दूसरे दिन सुबह जल्दी उठकर सभी नहा धोकर तैयार हुए , मंदिर पहुंचे तब तक मंगला आरती तो हो चुकी थी ...मंगला झांकी के दर्शन कर के ही संतुष्ट होना पड़ा ...फिर चल पड़े हम मथुरा की ओर ...
मार्ग में अधिकांश मकान नीले और हरे रंग से पुते हुए थे ...
मथुरा में द्वारकाधीश जी के नजदीक पहुंचे ही थी कि एक गाईड पीछे पड़ गया ...गाडी के साथ चलते मंदिर और पार्किंग के बारे में बताने लगा ...जैसे तैसे उससे पीछा छुड़ा कर हम भागे मंदिर की ओर , वहां दर्शन में सिर्फ 5 मिनट बचे थे . ...मंदिर के विशाल प्रांगन में भीड़ -भाड़ होने के बावजूद दर्शन आराम से हो गए...प्रसाद लेकर बाहर निकाले तो ड्राईवर गाडी सहित फरार मिला ...वही गाईड फिर नजर आ गया ..." चलिए , आपकी गाडी उधर घाट के पास पार्क कर दी है " साथ -साथ चलते जयपुर में किस स्थान पर रहते हैं , क्या गोत्र है ...आदि आदि पूछने लगे ...हमने समझाया कि हम यहाँ पहली बार नहीं आये हैं , हमें सब पता है " मगर फिर भी वो साथ साथ ही चलता रहा ...विश्राम घाट पर सूर्योदय की छटा निराली थी ...पिछली बार के मुकाबले यहाँ सफाई भी थी ...
अब हमने रुख किया कृष्ण जन्मभूमि की ओर ....गाईड अभी भी साथ था ..आखिर कुछ रूपये देकर उन्हें हाथ जोड़ लिया ...इस तरह जबरन पीछे पड़ने के कारण गुस्सा तो बहुत आ रहा था मगर फिर ये भी लगा कि ये भी उनके रोजगार का ही एक हिस्सा है ....
कृष्ण जन्मस्थान पर भरी सेक्युरिटी का इंतजाम था ...चप्पे- चप्पे पर कमांडो अपनी गन संभाले हुए सतर्क ...कितनी अजीब बात है जिन प्रभु के चरणों में हम सुरक्षित होने जाते हैं , वे खुद भी इन गार्ड की निगरानी में हैं ...देश में हालात को देखते हुए ये जरुरी भी है मगर कचोटता बहुत है ...जन्मभूमि से बिलकुल सटी ही मस्जिद का हरा गुम्बद नजर आ रहा था ...कंस की कैद में वसुदेव और देवकी के पुत्र कृष्ण ने जेल में ही जन्म लिया था ... वह स्थान अब पूज्यनीय है ....महान लोंग अपने कर्मों से किसी भी स्थल को पूज्यनीय बना देते हैं , वरना कोई जेल में भी जाता है प्रभु के दर्शन करने ...:)कडकडाती सर्दी में भी सुबह इतनी जल्दी मंदिर में अच्छी खासी चहलपहल थी ....कश्मीरी युवकों का एक दल भी नजर आया , वहीँ एक विदेशी भक्त महिला भगवान् के सामने जोर -जोर से अपनी तकलीफ /शिकायत बयान कर रही थी " तुमने गीता में यह उपदेश क्यों दिया , मैं कल से अपना कर्म ही कर रही हूँ , सब मुझपर हँस रहे हैं " पता नहीं , पुजारियों और उस महिला के बीच क्या रार हो गयी थी ...
मंदिर से बाहर आते हुए वहां बनी दुकानों से हमारे साथ की अम्माजी ने काफी अपने पोते-पोतियों , बहू -बेटियों के लिए अंगूठियाँ , चेन आदि खरीदी ....मुझे भी याद आया , दादी की तीर्थयात्रा से लौटने पर उनसे मिलने वाली छोटी -छोटी भेंट के लिए हम कितने उत्साहित रहते थे ...कुछ समय बाद ही चाहे वे किसी काम की ना रहे ...लिखते हुए ही याद आया की माँ भी अभी मुंबई और सिर्धि साई बाबा की यात्रा पर हैं ...लगी होंगी बच्चों के लिए खरीददारी में ...
पागल बाबा के मंदिर की सातमंजिला संगमरमरी ईमारत लुभाती हैं मगर यहाँ सफाई व्यवस्था इतनी दुरुस्त नहीं है ...यहीं इलेक्ट्रोनिक झांकियां भी अपनी अव्यवस्था के बावजूद अच्छी लगी ...
बाँके बिहारी जी श्री कृष्ण ....हँसते हैं सब उनके खड़े होने के अंदाज़ पर ...की स्वाभाव का ही इतना बांका है की सीधे खड़ा ही नहीं हुआ जाता ...ये हमारे धर्म की विशेषता है की हम अपने ईश्वर के साथ मजाक कर सकते हैं , चिढ़ा सकते हैं और तो और गोद में भी खिला सकते हैं...
हमारा अगला पड़ाव था वृन्दावन का इस्कॉन टेम्पल ...मंदिर का निर्माण करने वाले स्वामीजी की समाधि पर फूल बने हुए है जिन पर चलते हुए " हरे कृष्ण हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे . हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे " कहना होता है ...बहार निकलते ही वे सज्जन मिल गए जिन्होंने राम -कृष्ण लिखे कार्ड हमें दिए थे जो हमें उन्हें वापस लौटाने थे ...मेरे आगे कड़ी बेटियों से उनकी शिक्षा के बारे में पूछा तो उन्हें ढेरों आशीर्वाद देते हुए वाही कार्ड उन्हें वापस देते हुए अपनी किताबों के बीच रखने का निर्देश दिया ...बच्चे महाखुश ...अब मुझसे मुखातिब होकर उन्होंने कहा ..." आप इनकी मम्मी हैं " मेरे हाँ कहने पर आशीर्वाद देते हुए बोले, "लक्की मॉम "...ख़ुशी के मारे मेरे पैर कहाँ रहते जमीन पर ....वरना ज्यादा समय यही सुनना पड़ता है " लान का एक छोरो हो जातो "(बेचारी के एक बेटा हो जाता )...:)
वृन्दावन में ही भगवान् रंगनाथ एवं गोदाजी का मंदिर है ...यह वृन्दावन का सबसे बड़ा मंदिर है ...संयोग की ही बात है की धनुर्मास के पहले ही दिन इनका दर्शन लाभ प्राप्त हुआ ... मायके में श्रीवैष्णव धर्म का पालन किये जाने के कारण इस मास को उत्सव की तरह मनाया जाता रहा है ...ससुराल में यह सब छूट गया है इसलिए ऐसे प्रयोजनों पर अचानक घर या मंदिर पहुँच जाना बहुत सुख देता ...इस पवित्र मास में प्रत्येक सुबह विशेष प्रकार की खिचड़ी या खिरान्न का प्रसाद तो हमारी कमजोरी रहा है ....
यूँ तो मथुरा -वृन्दावन में हर गली में मंदिर हैं ...जितना दर्शन लाभ करो , कम है ...मगर हमने अपनी यात्रा यही रोकी और जयपुर के लिए रवाना हो गए ......