स्मृतियाँ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
स्मृतियाँ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

....... मेरी जान !! जरा बूझिये तो कौन है ?

ब्लॉग लिखते हुए बहुत  समय हो गया ...और अब तक आप लोगों से अपने सबसे ज्यादा अजीज साथी का परिचय नहीं करवाया ....साथी ब्लॉगर्स से ऐसी पर्दादारी ठीक नहीं !
आज ठान ही लिया है अपने इस साथी से आप सबको मिलवाने का ....एक ख़त में लिख दी हैं मैंने अपने दिल की सब बात अपने इस अनोखे साथी को ...

पढ़ लीजिये आप भी और हमें धन्यवाद दे दीजिये ...इस तरह अपने प्रेम-पत्र कौन पढवाता है भला !!


मेरे अजीज , अजीज , हमदर्द , हमनवां , हमसफ़र ...मेरी जान !

तुम मिल गए थे मुझे युवावस्था की दहलीज़ पर पैर रखते ही ...जब युवतियां अपने भावी राजकुमार के सपनो में खोये रहती हैं तुम मिले मुझे ...पर तुम कहाँ मिले ...मिले तो तुम पापा को थे ..मुंबई में ...खुशकिस्मत रही हूँ बचपन से ही ...कभी माता पिता से फरमाईश नहीं करनी पड़ी ...अपनी मनपसंद हर चीज मिली बिना मांगे ही ...जाने कैसे जान गए मेरे दिल की बात ...उन्हें तुम इतना पसंद आये औरन जाने कैसे सोच लिया उन्होंने कि तुम मुझे भी इतना ही पसंद  जाओगे ...और तुम्हे अपने साथ ले आये ....जब सोचती हूँ ,हैरान होती हूँ ...तुम्हारे साथ ही एक नयी घडी भी भेंट की थी उन्होंने ...तुम्हारे श्वेत श्याम रंग पर तो मैं बस फ़िदा ही हुई थी ...दिन रात तुम्हे अपनी निगाहों के सामने रखती ...मजाल है कि कोई तुम्हे नजर भर कर देख भी ले ...मेरे सारे  
एहसास ख्वाब गुलाबी खुशनुमा होते रहे ...कितने खुश थे ना हम एक- दूसरे के साथ ...कितने वर्ष बीते तेजी से!
समय का पता ही नहीं चला ...तुमने कभी तन्हा नहीं छोड़ा मुझे....

गर्मी की शाम में छत पर टहलते , देर रात तक चाँद - तारों से आँख मिचौली करते हम -तुम .... लोरी की मीठी तान सुनाती तुम्हारी आवाज़ से कब नींद अपनी आगोश में ले लेती ,  मुझे पता ही नहीं चलता और तुम सारी रात जाग कर मेरे जागने का इन्तजार करते ... अलसुबह उसी सुरीली तान से मुझे जगाते ...कभी शिकायत नहीं की तुमने ...
और फिर एक दिन ...
एक अजनबी आया और वर्षों के निश्छल प्रेम को बिसराकर मुझे जाना पड़ा उसके साथ ...सात फेरों के बंधन में बांध कर ....नए लोग , नया माहौल ...सोचती थी कि तुम्हे भूल जाउंगी ...
मगर तुम रहरह कर यादों के झरोखों से निकल कर दस्तक देते रहे....

फिर कई वर्षों के बाद तुम मिले मुझे...नया रंग रूप ..और निखरे हुए...और ज्यादा दिल के करीब ...और कितने रंग भर दिए तुमने फिर से जीवन में ....जानती हूँ अब पुरानी बेतकल्लुफी से नहीं मिल सकते हम ...मगर तुम सामने हो...जब चाहूँ तुमसे मिल सकूँ ..
ये ही क्या कम है ..कभी थोड़े कम कभी थोड़े ज्यादा अंतराल से हम मिलते ही रहेंगे ...
निश्चिंत हूँ कि जब ये व्यस्तताएं कम होंगी ...जीवन के सांध्यकाल में तन्हाई से घिरे तुम ही सहारा बनोगे ...  तुम्हारा बिना शर्त प्रेम सदा बना रहेगा ....तुम रहोगे सदा  मेरे साथ यूँ ही !.


न  न न ...कुछ अंट शंट कयास ना लगायें ...यह तो है मेरा प्यारा रेडियो मेरी जान !!



