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शुक्रवार, 26 मार्च 2021

सखियों की चौपाल (होलियाना)

 पत्नी -  आपको वाट्सएप मैसेज किया था सुबह . अभी तक देखा नहीं!

पति- तुम्हें पता तो है मैं नहीं देख पाता किसी का मैसेज.

पत्नी - क्या मतलब है तुम्हारा. मैं 'किसी' में  हूँ.

पति - अरे बाबा... 1000 मैसेज बिना पढ़े रखे हैं. उनकी अपडेट में तुम्हारा मैसेज नीचे चला गया होगा.

पत्नी - सही है वैसे. तुम्हारे फोन में वाट्सएप मैसेज पढ़ने जैसा क्या है.  (जोर से)

कैसे कैसे तो ग्रुप हैं.  फलाना समाज, ढ़िकरा कॉलोनी,  अनाप वैवाहिक विज्ञापन ग्रुप, शनाप रिटायर्ड ग्रुप, फलाने गुरूजी, आध्यात्मिक संदेश... क्या पढ़ने का मन करेगा. तुम्हें नींद आने के बाद कभी  तुम्हारा फोन चेक करती हूँ तो मैं ही बोर हो जाती हूँ... (धीमे से बड़बड़)

पति- क्या कह रही हो. जोर से बोलो न!

पत्नी - नहीं. सब्जी क्या बनाऊँ!! 😊

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सखियों की चौपाल- 

एक सखी-  पति पत्नी दोनों सोशल मीडिया में सक्रिय हो तो आपस में झगड़ा कम होता है. दोनों उसी में लगे रहते हैं. लड़ना झगड़ना भी वहीं चलता रहता है.

दूसरी सखी-  मेरे पति का क्या करूँ. वो तो फेसबूक,  वाट्सएप ज्यादा चलाते ही नहीं. सरसरी नजर से देखकर रह जाते हैं. रिटायर होने के बाद घर में ही रहना पड़ता है तो सारा झगड़ा आमने सामने ही होता रहता है.

पहली सखी-  ऐसा करो. उनका  वाट्सएप नंबर अपनी सखियों वाले ग्रुप में अपडेट कर दो. फिर देखना . उसी में व्यस्त रहेंगे . तो लड़ना झगड़ना भी नहीं होगा .

दूसरी सखी -  ना रे. . वो तो मेरी सखियों को आँख उठा कर भी नहीं देखते. सामने हो तो आँखें नीची कर साइड से निकल जाते हैं.

पहली सखी -  तो फिर समस्या तुम्हारा पति नहीं, सखियाँ हैं.उन्हें ही बदल डालो 😂


गुरुवार, 14 मार्च 2013

अथ श्री लड़ाई- झगडा पुराणम !!


बचपन शब्द याद आते ही जो सबसे पहली बात जबान से निकलती है वह है...वह बचपन का लड़ना- झगड़ना.  
 बचपन की मासूमियत और निष्पाप हृदय को अभिव्यक्ति करती है ये पंक्तियाँ - 
बच्चों सी मुहब्बत कर लो 
मुझसे लड़ना -झगड़ना, रूठना-मनाना. 
दिन भर खेलना कूदना 
शाम पड़े पर घर जाना 
और सब कुछ भूल जाना सुनो. 

 मानो  बचपन का नाम ही लड़ना झगड़ना हो . और ऐसा होता भी है . कैरम ,सितोलिया , गिल्ली डंडा , कंचे , क्रिकेट आदि खेलते हुए कई बार झगडे होंगे बचपन में . 

 जाओ नहीं खेलते तुम्हारे साथ . तुमने बेईमानी की और खेल वही  समाप्त हो जाता . परंतु  अगले ही दिन जब खेल का समय हो तो आवाज़ लगते ही सारे एक साथ दौड़े चले आते . कभी तो कल का झगडा याद ही नहीं होता  और जो याद होता तो  कल जैसी बेईमानी की  तो फिर कभी नहीं खेलेंगे . यह जानते हुए भी कि खेल में बेईमानी तो होनी है . किसी ने ना की तो लगातार हारते हुए हम यही बहाना  बनाकर तो खेल समाप्त करेंगे . 


ग़ज़ल की पंक्ति सुनते ...  वो चिड़िया, वो बुलबुल, वो तितली पकड़ना,  वो गुड़िया की शादी में लड़ना झगड़ना "  मन किसका ना भीग जाता होगा .

 सच यह है की कपट रहित  लड़ने- झगड़ने का  सौभाग्य सिर्फ बचपन में ही  नसीब होता है . बड़े होते सभ्यता के मारे लडाई- झगडा बंद हो जाता है और यदि होता भी है तो कुटिलता के साथ जिसमें परस्पर मान सम्मान की हानि पहुंचाते हुए   दुर्भावना साफ़ नजर आती है।  

बच्चों और बड़ों के/से  झगडे में सबसे बड़ा अंतर यह होता है कि बच्चे जितनी शीघ्रता से लड़ते झगड़ते हैं , उसी शीघ्रता  से मान भी जाते हैं . बड़ी बातो के छोटे झगडे होते हैं जबकि बड़े होने पर पर छोटी बाते बड़े झगडे़ की वजह बन जाती है .

बड़े होने पर झगडे भूले नहीं जाते /पाते और बुरे व्यवहार की यह याद आपस में वैर भाव बढाती ही जाती है और हृदयों के बीच कभी ना पाटने वाली खाई बन जाती है . 

लडाई -लड़ाई माफ़ करो , गाँधी जी को याद करो ....बड़े होने पर अधिकांश मामलों में सही हो सकता है पर  यदि इसकी आड़ में आत्मसम्मान और स्वाभिमान लगातार प्रताड़ित हो तो भूलना या माफ़ करना मुश्किल होता है और होना भी चाहिए .  
माफ़ करो का मतलब यह थोड़े ना है कि पड़ो सी आपके घर में अपना कचरा उठा कर डालता रहे  और आपसे उम्मीद करे , आप भूल जाएँ . 
बचपन के लड़ने- झगड़ने और प्रताड़ना में उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव जितना ही अंतर होता है . 

कई  कलहप्रिय लोगो के लिए लड़ना झगड़ना भी एक शौक सा बन जाता है  . कई बार ये लोग  बिना बात दूसरों से उलझते  हैं तो कभी  दूसरों को उकसा कर लड़वा कर  और फिर हाथ बंधे खड़े होकर तमाशा देख अपना मुफ्त  का मनोरंजन करने वालों में शामिल हो जाते हैं .  
क्रोध में अपना नुकसान ना कर ले , संयत वाणी का प्रयोग करें , जैसे उपदेशों के साथ हममे से अधिकांश ने वह कहानी सुनी ही होगी . वही  कहानी, जिसमे   झगड़े को मिटाने के लिए साधारण पानी को दवा बताते हुए क्रोध के समय अपने मुंह में भर लेने की सलाह दी जाती है . 

मगर इससे अलग एक कहानी भी सुनी हमने कभी ....सुन लीजिये आप भी ! 

एक लड़ाका स्त्री थी.  ( खिल गयी ना बांछे , यहाँ भी मानसिकता हावी होगी, कभी किसी लड़ाका पुरुष की कहानी कभी कही सुनी  ही नहीं गयी ). 

 खैर , सुनते हैं आगे .

 उस स्त्री को रोज लड़ने का बहाना चाहिए था क्योंकि उसके बिना उसे कुछ अच्छा नहीं लगता था . जैसे सामान्य मानव के लिए पेट भरने के लिए रोज भोजन  का सेवन आवश्यक है , उसके लिए झगडा ही औषधि थी . ना लड़े  तो  बीमार हो जाए , मगर रोज एक पड़ोसी से ही कब तक लड़े . बोरियत होती थी उसे और बेचारा  पड़ोसी भी परेशान . 

पडोसी ने ही एक  समाधान सुझा दिया कि  क्यों ना हफ़्तावसूली की ही तर्ज पर वह प्रतिदिन अलग -अलग घर में जाकर लड़ना झगड़ना कर ले . इससे किसी एक पर ही मानसिक दबाव नहीं होगा और दूसरों का मुफ्त मनोरंजन भरपूर होगा .
 नए लोग , नई बातें , नए झगडे . उस स्त्री को यह सुझाव जम  गया . अब वह हर दिन नए घर में जाती , उल्टा -सीधा बोलती तो उस घर के लोगों से रहा नहीं जाता , वे भी जम कर उसे वापस सुनाते। मोहल्ले के बाकी लोग उनका झगडा देख मुसकी काटते हुए घबराते कि कल उनका नंबर भी आने वाला है . 

 भयंकर तू- तू मैं -मैं होती ,  जब लड़ते हुए दोनों पक्ष थक जाते तब वह शांति से अपने घर लौट आती . झगड़े का मनोरंजन भी आखिर कब तक . 

कुछ   शांतिप्रिय लोग मन से लोग डरे सहमे रहते कि उनका नंबर भी आने वाला है . ऐसे ही एक घर में नई  शादी हुई थी .  नई  बहू आई  , द्वाराचार तथा अन्य रस्म निभाते हुए सासू माँ का डरा सहमा चेहरा और अन्य स्त्रियों की कानाफूसी देख बहू ने कारण पूछ ही लिया . पड़ोस की एक स्त्री ने बताया कि कल उस लड़ाका स्त्री का तुम्हारे घर लड़ने आने का कार्यक्रम है . सास इसलिए ही सूखी  जा रही है . नई  बहू के सामने बहुत तमाशा हो जाएगा .

 बहू बड़ी समझदार थी , सासू माँ के चरण पकड़ लिए .

 माँ , आप परेशान ना हो , मैं स्वयं उससे निपट लूंगी .

 सास ने ममता भर उड़ेलते हुए चिंतित मुख बहू को गले लगा लिया ," ना री , तू क्या उससे मुकाबला करेगी.  उससे तो आजतक कोई ना जीत सका " 

 माँ, आप चिंता ना करें , बस मुझ पर विश्वास रखे  . 

बहू ने कौल  ले लिया सबसे कि उसके अलावा आँगन में कोई नहीं रहेगा  . सब लोग कमरा बंद कर चुपचाप रहेंगे .

क्या करती सासू माँ . नई बहुरिया का आग्रह टाल  भी नहीं सकती , और साथ में चिंता भी कि यह नई  नवेली सुकुमारी गालियां  , अपशब्द कैसे सुनेगी/ सहेगी .

दूसरे दिन नियत समय पर वह लड़ाका स्त्री आ पहुंची .  देखे तो आँगन में सिर्फ एक स्त्री घूंघट निकाले खड़ी है , घर में कोई और नहीं है . 

अब वह बड़ी प्रसन्न . आज आएगा मजा लड़ने में . नई  बहू है ,नया जोश होगा . एक कहूँगी तो चार सुनाएगी  फिर मैं आठ सुनाऊंगी . आज ही आएगा मजा लड़ने में . 

लड़ाका स्त्री शुरू हो गयी  - अरे! कहां  मर गये नासपीटों . कहाँ छिपे हो सब करमजलों  और भयंकर गालियाँ  बकना शुरू कर दिया . 
नई नवेली बहू आँगन में चुपचाप वैसे ही घूंघट काढ़े खड़ी रही , एक शब्द भी ना कहा . लड़ाका स्त्री परेशान , एकतरफा झगडा आखिर कितनी देर तक हो सकता था . आज और लड़ने का कोई फायदा नहीं था. 

वह मुड़ कर जाने लगी . अभी दरवाजे तक पहुंची भी ना थी की बहू ने घूंघट हटाया , धीरे से बोली ." कहाँ चली नासपीटी , करमजली " . जाते- जाते लड़ाका स्त्री के कान में यह शब्द पड़े. 

अब आया है मजा लड़ने में सोचते वह पुलकती गालियाँ बकते लौट आयी . देखे तो बहू फिर से उसी तरह घूंघट निकाले आँगन में खड़़ी  . मुंह से एक शब्द ना निकाले . जी भर कर गालियाँ बकते थक गयी वह स्त्री मगर बहू तो कुछ ना बोले . आखिर फिर से घर लौटने का रास्ता पकड़ते दरवाजे तक आयी कि  बहू  ने घूंघट हटाया और फिर वही  दुहराया -   कहाँ चली नासपीटी , करमजली ! 

अब तो लड़ाका  स्त्री के क्रोध का पारावार ना रहा . पलट कर अनगिनत गालियाँ बकते लौट आई . और बहू उसी तरह फिर से घूंघट निकाले चुपचाप खड़ी . जब तक वह स्त्री लड़ती , बहू  कुछ ना कहती मगर जैसे ही वह पलट कर जाने लगती बहू फिर उसे छेड़ देती . ऐसा कई बार होते आखिर वह स्त्री थक गयी . इस बार बहू के कहने पर भी नहीं पलटी और धीमे- धीमे घर से बाहर निकल गयी . रास्ते भर अपने आपसे प्रण करती रही कि आज के  बाद  वह किसी के घर झगड़ने नहीं जायेगी .  

अथ श्री लड़ाई- झगडा पुराणम !! 

मॉरल पर हम कुछ नहीं कहेंगे . काहे से कि फिर इलज़ाम लगेगा ज्ञान बांटने का इसलिए जिसको जो उचित लगे ,वही समझ ले !!


चित्र गूगल से साभार !

रविवार, 3 मार्च 2013

चाँद को देखो जी ....



