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गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

सोलह दिन गणगौर के ....



इन दिनों गणगौर त्यौहार की तैयारियां  चरमोत्कर्ष पर है . आज सिंजारा है , सुहागिनें हाथों में मेहंदी रचाएंगी , झुण्ड के झुण्ड पनघट /बावड़ी /तालाब से गीत गाते जल कलश सर पर उठाये नजर आएँगी . नवविवाहिताओं के लिए ससुराल  पक्ष से नए वस्त्र (चुन्दड़ी विशेष तौर पर ),गहने , घेवर , मेहंदी आदि उनके मायके पहुंचाए जायेंगे .  विवाह के पहले वर्ष में सोलह दिन पूजी  जाने वाली  गणगौर लड़कियां अपने मायके में ही करती है , जहाँ ससुराल से सिंजारे के अवसर पर उनके लिए भेंट भेजी जाती है . 

 होली के दूसरे  दिन यानी धुलंडी से प्रारम्भ होकर चैत्र कृष्णपक्ष की  तृतीया तक इस उत्सव की छटा हर तरफ अपना रंग बिखेरे रखती है ..धुलंडी (रंग खेली जाने वाली होली ) के दिन होलिका दहन की राख लाकर इसकी आठ पिंडियाँ शिव और पार्वती के  प्रतीक इसर और गणगौर को  दूब , पुष्प , कुमकुम , मेहंदी , काजल , आदि अर्पण कर पूजा की जाती है . इस पर्व का पालन कुंवारी लड़ियाँ मनोवांछित वर के लिए तो  विवाहित स्त्रियाँ अखंड सौभाग्यवती होने के लिए करती है .गणगौर के पूजन के लिए जल का प्रबंध करने प्रातः ही लड़कियों या महिलाओं के समूह गीत गाते घर से निकलते हैं , तथा पास में ही किसी कुएं , बावड़ी आदि से जल लेकर आते हैं , चूँकि आजकल कुएं बावड़ी आदि का अस्तित्व समाप्त सा है , इसलिए इसकी जिम्मेदारी सार्वजनिक नलों अथवा घरों  पर होती है .
धुलंडी से शीतला अष्टमी तक राख की इन पिंडियों  का विधिवत पूजन करने के पश्चात् मिटटी लाकर उसके गणगौर , इसर तथा अन्य प्रतीक बनाकर उनका नए वस्त्रों से श्रृंगार  किया  जाते हैं . सरकंडों पर गोटा लगाकर झूला सजाते हैं , जौ के जंवारे उगाये जाते हैं .

गणगौर के मध्य में मनाये जाने वाला शीतलाष्टमी  पर्व राजस्थान का प्रमुख लोक पर्व है . इस दिन गर्दभ पर सवार माता शीतला का पूजन कर उन्हें एक दिन पहले बनाये गए खाने पीने की विभिन्न चीजों का भोग अर्पित किया जाता है . विभिन्न लोक पर्व किसी न किसी मान्यता से जुड़े होते हैं . यह पर्व भी इसी संक्रामक रोग की जनक शीतला माता को प्रसन्न करने के लिए मनाया  जाता है . शीतला जिसे चेचक भी कहते हैं ,इस मौसम में बड़े पैमाने पर फैलने वाला संक्रामक रोग होता था , हालाँकि आजकल टीकाकरण के कारण इन पर काबू पाया जा सका है , फिर भी यह रोग अन्य कई रूपों  छोटी चेचक , खसरा आदि में फैलता ही है . इन संक्रामक रोगों से मुक्ति अथवा बचाए रखने हेतु माता शीतला से प्रार्थना की जाती है . 

