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बुधवार, 4 सितंबर 2013

बहुत कुछ दुनिया में यूँ ही होता है निःस्वार्थ !!

कल सुबह पेड़ पौधों को  निहारती फुर्ती से  कदम बढ़ाती एक महिला जाते -जाते मुड़ कर आई और गुड़हल के फूलों की और इशारा करते हुए बोली। 

क्या आप एक फूल दे दोगे मुझे !

हां . क्यों नहीं  !

उसे हाथ बढ़ाकर फूल तोड़ते देख मुझे एकदम से हंसी आ गयी क्योंकि उनसे फूल नहीं टूट पा रहा था।  

इससे पहले कभी फूल  तोड़ा नहीं !!

मेरी कही इस बात पर बड़ी सी मुस्कराहट के साथ बोली "कल टीचर्स डे है तो सोचा बेटी फूल ले जाए चौकलेट के साथ , आस पास कही मिला नहीं।   मैं पत्तों के साथ तोड़ना चाह रही थी और यह भी भय   की ज्यादा ना टूट जाए। "

 ओहो ! पराई बगिया में भी कोई इतनी एहतियात रखता है!?? मन ही मन खुश होते हुए मैंने कहा - लाओ मैं तोड़ देती हूँ।

अभी कुछ दिनों पहले ही जन्माष्टमी पर छोटे बच्चे डलिया लेकर घूम रहे बच्चों के  उचकते  नन्हे हाथ फूलों तक नहीं पहुंचे तब भी उन्हें फूल तोड़ कर दिए।  जब पौधा ही कोताही नहीं करता रोज  फूलों को खिलाने में तो हम क्यों करे। पुराने घर की  बगिया में ढेरों ग्राफ्टेड गुलाब चुन कर दिए छोटे बच्चों को उनके शिक्षक /शिक्षिकाओं के लिए।  

ऐसे बेगरज किये छोटे कार्य कई बार  छोटी ख़ुशी दे जाते हैं , कई  छोटी खुशियाँ मिलकर बड़ी खुशियाँ बन जाती हैं।  विश्वास बना रहता है कि दुनिया में बहुत कुछ बिना वजह भी होता है।  

बच्चों को भी अपार ख़ुशी मिलती है अपने शिक्षक /शिक्षिकाओं के लिए फूल और तोहफे जुटाने में. याद आया कि कल शिक्षक दिवस है , बच्चे स्कूल में थे तो याद रहता था ,  मैम को ऐसा कार्ड देना है , फूल कौन से ले जायेंगे ,  सांस्कृतिक कार्यक्रम में नृत्य गान आदि की तैयारियां अलग से ! बच्चों के अपनी ख़ास पसंद वाली मैम के लिए ख़ास उत्साह होना लाजिमी है।

अपने विषय में प्रवीणता  और सुव्यवहार से गुरु सहज ही अपने विद्यार्थियों के बीच लोकप्रिय हो जाते हैं। अपने कोमल और उदार स्वभाव  से कई बार शिक्षक  अभिभावकों से भी ज्यादा आदर सत्कार और स्नेह प्राप्त करते हैं। 

बच्चों में बचपन से ही गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा और सम्मान का भाव निरोपित करने  में अभिभावकों की भूमिका भी कम नहीं होती। शिक्षकों की  डांट फटकार अथवा सजा देने के कारण को समझकर बच्चों को समझाते अभिभावक बच्चों के मन में उनके प्रति सम्मान को सुरक्षित रखते /रख  सकते हैं।  बाकी प्रेम और  स्नेह  -व्यवहार को आत्मसात करने की शक्ति यूँ भी बच्चों में होती है।

बड़े होने पर भी हम अपने उन गुरुओं को नहीं बिसराते जिन्होंने हमें सुसंस्कार दिए। 

कई बार अनजाने ही श्रद्धा उपजती है उनके प्रति भी जो हमारे शिक्षक नहीं है  जिन्होंने हमें पढाया नहीं परंतु अपने व्यवहार और व्यक्तित्व से ही इतना  प्रेरित करते हैं कि सामने उपस्थित हो तो शायद मुंह से बोल भी न फूटें  लेकिन मन ही मन श्रद्धा से हाथ  जुड़ जाते हैं। 

