ब्लॉग लिखते हुए बहुत समय हो गया ...और अब तक आप लोगों से अपने सबसे ज्यादा अजीज साथी का परिचय नहीं करवाया ....साथी ब्लॉगर्स से ऐसी पर्दादारी ठीक नहीं !
आज ठान ही लिया है अपने इस साथी से आप सबको मिलवाने का ....एक ख़त में लिख दी हैं मैंने अपने दिल की सब बात अपने इस अनोखे साथी को ...
पढ़ लीजिये आप भी और हमें धन्यवाद दे दीजिये ...इस तरह अपने प्रेम-पत्र कौन पढवाता है भला !!
मेरे अजीज , अजीज , हमदर्द , हमनवां , हमसफ़र ...मेरी जान !
तुम मिल गए थे मुझे युवावस्था की दहलीज़ पर पैर रखते ही ...जब युवतियां अपने भावी राजकुमार के सपनो में खोये रहती हैं तुम मिले मुझे ...पर तुम कहाँ मिले ...मिले तो तुम पापा को थे ..मुंबई में ...खुशकिस्मत रही हूँ बचपन से ही ...कभी माता पिता से फरमाईश नहीं करनी पड़ी ...अपनी मनपसंद हर चीज मिली बिना मांगे ही ...जाने कैसे जान गए मेरे दिल की बात ...उन्हें तुम इतना पसंद आये औरन जाने कैसे सोच लिया उन्होंने कि तुम मुझे भी इतना ही पसंद आ जाओगे ...और तुम्हे अपने साथ ले आये ....जब सोचती हूँ ,हैरान होती हूँ ...तुम्हारे साथ ही एक नयी घडी भी भेंट की थी उन्होंने ...तुम्हारे श्वेत श्याम रंग पर तो मैं बस फ़िदा ही हुई थी ...दिन रात तुम्हे अपनी निगाहों के सामने रखती ...मजाल है कि कोई तुम्हे नजर भर कर देख भी ले ...मेरे सारे
एहसास ख्वाब गुलाबी खुशनुमा होते रहे ...कितने खुश थे ना हम एक- दूसरे के साथ ...कितने वर्ष बीते तेजी से!
समय का पता ही नहीं चला ...तुमने कभी तन्हा नहीं छोड़ा मुझे....
गर्मी की शाम में छत पर टहलते , देर रात तक चाँद - तारों से आँख मिचौली करते हम -तुम .... लोरी की मीठी तान सुनाती तुम्हारी आवाज़ से कब नींद अपनी आगोश में ले लेती , मुझे पता ही नहीं चलता और तुम सारी रात जाग कर मेरे जागने का इन्तजार करते ... अलसुबह उसी सुरीली तान से मुझे जगाते ...कभी शिकायत नहीं की तुमने ...
और फिर एक दिन ...
एक अजनबी आया और वर्षों के निश्छल प्रेम को बिसराकर मुझे जाना पड़ा उसके साथ ...सात फेरों के बंधन में बांध कर ....नए लोग , नया माहौल ...सोचती थी कि तुम्हे भूल जाउंगी ...
मगर तुम रह- रह कर यादों के झरोखों से निकल कर दस्तक देते रहे....
फिर कई वर्षों के बाद तुम मिले मुझे...नया रंग रूप ..और निखरे हुए...और ज्यादा दिल के करीब ...और कितने रंग भर दिए तुमने फिर से जीवन में ....जानती हूँ अब पुरानी बेतकल्लुफी से नहीं मिल सकते हम ...मगर तुम सामने हो...जब चाहूँ तुमसे मिल सकूँ ..
ये ही क्या कम है ..कभी थोड़े कम कभी थोड़े ज्यादा अंतराल से हम मिलते ही रहेंगे ...
निश्चिंत हूँ कि जब ये व्यस्तताएं कम होंगी ...जीवन के सांध्यकाल में तन्हाई से घिरे तुम ही सहारा बनोगे ... तुम्हारा बिना शर्त प्रेम सदा बना रहेगा ....तुम रहोगे सदा मेरे साथ यूँ ही !.
न न न ...कुछ अंट शंट कयास ना लगायें ...यह तो है मेरा प्यारा रेडियो मेरी जान !!
( अरसा हुआ , एक बार रेडियो पर ही " रेडियो मेरी जान "प्रतियोगिता में विचार मांगे गए थे पर . लिखा मगर वहां भेजा नहीं , ब्लॉग तो हैं ना , अपनी बेलाग अभिव्यक्ति प्रस्तुत करने के लिए ! आप सबकी यादें भी जुडी होंगी इसी रेडियो से , हम सबका प्यारा रेडियो कल भी , आज भी !)