होली के बाद आने वाली छठ से अष्टमी के मध्य शुभ दिन देख कर शीतला माता को विभिन्न प्रकार के पकवानों का भोग लगा कर यह पर्व मनाया जाता है .  मक्के या बाजरी से बनाये जाने वाली राबड़ी और रोटी के मुख्य भोग के साथ  मिटटी के नौ सिकोरे (कंडवारे  )में नौ विभिन्न पकवान और एक करवा शीतल जल या कांजी भरकर माता को अर्पण किया जाता है .विवाह के पहले वर्ष में वर वधू के नाम से , तथा बच्चे के जन्म पर अतिरिक्त सिकोरे भरे जाते हैं . 
राख की पिंडियों के स्थान पर मिटटी के इसर गणगौर बनाये जाते हैं , उनका वस्त्रादि , गहनों आदि से श्रृंगार होता है .  ईसर  गणगौर के प्रतीक के रूप में  छोटी बालिकाओं को विभिन्न बाग़ बगीचों में ले जाकर  सांकेतिक विवाह संपन्न  किया जाता है . 
शीतलाष्टमी से गणगौर तक के दिनों में इस पर्व की बहुत धूम होती है . लड़कियां , महिलाएं रोज प्रातः विभिन्न बाग़ बगीचों और कुएं बावड़ी से दूब , पुष्प ,   जल भर कर लाती है। आजकल बावडियों का अस्तित्व नहीं होने के कारण किसी के भी घर , किचन गार्डेन  से जल , पुष्प आदि  लाया जाता है . पूजन करने वाली स्त्रियाँ /लड़कियां बारी -बारी से गणगौर को जिमाने अपने घर बुलाती है . दीपक को चलनी से ढककर तथा गणगौर को चुनरी  की आड़ में नगर भ्रमण भी करवाया जाता है .

चैत्र शुक्ल तृतीया को गणगौर पर्व का मुख्य उत्सव /पूजन हर्षोल्लास से संपन्न किया जाएगा . गणगौर को दूब , फूल आदि से पूजन करने के पश्चात भोग में  मुख्य रूप से घेवर और गुणे अर्पित किये जायेंगे। 

  नवविवाहिताये पूजन के बाद अपने ससुराल पक्ष के लिए बयाने के रूप में वस्त्र , घेवर, गुणे आदि लेकर जायेंगी . सुबह बहुत उत्साह  से पूजन की हुई गणगौर को शाम ढलते विदा करते हुए भारी मन से " म्हारो सोलह दिन को चलो रे ईसर ले चाल्यों गणगौर " गीत गाती  उन्हें विसर्जित कर आएँगी . और त्योहारों उत्सवों का यह दौर सावन की तीज और फिर से अगली गणगौर का इतंजार करते  करते थम- सा जाएगा .  हालाँकि उत्सव प्रधान हमारे देश में नवरात्री की धूम यथावत रहेगी ! 
लोक परम्पराओं  से समृद्ध करता उत्सवों का यह आता -जाता दौर जन समूह में उत्साह , उमंग  भरता हमारी संस्कृति को  जीवंत बनाये रखता है . 

म्हारा सोलह दिन को चालो र ईसर ले चाल्यो गणगौर ...


त्योहारों का इंतज़ार हम जहाँ पूरी बेसब्री से वर्ष भर करते हैं , वही इनके जाने के बाद एक अजीब सा खालीपन या सूनापन लगने लगता है ...और जब त्यौहार मनाने की अवधि अठारह - उन्नीस दिन तक रही हो तो इसके बाद का खाली वक़्त और अधिक अखरता है ...

पिछले दिनों गणगौर पर्व की अठारह दिनों की पूजा के बाद हमें भी कुछ ऐसा ही लगा ...सावन की तीज से शुरू होने वाले त्यौहार चैत्र की गणगौर के बाद थोडा अधिक विराम लेते हैं ...रोज 4-5 घंटे सहेलियों(हर उम्र की ) के साथ बिताना और घर के कई कामों को त्योहारी व्यस्तता के कारण टालते हुए त्यौहार के बीत जाने का इंतज़ार , मगर फिर उसके बाद का सूनापन एक उदासी-सी भरता है कुछ समय के लिए ..