बचपन की एक घटना याद आती है।  छोटे कसबे में घर के पास ही दो स्कूल और  कॉलेज होने के कारण हमारे आस- पास के घरों में किराये पर रहने वाले शिक्षकों और विद्यार्थियों की भी संख्या काफी तादाद में थी। पास में ही जातियों के आधार पर बंटे हुए छात्रावास भी जिनके आपसी मनमुटाव के कारण आये दिन लड़ाई- झगड़ों के समाचार मिलते ही रहते थे। 

एक दिन बुखार के कारण स्कूल नहीं जाना हुआ।  सड़क से लगती जालीदार खिडकियों के सहारे पलंग पर लेटे यूँ ही आँख लगी थी कि जोरदार शोर शराबे के बीच बाहर झांकर देखा तो कोई दस पंद्रह लड़के " पकड़ो पकड़ो"  का शोर करते किसी एक लड़के का पीछा करते हमारे घर के में गेट के पास आ ठहरे थे ।  उनके हाथों में  हॉकी स्टिक , लाठियां भी थी। भय और घबराहट से नानी को पुकारते मैं तीन सीढियाँ एक साथ लांघ गई। लड़कों की भीड़ पड़ोस के प्रोफ़ेसर साहब के घर के बाहर रुकी थी क्योंकि जिस लड़के का पीछा करते हुए वे आये थे  वह उन प्रोफ़ेसर के घर में छिप गया था। ये सभी छात्र एक ही कॉलेज से थे , और प्रोफ़ेसर उनके शिक्षक। 
छात्र  बाहर खड़े अनुरोध करते रहे - सर ,आप एकबार इस लड़के को बाहर निकाल दें , हम चले जायेंगे।  
प्रोफ़ेसर साहब अड़े हुए थे  कि मैं अपने  सामने किसी लड़के से मारपीट नहीं होने दूंगा . तुम चले जाओ।  
थक हार कर लड़के वापस लौट गए।  
क्रोधित युवा भीड़ का अपने प्रोफ़ेसर के सामने नतमस्तक होते देखने का  यह अनुभव मुझे हमेशा याद रहता है।

उस प्रोफ़ेसर का उस छात्र  से कोई सम्बन्ध नहीं था , मगर उन्होंने उसकी सहायता की , यूँ ही निःस्वार्थ  … 
आये दिन जब शिक्षकों और  विद्यार्थियों की झड़प के बारे में सुनती हूँ तो  उक्त घटना और बेतरह याद आती है।  
आध्यात्मिक गुरुओं / शिक्षकों द्वारा चेले , विद्यार्थियों के शोषण की ख़बरों के बीच क्या आज भी हम भी हम गुरु पर इतना भरोसा कर सकते हैं !! ना ही आजकल विद्यार्थियों में इतनी सहिष्णुता बची है। 

कौन दोषी है . कौन पाक साफ़ . इस समय में पहचान मुश्किल होती जाती है क्योंकि षड्यंत्रकारी दोनों ही ओर है ! 
और शायद इसलिए ही आम जन के बीच यह यकीन भी उठता जाता है कि कई बार सहायता , स्नेह , प्रेम यूँ ही / यूँ भी होता है निःस्वार्थ  !!




शिक्षक दिवस की बहुत शुभकामनायें !!

रविवार, 4 सितंबर 2011

प्रथम गुरु को प्रणाम !