आज ठान ही लिया है अपने इस साथी से आप सबको मिलवाने का ....एक ख़त में लिख दी हैं मैंने अपने दिल की सब बात अपने इस अनोखे साथी को ...
पढ़ लीजिये आप भी और हमें धन्यवाद दे दीजिये ...इस तरह अपने प्रेम-पत्र कौन पढवाता है भला !!
मेरे अजीज , अजीज , हमदर्द , हमनवां , हमसफ़र ...मेरी जान !
तुम मिल गए थे मुझे युवावस्था की दहलीज़ पर पैर रखते ही ...जब युवतियां अपने भावी राजकुमार के सपनो में खोये रहती हैं तुम मिले मुझे ...पर तुम कहाँ मिले ...मिले तो तुम पापा को थे ..मुंबई में ...खुशकिस्मत रही हूँ बचपन से ही ...कभी माता पिता से फरमाईश नहीं करनी पड़ी ...अपनी मनपसंद हर चीज मिली बिना मांगे ही ...जाने कैसे जान गए मेरे दिल की बात ...उन्हें तुम इतना पसंद आये औरन जाने कैसे सोच लिया उन्होंने कि तुम मुझे भी इतना ही पसंद आ जाओगे ...और तुम्हे अपने साथ ले आये ....जब सोचती हूँ ,हैरान होती हूँ ...तुम्हारे साथ ही एक नयी घडी भी भेंट की थी उन्होंने ...तुम्हारे श्वेत श्याम रंग पर तो मैं बस फ़िदा ही हुई थी ...दिन रात तुम्हे अपनी निगाहों के सामने रखती ...मजाल है कि कोई तुम्हे नजर भर कर देख भी ले ...मेरे सारे
एहसास ख्वाब गुलाबी खुशनुमा होते रहे ...कितने खुश थे ना हम एक- दूसरे के साथ ...कितने वर्ष बीते तेजी से!
समय का पता ही नहीं चला ...तुमने कभी तन्हा नहीं छोड़ा मुझे....
गर्मी की शाम में छत पर टहलते , देर रात तक चाँद - तारों से आँख मिचौली करते हम -तुम .... लोरी की मीठी तान सुनाती तुम्हारी आवाज़ से कब नींद अपनी आगोश में ले लेती , मुझे पता ही नहीं चलता और तुम सारी रात जाग कर मेरे जागने का इन्तजार करते ... अलसुबह उसी सुरीली तान से मुझे जगाते ...कभी शिकायत नहीं की तुमने ...
और फिर एक दिन ...
एक अजनबी आया और वर्षों के निश्छल प्रेम को बिसराकर मुझे जाना पड़ा उसके साथ ...सात फेरों के बंधन में बांध कर ....नए लोग , नया माहौल ...सोचती थी कि तुम्हे भूल जाउंगी ...
मगर तुम रह- रह कर यादों के झरोखों से निकल कर दस्तक देते रहे....
फिर कई वर्षों के बाद तुम मिले मुझे...नया रंग रूप ..और निखरे हुए...और ज्यादा दिल के करीब ...और कितने रंग भर दिए तुमने फिर से जीवन में ....जानती हूँ अब पुरानी बेतकल्लुफी से नहीं मिल सकते हम ...मगर तुम सामने हो...जब चाहूँ तुमसे मिल सकूँ ..
ये ही क्या कम है ..कभी थोड़े कम कभी थोड़े ज्यादा अंतराल से हम मिलते ही रहेंगे ...
निश्चिंत हूँ कि जब ये व्यस्तताएं कम होंगी ...जीवन के सांध्यकाल में तन्हाई से घिरे तुम ही सहारा बनोगे ... तुम्हारा बिना शर्त प्रेम सदा बना रहेगा ....तुम रहोगे सदा मेरे साथ यूँ ही !.
न न न ...कुछ अंट शंट कयास ना लगायें ...यह तो है मेरा प्यारा रेडियो मेरी जान !!
( अरसा हुआ , एक बार रेडियो पर ही " रेडियो मेरी जान "प्रतियोगिता में विचार मांगे गए थे पर . लिखा मगर वहां भेजा नहीं , ब्लॉग तो हैं ना , अपनी बेलाग अभिव्यक्ति प्रस्तुत करने के लिए ! आप सबकी यादें भी जुडी होंगी इसी रेडियो से , हम सबका प्यारा रेडियो कल भी , आज भी !)