होली के दूसरे दिन (धुलंडी )से प्रारंभ हुई मुख्य गणगौर पूजा चैत्र तृतीया ६अप्रैल की गयी तथा इसके दूसरे दिन गणगौर के विसर्जन से " तीज त्योहार बावड़ी ले डूबी गणगौर ' से संपन्न हुई ...

विवाह के पहले वर्ष में नवविवाहित बेटियां गणगौर पूजन के लिए अपने मायके जाती हैं और वहां गणगौर की स्थापना कर पूरे सोलह दिन तक पूजन करती हैं , और साथ देने के लिए सखी सहेलियां और आस पड़ोस की महिलाएं भी उसके साथ पूजन करती हैं ...विवाह के पहले वर्ष में यदि नववधू मायके नहीं जा सके तो ससुराल में ही १६ दिन तक उसे गणगौर का पूजन करना होता है ..पहली बार १६ दिन तक पूजन के बाद हर वर्ष इस लम्बी अवधि तक गणगौर पूजन की कोई बाध्यता नहीं होती ...ये १६ दिन बहुत ख़ास हो जाते हैं क्योंकि लम्बे समय तक चलनी वाली पूजन अवधि के कारण महिलाओं के लिए हर वर्ष पूरे सोलह दिन की पूजा संभव नहीं हो पाती है ...

शीतलाष्टमी के बाद पर्व की रौनक और बढ़ जाती है ...इस दिन जंवारे , हिंडोले आदि की स्थापना के साथ गणगौर को वस्त्र आभूषणों से सजाया जाता है ...तत्पश्चात प्रत्येक दिन गणगौर का बिन्दोरा पूजन करने वाली लड़कियों या महिलाओं के घर रखा जाता है ...गणगौर के पारंपरिक गीतों के साथ गणगौर तथा पूजन कर्ताओं का चाय नाश्ते आदि के साथ आतिथ्य सत्कार किया जाता है ...

हमारी लोक संस्कृति में गीत/संगीत रचे बसे हैं ...महानगरीय संस्कृति में भी ये गीत सामाजिकता निभाने और परिचय बढ़ाने में अनूठी मदद करते हैं , क्योंकि इन गीतों में उपस्थित कन्याओं और महिलाओं के नाम के साथ पिता , पति, ससुर , भाई , बेटा/ बेटी आदि के नाम भी लिए जाते हैं ...इन गीतों के माध्यम से वर्षों तक एक दूसरे के नाम से अपिरिचित लोंग पूरे परिवार के नामों से परिचित हो जाते हैं ..

गणगौर पूजन को जाते अपने पति से मनुहार करती हैं की उन्हें पूजन के लिए जाने दे , उनकी सहेलियां बाट देख रही हैं
भंवर म्हणे पूजन दयों गिन्गौर , म्हारी सहेलियां जोवे बाट ...

पूजन के लिए दूब और जल का कलश भर लाने से ...महिलाएं दूब लेने जाती हैं तो माली/मालन का द्वार खटखटाते हुए उसे दूब देने को कहती हैं ,
बाड़ी वाला बाड़ी खोल , म्हे आया छ दोब न ..
माली/मालन पहले उनसे उनके पिता/ससुर का नाम पूछता है ...
कुण जी री बेटी छो ,कुणजी री बहू छो ...

जल का पात्र भरते हुए वे कहती हैं ......
उंचों चंवरो चौखुटों , जल जमना को नीर भराओ जी , जठा पिता /पति का नाम संपरिया , वांकी रानियाँ /बेटियां ना गौर पूजाओजी...

दूब लेकर लौटती हुई वे गुनगुनाती हैं ...
गौर ए गणगौर माता खोल ए किंवाड़ी, बारे ऊबी थाने पूजन हाळी ...
हे गणगौर माता , किंवार खोल दे , हम पूजन करने वाली बाहर खड़ी हैं ..