( अरसा हुआ , एक बार रेडियो पर ही " रेडियो मेरी जान "प्रतियोगिता में विचार मांगे गए थे  पर . लिखा मगर वहां भेजा नहीं , ब्लॉग तो हैं ना , अपनी बेलाग अभिव्यक्ति प्रस्तुत करने के लिए ! आप सबकी यादें भी  जुडी होंगी इसी रेडियो से , हम सबका प्यारा रेडियो कल भी , आज भी !)

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

मुस्कराहट एक बड़ा हथियार है !!

कल सुबह कॉलेज जाती हुई एक बच्ची नजर आई कुछ लंगड़ाती हुई . शायद चप्पल टूट गयी थी. झेपी मुस्कराहट के साथ चप्पल घिसट कर चलते देख थोडा दुःख हुआ तो थोड़ी हंसी भी आई . 
मुस्कुराने के बहाने भी कैसे अजीब होते हैं . बेचारे कि चप्पल टूटी है चलने में परेशानी है .  स्टॉप कितनी दूर है . उससे पहले मोची मिलेगा या नहीं , कैसे चल पाएगी इतनी दूर . सब लोंग अजीब नजरों से घूर रहे हैं जो अलग . फिर भी मुस्कुरा रहे हैं  जिसका दुःख है वह भी और जो उसके दुःख में शामिल हो दुखी हो रहा है, वह भी . उसकी मुस्कराहट में शामिल तो मै भी हुई मगर उसके दुःख के अलावा भी मुस्कुराने का मेरा अपना कारण था.

