लिखने , बोलने या समझाने का सबका अपना अलग ढंग/ तरीका होता है. गुणीजनों को अपनी शब्द सम्पदा पर मोहित हो कठिन शब्दों में ग्रंथों के हवाले से सदुपदेश देना रुचता है , वही महात्मा सरल शब्दों में विभिन्न महापुरुषों के उदाहरण देकर समझाने का यत्न करते हैं जबकि आम इंसान अपनी शब्दों की घनचक्करी के बिना ही अपने आसपास घटने वाली घटनाओं और उसमे स्वयं और विभिन्न व्यक्तियों द्वारा निष्पादित कार्यों अथवा व्यवहार द्वारा सिर्फ यह जतलाता है कि यह समस्या है/थी , इसे सुलझाने के प्रयास इस प्रकार किये जा सकते थे /हैं .
देश प्रेम पर बड़ी -बड़ी बातें पढ़ी सुनी, मगर मेरे लिए देश प्रेम का सीधा सा मतलब है इस देश से , देश में रहने वाले इंसानों से ,देश की प्रकृति से , भोगौलिक स्थिति से , यहाँ बसने वाले पशु पक्षी , बोलियाँ , भाषा , रहन सहन ,सबसे प्रेम करना है .
प्रत्येक व्यक्ति , समाज , देश के व्यवहार के दोनों पहलुओं में कुछ सकारात्मक अथवा नकारात्मक हो सकते हैं . साधु स्वभाव के बीच विघटनकारी अथवा दुष्ट प्रवृति भी साथ पलती ही है . ऐसी परिस्थितियों में हमारा या अन्य व्यक्तियों का वह व्यवहार जो दुष्प्रवृतियों को परे हटाकर सदमार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है , वही आदर्श हो जाता है . ध्यान रहे कि यहाँ समझाने के लिए भारी- भरकम उदाहरण नहीं देकर सिर्फ यह जतलाना होता है कि मैंने यह किया , इससे निजात पाई , तुम भी यह कर सकते हो या कम से कम प्रयास तो कर सकते हो ...
एक स्थान पर अभियंताओं का बड़ा दल भरसक प्रयास कर के भी नक़्शे के अनुसार बनाये गये मशीन के बराबर बनाये गये स्थान पर एक बड़ी मशीन को लगा नहीं पा रहे थे कि एक ग्रामीण के सरल उपाय ने उनकी मुश्किल एकदम से आसान कर दी . उसने सुझाव दिया कि पूरे स्थान को बर्फ के टुकड़ों से भरकर उसपर मशीन को रख दिया जाए , जैसे- जैसे बर्फ पिघलती जायेगी , मशीन भी उसके साथ अपने निर्धारित स्थान पर रख जाएगी .
कहने का तात्पर्य सिर्फ यह है कि बड़ी- बड़ी बातें करने या लिखने से ही हर समस्या का निदान संभव हो , आवश्यक नहीं ,सामान्य सहज बुद्धि भी कई बार बड़ी समस्याओं को चुटकियों में सुलझाने में सक्षम होती है .
कोई भी व्यक्ति , समाज या देश अपने आप में परिपूर्ण नहीं है . इन संस्थाओं में आसुरी प्रवृति को अनदेखा करते रहना , उसे छोड़ जाना या गरियाते रहना , कोई निदान नहीं है . अपने परिवार , समाज और देश में साथ रह कर अपने अच्छे कार्यों द्वारा समझाना, सुधार का प्रयास और फिर अंतिम उपाय के रूप में दंड देना ही एक मात्र समाधान है .
मैं सबसे पहले एक इंसान और हिन्दुस्तानी हूँ और जब हमारे समाज और देश के समस्त नियम , कायदे, कानून और संविधान धर्म और जातियों के आधार पर ही निर्धारित हैं तो मुझे अपने धर्म और समाज पर कोई शर्मिंदगी भी नहीं है . एक सच्चे हिन्दुस्तानी के रूप में मैं दूसरे व्यक्ति , समाज अथवा धर्मों में कमी देखने या दिखाने की बजाय स्वयं अपने में , परिवार में , समाज में और देश में सुधार की कोशिश करने का प्रयत्न /प्रार्थना करूंगी .