गणगौर का पूजन करते हुई वे गाती हैं ...
गोर गोर गणपति , ईसर पूजे पार्वती ...



पूजन करती हुई बहू बेटियों को टोकती महिलाएं जंवारा गीत गाती हैं ...
म्हारा हरया ए जंवारा की जंवारा म्हारा पीला पड़ गया
गोरियों सीचों जतन से , की लाम्बा तीखा सरस बढे

छोटे से कान्हुड़े को झूला झुलाती गाती हैं ...
चंपा की डाळ हिंडोलो जी घाल्यो घाल्यो छ रेशम डोर जी
म्हे हिंडो घाल्यो ...

हर सुहागिन अपने लिए अनमोल चुंदरी की फरमाईश करती हुए गाती हैं ...उसके लिए हरे पल्ले और कसूमल (गहरा लाल रंग )की चुंदरी ले कर आये ..
बाई सा र बीरा , थे तो जयपुर जा जो जी , आता तो ल्याजो तारा की चुन्दडी ...जांका हरया- हरया पल्ला जी , कसूमल रंग की तारा की चुंदरी...

अनगिनत सुमधुर लोक गीत हैं जो इस अवसर पर गाये जाते हैं....
इन लोकगीतों में स्त्रियों को भी पूरी तवज्जो मिलती है , कुछेक ही ऐसे अवसर होते हैं जिनमें वे अपने नाम से जाती हैं ...अपने नाम से अनचीन्ही सी फलाने की बहू , फलाने की माँ इन गीतों को गाते हुए अपने नाम भी लेती है ...
जैसे एक कांगासिया(कंघी ) गीत इस प्रकार है ...
म्हारी बाई (गीत गाने वाली महिलाओं के नाम ) का लाम्बा केस , कंगासियो बाई क सिरां चढ्यों जी राज
"कर ले बाई आरत्यों " मे भी इसी प्रकार महिलाओं के नाम जुड़ते हैं ...

लोकगीतों में महिलाओं के मन की भड़ास निकालने के पूरे अवसर मौजूद होते हैं ...परदे में रहने वाली जो बहुएं , सास -ससुर , देवर ननद आदि से तकरार नहीं कर सकती थी , इन गीतों के माध्यम से अपनी पूरी भड़ास निकल लेती थी ...सास , ननद आदि के पास सिर्फ मुस्कुरा कर रह जाने के अलावा कोई चारा नहीं रहता क्योंकि उसी समय वे स्वयम भी यही गीत गा रही होती हैं ...
गणगौर पूजन के समय कनेर के पत्ते से पूजन करती हुई वे गाती हैं ...
" गेले गेले सांप जाए , सुसराजी थांको बाप जाए "
" गेले गेले हिरनी जाए , सुसराजी थांकी परनी जाए "
" चूल्हा पाचे फिर उन्दरी , सासु जाने बहन सुंदरी "
"चूल्हा पाछ पांच पछेठा , सासू जाने म्हारा बेटा "
इनमे से कुछ शब्दों के अर्थ तो मुझ भी नहीं मालूम ... उपस्थित महिलाओं से संस्कृति से जुड़े कई रोचक आख्यान सुनने को मिल जाते हैं !

विभिन्न त्योहारों अथवा मांगलिक अवसरों पर विशेष प्रकार के पकवान और वेशभूषा राजस्थानी संस्कृति की अनूठी विशेषता है ...इसी प्रकार गणगौर के अवसर पर भी विशेष पकवान " गुणे" और घेवर बनाये जाते हैं .. ...आटे या मैदे के गुड अथवा चीनी की चाशनी पगे आठ या सोलह "गुणों" तथा घेवर ईसर गणगौर को भोग में अर्पित किये जाते हैं....

गुणे
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गणगौर विसर्जन के पल बड़े भावुक होते हैं ...महिलाएं भावुक होकर गीत गाते हुए उन्हें जंवारों सहित विसर्जन के लिए ले जाती हैं ...