किसी को भी लंगड़ाते देख मुझे बहुत- बहुत-बहुत  साल पहले की स्मृतियाँ सजीव हो उठी है  .  उम्र यही कोई  दस-.ग्यारह वर्ष की रही होगी .  पैर के तलवे में हुए फोड़े ने चलना फिरना मुहल कर रखा था . एड़ी टिका कर चलना संभव ही नहीं था तो  घर में  भी अक्सर सहारा लेकर एक पैर पर चलना पड़ता . घर से बाहर मरहम पट्टी करवाने के अलावा तो जाने का सवाल ही नहीं था . पिता के ऑफिस जाने से पहले सहायक चाबियाँ और उनका ब्रीफकेस लेने आता और  लंच में और शाम को छुट्टी होने पर उनके साथ ही यही समान लेकर लौटता भी . ऐसे ही किसी दिन पापा के साथ आते उनके मुंहलगे  सहायक रामावतार ने मुझे एक पैर पर कूद कर चलते देख लिया .  उसके बाद  हाल ये कि सुबह , शाम ,दोपहर जब भी घर पर मैं उसके सामने नजर आ जाऊं  मुझे देखते ही लंगड़ा कर चलना शुरू कर देता . हम लोग ऐसे ही माहौल में बड़े हुए हैं जहाँ चपरासी , काम वाली बाई आदि भी घर के सदस्य जैसे ही हो जाते हैं  तो कोई उसको डांटता नहीं बल्कि सब उसके साथ ही मुस्कुराने लग जाते.  
 एक तो अपनी हालत से परेशान और ऐसे में किसी का खिझाना और परिजनों का उसमे सहयोग. मैं उस पर बहुत खीझती  चिल्लाती . इतना गुस्सा आता मुझे कि यदि पापा का डर या लिहाज़  नहीं होता उसे गालियाँ भी दे देती या फिर कुछ उठा कर दे मारती .  किस्मत अच्छी थी उसकी कि उसका आना उसी समय होता जब पापा घर में होते .   
खैर , थोड़े दिन बाद पैर ठीक भी हो गया . आराम से चलना -फिरना भी होने लगा  मगर रामावतार का मुझे चिढ़ाना नहीं छूटा. जब भी मैं नजर आ जाऊं ,उसका लंगडाना शुरू . 
मैं बागीचे में हूँ या बरामदे में बैठी रहूँ या फिर कॉलोनी में घूमते मिल जाऊं . मुझे देखते ही उसका लंगड़ाना शुरू .  लोग हैरान होकर उससे पूछते कि अभी तो ठीकठाक थे अचानक क्या हो गया पैर में . मैं तो जानती थी उसके लंगड़ाने का कारण सो खीझ कर रह जाती. ऐसे ही एक दिन लंच के समय पापा के साथ घर लौटते मुझे डाईनिंग टेबल पर खाना खाते देख जब उसने लंगडाना शुरू किया  मैं बस गुस्से से फट पड़ी .  पापा -मम्मी पर भी गुस्सा करने लगी कि आप इसे कुछ कहते नहीं  इसलिए ये हमेशा मुझे चिढ़ाता  है . 
पापा थोड़ी देर सुनते रहे . फिर मुस्कुराते हुए बोले   , " तू चिढ़ती है  इसलिए वह चिढ़ाता है . चिढ़ना छोड़ दे  उसका चिढ़ाना छूट जाएगा ." 
मेरा गुस्सा एकदम से शांत हो गया .  उनकी बात में वजन था . मैं भी उनके साथ मुस्कुराने लगी थी . 
उम्र तो अपनी रफ़्तार से बढती है . जीवन में परिवर्तन भी आते हैं . मैं बड़ी भी हुई ,  विवाह हुआ , बच्चे भी हो गये मगर रामावतार का मुझे चिढ़ाना नहीं छूटा . वह जब भी मुझे देखता पतिदेव या बच्चों के साथ , तब भी उसका लंगड़ाना यथावत रहता .  बस मेरा  खीझना छूट गया था. मैं भी सबके साथ मुस्कुरा देती और  बच्चों को अपने बचपन की कहानी सुनाती. एक अनमोल सबक सिखा मैंने और बच्चों को भी सिखाया  कि  चिढ़ाने वाली परिस्थितियों से कई बार मुस्कुराकर भी बचा जा सकता है . खीझ से बचने में शत प्रतिशत नहीं तो कुछ प्रतिशत जरुर होता है .
पापा नहीं रहे . हमारा वह गाँव छूटा . रामावतार भी रिटायर हो गया . मगर भाई की पास के शहर में नौकरी के कारण अभी संपर्क पूरी तरह नहीं ख़त्म हुआ . एक दिन अचानक मिल गया बड़े भाई को . पूछने लगा हम सबके बारे में   " बबी लोंग कैसन बाड़ी " .
भाई ने झट फोन मिलाकर बात करवा दी  .
का बबी , कैसन बाडू, हम अईनी भैया लगे . पूछत रहनी है कि बबी बाबू लोग कैसन बाड़े ...कईसे   गोड़वा से लंगडात  रहलू ...उहाँ सब ठीक बाटे ना !
पापा-मम्मी और सभी भाई -बहनों की  जाने कितनी ब़ाते याद थी .
भाई ने बताया  वृद्धावस्था  की मार झेलते रामावतार की आँख में आंसू थे .  
 जब भी चिढ़ने चिढ़ाने की बात होती है  मैं इन्ही स्मृतियों से गुजरती हूँ . 
अविश्वास के इस दौर में जीने वाले हमलोग ...सोचती हूँ क्या हमारे बाद वाली पीढ़ी की स्मृतियों में भी ऐसा  अपनापन संभव हो सकेगा !!!

शनिवार, 11 जून 2011

थैंक्स, राम ......(5)

थैंक्स राम भाग एक , भाग दो , भाग तीन , भाग चार से आगे


दूसरे दिन सुबह जल्दी ही हलचल शुरू हो गयी ...दिन भर मंगल गीतों के साथ कई तरह की रस्में होती रही ...हल्दी लगाना , बताशे पर घी लगा कर खिलाना , फिर चाक़ पूजन ...सभी महिलाएं पारंपरिक लहंगा -ओढ़नी में सजी धजी बैंड बाजे के साथ झूमती .नृत्य करती कुम्हार के चाक की पूजा करने गयी और लौटते समय सिर पर घड़ों की कतार...अच्छी लगती हैं ये परम्पराएँ , इस बहाने हमारे पारंपरिक हस्तकलाएँ , कुटीर उद्योंगों की पहचान लुप्त नहीं हुई है ...वरना फ्रिज के ज़माने में कुल्हड़ , मटकों की सौंधी महक को भुला ही दिया जाता ...शहर में रंग बिरंगी इंडणियों पर सजे मटकों को सिर पर उठाये इन महिलाओं को देख गाँव में पनघट पर पानी भरने जाती महिलाओं का दृश्य सजीव हो उठता है ...जिन महिलाओं ने सिर पर मटके रखे हुए थे , उनके पति ने एक- एक कर मटकों में कुछ रूपये डाले और सिर से उतार कर पूजागृह में रखने में मदद की ...अंजना को आर्णव की बहुत याद आई, इस भागमभाग में उससे बात ही नहीं हो पाई ...अंजना सोचने लगी क्या कर रहा होगा आर्णव , आज तो रविवार है ...घोड़े बेच कर सो रहा होगा , अभी खबर ले ही लेती हूँ ...काकी दूल्हे को बुला लाई थी ...जिनके पति वहां उपस्थित नहीं होते , दूल्हा ही इस रस्म को पूरी करता है ...