मैं हर दिन ईश्वर से यही प्रार्थना करती हूँ कि जिस समय या जो वस्तु , इंसान या कोई भी प्रलोभन मुझे अपने परिवार ,समाज और देश से गद्दारी या बेईमानी करने को उकसाए , वही पल उस वस्तु , इंसान और स्वयं मेरे लिए भी आखिरी हो जाए ....
परिवार , समाज या देश से प्रेम का जो मतलब मैं समझती हूँ , वह तो यही है , आपके लिए इनके क्या मायने हैं .....
स्वतन्त्रता दिवस की अनगिनत शुभकामनायें!
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रविवार, 14 अगस्त 2011
शुक्रवार, 13 अगस्त 2010
बेशक स्वतन्त्रता का जश्न मनाये ...ये तो जान लें कि देश- प्रेम है क्या ....!
मुबारक हो ...हम एक बार फिर स्वतंत्र होने जा रहे हैं ...... एक बार फिर तरंगा लहराएगा , राष्ट्र गान गायेंगे , लड्डू या अन्य मिठाईयां बाटी जायेंगी ....विद्यालयों में तो फ़िल्मी गानों पर लटके झटके दिखाते छोटे- मोटे सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हो जाएँ शायद ... सार्वजनिक स्थलों पर परेड भी ...बस इस तरह मन जाएगा स्वतन्त्रता देवास ...हर वर्ष की भांति ही ...बस कलेंडर में वर्ष तिथि बदली होगी ...और क्या बदलेगा .....
गरीबी , अशिक्षा , भूखमरी , हिंसा , साम्प्रदायिकता ये सब कुंडली मारे ज्यों के त्यों बैठे रहेंगे ...लोकतंत्र और उदार होता रहेगा ...चाहे आर्थिक और सामाजिक ढांचा चरमराता रहे , हिमालय की चोटियों से कोई ललकारता रहेगा , देश के विभिन्न कोनों से अलगाववाद की चिमनी से निकलता धुआं , खाप पंचायतों की भेंट चढ़े कुछ और परिंदे , हमारा स्वतंत्रता दिवस बदस्तूर बिना किसी रूकावट यूँ ही मनाया जाता रहेगा ....
बल्कि मेरा तो मानना है कि सरकारी संस्थानों और विद्यालयों में स्वतंत्रता दिवस समारोहों की रिकॉर्डिंग कर रख ली जानी चाहिए और हर वर्ष उसे विडियो पर घर बैठे देख लेना चाहिए .....फालतू आने जाने में बच्चे और बड़े परेशान क्यूँ ....हर वक़्त किसी हादसे की चपेट में आने का डर क्यूँ पालें ... सुरक्षा व्यवस्था पर इतना खर्च क्यों ....समय और धन दोनों की ही बचत हो जायेगी ...एक औपचारिकता को निभाने के लिए इतना ताम जहां क्यूँ ...माफ़ कीजिये यदि आपको इस लेख में कुछ तल्खी नजर आये ....मगर कवि रामनाथ सिंह जी की इन पंक्तियों को पढ़कर बताये ....कि हम कितने आज़ाद है ...
'सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है
दिल पे रखकर हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है'।
बेशक रस्मी ही मनाएं स्वतंत्रता दिवस ...एक बार याद कर लें उस महापुरुष को जिसने रामराज्य के सपने देखे थे...उसी देश में राम के अस्तित्व को ही नकारा जा रहा है और रावण असलियत का जामा पहने अट्टहास करता नजर आ रहा है ... स्वतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत करने का सन्देश प्रसारित किया जाता है ....आखिर हमारी सुरक्षा इतनी असुरक्षित क्यूँ हो गयी है जो 64 वर्षों से हर बार पहले -से कड़ी होने के बाद भी सुरक्षित नहीं ...
स्वतंत्र होने का औपचारिक जश्न मानते सरकारी मुलाजिम और लोकसेवक , देश प्रेम की सच्ची भावना क्या है ...क्या होनी चाहिए ...देखिये आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने क्या कहा ....