म्हारा सोलह दिन को चालो रे इसर ले चाल्यो गणगौर ...
मैं तो बागां में फुन्दी खाती रे ईसर ले चल्यो गणगौर ...
मेरे सोलह दिनों की चहलपहल गणगौर को ईसर जी अपने साथ लिए जा रहे हैं ...

मैं तो बागां में फुन्दी खाती रे ईसर ले चल्यो गणगौर ...
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घरों में सादे तरीके से की गयी पूजा का समापन भी सादगी से होता है , मगर कई स्थानों पर बड़ी गणगौर स्थापित की जाती हैं , उन्हें बाकायदा ढोल नगाड़ों के साथ ले जाकर झील/ तालाब पर विसर्जित किया जाता है , मेला भी लगता है ...

जयपुर की गणगौर की शाही लवाजमे के साथ निकली सवारी देशी -विदेशी पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण होती है ...

सोमवार, 19 नवंबर 2012

अमीर- गरीब , बड़े -छोटे, ऊँच - नीच का भेद मिटाता है छठ पर्व !

    
 छठ राजस्थानियों का पर्व  नहीं है , मगर वर्षों बिहार में रहने के कारण माँ और भाभी भी इस पर्व को पूरी श्रद्धा और विधि विधान से करती हैं , जयपुर के गलता  तीर्थ सहित अन्य कुछ और स्थानों पर इस पर्व के दिन धूमधाम होती है . तीन दिन तक कठोर नियम कायदे के बीच यह व्रत बहुत मुश्किल होता है , हम  सिर्फ जल में खड़े होकर कुछ देर सूप पकड़ना ,  दूध और जल से अर्ध्य देने जितना ही कर पाते है . पिछले कुछ वर्षों में बढती भीड़ के कारण यह भी सोचा गया कि क्यों न यह पर्व घर पर ही मन लिया जाए , मगर  माँ को मनाना इतना आसान नहीं होता , कोई साथ जाए ना जाए , वे तीर्थ स्थान पर ही पूजा करती है . डूबते सूरज को अर्ध्य वाले दिन दोपहर में ही गंतव्य पर पहुँच कर ठहरने का इंतजाम , दरी , रजाई , कम्बल आदि , पूरे  परिवार के शाम के खाने का प्रबंध ,भारी  भरकम पूजन सामग्री के साथ जाना परेद्श भ्रमण जैसा ही हो जाता है . रात भर माईक पर चलने वाली  भजन -कीर्तन की सांस्कृतिक संध्या के अतिरिक्त  पटाखों की आवाज़ , छठ  व्रतियों के परिवार की महिलाओं  द्वारा झुण्ड गाये जाने वाले भजन , चाय नाश्ते के साथ अन्य  साजो सामान की छोटी दुकाने , मेले या हाट का आभास देती हैं .


 छठ पर्व के नियम के अनुसार पूजन/अर्ध्य के   के लिए जुटाई गयी सभी सामग्रियों में शुचिता का पूरा ध्यान रखा जाता है . गेंहू धोकर सुखाने से लेकर खरने के लिए खीर , पूड़ी बनाने , ठेकुआ बनाते समय बहुत सावधानी रखी जाती है . छठ पर्व का मुख्य प्रसाद ठेकुआ व्रतियों द्वारा देर रात बनाया जाता है , कहा जाता है इस समय बिल्ली या किसी भी पशु पक्षी की आवाज़ भी सुनायी नहीं देनी चाहिए . मगर अर्ध्य के समय घाट  पर उपस्थित भारी भीड़ में संतुलन बिगड़ता प्रतीत होता है . गलता  तीर्थ छठ व्रतियों के हिसाब से बहुत छोटा पड़ता है , व्यवस्था बनाये रखने में प्रशासन और विभिन्न स्वयं सेवक संगठनों  को भी बहुत समस्या होती है  . इस भीडभाड से बचने के लिए बहुत से लोग घरों में तसले अथवा टब के  पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्ध्य देने का इतंजाम भी करने लगे हैं .