किसी भी मनुष्य की पहली पाठशाला उसका घर है . परिवार के विभिन्न सदस्यों के आपसी व्यवहार का असर उसके पूरे जीवन पर होता है . लेकिन जब थोडा बड़ा होने पर घर से बाहर की दुनिया में जहाँ वह प्रवेश लेता है ,जहाँ व्यक्तित्व निर्माण की महत्वपूर्ण प्रक्रिया प्रारंभ होती है , वह है उसका विद्यालय ... जो सबक विद्यालय और घर में सीखे जाते हैं , व्यस्क होने पर बाहरी दुनिया में पैर रखने पर वही आजीवन काम आते हैं ...वास्तव में सीखने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती , हम जीवन भर कुछ न कुछ सीख लेते रहते हैं और दिन प्रतिदिन परिपक्व होते हैं , लेकिन हमारे सबसे पहले गुरु को हम कभी नहीं भूला सकते हैं , यदि उन्होंने हमारे जीवन को सही दिशा दी हो .

आज शिक्षक दिवस पर मैं भी अपने प्रथम गुरु श्री राजकुमार भाटिया जी को याद कर रही हूँ . गुरु या शिक्षक शब्द सुनते ही सबसे पहले मुझे उनका ही स्मरण होता है . श्री राजकुमार भाटिया सर का जन्म लाहौर में 7 जुलाई 1935 को हुआ था .वे निहायत सादी वेश भूषा में उच्चतम संस्कारों की प्रतिमूर्ति थे. हिंदी , अंग्रेजी और संस्कृत साहित्य के प्रकांड विद्वान श्री भाटिया सर अपनी उच्च शिक्षा की बदौलत किसी बड़े शहर या महानगर में रहने और अपनी प्रतिभा का दोहन कर बहुत नाम और यश हासिल कर सकते थे , मगर उन्होंने बिहार के बहुत ही छोटे से गाँव को अपनी कर्मभूमि बनाया और अपनी छोटी बहन सरोज भाटिया के साथ अपने छोटे से विद्यालय से बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया .

वे अद्भुत स्मरण शक्ति के धनी थे. मुझे आज भी याद है कि जब वे कक्षा में पढ़ाने आते तो उनके स्वयं के हाथ में किताब कम ही होती थी . बिना किताब आँखे बंद कर वे हमें बताते कि अमुक किताब का अमुक चैप्टर अमुक पेज पर है , और उसके इस पैराग्राफ की पंक्तियाँ इस प्रकार हैं .

उनकी सिखाई ही प्रार्थना की कुछ पंक्तियाँ ही याद है अब , मगर हमारे जीवन जीने का मूल मंत्र आज भी वही हैं ...
" जी रहे जहान में तो खान- पान चाहिए ,
नित्य निवास के लिए हमें मकान चाहिए
चाहिए हज़ार सुख मगर ना दान चाहिए "

आजीवन अविवाहित सर को जब हम बच्चों के जन्मदिन पर निमंत्रित किया जाता तो वे सहर्ष उपस्थित होते थे . सर के माता -पिता पूरे कस्बे में चाचाजी और चाचीजी के नाम से ही जाने जाते थे . हर विद्यार्थी की घरेलू समस्या उनकी अपनी होती थी . कोई बच्चा कुछ दिन विद्यालय नहीं आ पाया हो तो उसका हालचाल पूछने उसके घर पहुँच जाते थे और यथासंभव उसकी मदद भी करते थे . आज उनके पढाये हुए छात्रा /छात्राएं देश -विदेश में विभिन्न कम्पनियों में उच्चतम पदों पर कार्यरत हैं .

जीवन भर किसी के सामने सर नहीं झुकाने वाले आर्यसमाजी श्री भाटिया सर को अंतिम समय में काल के वशीभूत हो अपनी बीमारी से परास्त होना पड़ा और एक सप्ताह पहले 31 अगस्त को उनका देहावसान हो गया .
शांति निकेतन , पंडित जवाहर लाल नेहरु , जानकी वल्लभ शास्त्री , रामधारी सिंह दिनकर ,आदि के साथ बिताये अविस्मर्णीय पलों को लिपिबद्ध कर पुस्तक का रूप देने की इच्छा अधूरी ही रह गयी !
वे जहाँ भी हो , उनके विद्यार्थियों की स्मृतियों में हमेशा जिन्दा रहेंगे ..

" गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुर्साक्षात्‌ परमब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवैनमः॥"

सभी शिक्षकों को शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !