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गुरुवार, 7 नवंबर 2013

डूबते सूरज को अर्ध्य देने वाला इकलौता छठ - पर्व .....

आज छठ पूजा है , छठ व्रती और श्रद्धालु शाम को ढलते सूरज को अर्ध्य देंगे।  यह इकलौता ऐसा पर्व है जहाँ डूबते सूरज को  दिया जाता है।आज वर्षों बाद इस दिन बेचैनी नहीं है।    माँ वर्षों से करती रही है इस व्रत को , उनका विश्वास रहा कि पापा इस व्रत के कारण ही अपनी जिंदगी के अनमोल दस वर्ष और जी पाये। पापा भी इस कठिन व्रत की पालना के समय उनका पूरा ध्यान  रखते थे।  व्रत के लिए आवश्यक फल फूल सब्जियाँ   , दौरे , सूप जैसी समस्त सामग्रियों को लाने और ढंग से धोकर जमाने तक में भूखी प्यासी माँ की सहायता के लिए सहायक उपस्थित होते थे।  
पिता के जाने के बाद व्रत करते हुए भी इन सब चीजों की व्यवस्था माँ स्वयं करती , बाजार जाती , सब्जी फल सूप वगैरह खुद चुन कर लाती , मन हमेशा चिंताग्रस्त बना रहता। माँ को सबने बहुत समझाया  कि वे अब इस व्रत को त्याग दें , जिनके लिए करती थी वही  नहीं रहे , और जिन संतानों के लिए करती रही है ,   वे स्वयं खुद कर लेंगे अपनी सुरक्षा के लिए , मगर माँ होते हुए समझ सकती हूँ   ममता की लाचारी। दिल के दौरे के बाद हुई  एन्जियोंप्लास्टी के कारण  आखिर माँ को यह व्रत दूसरे को सौंपना ही पड़ा।  कहते हैं कि इस व्रत को छोड़ा नहीं जा सकता , किसी दूसरे को अर्पण किया जाता है , यानि वह व्यक्ति इस व्रत को करने का संकल्प लेता है ! पिछली छठ को बिहार जाकर इस व्रत को त्याग आई माँ और यही कारण है कि आज मैं कुछ निश्चिन्त हूँ। हालाँकि उन माताओं की भी चिंता मन में है जो अपने परिवार के समुचित सहयोग के बिना इस व्रत को कर रही होंगी। 
माँ के व्रत के बहाने जयपुर के गलता घाट  की रौनक , प्रसाद , व्रतियों के सूप में दूध का अर्ध्य , सात स्त्रियों से प्रसाद माँगना , सिन्दूर लगाना , पहाड़ी पर  सूर्य देवता के दर्शन आदि की कमी भी महसूस हो ही रही है !

तीन दिन तक बिना पानी -खाने के अलावा रात में जाग कर ठेकुवे का प्रसाद बनाना , रात भर खुले आसमान के नीचे दूसरे दिन  उगने वाले सूर्य का इन्तजार करना , ठन्डे पानी में गीले बालों और  वस्त्रों के साथ खड़े रहना  निश्चित ही इतना आसान नहीं है। परिणाम स्वरुप अक्सर व्रती स्त्रियां चिड़चिड़ी हो जाती हैं। दौरे को रखने , अर्ध्य देने आदि के दौरान कई बार लड़ने झगड़ने के स्वर सुनाई देते हैं। 
 एक बार का दृश्य याद है जब सूर्योदय के अर्ध्य के बाद व्रती स्त्री के पति द्वारा लाये गए चाय के ग्लास को उठाकर उस स्त्री ने फेंक दिया , पता नहीं किस बात पर गुस्से में भरी हुई थी। इस दौरान उनके चिड़चिड़ेपन पर मुझे गुस्सा नहीं आता , डिहाईड्रेशन के कारण उनके चिड़चिड़ेपन को समझा जा सकता है।  हालाँकि इस व्रत को सिर्फ स्त्रियां नहीं करती , पुरुष भी तड़के ठण्ड में ठिठुरते गीले कपड़ों में नारियल आदि लिए सूर्यदेव का इन्तजार करते नजर आते हैं , वहीं कुछ लोग पत्नी या माँ के सहयोग के लिए भी उपस्थित रहते हैं।  इन व्रत त्योहारों के धार्मिक कारण कुछ भी हों , परन्तु ये आयोजन परिवार और समाज के बीच एक सेतु बनाने का कार्य अवश्य करते हैं। 