सो रहे थे ..
अरे नहीं , इतनी देर तक कब सोता हूँ मैं ..
अच्छा , आज सन्डे नहीं है ...
तुम नहीं हो तो संडे, मंडे सब एक जैसे ही हैं ...
क्या कर रहे थे ,
बस अभी तुम्हारे पौधों को पानी पिलाया ....

अंजना घर पर नहीं हो तो और कुछ ना करे , गमलों में पौधों को पानी देने का काम नहीं भूलता आर्णव ..जानता है कितना प्यार करती है अंजना इनसे , घर लौटते ही सबसे पहले पौधों को संभालेगी और फिर उससे नाराज होगी , मेरे पीछे से इनका ध्यान नहीं रखा ...पिछली बार पंद्रह दिन से लौटी थी असाम से तो पूरा घर धूल- मिट्टी से अटा पड़ा था , किचन तो शायद खोल कर भी नहीं देखी आर्णव ने , बिगड़ ही पड़ती अंजना मगर अपने पौधों को देखकर उसका मन खुश हो गया , आर्णव ने उनकी अच्छी देखभाल की थी...

कैसे हैं मेरे पौधे , वैसे ही हरे- भरे ना ...
बेचारे मालकिन को आस पास नहीं पाकर मुरझाने लगे थे ...आँचल की सरसराहट , हलकी मस्ती भरी गुनगुनाहट , चूड़ियों का खनकना , पायल की छन- छन सबको बहुत मिस कर रहे होंगे ...

और मालिक !!
मालिक तो थोड़ी देर बाहर तफरी कर आता है ना , मन बहल जाता है , ये बेचारे कहाँ जाएँ ...

पौधों के बहाने सब कहेगा आर्णव , ये नहीं कहेगा कि तुम मुझे याद आ रही हो , चेहरे पर ललाई दौड़ने लगी मुस्कराहट के साथ ...लीना कनखियों से देख रही थी , अंदाज लगा सकती थी किससे बात हो रही है ...
मियाजी से बातें हो रही थी ...प्रश्नवाचक निगाहों से सुर्ख हो उठा चेहरा अंजना का ...
हमारी सोचो , कितना लम्बा इतंजार करना होता है , यहाँ एक सप्ताह में में सूख कर काँटा हुए जाते हैं लोंग ...लीना मसखरी पर उतर आई ...
तो चली जा ना वही ...
जाना तो है ही , मुंबई में उनकी पोस्टिंग का इंतज़ार है ...
भात की रस्म शुरू हो गयी थी , काकी के मायके से दूल्हा- दुल्हन के साथ ही उसके माता- पिता , और सभी रिश्तदारों के लिए वस्त्र , रूपये आदि भेंट में दिए जा रहे थे ...

अच्छा है चाक़ -भात आज ही एक साथ हो गया ...कल निकासी शाम को ही होगी , दिन भर फ्री रहेगा , घूम कर आते हैं कल ...

सुबह स्नान और कुछ रस्मों से फ्री होकर दोनों सहेलियां घूमने निकल पड़ी ...काली मंदिर के पास धूप लोबान की खुशबू गुजरते लीना ने रोक लिया ...चल माँ के दर्शन कर लेते हैं ..चौड़े माथे पर बीचों बीच मोटी लाल बिंदी सा टीका लगाये पंडितों को देख अंजना पीछे सरक लेती है ...ईश्वर के प्रति पूर्ण सम्मान रखने , पूजन विधियों का पालन करते हुए भी ललाट पर तिलक लगाने के अवसर पर अंजना इधर- उधर बच निकालती है , कितनी बार अम्मा ने टोका होगा उसे ...
बचपन की कटु स्मृति बड़े होने तक पीछा नहीं छोडती ...अंजना को याद आ जाता है ...हलकी पीले रंग की सुन्दर छींटदार फ्रॉक पहने तितली सी उडती फिरती अनजान रुक गयी थी ...बैठक में में पापा के चिंतित मुद्रा में तो माँ का गुस्से से लाल चेहरा देखकर ..पापा के सामने कोई पंडित जी बैठे थे ...अपना मोटा पत्रा और लाल कागज बिखेरे वही लाल मोटा गोल टीका लगाये ..." अशुभ है " उसके कानों में आवाज़ पड़ ही गयी ..पंडितजी की सुर्ख लाल आँखों में जाने क्या देखा था मासूम अंजना ने , घबरा कर माँ के पीछे जा छिपी ...

