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रविवार, 29 अगस्त 2010

एक प्रेम कथा ऐसी भी ....

एक प्रेम कथा ऐसी भी ....

 मैं तुझे इतनी अच्छी लगती हूँ . मेरे चेहरे पर झुर्रियां हैं. काले धब्बे हैं. उम्र भी बहुत हो गयी है.
फिर भी !!

हाँ . तू मुझे बहुत बहुत अच्छी लगती है .मुझे तेरी उपरी सुन्दरता से क्या मतलब. खूबसूरत तो मन होना चाहिए . मेरी नजरों में तू सबसे अधिक कीमती है.

आँखें बंद कर इत्मिनान से कंधे पर सर टिकाते दुर्लभ रक्त ग्रुप की वह स्वस्थ स्त्री उस कुटिल मुस्कान को नहीं देख पायी .

प्रेमी मानव अंगों का व्यापारी था ....!