पंडितों के व्यवधान के बिना भक्त और आदित्य   के सीधे संपर्क का यह  अनूठा पर्व इस मायने में अनोखा है कि इस के नियम पालन के लिए सिर्फ श्रद्धा ही काफी है .  प्रदेश  में बिहारियों की बड़ी संख्या श्रमिक वर्ग की है ,  जिनके लिए रोज की रोटी का इंतजाम ही मुश्किल होता है। अपने परिवार से दूर पर्व के लिए ज्यादा तैयारी नहीं कर पाने के कारण  कई बार इन परिवार के पुरुषों को सिर्फ नारियल या केले का डंठल लेकर ठण्ड में कांपते जल के बीच खड़े सूर्य के उगने या अस्त होने का इन्तजार करते भी देखा जा सकता है  .सूर्योदय के अर्ध्य के बाद अपनी झोली फैलाकर कम से कम दो से सात व्रतियों से प्रसाद माँगना , सुहागन स्त्रियों द्वारा अन्य स्त्रियों की मांग में सिन्दूर भरना भी इस पर्व की एक विशेषता है .   ऊँच - नीच, बड़े- छोटे , अमीर -गरीब का भेद इस समय मिट जाता है .इस पर्व पर भगवान् आदित्य के दर्शन और प्रसाद वितरण का लाभ लेते हिन्दूओं के साथ मुस्लिम और ईसाईयों  को भी आसानी से देखा जा सकता है .

माँ इस बार छठ पर बिहार में हैं . कल शाम  किसी भी शहर के छठ पर्व के विहंगम दृश्यों और तस्वीरों  के लिए समाचार चैनल पर  ट्यून किया तो सामने ह्रदय विदारक दृश्य नजर आये . राज्य की राजधानी जहाँ छठ पर्व का मुख्य  आयोजन होता है , वहां ऐसी बदइन्तजामी देखकर बहुत ही निराशा और दुःख हुआ . भूखे प्यासे व्रतियों और उनके परिजनों के साथ हुए हादसे ने दिल दहला दिया . बांस के कच्चे अस्थायी पुल के कारण  होने वाली इस घटना  के लिए यकीनन  प्रशासन के इंतजामों की खामियां गिनाई जा सकती है , मगर यह भी कहना होगा कि इस प्रकार की अन्य दर्दनाक  घटनाओं में आम नागरिकों का   दोष भी कम नहीं है . हममे  से कितने लोग प्रशासन द्वारा किये गए इंतजामों में उनका ईमानदारी  से सहयोग कर पाते हैं .सबसे पहले , सबसे आगे होने की दौड़ ऐसी बहुत सी घटनाओं का कारण बनती है . लोग कैसे भूल जाते हैं कि भीड़भाड़  वाले स्थानों पर आम जन का संतुलित और सहयोगी होना ही  सुरक्षित होता है  अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी !

जयपुर के गलता तीर्थ पर भी किये गए अनगिनत इंतजामों के बावजूद हालत बहुत खस्ता होती है . भीड़ में कई शराबी भी घुस आते हैं जो व्रतियों के परिवारजन या मित्र  ही होते हैं . इस व्रत के पालन में शुचिता का अत्यंत ध्यान रखे जाने के बाद यह व्यवहार अजीब ही लगता है .इनके द्वारा  कई बार वमन करते हुए चीखने चिल्लाने के अतिरिक्त  मार पीट के दृश्य भी उपस्थित होते हैं , जहाँ पुलिस को बीच बचाव करना पड़ता है . एक शराबी के वमन न का शिकार हमारी नयी कम्बल भी हो चुकी जिसे वही  छोड़ कर आना पड़ा .
सुरक्षा इंतजामों में पुलिस , प्रशासन और स्वयंसेवकों के साथ ही आम जनता की जागरूकता, अनुशासन , सजगता और सहयोग भी  आवश्यक है,  तभी हमारी गंगा जमुनी संस्कृति के आडम्बर रहित पर्व भी प्रसन्नता के साथ मनाये जा सकेंगे .