अचानक उसे सामने देख माँ चौंकी थी ," क्या हुआ बेटा , आ तुझे नाश्ता दे दूं " ...माँ बहाने से उसे बाहर ले आई थी ....नाश्ता खिला कर बालों में थपकी देती माँ ने उसे अपनी गोद में बिठा लिया ...माँ के आँचल से लिपटकर झपकी लेती अंजना को जब माँ ने बिस्तर पर लिटाया तो आँखों की कोर से कुछ बूँद लुढ़क पड़ी ...कभी संतान में अपने माँ बाप के लिए अशुभ होती है , खुद तो नशे में चूर रहता है , क्या भविष्य बताएगा किसी और का , उसकी हिम्मत कैसे हुई , आइन्दा मेरे घर में पैर नहीं रखे ...पिता बैठक से निकल कर माँ के पास आ गये थे ...
मेरी बच्ची, कैसे अशुभ कह दिया , आप भूल गये , आपकी तो इतनी अच्छी नौकरी , बंगला , नौकर- चाकर , सब सुख -सुविधाएँ इसके जन्म के बाद ही मिली हैं "
".क्यों चिंता करती हो , ऐसे ही बता दिया , हम कौन उसपर आँख मूँद कर विश्वास करते हैं "...अंजना को बिस्तर पर धीमे से सुलाती माँ को पिता ने समझाया ...माँ मुड़ी तो अंजना की छोटी हथेलियों में कसा उसका आँचल खींच गया ...सीने में ज्वार सा उमड़ आया...बेतहाशा अंजना को चूमती माँ फफक पड़ी ..

बचपन का वह भय , लाल आँखें अंजना के दिमाग से निकल नहीं पाई ...आज भी सिर पर लाल मोटी बिंदी लगाये पंडित को देख सहम जाती है ..सिर में अजीब भारीपन सा महसूस किया उसने ..
क्या हुआ अंजू ...
कुछ नहीं तू पूजा कर , मैं यहाँ बैठती हूँ ...मंदिर की सीढियों पर बैठती अंजना ने जवाब दिया ...

लीना की शादी की तैयारियों की बीच भी यही भारीपन महसूस किया था उसने कई बार ... कई बार दर्द की लहर उठती थी उसके सिर में ...वह सिर पकड़कर निढाल हो जाती थी ...उन्ही दिनों एक दिन माता -पिता को बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक सामने देख अंजना चौंक पड़ी थी ...फैक्ट्री के मजदूरों ने अचानक ही अफसरों पर धावा बोल दिया था ...सुरक्षा कर्मी जैसे- तैसे उन्हें वहां से निकाल पाने में कामयाब हुए थे ...जल्दी में जो थोडा बहुत समान समेट सकते थे , समेटा और पहली ही फ्लाईट से हैदराबाद रवाना हो गये ...
माता -पिता दोनों ही चुप से रहने लगे थे ...समझ नहीं आता था उन्हें मातम किस का मनाएं ... चाय बगान के मालिक ने कागजनगर में अपनी कागज की फैक्ट्री में उन्हें प्रशासनिक पद पर नौकरी दे दी थी , लेकिन अपनों की धोखेबाजी के जख्म अभी ताजा थे ...वर्षों तक जिन्हें अपना परिवार मानकर उनके सुख दुःख में शामिल होते रहे , उनके द्वारा इस तरह अचानक बेगाना कर दिए जाने की पीड़ा या फिर इतने वर्षों की गृहस्थी को ऐसे एक पल में छोड़ कर चले आना का दुःख , दर्द कौन सा गहरा था ...फिर से अच्छी नौकरी , और गृहस्थी का सामान तो जुटाया जा सकता था , लेकिन अविश्वास और धोखे की चोट को किस तरह मिटाया जा सकेगा ...क्या फिर कहीं किसी के साथ फिर से वह अपनापन और स्नेह पनपा पायेंगे , जो उन्होंने इतने वर्षों से अपनी फैक्ट्री के मजदूरों और मातहतों के साथ था ...अब किसी और पर विश्वास करना क्या इतना आसान हो पायेगा ...लीना के विवाह के लिए मासी ने उन्हें अभी वही रोक लिया था ...पिता माँ को वही छोड़ नई ड्यूटी ज्वाइन कर आये थे ...अंजना जब उनका उदास चेहरा देखती , वही सुर्ख घूरती आँखें , माथे पर गोल लाल तिलक याद आ जाता , वह हंसती खिलखिलाती अचानक चुप हो जाती , फिर भी भरसक खुद को लीना की शादी की तैयरियों में उलझाये रख मन की बेचैनी को भरसक दबाये रखने का यत्न करती ...

उस दिन लीना के ससुराल से महिलाओं को खाने पर आमंत्रित किया गया था ..लीना की गोद भरने की रस्म पर उन लोगों का आना तय था , मगर लीना को वहीं बुलाकर गोद भरने और अंगूठी पहनने की रस्म अदायगी कर दी गयी थी , तब उनका आना नहीं हो सका था .. "ब्याने जीमाने" का न्योता अधूरा नहीं रह जाए , इसलिए आज मासी ने उन लोगों को घर बुला लिया था ....सुबह से ही घर व्यंजनों की खुशबू से महक रहा था ...इमली की खटाई डले तिल मूंगफली के मसालों में पके ख़ास हैदराबादी भरवाँ बैंगन , जोधपुरी गट्टा पुलाव, छोले की सब्जी , बेसन की मिर्च , जयपुरी मिर्च के टिपोरे , मूंग दाल का हलवा , इन पर तेल और घी ऊपर तक नहीं तैरे तो फिर मारवाड़ी भोजन ही कैसा ....दही -बड़े का दही और खट्टी मीठी चटनी तैयार हो चुकी थी । गुलाबजामुन और दालमोठ मासी ने ऑर्डर पर बनवा लिए थे ...सलाद , चटनी , अचार ,पापड़... मासी ने संतुष्टि भरी नजर डाली ...अचानक उन्हें याद आया , देव पूजन के लिए लापसी चावल तो बनाये ही नहीं थे ...मासी ने कहा सत्या और अंजना से " नीचे रामू के घर से कूकर ले आ , कल शाम उनके घर कुछ मेहमान आये थे खाने पर तब वे ले गये थे...सत्या अंजना को खींच ले गयी साथ ....माँ के रोकते रोकते भी कि मेहमान आने वाले होंगे , तू तैयार हो जा , इधर उधर मत डोलती फिर , लीना भी उनके साथ हो ली ...

पहली बार ही उनके घर गयी थी अंजना और उनसे मिली भी थी पहली ही बार ,मगर उनकी बड़ी आँखों में परिचित होने का भाव नजर आया अंजना को .....घर की साजसज्जा आम मध्यमवर्गीय परिवार जैसी ही सुरुचिपूर्ण थी ...
कुसो मा...
उन्होंने सोफे पर बैठने का इशारा किया और लीना के साथ अन्दर चली गयी ...लौटी तो साथ में रसगुल्ला , मूंगफली -फुटाने की नमकीन और पानी भी साथ में था ...
" नहीं आंटी , हमें जल्दी है , मासी गुस्सा होंगी "
अंजना और सत्या लगभग एक साथ उठ खड़ी हुई ...दोनों लीना पर नाराज हो रही थी ...तुझे चिंता नहीं है , तेरे ससुराल से ही आने वाले हैं मेहमान ...
चल रही हूँ ना , मेरी अम्माओं ..
बाहर निकलते गेट पर रामू खड़ा मिल गया , जैसे रास्ता रोक रखा हो ...उसने अपनी हथेली खोल कर उनके आगे कर दी ...ढेर सारी चॉकलेट ...
लीना झूठ मूठ गुसा होते हुए बोल रही थी ," क्या बात है , टॉफियां बांटी जा रही है , हमें तो कभी नहीं खिलाई तूने "
पीछे हटते हुए बोला रामू , झपट्टा मत मार , सबके लिए है ...