सर्दियों में खिडकियों से ताक झांकी कर लेने वाला चाँद या  गर्मियों में छत पर टहलते चौदस और पूर्णिमा का चन्द्रमा जाने कितनी बार किस- किस तरह  न मोह लेता है . 
हलकी बहती ठंडी हवा , दूर तक शांत माहौल और उस पर   धीमी आवाज़ में रेडियो पर बज रहे  रात का समां  झूमे चन्द्रमा , खोया -खोया चाँद , ये हवा ये रात ये चांदनी जैसे गीतों का सम्मोहन दूर बचपन से लेकर बुढ़ापे की और बढ़ते जस का तस है . मोहक वातावरण की खुमारी में बस ख़ामोशी से सुनते  इन गीतों के साथ ओस की बूंदों सा भीगता मन  अम्बर के  जाने किस रहस्यमय लोक में भ्रमण कर आता है। 

चाँद अपने आप में विशिष्ट है . नाम में भी  स्त्रीलिंग या पुल्लिंग का भेद नहीं .. शशि , इंदु  है तो  सुधांशु , हिमांशु , मृगांक, मयंक भी . श्रापित हो  शिव के सर चढ़ उन्हें शशिधर बनाता है. स्वयं घटते- बढ़ते संदेसा भी देता है . कुछ भी स्थिर नहीं , ना सुख , ना दुःख ...सुख गया तो दुःख भी जाएगा  ! अँधेरी रातों को जगमग करता एक चन्द्रमा सितारों के घने झुरमुट पर भारी है .  बुझे मनों  में भ्रम या आस जो कहे जगाये रखता है . अमावस की रात कितनी लम्बी हो , पूर्णिमा भी होगी ! 
बदली कितनी घनी हो , फाड़ कर आसमान का सीना झलक दिखला देता है अक्सर! 

किसी प्रिय ने चाँद के हाथों अपने प्रियतम को संदेसा भेजा  तो कोई बहन भाई की राह तकते चाँद को उसे राह दिखने की फ़रियाद करती है . 
किसी ने माशूक को कहा चाँद  तो किसी का लाल हो गया उसका चाँद . किसी भूखे पेट बच्चे को रोटी सा नजर आया चाँद तो किसी का मामा बन गया . कितने गीत लिखे गए , तस्वीरें ली गयी , चित्र बनाये गए , परंतु वह खूबसूरती आंकी ना जा सकी . 

यह तो हुई भावुक दिलों , संवेदनशील कलम या मन की दास्ताँ .  खुश होकर कुछ देर गा ले इंसान -  आजकल पाँव जमीन पर नहीं पड़ते मेरे . 
कल्पना या खवाबों की उड़ान में बेशुमार विचर  आये मन मगर भावुकता से परे एक कठोर धरातल भी है जिसपर हर इंसान को चाहे /अनचाहे पैर टिकाने ही पड़ते हैं . आखिर तो हम इंसान हैं . पक्षी तो है नहीं कि पर फैलाये आसमानी बादलों को निहारते तो कभी गर्दन झुक कर नीचे पृथ्वी के नदी , झरने ,पहाड़ों को निरखते  मीलों  उड़ते रहो . थक जाओ तो कही किसी पेड़ , मकान , तारों की छत पर दो मिनट सुस्ता  लिए और फिर वही उन्मुक्त उड़ान .  

चाँद को करीब से देखने की चाहत में विज्ञान ने भी क्या नहीं किया . बरसों बरस  दूरियां आंकी , अनुमान लगाते  गणनाएं की  जो जान लें की कितनी दूरी है इस चाँद और हम इंसान के बीच . दूरबीन से न हुआ तो टेलिस्कोप लगा कर देख लिया .और जब देखा तो कितने भरम टूटे होंगे ...

कि  चाँद की धरती तो बड़ी उबड़- खाबड़ है . बड़े गड्ढे हैं वहां . चाँद से पृथ्वी को देखे तो वह भी चाँद सी ही नजर आये जिसे पृथचन्दा कहते हैं यानि की इसी अन्तरिक्ष में हमारी धरती भी किसी के लिए चाँद सी है . वह " किसी "  अभी हम सबसे अनजाना है हालांकि किस्से कहानियों में जाना- पहचाना भी !

कुछ वैज्ञानिको ने तो यह शोध भी किया कि  यदि चाँद से धरती की  दूरी कम हुई तो धरती पर प्रलय जैसी स्थितियां हो सकती है . माने कि चाँद टंगा  रहे वही  दूर , हम पृथ्वीवासियों के  लिए यही ठीक है .
 चाँद पर पहुंचे एक चंद्रयात्री का अनुभव  तो यही बताता है कि कोई नहीं , पहुंचे चाँद पर तो ठीक था . वहां से देखने वाले दृश्य साफ़गोई से तो न बताते वह भी तब जब की प्रोग्राम लाईव हो . 

लेखकों /कवियों / कवयित्रियों के लिए अत्यधिक आवश्यक है की विज्ञान और विज्ञान की छात्रों /छात्राओं की ओर से आँखें मूंदे ही रहे वर्ना चाँद से उनकी तुलना पर क्या न भुगतना पड़  जाए . चाँद से तुलना के खतरे हजार  है .

जाहिर है किसी खगोलशास्त्री को आपने कह  दिया कि मुखड़ा चाँद सा है तो वह लट्ठ लेकर ना पीछे पड़  जाए .  बन्दे/बंदी  ने टेलिस्कोप से चाँद को बहुत करीब से बार -बार देखा है. आपकी तारीफ़ को जाने क्या समझ ले!

वर्षों पुरानी पत्नी  (पुरानी तो पत्नी ही होगी न , प्रेमिका तो होने से रही  ) को चाँद कह दिया तो तड़ से जवाब मिल जाए  - जानती हूँ तुम्हारे इरादे . अब वहीँ आसमान में  टंगे देखना चाहते हो पर मैं तुम्हारी यह चाहत पूर्ण नहीं होने दूँगी . यही रहूंगी तुम्हारी छाती पर मूंग दलते !

कई समझदार टाईप के पति /प्रेमी गा -गा कर कहते नजर आते हैं - चाँद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था  .  
सोचो तो... जो बेचारी भोली -भाली माशूकाओं को असल बात पता चले तो  के जी , सानू चंगी तरह मलुम है साडी इन्नी बढिया  किस्मत कित्थों  हुई " अपणी किस्मत में तो तू ही सी  !!  
समझ भी लो  उनके दुख/ दर्द को . 😝

साहित्यकार और कवि के लिए चाँद महबूबा , माशूका , प्रेमिका  कुछ भी हो , कुछ भी कहें परंतु
किसी भूखे गरीब को चाँद दिखा दिया तो उसे चाँद में रोटी- सा गोल होने के अतिरिक्त क्या नजर आयेगा ..... 

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

मुस्कराहट एक बड़ा हथियार है !!

कल सुबह कॉलेज जाती हुई एक बच्ची नजर आई कुछ लंगड़ाती हुई . शायद चप्पल टूट गयी थी. झेपी मुस्कराहट के साथ चप्पल घिसट कर चलते देख थोडा दुःख हुआ तो थोड़ी हंसी भी आई . 
मुस्कुराने के बहाने भी कैसे अजीब होते हैं . बेचारे कि चप्पल टूटी है चलने में परेशानी है .  स्टॉप कितनी दूर है . उससे पहले मोची मिलेगा या नहीं , कैसे चल पाएगी इतनी दूर . सब लोंग अजीब नजरों से घूर रहे हैं जो अलग . फिर भी मुस्कुरा रहे हैं  जिसका दुःख है वह भी और जो उसके दुःख में शामिल हो दुखी हो रहा है, वह भी . उसकी मुस्कराहट में शामिल तो मै भी हुई मगर उसके दुःख के अलावा भी मुस्कुराने का मेरा अपना कारण था.

