हुए सतर्क ...कितनी अजीब बात है जिन प्रभु के चरणों में हम सुरक्षित होने जाते हैं , वे खुद भी इन गार्ड की निगरानी में हैं ...देश में हालात को देखते हुए ये जरुरी भी है मगर कचोटता बहुत है ...जन्मभूमि से बिलकुल सटी ही मस्जिद का हरा गुम्बद नजर आ रहा था ...कंस की कैद में वसुदेव और देवकी के पुत्र कृष्ण ने जेल में ही जन्म लिया था ... वह स्थान अब पूज्यनीय है ....महान लोंग अपने कर्मों से किसी भी स्थल को पूज्यनीय बना देते हैं , वरना कोई जेल में भी जाता है प्रभु के दर्शन करने ...:)कडकडाती सर्दी में भी सुबह इतनी जल्दी मंदिर में अच्छी खासी चहलपहल थी ....कश्मीरी युवकों का एक दल भी नजर आया , वहीँ एक विदेशी भक्त महिला भगवान् के सामने जोर -जोर से अपनी तकलीफ /शिकायत बयान कर रही थी " तुमने गीता में यह उपदेश क्यों दिया , मैं कल से अपना कर्म ही कर रही हूँ , सब मुझपर हँस रहे हैं " पता नहीं , पुजारियों और उस महिला के बीच क्या रार हो गयी थी ...
मंदिर से बाहर आते हुए वहां बनी दुकानों से हमारे साथ की अम्माजी ने काफी अपने पोते-पोतियों , बहू -बेटियों के लिए अंगूठियाँ , चेन आदि खरीदी ....मुझे भी याद आया , दादी की तीर्थयात्रा से लौटने पर उनसे मिलने वाली छोटी -छोटी भेंट के लिए हम कितने उत्साहित रहते थे ...कुछ समय बाद ही चाहे वे किसी काम की ना रहे ...लिखते हुए ही याद आया की माँ भी अभी मुंबई और सिर्धि साई बाबा की यात्रा पर हैं ...लगी होंगी बच्चों के लिए खरीददारी में ...

पागल बाबा के मंदिर की सातमंजिला संगमरमरी ईमारत लुभाती हैं मगर यहाँ सफाई व्यवस्था इतनी दुरुस्त नहीं है ...यहीं इलेक्ट्रोनिक झांकियां भी अपनी अव्यवस्था के बावजूद अच्छी लगी ...

पागल बाबा का मंदिर

बाँके बिहारी जी श्री कृष्ण ....हँसते हैं सब उनके खड़े होने के अंदाज़ पर ...की स्वाभाव का ही इतना बांका है की सीधे खड़ा ही नहीं हुआ जाता ...ये हमारे धर्म की विशेषता है की हम अपने ईश्वर के साथ मजाक कर सकते हैं , चिढ़ा सकते हैं और तो और गोद में भी खिला सकते हैं...

हमारा अगला पड़ाव था वृन्दावन का इस्कॉन टेम्पल ...मंदिर का निर्माण करने वाले स्वामीजी की समाधि पर फूल बने हुए है जिन पर चलते हुए " हरे कृष्ण हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे . हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे " कहना होता है ...बहार निकलते ही वे सज्जन मिल गए जिन्होंने राम -कृष्ण लिखे कार्ड हमें दिए थे जो हमें उन्हें वापस लौटाने थे ...मेरे आगे कड़ी बेटियों से उनकी शिक्षा के बारे में पूछा तो उन्हें ढेरों आशीर्वाद देते हुए वाही कार्ड उन्हें वापस देते हुए अपनी किताबों के बीच रखने का निर्देश दिया ...बच्चे महाखुश ...अब मुझसे मुखातिब होकर उन्होंने कहा ..." आप इनकी मम्मी हैं " मेरे हाँ कहने पर आशीर्वाद देते हुए बोले, "लक्की मॉम "...ख़ुशी के मारे मेरे पैर कहाँ रहते जमीन पर ....वरना ज्यादा समय यही सुनना पड़ता है " लान का एक छोरो हो जातो "(बेचारी के एक बेटा हो जाता )...:)
श्रीरंगनाथ मंदिर


वृन्दावन में ही भगवान् रंगनाथ एवं गोदाजी का मंदिर है ...यह वृन्दावन का सबसे बड़ा मंदिर है ...संयोग की ही बात है की धनुर्मास के पहले ही दिन इनका दर्शन लाभ प्राप्त हुआ ... मायके में श्रीवैष्णव धर्म का पालन किये जाने के कारण इस मास को उत्सव की तरह मनाया जाता रहा है ...ससुराल में यह सब छूट गया है इसलिए ऐसे प्रयोजनों पर अचानक घर या मंदिर पहुँच जाना बहुत सुख देता ...इस पवित्र मास में प्रत्येक सुबह विशेष प्रकार की खिचड़ी या खिरान्न का प्रसाद तो हमारी कमजोरी रहा है ....
यूँ तो मथुरा -वृन्दावन में हर गली में मंदिर हैं ...जितना दर्शन लाभ करो , कम है ...मगर हमने अपनी यात्रा यही रोकी और जयपुर के लिए रवाना हो गए ......

शनिवार, 18 सितंबर 2010

भागवत में कृष्ण ....

अभी पिछले दिनों एक परिचित का घर आना हुआ ...सेवानिवृति के बाद उनका ज्यादा समय धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन , तीर्थस्थान भ्रमण , भागवत -रामायण सुनते पढ़ते ही बीतता है ...भागवत श्रवण में कई रोचक जानकारियों और प्रेरक प्रसंगों से प्रभावित होकर उन्होंने इन्हें कलमबद्ध किया है ...मेरे पढने के शौक को देखते हुए एक प्रति मुझे भी थमा गए .....हालाँकि यह सबकुछ विद्वान् लेखकों की पुस्तकों में पढने को मिल सकता है , मगर मुझे सरल सहज शब्दावली के कारण कई अबूझे से प्रसंगों का ज्ञान इस पुस्तिका से प्राप्त हुआ ... अभी उनसे अनुमति नहीं ले पायी हूँ इसलिए उनका नाम नहीं लिख रही हूँ ...

उनका कहना है ....." मेरा इन प्रसंगों को लिखने का उद्देश्य मात्र इतना ही है कि भागवत की कथाओं का सार तथा उनके ज्ञान का प्रसार प्रचार घर बैठे काम समय में हो सके ....

कृष्ण के मथुरा जाने के बाद पुनः राधा से उनका मिलना कब हुआ ...विभिन्न पुस्तकों में कोई जानकारी नहीं मिल सकी थी या फिर उनकी गूढ़ भाषा में उलझ कर रह गयी ...इस छोटी से पुस्तिका में उन्होंने इसका वर्णन इस प्रकार किया है ....

भागवत वेद रूपी वृक्ष का पका फल है तो तोते की ज्ञान रूपी चोंच से मीठा है ....जगत का आधार कृष्ण है और कृष्ण का आधार राधा है परन्तु भागवत में राधा का नाम भी नहीं आया है .....इसके चार कारण बताये गए हैं ...
1. शुकदेव की गुरु राधा थी "
. राधा गुरु मंत्र है
3.राधा कृष्ण का आधार है
4. कृष्ण ही राधा है राधा ही कृष्ण है अर्थात राधा एक महाशक्ति है

इनका जन्म नहीं हुआ है । राधा अयोनिज है । वह कमल से पैदा हुई । इसी प्रकार सीता पृथ्वी से तथा रुक्मिणी कमल के पत्तों से । कृष्ण की एक ज्योति को भी राधा माना गया है । कृष्ण 11वर्ष की उम्र तक ही वृन्दावन में रहे इसी कारण इस लीला को वात्सल्य लीला कहते हैं ...
कृष्ण का राधा के प्रति प्रेम देख कर कहा गया है कि ---
राधा तुम बड़भागिनी , कौन तपस्या कीं
तीन लोक तारण तरन , इसमें मेक मीन

वृन्दावन सो वन नहीं , नन्द गाँव सो गाँव
राधा जैसी भक्ति नहीं , मित्र सुदामा जान ॥

11वर्ष की बाल्यावस्था में राधा व कृष्ण बिछड़ते हैं , कृष्ण ने राधा को केवल बांसुरी दी थी जिसे उसने जीवन पर्यंत यादगार के रूप में अपने पास रखी । वापिस कब मिलना होगा , ऐसा पूछने पर कृष्ण भी बता नहीं पाए ...इसलिए कहा है :-
" बंशी दिए जात हूँ , राधा मेरे समान
अबके बिछड़े कब मिले , कह सके भगवान्

राधा -कृष्ण का बचपन का अमर वात्सल्य प्रेम था । राधा व कृष्ण का विवाह नहीं हुआ था ... आचार्य चतुर सेन शास्त्री के अनुसार राधा व कृष्ण दोनों ही 11वर्ष की अवस्था में बिछड़ते हैं और जीवन के लम्बे थपेड़े खाते हुए 80 वर्ष की अवस्था में जब प्रेम रूपिणी वियोगिनी राधा वृद्धा ,अंधी और जर्जर हो जाती है तथा कृष्ण शोक , दग्ध , भग्न और अभिशप्त हैं तो दोनों का मिलन महा -शमशान में होता है । दोनों अपने पुत्र - पुत्रों को ढूँढने कुरुक्षेत्र में आये थे । प्रेम के प्रभाव से जीवन कहाँ कैसा बीता , वे जानते नहीं थे । वास्तव में उनका मिलन कारण रूप है , कार्य रूप नही ....

राम 12 कला के अवतार थे तो कृष्ण 16 कला के अवतार थे । कृष्ण ने सान्दीपन गुरु से उजैन में शिक्षा ली तथा गुरु के मारे हुए पुत्र को पुनः जीवित किया । कृष्ण ने सिर्फ 64 दिन तक की शिक्षा प्राप्त कर 64 विद्याएँ सीखी । कृष्ण योगीराज थे , मोर भी योगी होता है । उसके आंसुओं को पीकर ही मोरनी गर्भवती होती है । इसी कारण योगी मोर की पंखुड़ी योगिराज कृष्ण धारण करते थे । कृष्ण 4वर्ष गोकुल में व 11 वर्ष 55 दिन वृन्दावन में रहे ।
कृष्ण ने वृन्दावन में चार वस्तुओं का त्याग किया था ...
1 कृष्ण ने कभी मुंडन नहीं कराया
2. चरण पादुकाएं नहीं पहनी अर्थात नंगे पाँव घूमे
3. कभी शास्त्र नहीं लिया
4. कभी सिले वस्त्र नहीं पहने

कृष्ण के वृन्दावन में पैदल घूमने के कारण ही आज उस धाम की मिट्टी को सर पर लगाते हैं , पवित्र मानते हैं । वृन्दावन की सेवा कुंज में आज भी सूर्यास्त के बाद नर , वानर , पशु व पक्षी नहीं जाते हैं ...इस सेवा कुंज की विशेषता है कि इसमें न तो फल लगते हैं , न ही फूल ...इसमें पतझड़ का असर भी नहीं होता ...

भागवत में सतयुग में विष्णु का ध्यान , त्रेता में यज्ञ का , द्वापर में कृष्ण- सेवा का तथा कलयुग में नाम- जप का महत्व बताया गया है । कलयुग में मानसिक पुण्य का फल मिलता है तथा मानसिक पाप का फल नहीं मिलता । राजा परीक्षित को सर्प डसने का शाप जब श्रृंग ऋषि के पुत्र ने दिया तो श्रृंग ऋषि ने नाराज होकर अपने पुत्र को श्राप दिया कि कलयुग में ब्राह्मण का श्राप नहीं लगेगा । कृष्ण स्वयं भी शापित थे ....


भागवत के कुछ चुने हुए प्रसंग अगली कड़ी में ...


अभी मेरी पसंद से सुनिए वाणी जयराम की आवाज़ में मीरा का एक गीत ....