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

शीतलाष्टमी ....राजस्थान का प्रमुख लोक -पर्व




शीतलाष्टमी राजस्थान में मनाया जाने वाला एक विशेष पर्व है ...इस दिन शीतला माता की पूजा करने के साथ ही एक दिन बासी ठंडा खाना ही माता को भोग लगता है और खाया भी वही जाता है...इस पर्व पर खास तौर पर मक्के अथवा बाजरे की राबड़ी के अतिरिक्त उत्तर भारत में होली पर बनाये जाने वाले पकवान गुझिया,नमकीन , दही /कांजी बड़े आदि भी बनाये जाते हैं ...

होली के दूसरे दिन से प्रारंभ होने वाली गणगौर पूजा में भी इस दिन का बहुत महत्व है ...होलिका दहन के पश्चात दूसरे दिन (धुलंडी ) होलिका दहन वाले स्थान से राख लाकर उसकी आठ या सोलह पिंडियाँ बनाई जाती है तथा दूब , कनेर के पत्ते , पुष्प आदि से 16 दिन तक इनकी पूजा की जाती है ...
मिट्टी के ईसर- गणगौर आदि

शीतलाष्टमी के दिन प्रायः हर घर में बासी खाना ही खाया जाता है , इसलिए पूरा दिन महिलाएं घर के काम से मुक्त होती है , इस समय का उपयोग वे सखियों के साथ हंसी ठिठोली करते हुए बिताती हैं ...शीतलाष्टमी के दिन काली मिट्टी लाकर उससे ईसर- गणगौर , मालन माली , आदि बनाये जाते हैं , उन्हें वस्त्र आदि पहनाते हैं , रेत अथवा काली मिट्टी की मेड़ बनाकर जंवारे ( जौ) उगाये जाते हैं ...सरकंडों पर गोटा लपेटकर झूला भी बनाया जाता है ...
वस्त्रादि से सुशोभित ईसर गणगौर , झूला भी सज गया तथा मिट्टी की मेड पर जंवारे ...

गणगौर पूजन करने वाली सभी स्त्रियाँ इकठ्ठा होकर ये सभी कार्य बड़े हर्षोल्लास से गीत गाते हुए करती है ...तत्पश्चात छोटे बच्चों (सिर्फ लड़कियों )को ईसर और गणगौर के प्रतीक रूप में दूल्हा -दुल्हन बनाकर उन्हें बगीचे में में ले जाकर खेल- खेल में गुड्डे गुड़ियों जैसी ही शादी रचाई जाती है ...
नन्हे दूल्हा- दुल्हन

पूजन करने वाली तथा दर्शक महिलाओं में से ही घराती और बाराती बनती है तथा आपस में ठिठोली करती हुई नृत्य गान आदि करती है ...आम लोकगीतों मे सुहागन महिलायें अपने अखंड सुहाग के लिए ईश्वर से प्रार्थना तो करती ही हैं , लगे हाथों विभिन्न आभूषणों और आकर्षक वस्त्रों की मांग भी कर लेती हैं...

हमारा शहर अभी महानगर बनने की दौड़ में हैं , परन्तु पारंपरिक लोक उत्सवों का उल्लास अभी भी बरकरार है ...अपने वाहन खुद हांकने वाली उच्च शिक्षित कामकाजी महिलाएं भी समय का तालमेल बैठते हुए इनमे बड़े उत्साह से भाग लेती हैं ...इन पर्वों और उत्सवों का हिस्सा बनते हुए दिल और दिमाग की रस्साकसी कहाँ शांत बैठती हैं ... कई बार ख्याल आता है की ज्यादा सुखी और खुश रहने वाली महिलाएं कौन -सी हैं ...