किसी को भी लंगड़ाते देख मुझे बहुत- बहुत-बहुत  साल पहले की स्मृतियाँ सजीव हो उठी है  .  उम्र यही कोई  दस-.ग्यारह वर्ष की रही होगी .  पैर के तलवे में हुए फोड़े ने चलना फिरना मुहल कर रखा था . एड़ी टिका कर चलना संभव ही नहीं था तो  घर में  भी अक्सर सहारा लेकर एक पैर पर चलना पड़ता . घर से बाहर मरहम पट्टी करवाने के अलावा तो जाने का सवाल ही नहीं था . पिता के ऑफिस जाने से पहले सहायक चाबियाँ और उनका ब्रीफकेस लेने आता और  लंच में और शाम को छुट्टी होने पर उनके साथ ही यही समान लेकर लौटता भी . ऐसे ही किसी दिन पापा के साथ आते उनके मुंहलगे  सहायक रामावतार ने मुझे एक पैर पर कूद कर चलते देख लिया .  उसके बाद  हाल ये कि सुबह , शाम ,दोपहर जब भी घर पर मैं उसके सामने नजर आ जाऊं  मुझे देखते ही लंगड़ा कर चलना शुरू कर देता . हम लोग ऐसे ही माहौल में बड़े हुए हैं जहाँ चपरासी , काम वाली बाई आदि भी घर के सदस्य जैसे ही हो जाते हैं  तो कोई उसको डांटता नहीं बल्कि सब उसके साथ ही मुस्कुराने लग जाते.  
 एक तो अपनी हालत से परेशान और ऐसे में किसी का खिझाना और परिजनों का उसमे सहयोग. मैं उस पर बहुत खीझती  चिल्लाती . इतना गुस्सा आता मुझे कि यदि पापा का डर या लिहाज़  नहीं होता उसे गालियाँ भी दे देती या फिर कुछ उठा कर दे मारती .  किस्मत अच्छी थी उसकी कि उसका आना उसी समय होता जब पापा घर में होते .   
खैर , थोड़े दिन बाद पैर ठीक भी हो गया . आराम से चलना -फिरना भी होने लगा  मगर रामावतार का मुझे चिढ़ाना नहीं छूटा. जब भी मैं नजर आ जाऊं ,उसका लंगडाना शुरू . 
मैं बागीचे में हूँ या बरामदे में बैठी रहूँ या फिर कॉलोनी में घूमते मिल जाऊं . मुझे देखते ही उसका लंगड़ाना शुरू .  लोग हैरान होकर उससे पूछते कि अभी तो ठीकठाक थे अचानक क्या हो गया पैर में . मैं तो जानती थी उसके लंगड़ाने का कारण सो खीझ कर रह जाती. ऐसे ही एक दिन लंच के समय पापा के साथ घर लौटते मुझे डाईनिंग टेबल पर खाना खाते देख जब उसने लंगडाना शुरू किया  मैं बस गुस्से से फट पड़ी .  पापा -मम्मी पर भी गुस्सा करने लगी कि आप इसे कुछ कहते नहीं  इसलिए ये हमेशा मुझे चिढ़ाता  है . 
पापा थोड़ी देर सुनते रहे . फिर मुस्कुराते हुए बोले   , " तू चिढ़ती है  इसलिए वह चिढ़ाता है . चिढ़ना छोड़ दे  उसका चिढ़ाना छूट जाएगा ." 
मेरा गुस्सा एकदम से शांत हो गया .  उनकी बात में वजन था . मैं भी उनके साथ मुस्कुराने लगी थी . 
उम्र तो अपनी रफ़्तार से बढती है . जीवन में परिवर्तन भी आते हैं . मैं बड़ी भी हुई ,  विवाह हुआ , बच्चे भी हो गये मगर रामावतार का मुझे चिढ़ाना नहीं छूटा . वह जब भी मुझे देखता पतिदेव या बच्चों के साथ , तब भी उसका लंगड़ाना यथावत रहता .  बस मेरा  खीझना छूट गया था. मैं भी सबके साथ मुस्कुरा देती और  बच्चों को अपने बचपन की कहानी सुनाती. एक अनमोल सबक सिखा मैंने और बच्चों को भी सिखाया  कि  चिढ़ाने वाली परिस्थितियों से कई बार मुस्कुराकर भी बचा जा सकता है . खीझ से बचने में शत प्रतिशत नहीं तो कुछ प्रतिशत जरुर होता है .
पापा नहीं रहे . हमारा वह गाँव छूटा . रामावतार भी रिटायर हो गया . मगर भाई की पास के शहर में नौकरी के कारण अभी संपर्क पूरी तरह नहीं ख़त्म हुआ . एक दिन अचानक मिल गया बड़े भाई को . पूछने लगा हम सबके बारे में   " बबी लोंग कैसन बाड़ी " .
भाई ने झट फोन मिलाकर बात करवा दी  .
का बबी , कैसन बाडू, हम अईनी भैया लगे . पूछत रहनी है कि बबी बाबू लोग कैसन बाड़े ...कईसे   गोड़वा से लंगडात  रहलू ...उहाँ सब ठीक बाटे ना !
पापा-मम्मी और सभी भाई -बहनों की  जाने कितनी ब़ाते याद थी .
भाई ने बताया  वृद्धावस्था  की मार झेलते रामावतार की आँख में आंसू थे .  
 जब भी चिढ़ने चिढ़ाने की बात होती है  मैं इन्ही स्मृतियों से गुजरती हूँ . 
अविश्वास के इस दौर में जीने वाले हमलोग ...सोचती हूँ क्या हमारे बाद वाली पीढ़ी की स्मृतियों में भी ऐसा  अपनापन संभव हो सकेगा !!!

रविवार, 12 अगस्त 2012

ऐसा भी कोई मित्र होता है भला ?

इन्टरनेट पर एक अलग फेसबुक समाज की स्थापना हो चुकी है . आभासी दुनिया की सीमा को लांघ कर यहाँ भी वास्तविक जीवन के सारे गुण दोष , अफवाहें , आरोप , प्रेम , तकरार , नफरत अपनी पूरी भावप्रवणता के साथ मौजूद हैं . हों भी क्यों नहीं . आभासी दुनिया कह देने से यह सिर्फ आभास नहीं हो सकता , कंप्यूटर के कीबोर्ड से जुड़े हुए लोग तो वास्तविक ही हैं . उनकी उम्र , जाति , लिंग , धर्म और प्रोफाइल फर्जी होने के बावजूद भी  .कुछ दिनों पहले फेसबुक पर मैसेज बॉक्स में आये विशेष सन्देश को लेकर काफी हलचल मची रही . इस सन्देश में एक कन्या विशेष को फ्रेंड लिस्ट में ना जोड़ने की प्रार्थना के साथ लेकर फेसबुक धारियों को आगाह किया जा रहा था कि उक्त कन्या बहुत खतरनाक है .. अफवाहों में विशेष रूचि नहीं होने के कारण इस पर तवज्जो नहीं दी मगर यह खयाल आया कि क्यों इस तरह किसी ख़ास कन्या को फेसबुक पर सामाजिक होने से बाधित किया जा रहा है . यदि खतरनाक भी होगी तो फेसबुक पर क्या कर तमंचा ,गोला बारूद चला लेगी ? अगले ही पल खयाल आया कि शायद यह चेतावनी उसके हैकर होने की सम्भावना को लेकर हो ..
किसने उड़ाई होगी यह अफवाह . इससे उसे क्या लाभ होगा ! यह अलग मसला था मगर मेरे ज़ेहन में एक विचार आया ही कि यह कहीं  दो  मित्रों के बीच किसी प्रकार की ग़लतफ़हमी के कारण रिश्ता टूटने या बिगाड़ने का परिणाम रहा हो . मित्र यदि दुश्मन बन जाए तो उससे खतरनाक कौन हो सकता है . विचार मंथन के दौरान एक हास्यव्यंग्य से भरपूर लोककथा स्मरण में रही जिसमे मित्रों के बीच स्नेह्बंधन टूटने का कारण   व्यंग्य की दृष्टि   से अत्यंत रोचक था . 

किसानों के लिए बुआई  का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है . सुबह जल्दी उठना , खेतों पर जाना , हाड़ तोड़ मेहनत के बाद जमीन को बुआई के लायक बनाते परिवार और मित् के साथ किसान अपने छकड़ों पर घर से खेतों के मार्ग का रास्ता बतियाते तय करते हैं . ऐसे ही एक विशेष जाति का किसान अपनी  
धुन   में अपने ऊंट छकड़े पर दौड़ता जा रहा था कि उसके गाँव के ही एक दूसरे व्यक्ति ने आवाज़ देकर उसे भी साथ ले चलने को कहा . किसान ने उस व्यक्ति से उसकी जाति पूछी और हमजात होने पर उसे अपने साथ ले चलने को राजी हुआ . 

हां तो तुम भी ....हो , इसलिए ही मैंने तुम्हे अपने छकड़े पर बैठा लिया .  फलाना जाति के होते तो मैं कभी अपने छकड़े पर तुम्हे जगह नहीं देता . वे लोग तो बिलकुल मित्रता के योग्य नहीं होते हैं .

कहते तो तुम ठीक हो . मेरा भी अनुभव कुछ ऐसा ही रहा है . इन लोगों को तो कभी मित्र बनाना ही नहीं चाहिए . बुरे समय में कभी साथ नहीं निभाते .  बोलो ऐसे भी कोई मित्र होते हैं !

अच्छा तुम्हारे साथ भी यही हुआ , क्या किस्सा है ,बताना तो !

अरे होना क्या है . मेरा भी एक ....मित्र था . दांत कटी दोस्ती थी हमारे बीच . साथ उठना- बैठना , खाना -पीना , खेतों पर काम करना  , सब कार्य  साथ ही करते थे . सब  अच्छा चल  रहा था मगर एक दिन  मेरे सर  पर आफत  आ  गयी  . मैंने जब  अपने उस मित्र को मदद  करने  को कहा तो साफ़  मुकर  गाया  ...

ऐसी   क्या मुसीबत  आ  गयी   थी  !

पिछली फसल के समय हम ऐसे ही अपने  छकड़े पर अपने परिवार के साथ खेतों पर जा रहे थे . रास्ते में प्यास लगी तो देखा कि  पानी भरा देवरा तो घर ही भूल आये थे . राह में ही मीठे पानी का कुआं दिख गया तो सोचा यही से पानी भर ले चले  . मैंने मित्र से कहा तो तुरन्त मान गया वह भी . हालाँकि उसके पास भी थोड़ा पानी तो भरा हुआ था .  रास्ता कंकड़ पत्थरों के साथ बेर की झाड़ियों के काँटों से भी भरा था . हम दोनों मित्र अपनी पत्नियों  के साथ  कुएं की ओर बढे . मेरी पत्नी की चप्पल टूट गयी थी मैंने अपने मित्र से कहा कि अपनी पत्नी की चप्पल दे दे मेरी पत्नी को . बेचारी कैसे चल पाएगी . मित्र की पत्नी ने अपनी एक चप्पल उतार कर दे दी!
 बोलो !ये क्या बात हुई . दोनों चप्पल दे देती तो क्या बिगड़ता ?
बेचारी मेरी पत्नी सिर्फ एक चप्पल से कैसे चल पाती . गुस्से का घूँट पीकर मैं उस समय चुप ही रहा . कुँए की पाल  पर   पहुंचे   तो देखा कि बाल्टी में रस्सी छोटी पड़ रही थी . बाल्टी कुएं में डूबती नहीं थी . कैसे पानी भर पाते!
अब  सुनसान  बियाबान  में जेवड़ी  कहाँ  से आती  , मैं बोला  मित्र से-- तेरे  ऊंट की जेवड़ी   निकाल  कर ले आ  . मित्र  भागा हुआ  गया और ऊंट के नाक  से बंधी  नकेल  का  आधा  हिस्सा  काट  कर ले आया.
मैंने बोला  कि तू   पूरी रस्सी  क्यों नहीं लाया  तो कहने  लगा  कि आधी  रस्सी  से ऊंट को पेेेड़ड़ से बांध  कर आया हूँ  . कहीं  इधर-  उधर  चला गया तो ?
खैर,  आधी  जेवड़ी  से जैसे-  तैसे  पानी निकाला  , मगर मेरा मन  खराब  हो गया था ,
बोलो!  ऐसा भी कोई मित्र  होता है?

सही कहते हो भाई ऐसा भी कोई मित्र होता है ! मगर तुमने अपने  ऊंट  की नकेल क्यों नहीं निकाली ...

क्या कहते हो . और मेरा ऊंट कही इधर - उधर चला जाता तो ? मैं तो बर्बाद ही हो जाता !

सही कहते हो भाई , ये लोग मित्र बनाने के योग्य नहीं है. अब तुम सुनो मेरा किस्सा !!
पिछले बरस अच्छी कमाई हुई खेती में . बारिश सही समय पर  आई   . अच्छी फसल हुई , अच्छी कीमत पर बिक भी गई तो सोचा के अबके बेटी का ब्याह ही  निपटा  दिया जाए . सो अच्छा -सा खाते -पीते घर का लड़का देखा .  शादी पक्की कर दी .  लगन हुआ . सारी  तैयारी करते शादी की तारीख भी आ गयी . मगर गलती ये हुई कि ननिहाल गयी बेटी को शादी के दिन समय से बुलवाने की बात ही  भूल गया  .
उधर बारात रवाना होने की खबर आई तो जल्दी से भाई को भेजा कि बेटी को लिवा  लाये . अब इतनी दूर का मामला . आते तो समय लगता ही . उधर बरात  रवाना हो चुकी थी . मैं अपने मित्र के पास गया कि एक दिन के लिए अपनी बेटी को मेरे घर भेज  दे .  हल्दी  , तेल  , मेहंदी  , जयमाल  तक  की सारी  रस्मे    कर लेगी .  तब  तक   मेरी बेटी आ जाएगी  ननिहाल से . फिर उसका  विवाह  कर देंगे  और तेरी बेटी तुझे वापस  .
मेरा मित्र बोला  कि हम इतने दिनों से अच्छे  मित्र है .  जैसी  मेरी बेटी  वैसी  ही तेरी  बेटी  मगर ये तो आज  तक  नहीं हुआ कि तेल  , हल्दी  , मेहंदी  किसी का हो , और विवाह  किसी और का .  यह नहीं हो सकता ...मुझे  माफ़  कर दे .