" जन्मभूमि का प्रेम , स्वदेश -प्रेम यदि वास्तव में अंतःकरण का कोई भाव है तो स्थान के लोभ के अतिरिक्त और कुछ नहीं है ... इन लोभ के लक्षणों से शून्य देश प्रेम कोरी बकवाद या फैशन के लिए गढ़ा हुआ शब्द है ... यदि किसी को अपने देश से प्रेम है तो उसे अपने देश के मनुष्य , पशु , पक्षी , लता , गुल्म , पेड , पत्ते , वन , पर्वत , नदी , निर्झर सबसे प्रेम होगा ...सबको वह चाह भरी दृष्टि से देखेगा , सबकी सुध करके वह विदेश में भी आंसू बहायेगा ....जो यह भी नहीं जानते कि कोयल किसी चिड़िया का नाम है , जो यह भी नहीं सुनती के चातक कहाँ चिल्लाता है ...जो आँख भर यह भी नहीं देखते के आम प्रणय सौरभपूर्ण मंजरियों से कैसे लदे हुए हैं , जो यह भी नहीं झांकते कि किसानों के झोंपड़ों के भीतर क्या हो रहा है , वे यदि दास बने ठने मित्रों के बीच प्रत्येक भारतवासी की औसत आमदनी का परता बता कर देश प्रेम का दवा करें तो उनसे पूछना चाहिए कि " भाइयों , बिना परिचय का यह प्रेम कैसा ...? जिनके सुख-दुःख के तुम कभी साथी नहीं हुए , उन्हें तुम सुखी देखना चाहते हो , यह समझते नहीं बनता । उनसे कोसों दूर बैठे बैठे , पड़े पड़े , या खड़े खड़े तुम विलायती बोली में अर्थशाश्त्र के दुहाई दिया करो , पर प्रेम का नाम उनके साथ ना घसीटो । "
प्रेम हिसाब किताब की बात नहीं है । हिसाब - किताब करने वाले भाड़े पर मिल जाते हैं पर प्रेम करने वाले नहीं । हिसाब किताब से देश की दशा का ज्ञान मात्र हो सकता है । हित- चिंतन और हित- साधन की प्रवृत्ति इस ज्ञान से भिन्न है । वह मन के वेग पर निर्भर है , उसका सम्बन्ध लोभ या प्रेम से है जिसके बिना आवश्यक त्याग का उत्साह हो ही नहीं सकता है । जिसे ब्रज की भूमि से प्यार होगा इस प्रकार कहेगा ...
नैनन सो रसखान जबै ब्रज के बन बाग़ तडाग निहारौं
केतिक ये कलधौत के धाम करीक के कुंजन ऊपर बारौं ..
रसखान तो किसी की लकुटी अरू कमरिया पर तीनों पुरों का राजसिंहासन तक त्यागने को तैयार थे , पर देश प्रेम की दुहाई देनेवालों में से कितने अपनी किसी थके -मांदे भाई के फटे पुराने कपड़ों और धूल भरे पैरों पर रीझकर या कम से कम खीझकर , बिना मन मैला किये कमरे की फर्श भी मैली होने देंगे ...
अब पूछिए के जिनमे वह देश प्रेम नहीं है उनमे वह किसी प्रकार भी हो सकता है ...? हाँ , हो सकता है ....परिचय से ...सान्निध्य से .....
जय हिंद ..
गरीबी , अशिक्षा , भूखमरी , हिंसा , साम्प्रदायिकता ये सब कुंडली मारे ज्यों के त्यों बैठे रहेंगे ...लोकतंत्र और उदार होता रहेगा ...चाहे आर्थिक और सामाजिक ढांचा चरमराता रहे , हिमालय की चोटियों से कोई ललकारता रहेगा , देश के विभिन्न कोनों से अलगाववाद की चिमनी से निकलता धुआं , खाप पंचायतों की भेंट चढ़े कुछ और परिंदे , हमारा स्वतंत्रता दिवस बदस्तूर बिना किसी रूकावट यूँ ही मनाया जाता रहेगा ....
बल्कि मेरा तो मानना है कि सरकारी संस्थानों और विद्यालयों में स्वतंत्रता दिवस समारोहों की रिकॉर्डिंग कर रख ली जानी चाहिए और हर वर्ष उसे विडियो पर घर बैठे देख लेना चाहिए .....फालतू आने जाने में बच्चे और बड़े परेशान क्यूँ ....हर वक़्त किसी हादसे की चपेट में आने का डर क्यूँ पालें ... सुरक्षा व्यवस्था पर इतना खर्च क्यों ....समय और धन दोनों की ही बचत हो जायेगी ...एक औपचारिकता को निभाने के लिए इतना ताम जहां क्यूँ ...माफ़ कीजिये यदि आपको इस लेख में कुछ तल्खी नजर आये ....मगर कवि रामनाथ सिंह जी की इन पंक्तियों को पढ़कर बताये ....कि हम कितने आज़ाद है ...
'सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है
दिल पे रखकर हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है'।
बेशक रस्मी ही मनाएं स्वतंत्रता दिवस ...एक बार याद कर लें उस महापुरुष को जिसने रामराज्य के सपने देखे थे...उसी देश में राम के अस्तित्व को ही नकारा जा रहा है और रावण असलियत का जामा पहने अट्टहास करता नजर आ रहा है ... स्वतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत करने का सन्देश प्रसारित किया जाता है ....आखिर हमारी सुरक्षा इतनी असुरक्षित क्यूँ हो गयी है जो 64 वर्षों से हर बार पहले -से कड़ी होने के बाद भी सुरक्षित नहीं ...
स्वतंत्र होने का औपचारिक जश्न मानते सरकारी मुलाजिम और लोकसेवक , देश प्रेम की सच्ची भावना क्या है ...क्या होनी चाहिए ...देखिये आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने क्या कहा ....
" जन्मभूमि का प्रेम , स्वदेश -प्रेम यदि वास्तव में अंतःकरण का कोई भाव है तो स्थान के लोभ के अतिरिक्त और कुछ नहीं है ... इन लोभ के लक्षणों से शून्य देश प्रेम कोरी बकवाद या फैशन के लिए गढ़ा हुआ शब्द है ... यदि किसी को अपने देश से प्रेम है तो उसे अपने देश के मनुष्य , पशु , पक्षी , लता , गुल्म , पेड , पत्ते , वन , पर्वत , नदी , निर्झर सबसे प्रेम होगा ...सबको वह चाह भरी दृष्टि से देखेगा , सबकी सुध करके वह विदेश में भी आंसू बहायेगा ....जो यह भी नहीं जानते कि कोयल किसी चिड़िया का नाम है , जो यह भी नहीं सुनती के चातक कहाँ चिल्लाता है ...जो आँख भर यह भी नहीं देखते के आम प्रणय सौरभपूर्ण मंजरियों से कैसे लदे हुए हैं , जो यह भी नहीं झांकते कि किसानों के झोंपड़ों के भीतर क्या हो रहा है , वे यदि दास बने ठने मित्रों के बीच प्रत्येक भारतवासी की औसत आमदनी का परता बता कर देश प्रेम का दवा करें तो उनसे पूछना चाहिए कि " भाइयों , बिना परिचय का यह प्रेम कैसा ...? जिनके सुख-दुःख के तुम कभी साथी नहीं हुए , उन्हें तुम सुखी देखना चाहते हो , यह समझते नहीं बनता । उनसे कोसों दूर बैठे बैठे , पड़े पड़े , या खड़े खड़े तुम विलायती बोली में अर्थशाश्त्र के दुहाई दिया करो , पर प्रेम का नाम उनके साथ ना घसीटो । "
प्रेम हिसाब किताब की बात नहीं है । हिसाब - किताब करने वाले भाड़े पर मिल जाते हैं पर प्रेम करने वाले नहीं । हिसाब किताब से देश की दशा का ज्ञान मात्र हो सकता है । हित- चिंतन और हित- साधन की प्रवृत्ति इस ज्ञान से भिन्न है । वह मन के वेग पर निर्भर है , उसका सम्बन्ध लोभ या प्रेम से है जिसके बिना आवश्यक त्याग का उत्साह हो ही नहीं सकता है । जिसे ब्रज की भूमि से प्यार होगा इस प्रकार कहेगा ...
नैनन सो रसखान जबै ब्रज के बन बाग़ तडाग निहारौं
केतिक ये कलधौत के धाम करीक के कुंजन ऊपर बारौं ..
रसखान तो किसी की लकुटी अरू कमरिया पर तीनों पुरों का राजसिंहासन तक त्यागने को तैयार थे , पर देश प्रेम की दुहाई देनेवालों में से कितने अपनी किसी थके -मांदे भाई के फटे पुराने कपड़ों और धूल भरे पैरों पर रीझकर या कम से कम खीझकर , बिना मन मैला किये कमरे की फर्श भी मैली होने देंगे ...
अब पूछिए के जिनमे वह देश प्रेम नहीं है उनमे वह किसी प्रकार भी हो सकता है ...? हाँ , हो सकता है ....परिचय से ...सान्निध्य से .....
जय हिंद ..
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