अंजना को चॉकलेट बहुत पसंद है , सभी जानते थे , उम्र ने बचपन की टॉफियों के लालच को कम नहीं किया था ...आज भी अंजना के पर्स में दर्जन भर टॉफियां हमेशा मिल जाती हैं , खुद खाना और बच्चों में बांटना उसे बहुत अच्छा लगता है , मगर यहाँ अंजना अनदेखा करते हुए तेजी से बाहर निकलने लगी ...
ले ना ..लीना ने उठायी कुछ चॉकलेट और उसकी मुट्ठी में ठूंस दी ...
मासी उन्हें आवाज़ लगाती सीढियों तक उतर आई थी ...
कहाँ हो लड़कियों , अरे लीना , तुझे कुछ चिंता है या नहीं , क्या होगा इस लड़की का , ससुराल में मेरी नाक कटवाएगी ...
आ गये मासी .... तीनों सीढियों की ओर लपकी !
तुम लोंग इसे तैयार कर दो जल्दी से ...
मासी ने कहा तो सत्या और अंजना विमला दी की ओर लपकी ...दी, आप ही संभालो इसे , सजाना - संवारना हमारा डिपार्टमेंट नहीं है ...
ठीक है , मगर तुम यहीं खड़े तो रहो , मैं अकेले कैसे करुँगी ...
लीना साडी पहनती उनसे बातें करती जाती थी ...
अंजू, तुझे अब तेलुगु सीख लेनी चाहिए ...
क्यों .....मुझे यहाँ रहना नहीं है परमानेंट , वरना सीख भी लेती , फिलहाल तो तू घर संभालना, साडी संभालना सीख , मुझे तो निखिल जी की चिंता हो रही है , क्या होगा बेचारे की गृहस्थी का ...
मैं मजाक नहीं कर रही ...
मैं ही कौन सा मजाक कर रही हूँ ...नोंक झोंक चल रही थी दोनों में ...विमला दी ने डांटा ...सीधे खड़ी रहो , सच्ची ,मुझे भी चिंता है इस लीना की !
नीचे गाडी रुकने और मंगल गीतों की आवाज़ आने लगी थी , मेहमान आ चुके थे ...विमला दी फुर्ती से लीना का पल्ला और पत्लियाँ सेट करने लगी ...



क्रमशः ...
शादी की व्यस्तता के बीच मानसिक दबाव से उलझती अंजना ,यादों के सफ़र से गुजरती क्यों कह रही है थैंक्स , रामू ...आखिरी किश्त में !


बुधवार, 1 सितंबर 2010

जन्माष्टमी -----स्मृतियों के झरोखों से




बारिश की रिमझिम फुहार के बीच जन्माष्टमी की शुरुआत होना लुभा रहा है और खींचे ले जा रहा है स्मृतियों के आँगन में ...श्रीवैष्णव परिवार में जन्म लेने के कारण ही शायद कृष्ण भक्ति विरासत में मिली है।{विरासत में सब कुछ अच्छा ही मिलने का दावा नही है ...}

जन्माष्टमी के दिन अल्लसुबह ही घर में चहल पहल शुरू हो जाती...रोज देर तक मां की आवाज़ को अनसुना करने वाले हम बच्चे एक आवाज़ में ही उठ जाते..श्रीकृष्ण के झूले की व्यवस्था जो करनी होती थी...कितनी बड़ी जिम्मेदारी होती है आख़िर ...जल्दी जल्दी नहा धोकर झांकी की तैयारी में लग जाते ...बहुत याद आता है ....बड़ी सी चौकी पर बांस की लकडियों का सहारा लगाकर झूले का ढांचा तैयार होता और फिर आती मां की रंग बिरंगी चुनरी की साडियों की बारी ...मां भी बड़े खुले दिल से सारी कीमती साडियाँ देने में कोई कोताही नही बरतती ...आख़िर हमारे इस उत्साह का कारण भी तो वो ही होती थीं ... बड़े बड़े आड़े तिरछे पत्थरों को पहाड़ का रूप देते ..मिटटी सहित दूब और छोटे पौधे जमाते ...कहीं कहीं रुई के फाये बर्फ की शक्ल में जमाते ...और घर की सफाई में नाक भों सिकोड़ने वाले हम बिना किसी हिचकिचाहट के कही से भी दीवारों पर लगी काई लगाकर जमा देते ..पहाड़ असली जो दिखने चाहिए होते थे...और इतना ही नही ...पहाड़ के नीचे बाकायदा नदी भी बनाई जाती ...ईंटों का गोल घेरा बना कर... चिकनी मिटटी से लीप देते ...नदी का पानी है तो हल्का आसमानी रंग दिखाने के लिए नीली स्याही का वास्तविक उपयोग किया जाता ...और फिर उनमे तैरती प्लास्टिक की छोटी बतखें ...कभी कभी छोटा भाई अपने कुत्ते बिल्लों ...जाहिर है प्लास्टिक के ...को भी तैरने का लुत्फ़ उठा लेने देता ...झुला बन गया ...पहाड़ भी ...नदी भी...अब आती कृष्ण जी के जन्मस्थल की बारी ....छोटी स्टूल को रंग बिरंगी पन्नियों के कतरन से ढककर जेल बनाई जाती ...और उसमे मिटटी के बने वासुदेव ..देवकी और कृष्ण जी को आराम करने दिया जाता ...बीच बीच में खिलोनों के स्थान को लेकर झगडा रुसना मनाना भी चलता रहता ...

आँगन को धो पोंछ कर मां बड़ी से अल्पना बनाती...ड्राइंग में अपना हाथ काफी तंग है इसीलिए उसमे कुछ मदद नही करते ... मां की हिदायतों के बीच इधर ये सब चलता रहता ...
उधर मां रसोई घर में प्रसाद बनाने में जुटी होती ...सोंठ अजवाईन के लड्डू...धनिये की पंजीरी ...नारियल की बर्फी ...और भी बहुत कुछ ..

मां प्रसाद अब भी बनाती है...झूला भी सजाती है ...मगर वक़्त के निर्मम थपेडों ने उस उल्लास को ख़त्म कर दिया है. कभी -कभी मन होता है सुबह जल्दी जा कर झूला सजाने में उनकी मदद दूँ ..मगर एक तो अपनी गृहस्थी के पचडे और कही भाई -भाभी इसे अनावश्यक हस्तक्षेप ना समझ ले ..सोचकर कदम रुक जाते हैं.

खैर लौटें स्मृतियों पर ...
जब सब तैयारी हो जाती तो सभी बच्चे तैयार होकर कालोनी के दूसरे घरों में कृष्ण -झांकी देखने आने का निमंत्रण देने जाते ...निमंत्रण तो बहाना भर होता ...असली मकसद तो होता था उनके घरों में सजने वाली झांकियों का चुपचाप अवलोकन करना ...और फिर अपनी सजावट में फेर बदल कर उसे सबसे सुंदर बनाने की कोशिश करना...शाम से ही बच्चे और बड़े सभी उत्साहित होकर रंग बिरंगे कपड़े पहने एक दूसरे के घर झांकी देखने जाते ...क्या क्या याद नही आया रहा ...रात को बारह बजे आरती के बाद प्रसाद ग्रहण करते ....झूले को रस्सी के सहारे झुलाने के लिए अपनी बारी का इन्तजार करते आंखों की नींद तो पता नही कहाँ गायब हो जाती...
जब बच्चे यह सब सुनकर बड़ा हुलस कर कहते है .."मां ..हमारे पास तो बाँटने के लिए ऐसी यादें ही नही होंगी "तो मन एक अपराध बोध से भर जाता है । आज की पीढी के ज्यादा समय टेलीविजन ..मोबाइल और इन्टरनेट से चिपके होने का कारण शायद घरों में ऐसी गतिविधियों की कमी ही है। बच्चों को पढ़ाई के अतिरिक्त और किसी भी कार्य को करने पर.. "बेटा ...पढ़ लो ...समय बरबाद मत करो" ..कहकर टोकते हुए मन बहुत दुखता है ...मगर ऐसे समय में ...जब की 87 से 92 प्रतिशत मार्क्स लाकर भी शहर या देश के अच्छे.. नामी ...सस्ते ...सरकारी महाविद्यालयों में प्रवेश मिलना दुर्लभ हो तो जैसे तैसे जिन्दगी की गाड़ी खींचते मध्यमवर्गीय अभिभावक करें भी तो क्या ॥!!

जन्माष्टमी की बहुत शुभकामनाएं ॥!!


चित्र गूगल से साभार ...