ओहो  ! फिर क्या हुआ , क्या किया ?

क्या करता  . मिट्टी  की गुुड़िया रखकर  सारे नेगचार  किये  . किस्मत  अच्छी थी कि जयमाल  के समय बेटी वापस  आ गयी थी ननिहाल से . सो शादी तो सही ढंग  से निपट  गयी मगर मैंने इस मुसीबत की घड़ी  में दोस्त  को अच्छी तरह परख   लिया . मैंने उससे दोस्ती ही तोड़ ली.   ऐसा भी कोई मित्र होता है भला ?

सही कहते हो भाई . ऐसे लोगों को तो मित्र बनाना ही नहीं चाहिए ! ऐसा भी कोई मित्र होता है भला!

लोक कथा से प्रेरित  ...
कहानी  का मॉरल  तो आप सब लिख   ही देंगे  :)

रविवार, 18 मार्च 2012

ताऊ की ब्लॉग लिखाई !

ब्लॉग जगत की सबसे बड़ी लाफ्टर मशीन ताऊ नजर नहीं आ रहे बहुत दिनों से . हंसोड़ों को हंसी कि तलब हो रही थी. क्या करेंअ ब ...जा पहुंचे रामप्यारी के पास ...
कुछ तो करके ताऊ को मना . उनके बिना सब दुखी- उदास हैं. हँसने के लिए अजीब वाहियात तरीके अपनाकर ब्लॉगजगत की हवा ख़राब कर रहे हैं . अब तू ही कुछ समझा सकती है !

रामप्यारी ने भी अब चिंता सताने लगी -- बहुत दिन हो गये वाकई . ताऊ ने समझाना पड़ेगा . जो इतनी लम्बी छुट्टी पर रहे तो कोई नाम तक याद रखने वाला नहीं मिलेगा !

रामप्यारी गई ताऊ के पास . ताऊ बड़ा- सा पैग बनाये उदास सूरत लिए बैठे थे .

क्या हुआ ताऊ . ऐसी रोनी सूरत क्यूँ बना रखी है . जे आप ही ऐसे रहोगे तो क्या होगा . बाकी तो वैसे ही रोना- धोना मचाये रखते हैं .

के करूँ रामप्यारी . लोगां ना हँसाने के फेर में तेरी ताई ने बहुत कुटाई की लट्ठों से ...कि इब तो दिमाग में कुछ आ ही नहीं रहा. के लिखूं , के ना लिखूं ! तू पढ़ी लिखी तो ना है वरना तेरे को समझाता कि इसे राईटर्स ब्लॉक कहते हैं ....

रामप्यारी को एक बार तो बहुत गुस्सा आया . जे ताऊ बड़ा विद्वान् बना फिरता है जैसे कि अब तक जो लिखा है , वह रामायण - गीता से भी बढ़ कर है . थोड़े बहुत संगी- साथियों ने तारीफ़ करके चने के झाड पर चढ़ा दिया है वरना तो लिखता क्या है , घास काटता है ...
मगर फेर थोड़ी सहानुभूति उपजी . ताऊ का इतने दिनों का साथ था आखिर . उनके साथ के कारण ही रामप्यारी की भी इतनी पूछ थी . 
प्रकट में बोली ...चिंता ना कर ताऊ . मैं पता करती हूँ कि तेरी इस समस्या का हल क्या है ...
ओहो . जे मेरी समस्या हल करेगी. ये मुंह और मसूर की दाल...के जमाना आ गया है . अब चेले गुरु को समझायेंगे ...
मन ही मन भड़क रहे थे ताऊ मगर वक़्त की नजाकत देखते प्रकट में प्यार से बोले ...
रे रामप्यारी . तू मेरी इतनी चिंता करती है . मने बहुत अच्छा लगा , पन तेरी चिंता मेरे से कुछ लिखवा नहीं सकती ...

कोई नहीं ताऊ . मैं तेरे लिखने का प्रबंध करने की सोचती हूँ ....

इब रामप्यारी जुट गई समस्या सुलझाने में ...अब उसने तो लिखना आता नहीं  कि शिक्षा देगी ताऊ को पर कुछ करना तो होगा ...
चश्मा लगाये घूम आई बहुत सारे ब्लॉग्स पर ....पढ़ते -पढ़ते उसकी मुस्कराहट चौड़ी होती गई ...
क्या -क्या लिखते हैं लोग . जे ताऊ फ़ालतू ही परेशान हो रिया है ...लिखना कौन बड़ी बात है !
घूम फिर कर पहुंची ताऊ के पास ...
फालतू ही परेशान हो रहे थे ताऊ . जे लिखना कोई बड़ी बात नहीं है . जे वाणी लिख सकती है तो आपके लिखने में कोई दिक्कत ना है . आप लिखने में आओ तो बड़े -बड़ों की छुट्टी कर सकते हो ...

सच रामप्यारी , ऐसा हो सकता है ! मगर परेशानी तो यही है कि समझ नहीं आ रहा क्या लिखूं ...

कौन मुश्किल है ताऊ ...देख सबसे पहले एक पोस्ट अपने जन्मदिन की लिख .  दूसरी ताई से मिला था उस दिन के हुआ था जे लिख . तीसरी शादी की सालगिरह . चौथी पुरानी प्रेमिका . पांचवी नई प्रेमिका . छठी आभासी प्रेमिका और कुछ ना सूझे तो एक राउंड लगा आ दिल्ली का .  तेरे गाँव से दिल्ली कौन दूर है ...तीन -चार पोस्ट बस में बैठने से लेकर दिल्ली पहुचंने तक के के हुआ वो सब लिख डाल ... 
ले ,हो गया दस पोस्ट का जुगाड़ !

ताऊ का सर भन्नाट हो गया ...ताई से मिला.... उस दिन के हुआ था . सिर पर गूमड़ का निशान उसी दिन का है . जोर का लट्ठ पड़ा था सिर पर ! इब ये लिखूंगा तो मेरी गृहस्थी की के इज्ज़त रह जाएगी ...
तू भी ताऊ . के इज्ज़त की परवाह करण लगा है . लिखना बड़ी बात है ...कुछ तो अपने --- से सिखा होता . जे वे अपनी और देश की इज्ज़त की परवाह करते तो हजारपति से अरबपति ना बन पाते ...तू भी ना ताऊ !
पर के ये ठीक रहेगा और ये सब प्रेमिकाओं वाली बात .  ना ...ये ठीक ना लग रहा ...क्या सोचेंगे वे सब मेरे बारे में और ताई को उनके बारे में पता लगा तो फेर तो लिखना लिखण छोड़ , पेन पकड़ने लायक भी नहीं रहूँगा ...ताई कोई घर में पाली पालतू बिल्ली थोड़ी है जो मलाई का कटोरा आगे सरकाया और सब भूल -भाल कर खाणे में जुट जाएगी ...तेरी ताई शेरनी है .कच्चा निगल जायेगी मुझे और डकार भी ना लेगी .. फाड़ खाएगी मेरी बोटी- बोटी . ये प्रेमिकाओं वाली बात रैन दे और कोई टिप्स दे !

जो भी हो , रामप्यारी ताऊ को और पिटते नहीं देख सकती थी ....

तो ताऊ .  आप तो वैसे भी साहित्यकार हो . कई पत्रिकाओं में छपते रहे हो . रेडियो पर लोग सुनते रहे हैं आपको . वही सब लिख दो यहाँ ....के परेशानी है , लोग इम्प्रेस हो जायेंगे कि ताऊ कितना विद्वान् है और ताई से पिटने का डर भी नहीं रहेगा ...

बावली बूच ...अब तो ताऊ माथा ठोकने लगा ... ...वो सब मैं लिखता हूँ , पैसे मिलते हैं ....इन मुफ्तखोरों (ब्लॉग पाठकों ) के लिए अपने अमूल्य ज्ञान को बाटूंगा यहाँ . बावली हुई है के! 
 वह सब तो विशिष्ठ पाठकों या श्रोताओं के लिए हैं ...के करेंगे ये ब्लॉगर... पढेंगे , कुछ समझेंगे , नहीं समझेंगे . दो लाईन ठोक जायेंगे . कोई तो बहुत बढ़िया कहकर खिसक लेंगे ...कोई थोड़े -बहुत अपनी विद्वता का झंडा गाड़ते नया कन्फ्यूजन पैदा कर जायेंगे ...

मगर ताऊ . जो तुम पत्रिकाओं में लिखते हो , रेडियो पर पढ़ते हो , तो कौण से वहां लोग खड़े होकर तालियाँ बजाते हैं . तुरन्त प्रतिक्रिया भी नहीं मिलती !

पिसे मिलते हैं रामप्यारी , पीसे ...तू के समझेगी .कभी कुछ छपवाया होता तो जाणती ....

चित्त भी मेरी , पट्ट भी मेरी ...ताऊ तेरा कुछ नहीं हो सकता !

चल तू रहणे दे ...मैं देखता हूँ के किया जा सकता है ....

जैसे -जैसे सुरा ताऊ के हलक से होती जिगर तक पहुँच रही थी . ताऊ के दिमाग की बत्ती जलने लगी थी ...
रे रामप्यारी , जुगाड़ हो गया पोस्ट का ... थोड़े दिन बाद तेरी ताई जाण वाली है मायके . तब कुछ लिख मारूँगा .आएगी लौट के जब तक मामला ठंडा हो जाएगा ...

अच्छा ताऊ  .  बड़े होशियार ....ताई के जासूस भरे पड़े हैं तेरी फैमिली में ...एक फ़ोन घुमाण की देर है !

जे बात है ....कोई ना ...जब तक ताई यहाँ नहीं है उनके मुंह बंद करने का इंतज़ाम है मेरे पास ..अपने --- से सिखा हुआ हुनर कब काम आएगा . एक बोतल में वही बोलेंगे जो मैं कहूँगा ...

ताऊ के बार की चमाचम बोतलें रामप्यारी को मुंह चिढ़ा रही थी ! रामप्यारी समझ गयी कि ताऊ दुनियादारी के सारे ढब सीख चुका है. लिखने के लिए कुछ न कुछ जुगाड़ कर ही लेगा !
 इब चिंता की कोई बात नहीं है !


गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

हम मूरख तुम ज्ञानी .......

दुनिया का चलन है ....हम जो है बस वही सही है , हम चतुर , सत्यवादी , निर्मल हृदय ,ईमानदार , कार्यकुशल , परोपकारी , ज्ञानी , ....जो हैं वो बस हम है ...." तुम मूरख हम ज्ञानी "
कभी न कभी हम सब के मन में यह खयाल जरुर आता है ..
हालाँकि ऐसे लोंग भी होते हैं जो सिर्फ अपने को मूर्ख मानते हैं , उन्हें हर व्यक्ति अपने से ज्यादा बुद्धिमान लगता है , मगर इनकी गिनती सिर्फ अन्गुलियों पर की जा सकती है ..दुर्लभ प्राणियों की इस जमात में खुद को शामिल कर हम इठलाते रहे हैं ... ." हम मूरख तुम ज्ञानी "


खांचों में जीते हैं हम लोंग , हमारे मापदंड , मर्यादायें इन खांचों के साथ बदलती रहती है .... अपनी भूमिका बदलते ही सोच भी अपनी सुविधानुसार परिवर्तित हो जाती है ..क्यों नहीं हम ये मान सकते कि दुनिया में हर रंग जरुरी है , हर शख्स ,हर वस्तु की अपनी खूबियाँ हैं , अपनी खामियां भी हैं ....स्वाद सिर्फ मीठा या तीखा ही नहीं देता ...नमकीन , खट्टा और कसैला मिलकर ही भोजन का स्वाद बढ़ाते हैं ..
देखिये तो जो हम है और जो हम नहीं हैं उसके लिए हम क्या -क्या सोचते हैं ....


मैं विवाहित हूँ
.....इसलिए सभी अविवाहित उत्श्रंखल, चरित्रहीन है ...!
मैं अविवाहित हूँ ...विवाहितों का भी कोई जीवन है जैसे कारागृह  के बंदी हों.

मैंने प्रेम विवाह किया है ....अरेंज मैरिज वही करते हैं जिन्हें कोई लड़का /लड़की घास नहीं डालती , ये तो मां -बाप ने शादी करवा दी वरना कुंवारे ही रह जाते .
मेरा अरेंज मैरेज है .... प्रेम विवाह छिछोरापन है .

मैं धार्मिक हूँ
.....इसलिए सभी नास्तिक पापी हैं , घृणा करने योग्य हैं .
मैं नास्तिक हूँ ....धार्मिक मान्यताओं का पालन करने वाले पाखंडी हैं .

मैं .... धर्म को मानती हूँ ....इसलिए दूसरे धर्मों में कोई सार नहीं है , उनमे कुछ भी अच्छा नहीं है .
मैं .... प्रान्त से हूँ ....सभ्य लोंग बस यहीं बसते हैं .
मैं .... भाषी हूँ ...बस मेरी बोली सबसे मीठी , बाकी सक बकवास .

मैं नेता हूँ ....पूरी जनता मेरी प्रजा है .

मैं अमीर हूँ ....गरीबों को जीने का कोई अधिकार नहीं है .
मैं गरीब हूँ ....अमीर सिर्फ नफरत किये जाने योग्य हैं .

मैं सत्यवादी हूँ ....दुनिया कितनी झूठी है .
मैं शिक्षित हूँ ......इसलिए सभी अशिक्षित जंगली हैं , गंवार हैं ..

मैं साहित्यकार हूँ ... .दूसरों को लिखने का शउर ही नहीं है , क्या -क्या लिख देते हैं .
मैं ब्लॉगर हूँ ...साहित्यकार , लेखक क्या चीज है, पैसों के भरोसे पैसों के लिए लिखते हैं ...मेरी जो मर्जी आये लिखता हूँ .

मैं कवि हूँ ....कवितायेँ लिखना कितना दुष्कर है , कहानी लिखने में क्या है , जो देखा आसपास लिख दो , कोई तुक , बहर का ख्याल नहीं रखना पड़ता .

मैं कहानीकार हूँ ....कवितायेँ तो यूँ ही लिख दी जाती हैं , कोई भी पंक्ति कैसे भी जोड़ दो , बस तुक मिलाने की जरुरत है , आधुनिक कविता में तो तुक की भी जरुरत नहीं .

मैं वैज्ञानिक हूँ ....ज्योतिष पाखंड है , सिर्फ बेवकूफ बनाने का जरिया है .
मैं ज्योतिषी हूँ ....वैज्ञानिकों का भाग्य तो हम ही बता सकते हैं ...

मैं बॉस हूँ ....मातहतों को अपने बॉस के साथ विनम्रता से पेश आना चाहिए ,ऑफिस के कार्य के अलावा थोड़े बहुत घर के काम भी कर दिए तो क्या हर्ज़ है ..
मैं मुलाजिम हूँ ...बॉस को कर्मचारियों से प्यार से पेश आना चाहिए , हम तनख्वाह ऑफिस के काम की लेते हैं , इनके घर का कम क्यों करें ...

मैं पुरुष हूँ .....स्त्रियों की अकल उनके घुटने में होती है !
मैं स्त्री हूँ ......पुरुषों के घुटने कहाँ झुकते हैं , कौन नहीं जानता !
मैं कामकाजी महिला हूँ ...घर बैठे सिर्फ डेली सोप देखना , पास पड़ोस में सास बहू की चुगलियाँ और काम क्या होता है इन गृहिणियों को .
मैं गृहिणी हूँ ....सुबह सवेर सज- संवर कर निकल जाना , घर और बच्चों को आया के भरोसे छोड़कर ...काम तो बहाना है.

मैं सास हूँ ....आजकल की बहुएं ना , आते ही पूरे घर पर कब्जा कर लेती हैं , बहू को ससुराल का हर कार्य आदर पूर्वक करना चाहिए..
मैं माँ हूँ ...बेचारी मेरे बेटी से ससुराल वाले कितना काम करवाते हैं , बहू का हक तो उसे मिलना ही चाहिए .
मैं बहू हूँ ....ये सासू माँ , समझती क्या है अपने आप को , जब देखो हुकम चलाती है .
मैं बेटी हूँ ....माँ ने अपनी बहुओं को कितना सर चढ़ा रखा है .
मैं ननद हूँ ...भाभियाँ भाई को अपने वश में रखती हैं , भाई को अपनी बहनों को तीज त्यौहार पर महंगे गिफ्ट देने चाहिए .
मैं भाभी हूँ ....ननद बिजलियाँ होती हैं , आग लगाने के सिवा कुछ नहीं जानती , तीज त्योहारों पर अपने भाई से महंगे तोहफों की मांग करती रहती हैं .

मैं पिता हूँ ....आजकल बच्चे कितने अनुशासनहीन है , हम तो अपने पिता से कितना डरते थे , उन्हें कभी हमें पढने के लिए कहना ही नहीं पड़ता था ..
हम बच्चे हैं .....हमारे पिता को कभी उनके माता पिता ने पढने के लिए नहीं टोका ,मगर ये हमेशा हमारे सर पर सवार रहते हैं ..

मैं ही मैं हूँ ....इस मैं को तो !!!

और बहुत कुछ "मैं " अभी जुड़ सकते हैं इसमें ....थोड़ी कोशिश आप भी कर ले !


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बुधवार, 22 जुलाई 2009

ताऊ तेरी रामप्यारी !!

ताऊ तेरी रामप्यारी !!
उस दिन जब ताऊ अपने ब्लॉग पर रचनाएँ आमंत्रित कर रहा था ...रामप्यारी की बहुत सी सखियों की तो बांछें खुल गयी ...ज्यादा क्या कहूं ..आप सब जानते हो इस युग के सखा और सखियों के बारे में...सारी की सारी लग गयी ...अब आयेगा मजा ...जम कर रामप्यारी की पोल खोलेंगे ....पर ये ताऊ कम ना है ...पूरी फीडबैक रखे है ...झट रचनाएँ आमंत्रित करने का आप्शन रद्द कर दिया ...मगर रामप्यारी की सखिओं को जो खडबडी लग गयी ...कहाँ मानती ...बहुत मान मनौवल करने लगीं ...अपने ब्लॉग पर ही लगा दो हमरी पोस्ट ...वोह ताऊ तो रामप्यारी के बारी में कुछ छपने न देगा ... हमने भी सोचा ...के फरक पड़ेगा ...थोडी रामप्यारी की सखिओं की भड़ास निकल जायेगी ...तो फिर सुनो किस्सा ...

एक बार ताऊ के दरबरिओं ने भड़का दिया ताऊ को ...कुछ पता है तमने ...तुम तो बड़े खुश हो रहे हो ...की रामप्यारी को घर घर की निगरानी पर लगा दिया है ...कुछ पता है ...यूँ आँख मूँद कर भरोसा करना ठीक ना है ...किसीने तो रामप्यारी के पीछे भी लगा निगरानी करने को ...बात ताऊ के जच गयी ...
इब क्या था ...ताऊ ने अपने तोते रामखिलावन को लगा दिया रामप्यारी के पीछे ...
जहाँ जहाँ रामप्यारी जाती ...रामखिलावन भी पीछे लगा रहता ....रामप्यारी परेशान ...यह कुन है जो रात दिन पीछे लगा रहता है ...रामखिलावन अपनी मीठी मीठी बातों के जाल में रामप्यारी ने फांसने की कोसिस करने लागा ...
कान खड़े हो गए रामप्यारी के ...वा भी कोई कम ना है ...ट्रेनिंग जो ताऊ ने दी सै ...
तो ...एक दिन रामखिलावन बड़े लाड से बोला ...
रामखिलावन :- रे रामप्यारी ...तू मन्ने भोत अच्छी लागने लागी है ।
रामप्यारी :- तू भी मन्ने भोत अच्छा लागे है ।
रामखिलावन :- तो फिर बणा ले ना अपना ..
रामप्यारी :- ये तो कोई बात ना हुई ...काळ कोई और अच्छा लागने लगेगा ...।
रामखिलावन :- ना...रामप्यारी ...तू आखिरी होगी ।
रामप्यारी :- ओये रामखिलावन ...भीगी लकड़ी की जलावन ...मैं तेरी थोडी ना बोल री हूँ ...
मैं तो अपनी बात करे थी ...!!
बेचारा राम खिलावन जा पड़ा ताऊ के चरणों में ...ताऊ ये तेरी रामप्यारी !!
और ताऊ अपने मुछों पर ताव देता मुस्कुराता रहा ....देखा मेरी ट्रेनिंग का असर ....बेचारे दरबारी अपना मुंह लटका कर रह गए ।

जैसा की रामप्यारी की सखी रामदुलारी ने बताया ...