जयपुर के गलता घाट पर छठ की पुरानी तस्वीरें 

मिलजुल कर पर्व की तैयारियां करना ,एक दूसरे की सहायता करना , गीतों के बोलों के साथ  हंसी- ठिठोली , एक ही छत के नीचे सबका इकट्ठा होना परिवार और समाज को एकजुट रखने में महती भूमिका निभाता है।  समाज के जिम्मेदार नागरिक होने के नाते हमें अपने परिवार में बच्चों को आपस में मिलजुल कर तथा पास पड़ोस को भी उल्लास में सम्मिलित करने को प्रेरित करना उचित है , बात उल्लास और आनंद के संचार की हो  ना कि गहने , कपडे , घरेलू उपकरणों ,विलास की सामग्रियों के थोथे प्रदर्शन का प्रतीक बन कर ना रह जाए ये उत्सव , त्यौहार !  

परिवारों , समाजों में  उल्लास बना रहे , मन का उत्सव भी रगीन खुशनुमा हो , छठ पर्व की अनगिनत शुभकामनाएँ !

सोमवार, 19 नवंबर 2012

अमीर- गरीब , बड़े -छोटे, ऊँच - नीच का भेद मिटाता है छठ पर्व !

    
 छठ राजस्थानियों का पर्व  नहीं है , मगर वर्षों बिहार में रहने के कारण माँ और भाभी भी इस पर्व को पूरी श्रद्धा और विधि विधान से करती हैं , जयपुर के गलता  तीर्थ सहित अन्य कुछ और स्थानों पर इस पर्व के दिन धूमधाम होती है . तीन दिन तक कठोर नियम कायदे के बीच यह व्रत बहुत मुश्किल होता है , हम  सिर्फ जल में खड़े होकर कुछ देर सूप पकड़ना ,  दूध और जल से अर्ध्य देने जितना ही कर पाते है . पिछले कुछ वर्षों में बढती भीड़ के कारण यह भी सोचा गया कि क्यों न यह पर्व घर पर ही मन लिया जाए , मगर  माँ को मनाना इतना आसान नहीं होता , कोई साथ जाए ना जाए , वे तीर्थ स्थान पर ही पूजा करती है . डूबते सूरज को अर्ध्य वाले दिन दोपहर में ही गंतव्य पर पहुँच कर ठहरने का इंतजाम , दरी , रजाई , कम्बल आदि , पूरे  परिवार के शाम के खाने का प्रबंध ,भारी  भरकम पूजन सामग्री के साथ जाना परेद्श भ्रमण जैसा ही हो जाता है . रात भर माईक पर चलने वाली  भजन -कीर्तन की सांस्कृतिक संध्या के अतिरिक्त  पटाखों की आवाज़ , छठ  व्रतियों के परिवार की महिलाओं  द्वारा झुण्ड गाये जाने वाले भजन , चाय नाश्ते के साथ अन्य  साजो सामान की छोटी दुकाने , मेले या हाट का आभास देती हैं .


 छठ पर्व के नियम के अनुसार पूजन/अर्ध्य के   के लिए जुटाई गयी सभी सामग्रियों में शुचिता का पूरा ध्यान रखा जाता है . गेंहू धोकर सुखाने से लेकर खरने के लिए खीर , पूड़ी बनाने , ठेकुआ बनाते समय बहुत सावधानी रखी जाती है . छठ पर्व का मुख्य प्रसाद ठेकुआ व्रतियों द्वारा देर रात बनाया जाता है , कहा जाता है इस समय बिल्ली या किसी भी पशु पक्षी की आवाज़ भी सुनायी नहीं देनी चाहिए . मगर अर्ध्य के समय घाट  पर उपस्थित भारी भीड़ में संतुलन बिगड़ता प्रतीत होता है . गलता  तीर्थ छठ व्रतियों के हिसाब से बहुत छोटा पड़ता है , व्यवस्था बनाये रखने में प्रशासन और विभिन्न स्वयं सेवक संगठनों  को भी बहुत समस्या होती है  . इस भीडभाड से बचने के लिए बहुत से लोग घरों में तसले अथवा टब के  पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्ध्य देने का इतंजाम भी करने लगे हैं .

पंडितों के व्यवधान के बिना भक्त और आदित्य   के सीधे संपर्क का यह  अनूठा पर्व इस मायने में अनोखा है कि इस के नियम पालन के लिए सिर्फ श्रद्धा ही काफी है .  प्रदेश  में बिहारियों की बड़ी संख्या श्रमिक वर्ग की है ,  जिनके लिए रोज की रोटी का इंतजाम ही मुश्किल होता है। अपने परिवार से दूर पर्व के लिए ज्यादा तैयारी नहीं कर पाने के कारण  कई बार इन परिवार के पुरुषों को सिर्फ नारियल या केले का डंठल लेकर ठण्ड में कांपते जल के बीच खड़े सूर्य के उगने या अस्त होने का इन्तजार करते भी देखा जा सकता है  .सूर्योदय के अर्ध्य के बाद अपनी झोली फैलाकर कम से कम दो से सात व्रतियों से प्रसाद माँगना , सुहागन स्त्रियों द्वारा अन्य स्त्रियों की मांग में सिन्दूर भरना भी इस पर्व की एक विशेषता है .   ऊँच - नीच, बड़े- छोटे , अमीर -गरीब का भेद इस समय मिट जाता है .इस पर्व पर भगवान् आदित्य के दर्शन और प्रसाद वितरण का लाभ लेते हिन्दूओं के साथ मुस्लिम और ईसाईयों  को भी आसानी से देखा जा सकता है .

माँ इस बार छठ पर बिहार में हैं . कल शाम  किसी भी शहर के छठ पर्व के विहंगम दृश्यों और तस्वीरों  के लिए समाचार चैनल पर  ट्यून किया तो सामने ह्रदय विदारक दृश्य नजर आये . राज्य की राजधानी जहाँ छठ पर्व का मुख्य  आयोजन होता है , वहां ऐसी बदइन्तजामी देखकर बहुत ही निराशा और दुःख हुआ . भूखे प्यासे व्रतियों और उनके परिजनों के साथ हुए हादसे ने दिल दहला दिया . बांस के कच्चे अस्थायी पुल के कारण  होने वाली इस घटना  के लिए यकीनन  प्रशासन के इंतजामों की खामियां गिनाई जा सकती है , मगर यह भी कहना होगा कि इस प्रकार की अन्य दर्दनाक  घटनाओं में आम नागरिकों का   दोष भी कम नहीं है . हममे  से कितने लोग प्रशासन द्वारा किये गए इंतजामों में उनका ईमानदारी  से सहयोग कर पाते हैं .सबसे पहले , सबसे आगे होने की दौड़ ऐसी बहुत सी घटनाओं का कारण बनती है . लोग कैसे भूल जाते हैं कि भीड़भाड़  वाले स्थानों पर आम जन का संतुलित और सहयोगी होना ही  सुरक्षित होता है  अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी !

जयपुर के गलता तीर्थ पर भी किये गए अनगिनत इंतजामों के बावजूद हालत बहुत खस्ता होती है . भीड़ में कई शराबी भी घुस आते हैं जो व्रतियों के परिवारजन या मित्र  ही होते हैं . इस व्रत के पालन में शुचिता का अत्यंत ध्यान रखे जाने के बाद यह व्यवहार अजीब ही लगता है .इनके द्वारा  कई बार वमन करते हुए चीखने चिल्लाने के अतिरिक्त  मार पीट के दृश्य भी उपस्थित होते हैं , जहाँ पुलिस को बीच बचाव करना पड़ता है . एक शराबी के वमन न का शिकार हमारी नयी कम्बल भी हो चुकी जिसे वही  छोड़ कर आना पड़ा .
सुरक्षा इंतजामों में पुलिस , प्रशासन और स्वयंसेवकों के साथ ही आम जनता की जागरूकता, अनुशासन , सजगता और सहयोग भी  आवश्यक है,  तभी हमारी गंगा जमुनी संस्कृति के आडम्बर रहित पर्व भी प्रसन्नता के साथ मनाये जा सकेंगे .

बुधवार, 24 नवंबर 2010

सुशासन का कोई विकल्प नहीं है ....

कल दिन भर बिहार के चुनावी नतीजों पर नजर रही ....ओपिनियन पोल और एक्जिट पोल को सही ठहराते हुए एक बार नितीश फिर से बिहार के सिरमौर बन गए हैं ....

मैं एक आम गृहिणी हूँ ....राजनीति से मेरा दूर दराज का भी कोई सम्बन्ध नहीं है ...पिता की कर्मभूमि होने के कारण बचपन और किशोरावस्था की बहुत सी यादें इसी प्रान्त से जुडी हैं ......फिर एक आम भारतीय की तरह भी देश की राजनीति में क्या हो रहा है , क्यूँ हो रहा है , जानने की रूचि रहती ही है ...

सुशासन का कोई विकल्प नहीं है ...बिहार की जनता ने साबित कर दिया है कि अब धर्म, जाति , प्रान्त , भाषा की राजनीति के दिन बस लद ही गए हैं ....पटना के गाँधी मैदान से दीपकजी का कार्यक्रम भी देखा ..आम जनता उत्साहित है ....मीडिया हाउस के लिए भीड़ जुटाना अपने कार्यक्रमों की पब्लिसिटी का एक अंग हो सकता है , मगर इसमें कोई शक नहीं कि बीते पांच वर्षों में बिहार में शासन की मंशा देश और विश्व स्तर पर राज्य की प्रतिष्ठा कायम करने की रही है ....और इसका प्रभाव भी नजर आ ही रहा है ...

पिता के देहावसान के बाद कभी बिहार जाना नहीं हुआ मगर बिहार से लौटने वाले लोंग जब वहां की साफ़ चमकदार गड्ढों रहित सड़कों की बात करते हैं, तो एकबारगी यकीन नहीं होता ...वरना वहां हाई वे तक का बुरा हाल देखा है ...कई बार अपने कस्बे से पटना या मुजफ्फरपुर जाने में अनुमानित समय से कहीं अधिक समय लग जाने के कारण ट्रेन छूटते रह गयी ....याद आ रहा है ...एक बार कार से पटना से कस्बे तक के सफ़र को तय करते हुए धचके खाता छोटा भाई सारे रास्ते झुंझलाता रहा ....पिता, जिनका ज्यादा समय सफ़र में ही गुजरता था , चुटकी लेते हुए बोले..." अगर ऐसी जगह पर तुम्हे नौकरी करनी पड़ती , तो क्या हाल होता तुम्हारा "
" मैं तो नौकरी ही छोड़ देता " मेरे भाई का जवाब था ..." बेटा , मैंने भी यही सोचा होता तो तुम लोगों का क्या हाल होता " ...पिता मंद मंद मुस्कुराते हुए बोले ....खैर , रास्ते में आम और लीची के खेतों से गुजरते भाई का संताप कुछ कम हुआ ...
जब भी बिहार की सड़कों की बात होती है , मुझे ये सफ़र बहुत याद आता है ...अच्छा लगता है सुनकर कि बड़े शहरों से लेकर छोटे ग्रामीण इलाकों तक की सड़कों में काफी सुधार हुआ है ....कहा ही जाता है कि किसी भी देश/प्रदेश के विकास का रास्ता वहां की सड़कें तय करती हैं ...

बिजली व्यवस्था का हाल अभी भी इतना दुरुस्त नहीं है ....अधिसंख्य लोंग बिजली के लिए सरकारी व्यवस्था से ज्यादा जेनरेटर पर निर्भर करते हैं और उसकी भी अपनी सीमा होती है ....उम्मीद है सड़कों की तरह इसमें भी सुधार होगा ही ...

पंचायतों और शहरी निकायों जैसे आम जनता से सीधे जुड़े क्षेत्रों में महिलाओं के लिए पचास प्रतिशत सुरक्षित स्थान महिलाओं को प्रदेश के सरोकारों से सीधे सीधे जोड़ता है और माने या ना माने , इसका यथोचित शुभ प्रभाव नजर आता ही ... सुरक्षा और कानून व्यवस्था में सुधार के कारण डकैती, अपहरण जैसी आम घटनाएँ अब इतनी आम नहीं रही है ...अपनी फ्रेंड के पडोसी , पिता के जूनियर ऑफिसर , फॅमिली डॉक्टर के अपहरण की घटना तो आँखों देखी रही हैं ....और गोलियों और चीख पुकार की आवाज़ों के बीच दूर कहीं डकैती का अनुमान लगाते कालोनी के सभी परिवारों को इकठ्ठा भगवान् को याद करते हुए कुछ यादें भी ज़ेहन में रही हैं ...

जनता की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए नितीश की सरकार ने दिखा दिया है सरकारों की इच्छा शक्ति से प्रदेशों में मनचाहे बदलाव लाये जा सकते हैं ....वही बिहार की जनता ने भी साबित कर दिया है कि वे अब सिर्फ विकास की राजनीति में विश्वास करते हैं .... यही शुभेच्छा प्रत्येक प्रान्त की जनता और राजनैतिक दल की हो जाए , तो इस देश को अपने खोये गौरव को प्राप्त करने से कोई रोक नहीं सकता ....

(प्रदेश की खुशहाली की कहानी मेरी सुनी हुई ही है या फिर अख़बारों में पढ़ा , टी वी पर देखा हुआ ...मेरी जानकारी में कुछ कमी हो तो अल्पज्ञता समझ कर क्षमा कीजिये )


बिहार की जनता की जीत के नाम ... हमारे शहर में (जयपुर) के गलता तीर्थ पर बिहार के लोक पर्व छठ के कुछ चित्र .....देर से लगा रही हूँ , मगर समय दुरुस्त है ....